By अपर्णा पाटनी
भारत के प्रमुख 12 ज्योतिर्लिंग स्थल और उनका आध्यात्मिक महत्व

“ज्योतिर्लिंग” शब्द दो संस्कृत पदों ज्योति और लिंग से मिलकर बना है। ज्योति का अर्थ है प्रकाश, तेज और आंतरिक दिव्यता। लिंग शिव के उस निराकार प्रतीक को कहते हैं जो सृष्टि, पालन और संहार के रहस्यमय संतुलन को दर्शाता है। इस प्रकार ज्योतिर्लिंग वह स्थान है जहां भगवान शिव प्रकाश स्वरूप में, स्वयंभू दिव्य तेज के रूप में प्रतिष्ठित माने जाते हैं।
भारत में बारह प्रमुख ज्योतिर्लिंगों का वर्णन मिलता है जिन्हें शिव के अत्यंत पवित्र धाम माना गया है। इन बारह ज्योतिर्लिंगों की यात्रा को केवल तीर्थयात्रा नहीं बल्कि आत्मशुद्धि, पापक्षय और अन्ततः मोक्ष की साधना समझा जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इन सभि शिव धामों में शरण लेकर मनुष्य अपने कर्म बन्धनों को हल्का कर सकता है और ईश्वर के और निकट जा सकता है।
बारहों ज्योतिर्लिंग भारत के भिन्न भिन्न भूभागों में स्थित हैं।
उत्तर के हिमालय से लेकर दक्षिण के समुद्रतटों तक, पश्चिम के सौराष्ट्र से पूर्व के झारखण्ड तक इन शिव धामों की कड़ी एक अखण्ड आध्यात्मिक वृत्त बनाती है।
ज्योतिर्लिंगों के संदर्भ में भक्तों के कुछ प्रमुख विश्वास इस प्रकार देखे जा सकते हैं।
यात्रा केवल बाहरी नहीं होती, ज्योतिर्लिंगों का मार्ग भीतर के अन्धकार से प्रकाश की ओर लौटने की यात्रा भी याद दिलाता है।
नीचे दी गयी सारणी में बारह ज्योतिर्लिंगों के स्थान, दिशा और सामान्यत: प्रचलित दर्शन समय को संक्षेप में रखा जा रहा है, ताकि धारणात्मक समझ स्पष्ट हो सके।
| ज्योतिर्लिंग | स्थान / नगर | राज्य | मुख की दिशा | प्रातः खुलने का समय | रात्रि बंद होने का समय |
|---|---|---|---|---|---|
| सोमनाथ | प्रभास पाटन | गुजरात | पूर्व | 6:00 सुबह | 9:00 रात |
| मल्लिकार्जुन | श्रीशैल | आंध्र प्रदेश | पूर्व | 4:30 सुबह | 10:00 रात |
| महाकालेश्वर | उज्जैन | मध्य प्रदेश | दक्षिण मुखी | 4:00 सुबह | 11:00 रात |
| ओंकारेश्वर | मण्डहाता द्वीप | मध्य प्रदेश | पूर्व | 5:00 सुबह | 9:30 रात |
| केदारनाथ | केदारनाथ | उत्तराखण्ड | पश्चिम | 4:00 सुबह (खुले काल में) | 9:00 रात (खुले काल में) |
| भीमाशंकर | भीमाशंकर क्षेत्र | महाराष्ट्र | पूर्व | 5:00 सुबह | 9:30 रात |
| काशी विश्वनाथ | वाराणसी | उत्तर प्रदेश | पूर्व | 3:00 सुबह | 11:00 रात |
| त्र्यंबकेश्वर | त्र्यंबकेश्वर | महाराष्ट्र | पूर्व | 5:30 सुबह | 9:00 रात |
| वैद्यनाथ | देवघर | झारखण्ड | पूर्व | 4:00 सुबह | 9:00 रात |
| नागेश्वर | द्वारका निकट | गुजरात | पश्चिम | 6:00 सुबह | 9:00 रात |
| रामेश्वर | रामेश्वरम् | तमिलनाडु | पूर्व | 5:00 सुबह | 9:00 रात |
| घृष्णेश्वर | एल्लोरा निकट | महाराष्ट्र | पूर्व | 5:30 सुबह | 9:30 रात |
कुछ धामों जैसे केदारनाथ के दर्शन केवल सीमित महीनों के लिए संभव हैं, जबकि अधिकतर ज्योतिर्लिंग वर्ष भर भक्तों के लिए खुले रहते हैं।
