By पं. अभिषेक शर्मा
12 ज्योतिर्लिंग, ग्रहों और राशियों के साथ आध्यात्मिक व ज्योतिषीय संबंध

ज्योतिर्लिंग केवल तीर्थ नहीं बल्कि भगवान शिव के उस दिव्य स्वरूप के प्रतीक माने जाते हैं जहां वे ज्योति अर्थात प्रकाश और लिंग अर्थात निराकार चेतना के मिलन रूप में अनुभव किए जाते हैं। वैदिक परम्परा में वर्णित बारह ज्योतिर्लिंग न केवल भक्ति के केन्द्र हैं बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि से भी अत्यन्त महत्वपूर्ण माने गए हैं। आधुनिक व्याख्याओं में यह समझ उभर कर आती है कि कई ज्योतिर्लिंग स्थलों का स्थान प्राकृतिक ऊर्जा, भूचुम्बकीय क्षेत्र और आकाशीय गणना के अनुरूप अत्यंत संवेदनशील माना जा सकता है, जिससे साधना और ध्यान का अनुभव गहरा हो जाता है।
ज्योतिषीय परिप्रेक्ष्य में कहा जाता है कि प्रत्येक ज्योतिर्लिंग किसी न किसी ग्रह की ऊर्जा, किसी राशिचक्र बिन्दु या आध्यात्मिक विषय से जुड़ा भाव दर्शाता है। इस प्रकार भक्ति, तीर्थ और ज्योतिष तीनों धाराएं मिलकर साधक के जीवन में एक समग्र उपचार, संरक्षण और मार्गदर्शन का आधार बनती हैं।
परम्परा में ज्योतिर्लिंगों को शिव के उन धामों के रूप में समझा गया है जहां उनका तेज स्तम्भाकार प्रकाश रूप में प्रकट हुआ।
आधुनिक ज्योतिषीय दृष्टिकोण इन धामों को इस प्रकार देखता है।
इन सब के बीच मूल भाव यही रखा जाता है कि ज्योतिर्लिंगों की यात्रा बाहरी मार्ग से अधिक भीतर की शुद्धि, समर्पण और जागरण का मार्ग है।
ज्योतिर्लिंग की कथा शिव पुराण में अत्यन्त अर्थपूर्ण रूप में वर्णित है।
कथा के अनुसार एक समय ब्रह्मा और विष्णु के बीच यह विवाद उठ खड़ा हुआ कि सृष्टि में श्रेष्ठ कौन है। उस विवाद को शांत करने के लिए शिव ने स्वयं को अनन्त, ऊपर नीचे फैलते हुए एक अग्निस्तम्भ या प्रकाशस्तम्भ के रूप में प्रकट किया।
शिव की दृष्टि में यह असत्य सहन नहीं हुआ।
यह कथा साधक को यह सिखाती है कि ज्योतिर्लिंग केवल स्थान नहीं, सत्यनिष्ठा, विनम्रता और अहंकार त्याग की साधना भी हैं।
ज्योतिषीय और आध्यात्मिक दृष्टि से कुछ ज्योतिर्लिंग ऐसे भी माने जाते हैं जहां शिव के साथ साथ देवी पार्वती की शक्ति अत्यन्त सघन रूप में विद्यमान है।
परम्परागत वर्णनों के अनुसार चार प्रमुख स्थलों पर ज्योतिर्लिंग और शक्ति पीठ के भाव को एक साथ देखा जाता है।
ऐसे धाम साधक को यह अनुभव कराते हैं कि शिव का तेज और शक्ति की करुणा एक दूसरे से अलग नहीं बल्कि एक ही चेतना के दो पूरक पक्ष हैं।
अब बारह ज्योतिर्लिंगों के साथ उनकी कथाएं और उनसे जुड़े राशिचक्र रूपक को क्रम से समझा जा सकता है।
रामेश्वरम् का ज्योतिर्लिंग रामनाथस्वामी स्वरूप में पूजित है। कथा के अनुसार लंका विजय के बाद श्रीराम को यह भाव हुआ कि रावण भले ही प्रतिपक्षी रहा परन्तु वह ब्राह्मण कुल से था, अतः उसके वध के प्रायश्चित्त की आवश्यकता है।
ज्योतिषीय रूपक में रामेश्वरम् को मेष राशि से जोड़ा गया है, जिसे सूर्य के उच्च स्थान का भाव माना जाता है। यहां पूजन को व्यक्ति के कर्मजनित दोषों की शान्ति और पाप क्षय में सहायक माना जाता है।
सोमनाथ का सम्बन्ध चन्द्रदेव की कथा से गहराई से जुड़ा है। चन्द्र ने दक्ष प्रजापति की अनेक कन्याओं से विवाह किया परन्तु उनका स्नेह अधिकतर रोहिणी के प्रति रहा।
