36 गुण और वैवाहिक सत्य

By पं. अमिताभ शर्मा

गुण मिलान की वास्तविकता

36 गुण विवाह कुंडली मिलान

कुंडली मिलान का वास्तविक उद्देश्य और सीमाएं

विवाह से पहले जब दो परिवारों के बीच बातचीत शुरू होती है, तो सबसे पहला कदम होता है कुंडली मिलान। सॉफ्टवेयर में वर वधू का विवरण डालते ही एक संख्या सामने आती है जो 28 गुण, 32 गुण या कभी कभी पूरे 36 गुण बताती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिन जोड़ों के 36 में से 34 गुण मिलते हैं, उनके रिश्ते भी कभी कभी कोर्ट की दहलीज पर क्यों पहुंच जाते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, अष्टकूट गुण मिलान केवल एक प्रारंभिक जांच है, अंतिम फैसला नहीं।

यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि गुण मिलान का उद्देश्य केवल एक संख्या प्राप्त करना नहीं है बल्कि यह दो व्यक्तियों के बीच ऊर्जा का सामंजस्य समझना है। जब व्यक्ति केवल संख्या पर ध्यान केंद्रित करता है, तो वह गहरे ज्योतिषीय विश्लेषण से वंचित रह जाता है जो वास्तव में वैवाहिक सुख की गारंटी दे सकता है। सुखी वैवाहिक जीवन के लिए केवल गुणों की संख्या मायने नहीं रखती बल्कि दोनों की व्यक्तिगत कुंडलियों में ग्रहों की आपसी स्थिति, सप्तम भाव की मजबूती और एक दूसरे के प्रति मानसिक समर्पण का होना कहीं अधिक जरूरी है।

प्राचीन ऋषियों ने अष्टकूट मिलान की व्यवस्था इसलिए बनाई थी ताकि दो व्यक्तियों के बीच मूलभूत ऊर्जा सामंजस्य को समझा जा सके। लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था एक यांत्रिक प्रक्रिया बन गई है जहां लोग केवल संख्या देखते हैं और गहराई में जाने का प्रयास नहीं करते। यह दृष्टिकोण न केवल अधूरा है बल्कि कई बार हानिकारक भी साबित होता है क्योंकि यह व्यक्ति को वास्तविक समस्याओं से अनजान रखता है।

गुण मिलान के मुख्य पहलू

पहलू विवरण
मिलान प्रकार अष्टकूट गुण मिलान
अधिकतम गुण 36 गुण
न्यूनतम स्वीकार्य 18 गुण
वास्तविक महत्व ग्रहों की स्थिति और भाव
सफलता का आधार व्यक्तिगत कुंडली विश्लेषण

मिलान के नियम

  1. केवल गुण संख्या पर निर्भर न रहें और गहन विश्लेषण करें
  2. व्यक्तिगत कुंडली का विश्लेषण अवश्य करें और हर पहलू को समझें
  3. सप्तम भाव और उसके स्वामी को देखें क्योंकि यह विवाह का कारक है
  4. मंगल दोष और अन्य दोषों की जांच करें क्योंकि ये महत्वपूर्ण हैं
  5. मानसिक और भावनात्मक सामंजस्य को समझें जो स्थायी सुख देता है

गुण संख्या और वास्तविकता का अंतर

समाज में एक व्यापक भ्रम पाया जाता है कि 36 में से जितने अधिक गुण मिलें, उतना ही सुखी वैवाहिक जीवन होगा। यह धारणा आंशिक रूप से सही है लेकिन पूर्ण सत्य नहीं है। गुण मिलान एक प्राथमिक छलनी की तरह है जो केवल यह बताता है कि दो कुंडलियों में मूलभूत ऊर्जा सामंजस्य है या नहीं।

वास्तविकता यह है कि कई बार 30 से अधिक गुण मिलने के बाद भी जोड़े असंतुष्ट रहते हैं। इसका कारण यह है कि गुण मिलान केवल सतही स्तर का विश्लेषण है। यह व्यक्ति के चरित्र, उसके संस्कार, उसकी सोच और उसके जीवन के प्रति दृष्टिकोण को नहीं देखता। यह केवल ऊर्जा के मूलभूत प्रवाह को मापता है जो आवश्यक तो है लेकिन पर्याप्त नहीं है।