“ज्योतिर्लिंग” की व्युत्पत्ति समझने से इन धामों की भावना और स्पष्ट हो जाती है।
कथाओं के अनुसार, जब कभी शिव ने अपनी अनन्त, असीम अग्नि की ज्योति से स्वयं को प्रकट किया, वही स्थान आगे चलकर ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजित हुआ। भक्त यह भी मानते हैं कि इन बारह विशिष्ट स्थानों पर शिव का तेज अधिक सुलभ और अनुभूतिमय रूप में प्रकट होता है।
अब बारहों ज्योतिर्लिंगों को संक्षेप में, उनके प्रमुख भाव और कथाओं के संकेत के साथ समझा जा सकता है।
सोमनाथ को भारत के प्राचीनतम शिव मंदिरों में गिना जाता है। परम्परा में वर्णन मिलता है कि यह दिव्य धाम अनेक बार विध्वंस और पुनर्निर्माण की प्रक्रियाओं से गुजरा, फिर भी आस्था की ज्योति कभी नहीं बुझी।
शिव पुराण के अनुसार, चन्द्रदेव को अपने ससुर दक्ष प्रजापति के शाप से क्षीणता प्राप्त हुई। चन्द्र ने प्रभास क्षेत्र में आकर गहन तप किया। भगवान शिव प्रसन्न होकर ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए और चन्द्र को पुनः पूर्ण तेज प्राप्त हुआ। इसी कारण इस धाम को सोमनाथ, अर्थात चन्द्र के नाथ कहा गया। आज भी यहां के समुद्रतट, मंदिर का दिव्य शिखर और सन्ध्या के समय आरती की ध्वनि श्रद्धालुओं के मन को गहराई से छूती है।
नल्लमाला पर्वतों के बीच श्रीशैल पर स्थित मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग शिव और पार्वती के स्नेहपूर्ण माता पिता रूप का सुन्दर प्रतीक माना जाता है। यहां शिव मल्लिकार्जुन तथा देवी भ्रामराम्बा रूप में पूजित हैं।
कथाओं में मिलता है कि भगवान शिव और देवी पार्वती, पुत्र कार्तिकेय के समीप रहने की भावना से इस क्षेत्र में अवतरण लेकर विराजमान हुए। यही कारण है कि यह धाम ज्योतिर्लिंग के साथ साथ शक्ति पीठ के रूप में भी सम्मानित है। यहां शिव और शक्ति दोनों के प्रति भक्ति एक ही परिसर में सहज रूप से फलती फूलती है।
उज्जैन के पवित्र नगर में क्षिप्रा नदी तट स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग शिव के महाकाल रूप का प्रत्यक्ष प्रतीक है। मान्यता है कि यहां स्थित शिवलिंग स्वयम्भू है, अर्थात धरती से स्वयं प्रकट हुआ।
महाकालेश्वर की एक विशिष्टता यह भी बतायी जाती है कि यह दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है, जिसे दक्षिण मुखी रूप कहा जाता है। रात्रि प्रहर और काल के गहन भाव के साथ इस धाम का संबंध समझा जाता है। यहां प्रातःकाल होने वाली भस्म आरती विशेष रूप से अत्यन्त पवित्र मानी जाती है, जिसमें शिव के सृजन और संहार के चक्र का बोध कराया जाता है।
नर्मदा नदी के मध्य स्थित मण्डहाता द्वीप प्राकृतिक रूप से “ॐ” की आकृति जैसा माना जाता है। इसी कारण यहां के ज्योतिर्लिंग का नाम ओंकारेश्वर, अर्थात ॐ के ईश्वर के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