वृषभ राशि चन्द्र के उच्च भाव की मानी जाती है। सोमनाथ में पूजा को स्वास्थ्य, जीवन शक्ति और रोग शमन के लिए कल्याणकारी समझा गया है।
नागेश्वर का क्षेत्र दारूकावन के नाम से जाना जाता है। यहाँ की कथा में दारुका नामक राक्षसी और अत्याचारों से पीड़ित भक्तों का वर्णन आता है।
नागेश्वर धाम को मिथुन राशि और राहु की ऊर्जाओं के प्रतीक रूपक में जोड़ा जाता है। यहां की आराधना को भीतर की विष वृत्तियों, जैसे क्रोध, लालच और नकारात्मक आसक्ति से मुक्ति का माध्यम माना जा सकता है।
कर्क राशि को परम्परा में चन्द्र और आधुनिक व्याख्याओं में गुरु के उच्च स्थान से जोड़कर देखा जाता है। ओंकारेश्वर की कथा में इक्ष्वाकु वंश के राजा मन्धाता के पुत्रों की तपस्या का उल्लेख मिलता है।
कर्क राशि के भाव में ओंकारेश्वर स्वज्ञान, आत्मबोध और हृदय की करुणा से जुड़ा रूपक माना जाता है। यहां की साधना मन को स्थिर और संवेदनशील बनाने में सहायक समझी जाती है।
बैद्यनाथ धाम की प्रसिद्ध कथा रावण के तप और शिव की कृपा से जुड़ी है।
सिंह राशि को सूर्य के मooltrikona स्वभाव से जोड़कर देखा जाता है। यहां शिव के वैद्य अर्थात रोगहारी रूप की भावना से सन्तान, बुद्धि, मन्त्र सिद्धि और मन जैसे विषयों के संतुलन का संकेत लिया जाता है।
मल्लिकार्जुन की कथा शिव परिवार के भीतर प्रेम, समझ और पारिवारिक सम्बन्धों के सूक्ष्म भाव को सामने लाती है।
कन्या राशि को बुद्धि, व्यवहारिकता और सूक्ष्म विवेक का भाव माना जाता है। मल्लिकार्जुन धाम को धन, यश और योग्य परिश्रम के फल से भी जोड़ा जाता है।
महाकालेश्वर की कथा उज्जैन के राजा चन्द्रसेन, बालक श्रीखर और वृद्धि नामक ब्राह्मण की भक्ति के इर्दगिर्द घूमती है।
महाकालेश्वर को दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग और तुला राशि में शनि के उच्च भाव का संकेत माना जाता है। यहां पूजा को आयु, स्वास्थ्य और दीर्घकालिक सुरक्षा का प्रतीक रूपक समझा जाता है।
घृष्णेश्वर या घुश्मेश्वर की कथा घुशमा नामक भक्त नारी से जुड़ी है।
वृश्चिक राशि को केतु और मंगल की गहन, रहस्यमय और रूपान्तरणकारी ऊर्जा से जोड़ा जाता है। यहां की पूजा कार्य क्षेत्र में अनिश्चितताएं कम करने और मन की गहराइयों में छिपे भय से मुक्ति का संकेत देती है।
काशी विश्वनाथ की कथा शिव के प्रकाश स्तम्भ रूप से सीधा सम्बन्ध रखती है। ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता के विवाद के प्रसंग में जो अग्निस्तम्भ प्रकट हुआ, काशी को उसी प्रथम ज्योतिर्लिंग के प्रकट होने का क्षेत्र माना जाता है।
धनु राशि को मोक्षकारक केतु के भाव से भी जोड़ा जाता है। काशी विश्वनाथ में पूजा को ज्ञान, वैराग्य और पापशमन से जुड़ा माना जाता है और यहाँ किये गए सद्कर्मों को अत्यंत फलदायी माना जाता है।
भीमाशंकर की कथा असुर भीम से संबंधित है जो रावण के भाई कुंभकर्ण का पुत्र माना जाता है।
मकर राशि में मंगल के उच्च स्थान का रूपक यहाँ जोड़ा जाता है। भीमाशंकर के पूजन को शत्रु भय, बाधा और विपरीत परिस्थितियों से रक्षा के भाव से जोड़ा जा सकता है।
केदारनाथ से जुड़ी कथा पाण्डवों और उनके प्रायश्चित्त की है।
केदारनाथ को त्रिकोणाकार शिवलिंग रूप में विशेष माना जाता है। कुम्भ राशि में राहु के उच्च भाव का रूपक यहाँ गहन दर्शन, वैराग्य और आध्यात्मिक बल की वृद्धि के संकेत से जोड़ा जाता है।