अनुभव से देखा गया है कि कई जोड़े जिनके गुण कम मिले थे, लेकिन उनकी कुंडली के अन्य कारक अनुकूल थे, वे अत्यंत सुखी रहे। इसके विपरीत, कई जोड़े जिनके 30 से अधिक गुण मिले थे, लेकिन सप्तम भाव कमजोर था या गंभीर दोष थे, वे असंतुष्ट रहे। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि गुण संख्या केवल एक पहलू है, संपूर्ण सत्य नहीं।

वास्तविकता के पहलू

  1. उच्च गुण संख्या हमेशा सफलता की गारंटी नहीं है और यह केवल प्रारंभिक संकेत है
  2. कम गुण होने पर भी सफल विवाह संभव है यदि अन्य कारक अनुकूल हों
  3. व्यक्तिगत कुंडली का विश्लेषण अधिक महत्वपूर्ण है और इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए
  4. मानसिक सामंजस्य गुणों से अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दैनिक जीवन को प्रभावित करता है
  5. भावनात्मक संगति दीर्घकालिक सुख की कुंजी है और इसे समझना आवश्यक है

अष्टकूट मिलान की गहरी समझ

अष्टकूट मिलान आठ कूटों या पहलुओं पर आधारित है जो दो व्यक्तियों के बीच विभिन्न स्तरों के सामंजस्य को मापता है। इनमें वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट, राशि और नाड़ी शामिल हैं। प्रत्येक कूट का अपना विशेष महत्व है और प्रत्येक जीवन के एक विशिष्ट पहलू को प्रभावित करता है। इस व्यवस्था की गहराई को समझने के लिए प्रत्येक कूट का विस्तृत विश्लेषण आवश्यक है।

नाड़ी दोष को सबसे गंभीर माना जाता है क्योंकि यह स्वास्थ्य और संतान से संबंधित है। यदि नाड़ी दोष है, तो संतान संबंधी समस्याएं या स्वास्थ्य समस्याएं आ सकती हैं। भकूट धन और समृद्धि को प्रभावित करता है। यदि भकूट अनुकूल नहीं है, तो पारिवारिक धन में बाधाएं आ सकती हैं। गण मिलान चरित्र और स्वभाव का सामंजस्य बताता है। यदि गण मिलान अच्छा है, तो पति पत्नी के स्वभाव में सामंजस्य रहता है।

वश्य कूट परस्पर आकर्षण और नियंत्रण का प्रतीक है। तारा कूट स्वास्थ्य और दीर्घायु को प्रभावित करता है। योनि कूट शारीरिक और मानसिक संगति बताता है। ग्रह मैत्री बौद्धिक संगति और मित्रता दर्शाता है। राशि कूट संतान और प्रजनन क्षमता से संबंधित है। जब इन सभी कूटों का समग्र विश्लेषण किया जाता है, तभी सही निष्कर्ष निकाला जा सकता है और यह केवल अनुभवी ज्योतिषी ही कर सकते हैं।

अष्टकूट के घटक

  1. वश्य कूट परस्पर आकर्षण और वश में रहने का प्रतीक है जो संबंध की गतिशीलता को प्रभावित करता है
  2. तारा कूट स्वास्थ्य और दीर्घायु को प्रभावित करता है इसलिए इसकी जांच अत्यंत आवश्यक है
  3. योनि कूट शारीरिक और मानसिक संगति बताता है जो वैवाहिक सुख का महत्वपूर्ण आधार है
  4. ग्रह मैत्री बौद्धिक संगति और मित्रता दर्शाता है जो दीर्घकालिक संबंध के लिए आवश्यक है
  5. गण कूट चरित्र और स्वभाव का मिलान है जो दैनिक जीवन में सामंजस्य बनाए रखता है
  6. भकूट धन और पारिवारिक सुख को प्रभावित करता है इसलिए इसे गंभीरता से लेना चाहिए
  7. राशि कूट संतान और प्रजनन क्षमता से संबंधित है जो कई जोड़ों के लिए महत्वपूर्ण है
  8. नाड़ी कूट स्वास्थ्य और आनुवंशिकता को दर्शाता है और इसे सबसे गंभीर माना जाता है

सप्तम भाव की महत्वपूर्ण भूमिका

वैदिक ज्योतिष में विवाह और दाम्पत्य जीवन का मुख्य कारक सप्तम भाव है। यह भाव जीवनसाथी, विवाह और वैवाहिक सुख को दर्शाता है। सप्तम भाव की मजबूती, उसमें स्थित ग्रह और उस भाव के स्वामी की स्थिति वैवाहिक जीवन की गुणवत्ता निर्धारित करती है। यह विश्लेषण गुण मिलान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है और इसे कभी भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

