By पं. सुव्रत शर्मा
नंदी की कथा में जन्म से धर्मरक्षण तक, वृषभ राशि का आध्यात्मिक संदेश

शाश्वत ब्रह्मांड जब लय-गति में था, भयानक तप और निर्भीक ध्यान से ऋषियों ने जगत की नींव का निर्माण किया। उन्हीं ऋषियों में शिलाद अपनी महान तपस्या के लिए प्रसिद्ध हुए। उनका तन ऊर्जा का पुंज और मन केवल एक इच्छा में केंद्रित , कि परमेश्वर शिव उनकी तप से प्रसन्न हों और ऐसा पुत्र दें जो जन्म-मरण के चक्र से परे, दिव्यता का जीवंत स्वरूप हो।
शिलाद की तपस्या तीक्ष्ण थी; अग्नि की तप में एकनिष्ठता, जल की शीतलता में अनंत धैर्य और वायु की गति में अतल लगन थी। वर्षों के संकल्प, व्रत और ध्यान ने पूरे सृष्टि का ध्यान खींचा। अंततः शिव प्रकट हुए, स्वयं वरदान का स्वरूप लेकर। शिलाद की आत्मा से शिव ने एक ज्योतिस्वरूप बालक को प्रकट किया , नंदी। यह दिव्य संतान नश्वर गर्भ या रक्त-मांस से नहीं, तप और भगवान की इच्छा से बनी।
नंदी का जन्म दिव्यता की पुष्टि है , मनुष्य के जीवन में जीवात्मा के सत्य, शुद्धता और भक्ति की शक्ति। नंदी की बाल्यावस्था में ही उसकी अदम्य तेजस्विता, गहन कोमलता और अटल पुनीतता परिलक्षित होती है। शिलाद ने अपने पुत्र का पालन पूर्ण वैदिक नियमों से, निःस्वार्थ प्रेम, अनुशासन और तपस्या की शिक्षा के साथ किया।
वेदों, पुराणों और ज्योतिषीय शास्त्रों में वृषभ की उपमा सदैव शक्ति, स्थिरता और वफादारी के लिए की गई है। नंदी, शिव के साथ एकात्म होकर, वृषभ राशि के गूढ़ और गहन रहस्यों का प्रकटीकरण करते हैं।
वृषभ राशि का स्वभाव , पृथ्वी तत्व की दृढ़ता, जीवन में सुख-सुविधा, अदम्य सहिष्णुता और सच्चे प्रेम का गूढ़ संदेश , नंदी की भंगिमा में विस्तृत रूप से प्रतिविम्बित होता है। एक शिव मंदिर में प्रवेश करते ही भक्त की दृष्टि नंदी पर जा टिकती है। मंदिर के द्वार पर बैठे नंदी शिवलिंग की ओर निरंतर निहारते हुए, समूचे वातावरण को एकाग्रता तथा सम्मान से भर देते हैं। उनका मुख उच्चतम ध्येय की ओर, उनके नेत्रों में सतत साधना की चमकियाँ , यह भक्त को आंतरिक यात्रा की प्रेरणा देता है।
नंदी के प्रतीकात्मक संबंधों में, वृषभ राशि के जातकों को अपने जीवन में धैर्य, संयम और निष्ठा के गुणों को अपनाना चाहिए। यहां बल हिंसा में नहीं, वरन् सहनशीलता और धैर्य में है। नंदी वृषभ की आत्मा के सबसे पवित्र गुणों का अद्भुत समन्वय हैं। जीवन की कठिनाइयां, परीक्षाएं और परिवर्तन , इन सभी में नंदी का नम्र, लेकिन अटल दृष्टिकोण मार्गदर्शन करता है।
नंदी के चार चरण हिंदू दर्शन के चार मौलिक सिद्धांतों का प्रमाण हैं , सत्य (अंतर्दृष्टि और विचारों का पवित्रता), धर्म (उचित कर्म और निर्णायक कार्य), शांति (मन एवं आत्मा की निर्मलता) और प्रेम (ईश्वरीय भावना)।
प्राचीन ग्रंथों में इन चारों को जीवन के चार मुख्य सोपान बताया गया है , प्राची, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर के द्वार के रूप में; हर दिशा में नंदी का कोई न कोई अर्थ है।