त्र्यंबकेश्वर की कथा ऋषि गौतम और उनकी पत्नी अहिल्या से संबंधित है।
त्र्यंबकेश्वर में तीन लिंग स्थापित हैं जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और शिव के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। मीन राशि में शुक्र के उच्च भाव का रूपक यहाँ पुनर्जन्म सदृश अवसर, पाप धुलाई और कोमल हृदय वाली भक्ति के रूप से जुड़ा माना जाता है।
बारह ज्योतिर्लिंग और बारह राशियों के बीच का यह रूपक संबंध यह सिखाता है कि जीवन के हर भाव, हर मनोदशा और हर कर्म क्षेत्र के लिए शिव के किसी न किसी धाम में मार्गदर्शन, उपचार और संतुलन का संकेत छिपा है। यहां कहीं पापक्षय और प्रायश्चित्त का संदेश है, कहीं रोग मुक्ति और स्वास्थ्य की आशा, कहीं धन, यश और कर्तव्य संतुलन का पाठ, तो कहीं मोक्ष, वैराग्य और आत्मबोध की प्रेरणा। भक्ति और ज्योतिष जब एक साथ चलें तो साधक ग्रहों के भय से नहीं बल्कि ग्रह ऊर्जा के साथ सामंजस्य स्थापित कर, शिव के प्रकाश के निकट आने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
सामान्य प्रश्न
ज्योतिर्लिंग और राशियों का संबंध शास्त्रीय है या प्रतीकात्मक समझ है?
ज्योतिर्लिंग और राशियों का यह संबंध मुख्यतः एक प्रतीकात्मक और व्याख्यात्मक दृष्टि है जो भक्ति और ज्योतिष को जोड़कर देखती है। मूल शास्त्र ज्योतिर्लिंगों को शिव के तेज के धाम के रूप में वर्णित करते हैं, बाद की परम्पराओं ने इन धामों को राशियों और ग्रहों से जोड़कर साधक को आत्मचिन्तन के नए आयाम दिए हैं।
क्या किसी विशेष ज्योतिर्लिंग पर पूजा से संबंधित ग्रह दोष अवश्य दूर हो जाते हैं?
पूजा, जप और आस्था निश्चित रूप से मन को स्थिर और सकारात्मक बनाते हैं। ग्रह दोषों के शमन की बात को आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से समझना उचित है। जब साधक अपने कर्म, विचार और जीवन शैली को धर्मसंगत बनाता है तब ज्योतिर्लिंगों की आराधना उसे भीतर से मजबूत आधार देती है।
क्या चार शक्ति पीठों से जुड़े ज्योतिर्लिंगों का प्रभाव अलग माना जा सकता है?
जहां शिव और शक्ति दोनों के भाव गहराई से जुड़े हैं, वहां भक्ति में संतुलन, करुणा और दृढ़ता के तत्व अधिक प्रबल अनुभव किए जाते हैं। ऐसे धाम साधक को केवल त्याग या केवल वीर्य नहीं बल्कि करुणा और प्रेम से भरे हुए साहस की शिक्षा देते हैं।
क्या अपनी राशि के अनुरूप किसी एक ज्योतिर्लिंग को विशेष मानकर उसी की पूजा करनी चाहिए?
भक्ति का मार्ग केवल राशि पर आधारित नहीं होता। कोई व्यक्ति अपनी जन्म राशि से जुड़ा धाम विशेष रूप से प्रिय मान सकता है, फिर भी सभी ज्योतिर्लिंग शिव के समान तेज स्वरूप माने गए हैं। जो स्थान हृदय को अधिक निकट लगे, वहाँ की भक्ति भी उतनी ही सार्थक है।
ज्योतिर्लिंगों की यात्रा और ज्योतिषीय उपायों में क्या अंतर है?
ज्योतिषीय उपाय अक्सर विशेष ग्रह स्थिति के अनुसार अल्पकालिक संतुलन के लिए सुझाए जाते हैं। ज्योतिर्लिंगों की यात्रा और पूजा को दीर्घकालिक आध्यात्मिक साधना के रूप में देखा जाता है, जहां उद्देश्य केवल फल प्राप्ति नहीं बल्कि स्वभाव, दृष्टिकोण और जीवन दिशा का शुद्धिकरण होता है।
चंद्र राशि मेरे बारे में क्या बताती है?
मेरी चंद्र राशि
अनुभव: 19
इनसे पूछें: विवाह, संबंध, करियर
इनके क्लाइंट: छ.ग., म.प्र., दि., ओडि, उ.प्र.
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