यदि सप्तम भाव में शुभ ग्रह स्थित हैं और भाव का स्वामी मजबूत है, तो वैवाहिक जीवन सुखद होता है। शुक्र, गुरु या चंद्रमा जैसे शुभ ग्रहों की उपस्थिति वैवाहिक सुख बढ़ाती है। यदि सप्तम भाव में पाप ग्रह हैं या भाव कमजोर है, तो संबंधों में कठिनाइयां आ सकती हैं। मंगल, शनि, राहु या केतु की उपस्थिति चुनौतियां पैदा कर सकती है लेकिन उचित उपायों से इन्हें संतुलित किया जा सकता है।

सप्तम भाव का स्वामी यदि लग्न में या केन्द्र त्रिकोण में हो, तो यह अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि सप्तमेश और लग्नेश के बीच अच्छा संबंध है, तो पति पत्नी के बीच प्रेम और समझ बनी रहती है। सप्तम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि भी वैवाहिक सुख बढ़ाती है। इस प्रकार का विस्तृत विश्लेषण केवल अनुभवी ज्योतिषी ही कर सकते हैं और यह सॉफ्टवेयर आधारित गुण मिलान में संभव नहीं है।

सप्तम भाव के विश्लेषण के बिंदु

  1. सप्तम भाव में कौन से ग्रह स्थित हैं और वे शुभ हैं या अशुभ इसकी जांच करें
  2. सप्तम भाव का स्वामी किस स्थिति में है और वह मजबूत है या कमजोर यह देखें
  3. सप्तम भाव पर किसी ग्रह की दृष्टि है या नहीं क्योंकि यह प्रभाव डालती है
  4. सप्तम भावेश और लग्नेश का संबंध कैसा है क्योंकि यह पति पत्नी के संबंध को दर्शाता है
  5. शुक्र और गुरु की स्थिति क्या है क्योंकि ये विवाह के मुख्य कारक ग्रह हैं
  6. सप्तम भाव में पाप ग्रहों की उपस्थिति है या नहीं और यदि है तो उपाय क्या हैं
  7. सप्तम भाव का स्वामी किस नक्षत्र में है क्योंकि यह अतिरिक्त जानकारी देता है

मंगल दोष और अन्य महत्वपूर्ण दोष

मंगल दोष वैवाहिक कुंडली मिलान में एक महत्वपूर्ण कारक है। यदि वर या वधू की कुंडली में मंगल दोष है और इसे नजरअंदाज किया जाता है, तो वैवाहिक जीवन में गंभीर कठिनाइयां आ सकती हैं। मंगल दोष का केवल गुण मिलान में सीधा उल्लेख नहीं होता, इसलिए इसकी अलग से जांच आवश्यक है। मंगल दोष तब होता है जब मंगल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में होता है।

मंगल दोष के प्रभाव से बचने के लिए या तो दोनों में मंगल दोष होना चाहिए या फिर उचित उपाय किए जाने चाहिए। मंगल दोष के उपायों में मंगलवार को व्रत करना, हनुमान जी की पूजा करना, मूंगे की अंगूठी पहनना और मंगल मंत्र का जाप करना शामिल है। इन उपायों से मंगल दोष के प्रभाव को कम किया जा सकता है और वैवाहिक जीवन को सुखद बनाया जा सकता है।

इसी प्रकार कालसर्प दोष, शनि दोष और अन्य ग्रह दोष भी वैवाहिक जीवन को प्रभावित करते हैं। कालसर्प दोष तब होता है जब सभी ग्रह राहु और केतु के बीच होते हैं। यह दोष मानसिक तनाव, भ्रम और असमंजस पैदा करता है। शनि दोष विलंब और कठिनाइयां लाता है। राहु केतु दोष भ्रम और असमंजस पैदा करते हैं। इन दोषों का विश्लेषण और उनके उपचार गुण मिलान से अधिक महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये सीधे जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।

प्रमुख दोष

  1. मंगल दोष वैवाहिक असंतोष का कारण बन सकता है और इसकी जांच अत्यंत आवश्यक है
  2. कालसर्प दोष मानसिक तनाव देता है और इसे उपायों से संतुलित किया जा सकता है
  3. शनि दोष विलंब और कठिनाइयां लाता है लेकिन उपायों से इसका प्रभाव कम होता है
  4. राहु केतु दोष भ्रम और असमंजस पैदा करते हैं और इनके लिए विशेष उपाय आवश्यक हैं
  5. इन दोषों का उपचार आवश्यक है और अनुभवी ज्योतिषी से परामर्श लेना चाहिए
  6. पितृ दोष भी वैवाहिक जीवन को प्रभावित कर सकता है और इसकी जांच करनी चाहिए
  7. नारद दोष और अन्य विशेष दोषों की भी जांच करनी चाहिए जो विवाह को प्रभावित करते हैं

