By पं. नीलेश शर्मा
मूल केतु प्रधान नक्षत्र का हर ग्रह आत्मा में अद्भुत परिवर्तनकारी संस्कार छोड़ता है

जहाँ ज्योतिष के आकाश में मूल नक्षत्र धनु राशि के 0°00’ से 13°20’ तक फैला है, वहीं इसकी विराट ऊर्जा विविध ग्रहों के संगम से अनगिनत स्तरों में प्रकट होती है। केतु की प्रधानता इस नक्षत्र के केंद्र में आध्यात्मिक विक्षेपण, मोह-त्याग और कर्मविमोचन की अनिवार्यता निर्मित करती है। किंतु जब अन्य ग्रह यानी सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और राहु मूल में प्रवेश करते हैं, तो हर ग्रह जीवन, स्वभाव, इच्छाशक्ति और भ्रम के उद्गम को अपनी छाया में रंग देता है। हर ग्रह की उपस्थिति मूल के परिवर्तनीय चक्र में एक विशिष्ट तालमेल जोड़ती है, जिससे आत्मा पुनर्परिभाषित होती है। इस विमर्श में मूल के भीतर निवास करते ग्रहों के विविध प्रभावों की गहन समीक्षा प्रस्तुत है।
केतु, जो दक्षिण ध्रुव (लुनर नोड) का प्रतीक है, मूल का स्वामी है। उसका असर यहाँ सर्वाधिक प्रखर, जड़ों तक प्रविष्ट करता है। मूल में केतु आत्मा की गहराई तक छनकर पहुँचता है-माया, बंधन और भ्रम को छिन्न-भिन्न करता है। यहां जन्मे जातक अप्रत्याशित जीवन-परिवर्तनों, विषम परिस्थितियों और गहरे मानसिक संशय का सामना करते हैं। किंतु यही संकट आत्मबोध, वैराग्य और गूढ़ ज्ञान की ओर श्रेष्ठ पथ बनते हैं। केतु मूल जातकों की अंतर्दृष्टि को जागृत करता है; वे प्रायः जड़ों की खोज, जीवन के रहस्यों और अदृश्य कारणों की पड़ताल में रुचि रखते हैं।
केतु की छाया जीवन में बार-बार स्थितिपरिवर्तन, मानसिक विमुक्ति और आत्मिक भ्रांति को सामने लाती है, जिससे जातक संपूर्ण रूपांतरण और आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है।
मूल में सूर्य का प्रवेश तेज, साहस और जिजीविषा से पूर्ण है। इस स्थिति में, जातक के भीतर शक्ति, स्वाभिमान और नेतृत्व-समर्थता जागृत होती है। सूर्य मूल में आकर पुराने संरचनाओं को नष्ट कर जीवन में नवीनता लाता है।
यह योग जीवन में स्वयं के ईगो के संकट या शक्ति-संघर्ष लाता है, परंतु यही चुनौती अंततः आध्यात्मिक बल, स्व-पुनर्निर्माण और आत्मसंयम की ओर उन्मुख करती है।
मूल में चंद्रमा संवेदनशीलता, भावना और गहरे अंतर्ज्ञान के द्वार खोलता है। जातक प्रायः अत्यंत संवेदनशील, कल्पनाशील तथा मनोवैज्ञानिक स्तर पर परिवर्तनशील पाए जाते हैं।
ऐसी प्रतिकूलता में मानसिक दृढ़ता व ध्यान योग द्वारा आत्म-संवाद का मार्ग प्रशस्त होता है, जिससे जातक मानसिक शांति व स्थिरता पा सकता है।
मूल में मंगल कठोर कर्म, दृढ़ता और साहस की शक्ति का विस्तार करता है। जातक चुनौतीपूर्ण परिवर्तनों के मध्य साहसपूर्वक खड़ा रहता है, किन्तु वहाँ क्रोध, आवेग और अचानक टूट-फूट की प्रवृत्ति भी देखी जाती है।
मंगल के साहस को सृजनात्मक दिशाओं में गतिशील करना मुख्य कर्त्तव्य है, अन्यथा उग्रता और आंतरिक असंतुलन व्यक्ति को दोषित कर सकता है।
मूल में बुध विश्लेषण, जिज्ञासा और तर्क की धार पुष्ट करता है। बुध जातक प्रायः गहन शोधकर्ता, अद्भुत विचारक और सत्यान्वेषी बनते हैं।
प्रगाढ़ जिज्ञासा के साथ स्थिरता और धरातलीकरण के अभ्यास से कल्पना और अव्यवस्था दोनों में संतुलन सम्भव है।