उनका स्थिर मुख ईश्वर के प्रति समर्पण और साधक की साधना का प्रतीक है। बाल नंदी की आंखों में संसार की कोई आकांक्षा नहीं , केवल शिव का ध्यान। यह निर्वैर भाव प्रगति के शिखर तक पहुंचने का मूल मंत्र है।
नंदी के कान शिव के समीपता का संकेत हैं , उनके माध्यम से भक्त अपनी प्रार्थना को सीधे शिव तक पहुंचाने का विश्वास करता है। उनके श्वेत रंग की त्वचा पवित्रता और निष्कलंक जीवन को दर्शाती है।
हम नंदी के बल, आकार और मुद्रा से अनेक आध्यात्मिक गुण ग्रहण कर सकते हैं:
नंदी केवल शिव के द्वारपाल नहीं बल्कि गुरु, नंदिकेश्वर के रूप में भी विख्यात हैं। वे शिव के गणों में सर्वोच्च स्थान पाते हैं , उनकी वाणी से गूढ़ योग, भक्ति और साधना की शिक्षा निकलती है।
कथा है कि शिव के गणों के बीच नंदी सबसे अनुशासित, परिश्रमी और न्यायप्रिय हैं। उनकी सेवा-भावना और दया की भावना से अन्य गण प्रेरित होते हैं।
मंदिरों में एक परंपरा प्रतिष्ठित है कि भक्त अपनी मनोकामना नंदी के कान में कहते हैं , इस विश्वास से कि नंदी उनकी प्रार्थना को शीघ्र शिव तक पहुंचाते हैं। यह रिवाज भक्त और भगवान के बीच सेतु बना देता है, जहां नंदी दूत की भूमिका निर्वहन करते हैं।
योगिक पद्धतियों में नंदी के ध्यान को अचल मन, ध्यानिक दृष्टि और अटल भक्ति के अभ्यास में सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
बच्चों, युवाओं और वृद्धों , सभी के लिए नंदी के गुणों का अनुकरण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सकारात्मक परिणाम देता है। उनके रूप को ध्यान में रखकर व्यक्ति अपने जीवन को अनुशासन, सत्प्रवृत्ति और साधना की ओर ढाल सकता है।
शास्त्रों में वर्णन है कि नंदी की प्रतिमा के सान्निध्य में नियमित रूप से ध्यान, जप और भक्ति की साधना करनी चाहिए। नंदी का पूजन विशेष रूप से सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि को शुभ माना जाता है।
प्रात:काल मंदिर के द्वार पर नंदी की आरती, पुष्प-प्रसाद अर्पण और उनके कान में धीरे-धीरे अपनी मनोकामना कहने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
पौराणिक कथाओं में अनेक प्रसंग मिलते हैं, पर रावण के साथ नंदी की कथा धर्मरक्षा की शक्ति को दर्शाती है। कैलास पर तपस्वी नंदी शिव के द्वार पर सतर्क रहते हैं। रावण जब गुरुर से मदांध होकर कैलास पहुँचता है और नंदी के साथ असम्मान करता है तब भक्ति और धर्म का अपमान होता है।
नंदी, तप और धर्म की शक्ति से संतुष्ट, रावण को शाप देते हैं , 'तेरा राज्य एक वानर द्वारा अग्नि में भस्म हो जाएगा!' यह संकेत था हनुमान की शक्ति का, जो आगे चलकर लंका को जलाकर धर्म की स्थापना करते हैं।
यह प्रसंग भक्तों को महान सन्देश देता है , विनम्रता में भी अपूर्व शक्ति होती है। जब धर्म की रक्षा के लिए खड़ा होना हो, तो नंदी का नम्र स्वरूप भी महापराक्रमी हो जाता है।
पारंपरिक कथाओं में तपस्या, श्रद्धा और कर्म से अर्जित शक्ति का उपयोग न्याय के लिए किया जाता है। नंदी का श्राप संसार को यह सिखाता है कि धर्म और सच्चाई के सामर्थ्य को कोई नकार नहीं सकता। जब परम भक्त धर्म का पक्ष लेते हैं, संसार बदल जाता है।