मानसिक समर्पण और भावनात्मक संगति

ज्योतिष केवल ग्रहों का विज्ञान नहीं है बल्कि यह मानवीय संबंधों और भावनाओं का भी विज्ञान है। दो व्यक्तियों के बीच मानसिक समर्पण और भावनात्मक संगति वैवाहिक सुख की आधारशिला है। जब दो व्यक्ति एक दूसरे के प्रति समर्पित होते हैं, तो वे ग्रहों के अशुभ प्रभावों को भी सहन कर लेते हैं। यह समर्पण केवल शब्दों में नहीं बल्कि कर्मों में प्रकट होता है।

भावनात्मक संगति का अर्थ है कि दोनों व्यक्ति एक दूसरे की भावनाओं को समझते हैं, उनका सम्मान करते हैं और एक दूसरे के सुख दुख में साथ खड़े रहते हैं। यह संगति कुंडली में भी देखी जा सकती है जब चंद्रमा और शुक्र की स्थिति अनुकूल होती है। चंद्रमा मन का कारक है और शुक्र प्रेम का कारक है। जब ये दोनों ग्रह अनुकूल होते हैं, तो भावनात्मक संगति स्वाभाविक रूप से विकसित होती है।

मानसिक समर्पण का अर्थ है कि दोनों व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर एक दूसरे के लिए जीते हैं। यह समर्पण धीरे धीरे विकसित होता है लेकिन जब यह होता है, तो संबंध अटूट हो जाता है। कुंडली में यह तब देखा जाता है जब सप्तम भाव और उसका स्वामी मजबूत होते हैं और शुभ ग्रहों से प्रभावित होते हैं।

मानसिक संगति के संकेत

  1. चंद्रमा की स्थिति मानसिक शांति बताती है और इसे अवश्य देखना चाहिए
  2. शुक्र प्रेम और आकर्षण को दर्शाता है और यह वैवाहिक सुख का कारक है
  3. बुध संचार और समझ को प्रभावित करता है इसलिए अच्छा संचार आवश्यक है
  4. गुरु सम्मान और मर्यादा को बढ़ाता है जो दीर्घकालिक संबंध के लिए आवश्यक है
  5. इन ग्रहों का सामंजस्य आवश्यक है और इनकी स्थिति का विश्लेषण करना चाहिए
  6. सप्तम भाव में शुभ ग्रहों की उपस्थिति मानसिक संगति बढ़ाती है
  7. लग्न और चंद्र लग्न का सामंजस्य भी मानसिक संगति को दर्शाता है

ग्रहों की आपसी स्थिति का विश्लेषण

दो कुंडलियों के मिलान में यह देखना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि एक कुंडली के ग्रह दूसरी कुंडली के ग्रहों और भावों के साथ कैसे संबंध बनाते हैं। यदि एक कुंडली का सूर्य दूसरी कुंडली के चंद्रमा के साथ अनुकूल है, तो पति पत्नी के बीच सम्मान और समझ बनी रहती है। सूर्य आत्मा का कारक है और चंद्रमा मन का कारक है। जब ये दोनों अनुकूल होते हैं, तो आत्मा और मन में सामंजस्य होता है।

यदि एक कुंडली का शुक्र दूसरी कुंडली के मंगल के साथ अनुकूल नहीं है, तो प्रेम और कामुकता में असंतोष हो सकता है। शुक्र प्रेम का कारक है और मंगल ऊर्जा का कारक है। जब ये दोनों अनुकूल नहीं होते, तो संबंधों में तनाव आ सकता है। इस प्रकार का गहन विश्लेषण केवल अनुभवी ज्योतिषी ही कर सकते हैं और यह सॉफ्टवेयर आधारित गुण मिलान में संभव नहीं है।

ग्रहों की आपसी दृष्टि भी महत्वपूर्ण है। यदि एक कुंडली का गुरु दूसरी कुंडली के सप्तम भाव को देखता है, तो यह अत्यंत शुभ माना जाता है। गुरु की दृष्टि आशीर्वाद के समान होती है और यह वैवाहिक सुख बढ़ाती है। इसी प्रकार यदि एक कुंडली का शनि दूसरी कुंडली के सप्तम भाव को देखता है, तो यह चुनौतियां पैदा कर सकता है लेकिन उपायों से इसे संतुलित किया जा सकता है।