मंदिर परिसर में कलात्मक स्तम्भ, शिखर और पत्थर की तराश देखी जा सकती है। यहां प्रतिष्ठित शिवलिंग को स्वयम्भू माना जाता है। नर्मदा तट पर स्थित होने के कारण यह स्थान साधना, ध्यान और शांतिपूर्ण मनन का भी सुन्दर केंद्र माना जाता है।
केदारनाथ धाम हिमालय की गोद में, लगभग 3583 मीटर की ऊंचाई पर, मन्दाकिनी नदी के किनारे स्थित है। यह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ साथ आकार में विशाल हिमालयी यात्रा का भी केन्द्र है।
मान्यता के अनुसार, महाभारत के पश्चात पाण्डव अपने पापकर्मों से मुक्ति के लिए शिव के दर्शन की इच्छा से यहां तक पहुंचे। कहा जाता है कि शिव ने केदार क्षेत्र में विशेष रूप से प्रकट होकर उन्हें आश्रय दिया। इस धाम के प्राचीन निर्माण का संबंध पाण्डवों और आगे चलकर आदि शंकराचार्य से भी जोड़ा जाता है। कठोर जलवायु के कारण मंदिर के कपाट वर्ष में सीमित महीनों के लिए ही खुले रहते हैं।
घने अरण्य और पहाड़ियों के बीच स्थित भीमाशंकर मंदिर के आसपास का क्षेत्र प्राकृतिक सौन्दर्य और आध्यात्मिकता दोनों से भरपूर है। परम्परा में कथा मिलती है कि यहीं भगवान शिव ने असुर त्रिपुरासुर का संहार किया और युद्ध के पश्चात उनके शरीर से निकला पसीना भीमा नदी के रूप में प्रवाहित हुआ।
मंदिर की रचना नागर शैली की मानी जाती है। आसपास का वन्यजीव अभयारण्य, पक्षी और वन्य प्राणी साधकों को प्रकृति के निकट रहने का अवसर भी देता है।
वाराणसी के पश्चिमी तट पर गंगा के किनारे स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर हिन्दू मन का अत्यंत प्रिय तीर्थ है। यहां शिव विश्वेश्वर, अर्थात समस्त जगत के ईश्वर रूप में पूजित हैं।
आस्था है कि काशी में शिव के साक्षात् सान्निध्य के कारण यहां मृत्यु होने पर जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति का मार्ग सरल हो जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित काले पत्थर के शिवलिंग के दर्शन और गंगा स्नान को जीवन के महानतम आध्यात्मिक अनुभवों में गिना जाता है। समय समय पर मंदिर के पुनर्निर्माण, शिखर पर स्वर्ण कलश और आसपास के घाटों ने इसे अद्वितीय आध्यात्मिक नगर के रूप में स्थापित किया है।
नासिक के समीप स्थित त्र्यंबकेश्वर धाम विशेष होता है क्योंकि यहां के शिवलिंग में ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों की शक्ति का प्रतीक भाव समाहित माना जाता है।
यह स्थान गोदावरी नदी के उद्गम क्षेत्र के निकट है, जिससे इसका पवित्र महत्व और बढ़ जाता है। मंदिर की स्थापत्य शैली, काले पत्थर की दीवारें और प्राचीन वातावरण साधकों को श्रद्धा और गम्भीरता की अनुभूति कराते हैं।
वैद्यनाथ धाम को बैद्यनाथ या वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है। परम्परा में यह स्थान रावण की शिव भक्ति से जुड़ी कथाओं के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