धनु राशि के स्वामी बृहस्पति जब मूल में होते हैं तब जातक की चेतना सुदृढ़, धर्मनिष्ठ और उच्च विचारों से विभूषित होती है। गुरु यहाँ मूल की तीक्ष्णता में धार्मिकता, आदर्श और त्रिविध बोध जोड़ते हैं।
यह स्थिति जातक में बड़े गुरु या शिक्षाविद् बनने की क्षमता प्रदान करती है। ऐसे लोग समाज या परिवार में प्रकाश-स्तंभ बन जाते हैं।
मूल में शुक्र संबंधों में गहराई, समर्पण और आत्मपरिवर्तन का संकेत देता है। जातक आकर्षक और करिश्माई होते हैं, किंतु प्रेम या दाम्पत्य में अचानक परिवर्तन या विरह के अनुभव संभव हैं।
शुक्र मूल जातकों को संबंध में संतुलन, आत्ममूल्यांकन और स्वयं-परिवर्तन की प्रेरणा देता है। कभी-कभी यह प्रतिष्ठा, सौंदर्य और कला के क्षेत्र में भी नवीनता लाने वाला है।
मूल में शनि अनुशासन, स्थिरता एवं गहन कार्मिक शिक्षा लाता है। जीवन में कई बार विलंब, कठिनाई और प्रतिकूलता का सामना होता है; परंतु इन्हीं कठिनाइयों में धैर्य और आंतरिक शक्ति का संस्कार होता है।
यह स्थिति सिखाती है कि प्रत्येक हानि, मंदी, या संघर्ष अंततः आत्मपरिष्कार और चिर-स्थायित्व का मूल बनती है।
मूल में राहु जातक को अनूठी रहस्यमय खोज, नवीनता और रूढ़ि तोड़ने की योग्यता देता है। यह स्थिति उन्हें अपरंपरागत ज्ञान, तांत्रिक साधना या पथ-प्रदर्शन की ओर ले जाती है।
राहु की प्रवृत्ति कभी-कभी भ्रम, विचार-भटकाव या अत्यधिक उत्कंठा दे सकती है। संयम एवं उचित दिशा छहने पर यही प्रवृत्ति नवनीत उपलब्धियों और अद्भुत खोजों का साधन बनती है।
| ग्रह | प्रभाव | जीवन-पाठ |
|---|---|---|
| केतु | वैराग्य, रहस्य | मोह-विच्छेद, आत्म-बोध |
| सूर्य | नेतृत्व, परिवर्तन | अहं का क्षय, आत्म-विकास |
| चंद्र | संवेदनशीलता, अंतर्दृष्टि | मानसिक शांति, आत्म-विश्लेषण |
| मंगल | साहस, संघर्ष | रचनात्मक ऊर्जा, संयम |
| बुध | बुद्धि, संवाद | औचित्य, तर्क-धैर्य |
| गुरु | विकास, धर्म | आदर्श, मार्गदर्शन |
| शुक्र | प्रेम, सौंदर्य | संबंध, आत्म-जागरण |
| शनि | अनुशासन, कर्म | धैर्य, स्थायित्व |
| राहु | जिज्ञासा, नवीनता | सीमांतर्ष, आत्म-सुधार |
मूल नक्षत्र में प्रत्येक ग्रह अपनी विशेष ऊर्जा लेकर आता है, जिससे जातकों का जीवन, स्वभाव और भाग्य अभूतपूर्व ढंग से रूपांतरित होता है। केतु की राजशक्ति जहाँ इस नक्षत्र को आत्मबोध, वैराग्य और कर्मक्षय की यात्रा पर अग्रसर करती है, वहीं शेष ग्रह इसकी गहराइयों में ज्ञान, शक्ति, प्रेम, संघर्ष और संतुलन का रंग भरते हैं। मूल के जातकों और ज्योतिषियों के लिए यह समझना आवश्यक है कि प्रत्येक ग्रह के व्यक्तिगत व गोचर काल के दौरान मूल की ऊर्जा का किस प्रकार दोहन किया जाए। इससे न केवल आत्मा का शुद्धिकरण संभव है बल्कि जीवन की प्रत्येक चुनौती एक नए अवतरण, उन्नयन और उच्चतर आत्म-प्रकाश के द्वार भी खोलती है।
व्यक्ति के जीवन में ग्रहों की सामूहिक छाया आत्मपरिवर्तन, गतिशीलता और चिरंतन साधना का अधिष्ठान बनती है, जिसे समझकर वह सच्चे अर्थों में मूल नक्षत्र की गूढ़ दिव्यता और चिरंतन शक्ति का अनुपम वरदान प्राप्त कर सकता है।
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