By पं. सुव्रत शर्मा
समुंदर मंथन की कथा से जुड़े मूल नक्षत्र, निरृति देवी और ज्येष्ठा का गूढ़ आध्यात्मिक संकेत

वैदिक ज्योतिष, पुराण और ब्रह्मांडीय अध्यात्म में मूल नक्षत्र का स्थान अत्यंत रहस्यपूर्ण है। यह नक्षत्र मात्र धनु राशि के 0°00’ से 13°20’ तक स्थित चंद्रमासिक बिंदु नहीं बल्कि सृष्टि के महान चक्र, जीवन के मूलतत्व और ब्रह्मांडीय प्रक्रियाओं से गहराई से जुड़ा है। इसके वास्तविक रहस्य को समझने के लिए समुंदर मंथन के महाकाव्य, निरृति के जन्म और उनके प्रतीकवाद को विस्तारपूर्वक देखना आवश्यक है।
समुंदर मंथन (समुद्र-मंथन) भारतीय मिथकों में सृष्टि, विनाश और पुनर्सृजन का गहन प्रतीक है। इसमें देवताओं (देव) और असुरों की अद्भुत संधि होती है-वे समृद्र का मंथन करते हैं ताकि अमृत की प्राप्ति हो सके। यह प्रक्रिया शिव द्वारा हलाहल विष के सेवन, अनेक रत्नों के प्रकट होने और विविध देवी-देवताओं, शक्तियों का उद्भव का केंद्र है।
समुंदर मंथन का यह संपूर्ण यज्ञ कर्म-मुक्ति, आत्म-परिष्कार और ऊर्जा-संतुलन की सबसे पुरातन कथा है।
मंथन का सबसे भयावह पक्ष हलाहल विष था। शिव ने उसे ग्रहण करके संसार को बचाया, किंतु इसी विष से प्रकट हुईं निरृति अथवा ज्येष्ठा-लक्ष्मी की बड़ी बहन। निरृति की उत्पत्ति दुख, दरिद्रता, अस्वीकारिता और अमंगल का गहरा संकेत है। वे उन अतल अंधकारों की अधिष्ठात्री हैं, जहां से उन्मूलन, नष्ट होना और पुनर्नवा जीवन की सारी प्रक्रिया प्रारंभ होती है।
भारतीय ग्रंथों में निरृति के त्याग, उपेक्षा और पीड़ा का स्वाभाविक चक्र आता है; देव-दैत्य दोनों उन्हें अपने समूह में स्थान नहीं देते, उनका साथ बुरा समझते हैं। पुराणों के अनुसार, ज्येष्ठा को पीपल के वृक्ष के नीचे छोड़ दिया गया-यह भी प्रतीक है कि जीवन में जब कोई अशुभता बिकट हो जाती है, उसे आत्मसात न कर पाने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
ज्येष्ठा के विवाह का प्रसंग महत्वपूर्ण है। ऋषि दुस्सह उनके पति बनकर यह दर्शाते हैं कि जीवन की कठिनाइयां केवल त्यागने योग्य नहीं बल्कि स्वीकार और संभालने योग्य हैं। ज्येष्ठा का सर्वप्रथम पति न होने का अर्थ भी है-दुख, दरिद्रता को संसार स्वीकार नहीं करना चाहता, किंतु प्रेरणादायक जीवन के लिए उन्हें आत्मसात किया जाना आवश्यक है।
ज्येष्ठा यानी निरृति, लक्ष्मी की बड़ी बहन। दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे के पूरक हैं; एक समृद्धि, सुख, धन-दौलत की देवी, दूसरी विपत्ति, दुख, दरिद्रता और विघटन की अधिष्ठात्री। उनका यह संबंध ब्रह्मांड के संतुलन का संकेत देता है-
इन्हीं दोनों बहनों का दैविक संतुलन स्थिति के गूढ़ सत्य के प्रति मानव-दृष्टि को उन्मुख करता है। सुख को समझने के लिए दुख का अनुभव अनिवार्य है-अशुभ की उपेक्षा करना जीवन की समृद्धि को सीमित करता है।
मूल नक्षत्र जीवन के मूल, जड़ और अंतिम सत्य के गहरे अन्वेषण का प्रतीक है। निरृति की कथा मूल नक्षत्र के उसी जड़गत जीवन चक्र का बोध कराती है-