कहानी में वर्णन आता है कि रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तीव्र तपस्या तथा अपना शीश अर्पित किया तब शिव ने प्रकट होकर उसे वरदान दिया। वैद्यनाथ नाम के पीछे शिव के वैद्य, अर्थात रोगहारी रूप का भी संकेत माना जाता है। इस धाम की परिक्रमा और पूजन को दुःख, रोग और बाधाओं से मुक्ति देने वाला माना जाता है।
सौराष्ट्र तट पर स्थित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग को नाग अर्थात सर्प और रक्षा के भाव से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि शिव ने यहां नागेश्वर महादेव रूप में भक्त सुप्रिया की रक्षा की और दारुक नामक असुर का नाश किया।
यह धाम विष, नकारात्मकता और भय से संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। मंदिर प्रांगण में स्थित शिव की ऊंची प्रतिमा और समुद्री हवा के बीच इस स्थान पर बैठकर ध्यान करने का अनुभव अनेक श्रद्धालु विशेष रूप से याद रखते हैं।
रामेश्वरम् धाम समुद्र के किनारे स्थित है और रामायण की कथा से गहराई से जुड़ा है। परम्परा है कि लंका विजय के पश्चात श्रीराम ने यहाँ शिव की उपासना की और उनके विग्रह, रामनाथस्वामी लिंग की स्थापना की।
मंदिर परिसर के भीतर स्थित २२ पवित्र तीर्थ कुण्डों के स्नान को पापक्षालन और शुद्धि का साधन माना जाता है। विस्तृत प्राकार, स्तम्भों की लम्बी शृंखला और समुद्री वातावरण इस ज्योतिर्लिंग को अत्यन्त अनूठा अनुभव बनाते हैं।
घृष्णेश्वर, जिसे घुश्मेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहा जाता है, का अर्थ है करुणा के स्वामी। यह बारहवां ज्योतिर्लिंग माना जाता है और एल्लोरा की गुफाओं के निकट स्थित है।
कथानक में देवी कुष्मा या घुष्मा का वर्णन आता है जो प्रतिदिन जल में शिवलिंग स्थापित कर गहन भक्ति से पूजा करती थीं। पुत्र की मृत्यु के बाद भी उन्होंने शिव भक्ति नहीं छोड़ी। उनकी अटूट साधना से प्रसन्न होकर शिव ने उनके पुत्र को पुनर्जीवित किया और यहां सदैव घृष्णेश्वर रूप में रहने का वर दिया। इस धाम की विशेषता यह भी मानी जाती है कि यहां शिवलिंग को स्पर्श कर अभिषेक करने की अनुमति मिलती है।
हिन्दू परम्परा में द्वादश ज्योतिर्लिंगों की जो परम्परागत सूची दी जाती है, वह स्थान और संक्षिप्त वर्णन सहित इस प्रकार है।
| क्रम | ज्योतिर्लिंग | राज्य | स्थिति / क्षेत्र | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|---|---|---|
| १ | सोमनाथ | गुजरात | प्रभास पाटन, सौराष्ट्र | प्राचीन शिव मंदिर, अनेक बार विध्वंस और पुनर्निर्माण की परम्परा |
| २ | मल्लिकार्जुन | आंध्र प्रदेश | श्रीशैल पर्वत, कृष्णा तट | दक्षिण का कैलाश, शिव और देवी दोनों के धाम के रूप में प्रसिद्ध |
| ३ | महाकालेश्वर | मध्य प्रदेश | उज्जैन, क्षिप्रा तट | स्वयम्भू लिंग, दक्षिण मुखी, भस्म आरती के लिए विख्यात |
| ४ | ओंकारेश्वर | मध्य प्रदेश | नर्मदा नदी के द्वीप पर | ॐ आकार द्वीप, स्वयम्भू लिंग और नर्मदा तट पर स्थित शिव धाम |