मंदिर में प्रवेश का अर्थ केवल भौतिक सीमा पार करना नहीं है बल्कि आत्मा को साधना की ओर ले जाना है। नंदी का स्थान गर्भगृह की ओर होता है ताकि भक्त की दृष्टि शिवलिंग पर ही केंद्रित रहे।
योगशास्त्र में इसे 'दृढ़ता' और 'पूर्ण समर्पण' का अभ्यास कहा गया है , जहाँ मन, बुद्धि, चित्त और आत्मा शिव की ओर स्थिर हो जाते हैं।
नंदी के माध्यम से शिव का दर्शन करना अभिप्राय है , जीवन में भी मनुष्य को भटकना नहीं चाहिए, वरन् पूरी साधना, श्रद्धा और प्रेम से ईश्वर की ओर उन्मुख रहना चाहिए।
वृषभ राशि वालों के लिए यह संदेश और पूजन विशेष फलदायी है , उनमें स्थिरता, अंतर्मुखी दृष्टि और सेवा का गहन संस्कार निहित है।
आधुनिक जीवन की अशांति, तनाव और प्रतिस्पर्धा में नंदी की शिक्षाएँ अत्यंत प्रासंगिक हैं। उनकी दृढ़ता, धैर्य और समर्पण का अनुसरण कर व्यक्ति जीवन की बाधाओं को सहज रूप से पार कर सकता है।
कार्यस्थल, परिवार और समाज में नंदी के गुणों का पालन आज भी सफलता की कुंजी है। उनकी भक्ति, सेवा और प्रेम का मार्ग सच्चे संकल्प की ओर ले जाने वाली शक्ति है।
मूलतः, नंदी केवल पौराणिक पात्र नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता में स्थिरता, विनम्रता और तपस्या का प्रकाश हैं। वे हर शिव मंदिर के द्वार पर साधकों को स्मरण दिलाते रहते हैं कि शिवकृपा की यात्रा भक्ति से प्रारंभ, अनुशासन द्वारा पल्लवित और अनंत आनंद में पूर्ण होती है।
नंदी स्थिरता को पूजा, शक्ति को विनम्रता और निष्ठा को आत्मिक सजगता का रूप दे देते हैं। शिव के द्वार पर मौन प्रहरी बने वे सफर के प्रत्येक पड़ाव पर दैवी ऊर्जा देते हैं।
उनका ध्यान करना आत्मा को सर्वोच्च लक्ष्य पर केंद्रित करने की परम कला है , जहाँ 'नंदि' का अर्थ है आनंद, जो अंततः ईश्वर-मिलन की अवस्था है।
प्र1: नंदी की उत्पत्ति किन परिस्थितियों में हुई?
नंदी का प्राकट्य शिलाद ऋषि की दीर्घकालीन तपस्या, पूर्ण वैदिक संकल्प और महादेव की कृपा से हुआ; वे अमर और दिव्य पुत्र के स्वरूप में अवतरित हुए।
प्र2: नंदी वृषभ राशि के लिए क्यों अत्यंत महत्वपूर्ण हैं?
नंदी वृषभ की स्थिरता, समर्पण और शांत स्वभाव के जीवंत प्रतीक हैं; उनके गुण वृषभ जातक को आध्यात्मिक लक्ष्य तक पहुँचने की शिक्षा देते हैं।
प्र3: नंदी के चार चरण क्या दर्शाते हैं?
सत्य, धर्म, शांति और प्रेम , यह चार मुख्य स्तंभ हैं, जिनके बिना मुक्ति और आत्मसिद्धि संभव नहीं है; इनसे जीवन पवित्र, संतुलित और उद्देश्यमय बनता है।
प्र4: भक्त नंदी के कान में जाकर प्रार्थना क्यों करते हैं?
परंपरा है कि नंदी शिव के परमप्रिय होने के कारण भक्त की प्रार्थना सर्वप्रथम भगवान तक पहुँचाते हैं, जिससे शीघ्र फल प्राप्त होता है।
प्र5: रावण को नंदी ने क्या श्राप दिया था और उसका क्या प्रभाव हुआ?
नंदी ने रावण को श्राप दिया था कि “एक वानर तेरे राज्य को अग्नि से भस्म कर देगा,” जो आगे चलकर रामायण में हनुमान द्वारा पूर्ण हुआ, धर्म की स्थापना हुई।
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मेरी चंद्र राशि
अनुभव: 27
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