मूल नक्षत्र की प्रत्येक पीड़ा, उथल-पुथल और परिवर्तन इस मिथकीय यात्रा की गूढ़ सीख को उजागर करती है-जड़ तक जाने, उसे उखाड़ने और सत्य तक पहुंचने की क्षमता।
मूल नक्षत्र में जन्मे जातकों की जीवन यात्रा कठिनाइयों, बदलाव और सत्य की तलाश से गुजरती है। उनके अनुभव दुःख, कष्ट और हानि से भरे होते हैं, लेकिन यही उन्हें आसक्तियों से मुक्त कर, आत्मा की गंभीरता और ब्रह्मज्ञान की ओर बढ़ाते हैं।
समुंदर मंथन, हलाहल विष और निरृति की मिथकीय कथा मूल नक्षत्र को ज्योतिषीय संकेतों से बहुत ऊपर जीवन के ब्रह्मांडीय सत्य में स्थान देती है। ब्रह्मांडीय संतुलन में सुख-विपत्ति, निर्माण-विनाश और बंधन-मुक्ति का चक्र चलता है; निरृति इन चक्रों में कठिनाई की पुनीत देवी हैं, जो मूल जातकों को जड़ों की गहराई खोजने, सत्य से जूझने और सच्चे अर्थों में आत्मज्ञान का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करती हैं।
मूल नक्षत्र से जुड़े व्यक्ति यह जानकर उन्नति की राह चुन सकते हैं कि जीवन की प्रत्येक कठिनाई, उपेक्षा और विष उन्हें अपने भीतर छुपे दिव्य शक्ति तक पहुँचने का अवसर देती है। सुख व समृद्धि पाने से पूर्व हर आत्मा को दुख, विघटन और विषाक्तता का रास्ता पार करना होता है-यही दिव्य संतुलन, यही उत्कर्ष मूल नक्षत्र का वास्तविक संदेश है।
प्र1. समुंदर मंथन की कथा का मूल नक्षत्र से क्या संबंध है?
समुंदर मंथन की प्रक्रिया से निरृति की उत्पत्ति हुई और यही कथा मूल नक्षत्र के गूढ़ आध्यात्मिक संदेश-विनाश, जड़ से उखाड़ना और आध्यात्मिक पुनर्नवा-का आधार बनती है।
प्र2. निरृति देवी कौन हैं और उनका लक्ष्मी से क्या संबंध है?
निरृति, ज्येष्ठा के रूप में, लक्ष्मी की बड़ी बहन मानी जाती हैं, जो कठिनाई, विपत्ति और दरिद्रता की अधिष्ठात्री हैं, जबकि लक्ष्मी समृद्धि व सुख की देवी हैं। दोनों बहनों का संबंध सुख-दुख के संतुलन का प्रतीक है।
प्र3. हलाहल विष और निरृति के जन्म का आध्यात्मिक महत्व क्या है?
हलाहल विष से निरृति का जन्म विनाश, आध्यात्मिक कठिनाई और पुनर्सृजन का संदेश देता है-यही दिखाता है कि आत्म-परिष्कार के लिए कठिनाईयों का सामना अनिवार्य है।
प्र4. मूल नक्षत्र के जातकों के लिए इस कथा का क्या व्यवहारिक अर्थ है?
मूल नक्षत्र जातकों को जीवन में बार-बार कठिनाई, हानि और आंतरिक परिवर्तन से गुजरना पड़ता है जिससे वे आखिरकार सत्य, चैतन्य और मुक्ति की ओर बढ़ते हैं। यह कथा सिखाती है कि चुनौतियाँ आत्मजागरण का द्वार हैं।
प्र5. निरृति और जड़ों का प्रतीकवाद आत्मविकास में कैसे सहायक है?
निरृति और ‘जड़’ का प्रतीक यह संदेश देता है कि जीवन में कभी-कभी पुराने, असत्य या क्लेशमय पक्षों को उखाड़कर ही आत्मा अपनी असली रोशनी तक पहुंच सकती है। यही आत्म-विकास की आधारशिला है।
जन्म नक्षत्र मेरे बारे में क्या बताता है?
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