| ५ | केदारनाथ | उत्तराखण्ड | हिमालय, मन्दाकिनी तट | ऊंचाई पर स्थित, सीमित काल के लिए खुले रहने वाला पवित्र धाम |
| ६ | भीमाशंकर | महाराष्ट्र | सह्याद्रि पर्वत, भीमा नदी क्षेत्र | त्रिपुरासुर वध की कथा, अरण्य और पर्वतीय वातावरण से जुड़ा |
| ७ | काशी विश्वनाथ | उत्तर प्रदेश | वाराणसी, गंगा तट | मोक्ष नगरी काशी का मुख्य शिवलिंग, गंगा स्नान और दर्शन अत्यंत पावन |
| ८ | त्र्यंबकेश्वर | महाराष्ट्र | त्र्यंबकेश्वर, गोदावरी उद्गम निकट | तीनों देव शक्तियों के प्रतीक, गोदावरी उद्गम के कारण विशेष महत्त्व |
| ९ | वैद्यनाथ | परम्परागत मान्यता | देवघर क्षेत्र सहित अन्य मान्यताएं | रावण की शिव भक्ति से जुड़ी कथा, शिव के वैद्य रूप की भावना |
| १० | नागेश्वर | गुजरात | द्वारका निकट दारुकावन क्षेत्र | नाग और रक्षा के भाव से जुड़ा, भय और नकारात्मकता से मुक्ति की भावना |
| ११ | रामेश्वर | तमिलनाडु | रामेश्वरम् द्वीप | रामायण से संबंधित, २२ तीर्थ कुण्डों वाला पवित्र शिव धाम |
| १२ | घृष्णेश्वर | महाराष्ट्र | एल्लोरा के पास, दौलताबाद निकट | करुणा के स्वामी, कुष्मा की भक्ति कथा से जुड़ा ज्योतिर्लिंग |
परम्परा में वैद्यनाथ के स्थान के विषय में भिन्न भिन्न मान्यताएं मिलती हैं परन्तु देवघर क्षेत्र और महाराष्ट्र के कुछ स्थानों को विशेष रूप से प्रमुख माना जाता है।
भक्त परम्परा में यह विश्वास गहराई से स्थापित है कि यदि कोई साधक श्रद्धा, नियम और शुद्ध भाव से बारहों ज्योतिर्लिंगों के दर्शन कर ले, तो उसके पापकर्म हल्के होते हैं और आत्मा के लिए मोक्ष मार्ग सरल होता है।
यात्रा के संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु इस प्रकार समझे जा सकते हैं।
अन्ततः ज्योतिर्लिंगों की यात्रा श्रद्धा, जप, ध्यान और चरित्र-निर्माण का संयुक्त मार्ग है, जो मोक्ष के लिए अनुकूल वातावरण बनाता है।
हिन्दू परम्परा में तीर्थों और धामों की अनेक श्रेणियां बतायी गयी हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंगों की सूची उन विशेष धामों की श्रेणी में आती है जिन्हें स्वयं शिव के तेज का अधिष्ठान माना गया।
उपलब्ध परम्परागत विवरणों में बारह ज्योतिर्लिंगों के साथ साथ
भी मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि ये धाम केवल पूजा स्थलों की सूची नहीं बल्कि भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्मृति के महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं।
बारह ज्योतिर्लिंग किसे कहा जाता है और उनका विशेष महत्व क्या है?
बारह ज्योतिर्लिंग वे प्रमुख शिव धाम हैं जहां भगवान शिव को प्रकाश स्वरूप, स्वयंभू तेज के रूप में पूजा जाता है। इन धामों पर की गयी आराधना को आत्मशुद्धि, पापक्षय और मोक्ष के मार्ग को सुदृढ़ करने वाला माना जाता है।
क्या कुछ ज्योतिर्लिंगों को विशेष रूप से अनिवार्य या अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है?