ग्रह संबंध के पहलू

  1. सूर्य और चंद्रमा का संबंध आत्म और मन का है जो मूलभूत संगति को दर्शाता है
  2. मंगल और शुक्र का संबंध ऊर्जा और प्रेम का है जो शारीरिक और भावनात्मक संगति को प्रभावित करता है
  3. बुध और गुरु का संबंध बुद्धि और ज्ञान का है जो बौद्धिक संगति को दर्शाता है
  4. शनि और राहु का संबंध कर्म और भ्रम का है जो चुनौतियों और सीख को दर्शाता है
  5. इन संबंधों का विश्लेषण आवश्यक है और इसे केवल अनुभवी ज्योतिषी ही कर सकते हैं
  6. एक कुंडली के शुभ ग्रह दूसरी कुंडली के अशुभ भावों को प्रभावित कर सकते हैं
  7. ग्रहों की नक्षत्र स्थिति भी संबंधों को प्रभावित करती है और इसकी जांच करनी चाहिए

भ्रम और वास्तविकता का संतुलन

समाज में व्याप्त भ्रम यह है कि 36 गुणों का मिलना सुखी दाम्पत्य की गारंटी है। वास्तविकता यह है कि 36 गुण केवल एक प्रारंभिक संकेत है जो यह बताता है कि दो कुंडलियों में मूलभूत सामंजस्य है। अंतिम निर्णय इसके बाद होने वाले गहन विश्लेषण पर निर्भर करता है। यह गहन विश्लेषण ही वास्तविक सत्य को उजागर करता है।

सच्चाई यह है कि 18 से 24 गुण मिलने पर भी यदि अन्य कारक अनुकूल हैं, तो विवाह सफल हो सकता है। इसके विपरीत, 30 से अधिक गुण मिलने पर भी यदि सप्तम भाव कमजोर है या गंभीर दोष हैं, तो विवाह में कठिनाइयां आ सकती हैं। इसलिए संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है जो गुण मिलान और गहन विश्लेषण दोनों को महत्व दे।

अनुभवी ज्योतिषी हमेशा संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हैं। वे गुण मिलान को महत्व देते हैं लेकिन इसे अंतिम सत्य नहीं मानते। वे व्यक्तिगत कुंडली का गहन विश्लेषण करते हैं, दोषों की जांच करते हैं और उपाय सुझाते हैं। यह समग्र दृष्टिकोण ही सफल वैवाहिक जीवन की कुंजी है और इसे अपनाकर जोड़े दीर्घकालिक सुख प्राप्त कर सकते हैं।

संतुलन के तत्व

  1. गुण मिलान को महत्व दें लेकिन अंतिम न मानें क्योंकि यह केवल प्रारंभिक संकेत है
  2. गहन कुंडली विश्लेषण अवश्य करें क्योंकि यह वास्तविक सत्य को उजागर करता है
  3. दोषों की जांच और उपचार करें क्योंकि ये जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं
  4. मानसिक और भावनात्मक संगति को समझें क्योंकि यह दीर्घकालिक सुख की कुंजी है
  5. अनुभवी ज्योतिषी से परामर्श लें क्योंकि वे समग्र दृष्टिकोण दे सकते हैं
  6. सॉफ्टवेयर मिलान पर पूर्ण निर्भरता न करें क्योंकि यह सीमित है
  7. व्यक्तिगत समझ और संवाद को महत्व दें क्योंकि यह संबंध को मजबूत बनाता है

FAQ

क्या 36 गुण मिलना जरूरी है
नहीं, 18 से अधिक गुण भी स्वीकार्य हैं और अन्य कारक अधिक महत्वपूर्ण हैं

क्या कम गुण होने पर विवाह नहीं करना चाहिए
नहीं, अन्य कारक अनुकूल हों तो विवाह सफल हो सकता है और कई उदाहरण हैं

मंगल दोष कितना महत्वपूर्ण है
मंगल दोष अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसकी जांच आवश्यक है लेकिन उपाय संभव हैं

क्या सॉफ्टवेयर मिलान भरोसेमंद है
सॉफ्टवेयर केवल प्रारंभिक जानकारी देता है, गहन विश्लेषण आवश्यक है और अनुभवी ज्योतिषी से परामर्श लेना चाहिए

सफल विवाह के लिए क्या जरूरी है
गुण मिलान, कुंडली विश्लेषण, दोष जांच और मानसिक संगति सभी जरूरी हैं और संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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