By पं. सुव्रत शर्मा
हस्त नक्षत्र, सवितृ का पौराणिक और ज्योतिषीय रहस्य, कथा और शक्ति

हिंदू ज्योतिष के आकाशीय संसार में हर नक्षत्र का एक गहरा, प्रतीकात्मक, आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व है। इन्हीं सब नक्षत्रों में हस्त विशिष्ट स्थान रखता है, जो अद्भुत सृजन शक्ति, कौशल और अभिव्यक्ति की ऊर्जा से जुड़ा है। हस्त नक्षत्र के अधिपति देव सवितृ हैं, जो हिंदू धर्म की बारह आदित्य सत्ताओं में एक माने जाते हैं। सवितृ का पौराणिक प्रसंग हस्त के इन अमूल्य विषयों को सुंदर ढंग से प्रकट करता है।
सवितृ को सूर्य देवता के रूप में पूजा जाता है। वे माता अदिति के पुत्र माने जाते हैं। सवितृ नाम का अर्थ ही 'सुवर्ण हस्त' है। यह उपाधि केवल उपमा नहीं है बल्कि प्राचीन शास्त्रों में वर्णित है कि सवितृ जिस भी वस्तु को छूते हैं उसमें प्रकाश, ऊर्जा और नया जीवन भर जाता है। देवताओं के मध्य, वे ही वह दिव्य शक्ति हैं जो हर भोर को लाती है और चेतना के साथ बुद्धि, अंत:करण और आत्मा को प्रकाशित करती है। ऐसा माना गया है कि सब प्राणियों को सवितृ ही ज्ञान और आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करते हैं।
ज्योतिष के दृष्टिकोण से सवितृ ऐसी दिव्य सत्ता मानी जाती है, जो 'जिसे हम प्राप्त करना चाहते हैं, उसे हमारे हाथों में देने की' क्षमता रखती है। यह भाव हस्त नक्षत्र के प्रतीक 'हाथ' से पूर्ण मेल खाता है -जो देने, पाने और रचने का प्रतिरूप है। हस्त की शक्ति 'हस्त स्थापित्यन्यागम शक्ति' कहलाती है, जिसका अर्थ है 'इच्छित वस्तुओं को अपनी पकड़ में लाने की शक्ति'। सवितृ इसी शक्ति का मूर्तस्वरूप हैं -संकल्प सिद्ध करने, आशीर्वाद प्रदान करने और साधकों को आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाले।
सवितृ से जुड़ी कहानियों में सबसे अधिक प्रभावशाली प्रसंग दक्ष प्रजापति के महायज्ञ से जुड़ा है। यह प्रसंग पौराणिक न्याय, संतुलन और बदलाव के सूत्रों को उजागर करता है। इस कथा में प्रमुख भूमिका है दक्ष प्रजापति (सति के पिता) द्वारा आयोजित विशाल यज्ञ की।
दक्ष व्यवस्था और परंपरा के पोषक थे। उन्होंने अपने महायज्ञ में सभी देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन अपनी ही पुत्री सती और उनके पति शिव को निमंत्रण नहीं भेजा। इसका कारण शिव का गृहस्थ जीवन, श्मशान से जुड़ाव और सामाजिक परिधि से परे स्वभाव था। सती, पिता और पति के बीच सामंजस्य बैठाने के लिए बिना बुलाए ही यज्ञ में पहुँचीं। वहाँ उन्हें अपमानित किया गया, जिससे पीड़ा में उन्होंने यज्ञ की अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया। इस घटना से संपूर्ण देवसमूह द्रवित हो उठा।