परम्परा में सभी द्वादश ज्योतिर्लिंग समान रूप से पवित्र माने जाते हैं। फिर भी अनेक भक्त सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, केदारनाथ और काशी विश्वनाथ को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मान कर पहले इन धामों की यात्रा करने की इच्छा रखते हैं।
क्या किसी एक ज्योतिर्लिंग को सबसे शक्तिशाली या सर्वोच्च माना जाता है?
शास्त्रीय दृष्टि से सभी ज्योतिर्लिंग शिव के समान ही तेजस्वी स्वरूप हैं। भक्ति परम्परा में काशी विश्वनाथ और सोमनाथ जैसे धामों को विशेष रूप से विख्यात और अत्यधिक पूज्य माना गया है परन्तु श्रेष्ठता का वास्तविक निर्णय साधक के अपने भाव और अनुभव पर ही निर्भर करता है।
इन ज्योतिर्लिंगों की दिशा क्या कोई विशेष संकेत देती है?
कई ज्योतिर्लिंग पूर्वाभिमुख हैं, जो पवित्रता और उदीयमान प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। महाकालेश्वर का दक्षिणमुखी होना काल और मृत्यु के गहरे भाव से जोड़ा गया है। केदारनाथ और नागेश्वर का पश्चिम की ओर होना भी विशिष्टता के रूप में वर्णित मिलता है।
क्या आधिकारिक रूप से केवल बारह ही ज्योतिर्लिंग माने जाते हैं?
परम्परा में मान्य सूची केवल द्वादश ज्योतिर्लिंगों की ही है। कुछ स्थलों को प्रतीक रूप में तेरहवें ज्योतिर्लिंग जैसा सम्मान दिया जाता है परन्तु शास्त्रीय रूप से स्वीकार्य मुख्य सूची बारह की ही मानी जाती है।
क्या सभी बारह ज्योतिर्लिंगों की यात्रा जीवन में एक ही बार करना आवश्यक है?
कोई कठोर नियम नहीं परन्तु आस्था है कि यदि जीवन में कभी भी श्रद्धा पूर्वक इन बारह धामों के दर्शन हो जाएं तो आत्मिक लाभ गहरा होता है। कई साधक अपने समय, सामर्थ्य और अवसर के अनुसार धीरे धीरे यह यात्रा पूर्ण करते हैं।
क्या महिलाएं और सभी वर्गों के भक्त इन धामों में समान रूप से प्रवेश कर सकते हैं?
परम्परा में इन ज्योतिर्लिंग धामों को समस्त भक्तों के लिए खुला माना गया है। सामान्य रूप से स्त्री, पुरुष और हर वर्ग के श्रद्धालु यहां जाकर दर्शन और पूजा कर सकते हैं, केवल भारत के कुछ विशेष प्रसंगों में शास्त्रीय नियमों पर चर्चा अलग रही है।
इन धामों की यात्रा के लिए सर्वोत्तम समय कौन सा माना जाता है?
अनेक भक्त महाशिवरात्रि और श्रावण मास में इन धामों की यात्रा को विशेष रूप से शुभ मानते हैं। पर्वकाल में भीड़ अधिक रहती है, अतः जो साधक शान्त वातावरण चाहते हैं वे अन्य समय भी चुनते हैं।
क्या बारहों ज्योतिर्लिंग किसी आध्यात्मिक कड़ी से जुड़े माने जाते हैं?
आस्था यह है कि ये बारह धाम शिव के अनन्त शक्ति क्षेत्र की भिन्न भिन्न अभिव्यक्तियां हैं। सोमनाथ से लेकर घृष्णेश्वर तक इन धामों को एक ही दिव्य चेतना के अलग अलग केन्द्रों के रूप में देखा जाता है, जो समस्त भारत को एक अदृश्य आध्यात्मिक धागे से जोड़ती है।
चंद्र राशि मेरे बारे में क्या बताती है?
मेरी चंद्र राशिअनुभव: 15
इनसे पूछें: पारिवारिक मामले, मुहूर्त
इनके क्लाइंट: म.प्र., दि.
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