सती की मृत्यु से शिव शोक व क्रोध में डूब जाते हैं। उनका प्रचंड रूप -महाकाली, वीरभद्र और काल भैरव -यज्ञ स्थल पर सर्वनाश लाते हैं। देवताओं के लिए भी यह घातक था। इसी उथल-पुथल में शिव के अंश काल भैरव, सवितृ का हाथ काट देते हैं। यह वही सवितृ हैं, जिनकी छुअन से संसार को ऊर्जा और सम्पन्नता मिलती है। उनके हाथ का कटना ब्रह्मांडीय असंतुलन का संकेत बनता है -रचनात्मकता, संतुलन और कौशल के प्रवाह में विघ्न पड़ता है।
आखिर शिव का रोष शांत होता है। वे सम्यक संतुलन के लिए, सवितृ को नये रूप में पुनर्स्थापित करते हैं। शिव उन्हें सुनहरी चमक वाले दिव्य हस्त (सुवर्ण हस्त) प्रदान करते हैं। इससे न केवल सवितृ की शक्ति लौटती है बल्कि उनके स्पर्श में आलोक, समृद्धि और अक्षय जीवन का नया वरदान भी जुड़ जाता है। 'हिरण्य हस्त' -अर्थात् स्वर्ण हस्तधारी देव -के रूप में सवितृ का यह दैवीय रूप हस्त नक्षत्र की शक्ति, कल्याण और फलोत्पादन क्षमता से जुड़ जाता है।
यह कथा बहुपरती अर्थों से युक्त है। सुवर्ण हस्त केवल, बेजोड़ कौशल या दिव्य हस्तक्षेप का प्रतीक नहीं है बल्कि यह भी दर्शाता है कि बड़ी से बड़ी हानि के बाद भी पुनर्सृजन, ऊर्ध्वगमन और कृपा संभव है। यही तथ्य हस्त नक्षत्र के जातकों में भी दिखता है -अनुकूलनशीलता, उपचार करने की योग्यता, हर बाधा से सफलता निकालने की क्षमता और परिश्रम-मूल्य से मनोरथ पूर्ण करने की विलक्षण प्रतिभा।
सवितृ न केवल सूर्य का तेज हैं बल्कि उपचार, सृजन और प्रत्येक व्यक्ति के भीतर छिपी आध्यात्मिक शक्ति के सम्पूर्ण रूप हैं। वे ही वह शक्ति हैं जिनकी प्रार्थना प्रसिद्ध गायत्री मंत्र में की जाती है -जो केवल आकाश ही नहीं, मन और हृदय में भी उत्कर्ष का प्रकाश भरता है।
इस प्रकार, हस्त नक्षत्र के संरक्षक के रूप में सवितृ की कथा जीवन यात्रा में कथा, जगत और अंतर्यम की एक सुंदर झलक है। यह सत्य सिखाती है कि सच्चा कौशल केवल शिल्प में नहीं बल्कि उपचार, संतुलन और सृजन की अंत:दृष्टि में भी है। हस्त की शक्ति का मूल यही 'सुवर्ण स्पर्श' है।
१. सवितृ को 'सुवर्ण हस्त' क्यों कहा जाता है?
यह उपाधि सवितृ की उस दैवीय कृपा का बोध है, जिसमें वे अपने स्पर्श से ऊर्जा, प्रकाश और सौभाग्य से संसार को भरते हैं।
२. सवितृ की कथा हस्त नक्षत्र से कैसे जुड़ती है?
हस्त नक्षत्र का प्रतीक हाथ है। सवितृ के स्वर्ण हस्त का पुनःस्थापन क्षमता, फलोत्पादन और आशीर्वाद के महत्व को रेखांकित करता है।
३. हस्त नक्षत्र के लोगों में सवितृ के गुण कैसे दृष्टिगोचर होते हैं?
कौशल, चुनौतियों का समाधान, उपचार की ताकत, परिश्रम और कल्याणकारी प्रवृत्ति -यह सब सवितृ से प्रभावित हैं।
४. शिव द्वारा सवितृ को सुनहरा हाथ देने के पीछे क्या महत्व था?
यह अध्यात्मिक पुनर्स्थापन और संतुलन का संदेश देता है कि हर कठिनाई के बाद दिव्यता की प्रतिष्ठा संभव है।
५. सवितृ का प्रकाश जीवन में कैसे उपयोगी है?
सवितृ का आलोक ज्ञान, मन, हृदय सभी में नई प्रेरणा, चेतना और ऊर्जा का उत्सव है।
जन्म नक्षत्र मेरे बारे में क्या बताता है?
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