By पं. नीलेश शर्मा
जीवनसाथी की प्रकृति तय करने वाला भाव

जन्म कुंडली में विवाह की बात आते ही सबसे पहले प्रश्न यही उठता है कि जीवनसाथी कैसा होगा और वैवाहिक जीवन कैसा बीतेगा। बहुत से लोग कुंडली दिखाते समय केवल विवाह कब होगा यह पूछते हैं परंतु जो बात सबसे अधिक जीवन को प्रभावित करती है वह यह है कि साथी का स्वभाव कैसा रहेगा संबंधों में कितनी स्थिरता होगी और साथ चलने की क्षमता कितनी होगी। यही सब कुछ कुंडली के सप्तम भाव में छिपा रहता है।
सप्तम भाव को केवल शादी का भाव कह देना पर्याप्त नहीं है। यह भाव वह दर्पण है जो दिखाता है कि मन किस प्रकार का साथी आकर्षित करता है और व्यक्ति खुद अपने संबंधों में कैसी ऊर्जा लेकर आता है। प्रेम विश्वास त्याग और साथ निभाने की इच्छा जैसी गहरी भावनाएं इसी भाव से पढ़ी जाती हैं। कई बार धन और करियर में सफलता मिल जाती है फिर भी जीवन में भीतर से खालीपन महसूस होता है इसका कारण अक्सर सप्तम भाव की स्थिति और वहां बैठे ग्रहों की ऊर्जा होती है।
बारह भावों वाली कुंडली में सातवां भाव ठीक लग्न के सामने स्थित होता है। लग्न से व्यक्ति का व्यक्तित्व और देह पढ़ी जाती है जबकि सप्तम भाव उस व्यक्ति को दिखाता है जो जीवन यात्रा का सहयात्री बनेगा। इसीलिए इसे साझेदारी का भाव भी कहा गया है जिसमें विवाह के साथ साथ व्यापारिक साझेदारी और दीर्घकालिक समझौते भी शामिल हो जाते हैं।
यह भाव केवल बाहरी संबंध नहीं बताता। यहां बैठे ग्रह यह भी दिखाते हैं कि भीतर से व्यक्ति संबंधों को कितना गंभीरता से लेता है वह कितना समझौता कर सकता है और कब कठोर हो जाता है। अगर यहां की ऊर्जा संतुलित होती है तो वैवाहिक जीवन शांत और संतोषपूर्ण रहता है। यदि इसी स्थान पर तनावपूर्ण या अग्नि प्रकृति के ग्रह अशुभ स्थिति में बैठ जाएं तो छोटी बात भी बड़े विवाद का रूप ले सकती है।
सप्तम भाव को केवल भावनात्मक दृष्टि से देखना अधूरा दृष्टिकोण है। यह भाव कर्म से भी गहरा जुड़ा हुआ है। पिछले जन्मों की कुछ अधूरी सीखें वैवाहिक जीवन के माध्यम से ही पूरी होती हैं। जिस प्रकार किसी घर के दरवाजे से मेहमान आते हैं उसी प्रकार सप्तम भाव जीवन में उन परिस्थितियों का प्रवेश द्वार बन जाता है जो संबंधों के माध्यम से व्यक्ति को परिपक्व बनाती हैं।
यह देखा जाता है कि जिन लोगों का सप्तम भाव चुनौतिपूर्ण होता है उनके जीवन में विवाह या साझेदारी के माध्यम से गहरे परिवर्तन आते हैं। कभी कभी यह परिवर्तन शुरुआत में पीड़ा देते हैं पर आगे चलकर वही अनुभव व्यक्ति के स्वभाव को परिपक्व बना देते हैं। इसलिए केवल शुभ अशुभ के आधार पर सप्तम भाव का निर्णय नहीं करना चाहिए बल्कि यह समझना चाहिए कि यहां की हर स्थिति किसी न किसी आंतरिक विकास की ओर संकेत करती है।
सूर्य को तेज और आत्मविश्वास का ग्रह माना जाता है। जब सूर्य सप्तम भाव में स्थित हो तो जीवनसाथी का स्वभाव सामान्य से अलग दिखाई देता है। ऐसे योग में मिलने वाला साथी आमतौर पर तेज दिमाग वाला होता है निर्णय जल्दी लेने वाला होता है और व्यक्तित्व में एक स्वाभाविक प्रभुत्व दिखाई देता है। आसपास के लोग उसकी बात को गंभीरता से लेते हैं और वह स्वयं भी सम्मान पाने की अपेक्षा रखता है।
विवाह के भाव में सूर्य होने से व्यक्ति को ऐसा साथी मिलता है जो सुरक्षा की भावना देता है। जब परिवार पर कोई संकट आता है तो वह आगे बढ़कर जिम्मेदारी उठाता है। ऐसे जीवनसाथी के साथ रहने पर अंदर से यह भरोसा बनता है कि कोई है जो हर परिस्थिति में ढाल बनकर खड़ा रहेगा। परंतु यही तेज कई बार अहंकार का रूप ले लेता है। छोटी बात पर भी स्वाभिमान आहत हो सकता है और फिर वही बात विवाद की जड़ बन जाती है।
सूर्य की यह स्थिति यह भी बताती है कि विवाह में सम्मान और पहचान का विषय बहुत महत्वपूर्ण रहेगा। यदि साथी को स्वयं को व्यक्त करने की स्वतंत्रता न मिले या उसकी बात को बार बार नज़रअंदाज़ किया जाए तो संबंध में दूरी बढ़ सकती है। ऐसे योग में यदि दोनों पक्ष एक दूसरे के स्वाभिमान की रक्षा करें और प्रशंसा की कमी न होने दें तो संबंध बहुत मजबूत और प्रेरणादायक बन सकता है।
चंद्रमा मन और भावनाओं का अधिपति है। जब यह ग्रह सप्तम भाव में बैठता है तो जीवनसाथी का मन समुद्र की लहरों की तरह बदलता रहता है। एक ओर यह व्यक्ति को अत्यंत संवेदनशील और समझदार साथी का आशीर्वाद देता है जो हर छोटी बात में भी आपकी भावना को पकड़ लेता है दूसरी ओर यही उतार चढ़ाव कभी कभी संबंधों में उलझन पैदा कर देते हैं।
चंद्रमा के चरणों की तरह आपके साथी की मनोदशा भी बदलती दिखाई देती है। जब वह प्रसन्न होता है तो पूरा घर खुशियों से भर जाता है। मुस्कान और स्नेह से वातावरण हल्का हो जाता है। परंतु जब निराशा या क्रोध घेर लेता है तो उस क्षण उसके व्यवहार को संभालना थोड़ा कठिन हो सकता है। यहां समझदारी यही है कि उस समय किसी भी बात को अंतिम सत्य न माना जाए क्योंकि मूड शांत होने पर वही व्यक्ति बहुत कोमल और सहायक बन जाता है।
चंद्रमा मन का प्रतीक होने से ऐसा जीवनसाथी आपकी अंदरूनी दुनिया को अच्छी तरह पढ़ लेता है। बिना कहे भी उदासी समझ लेता है और सांत्वना देने की कोशिश करता है। कई बार ऐसा भी होता है कि साथी उम्र में बराबर या छोटा होता है लेकिन भावनात्मक परिपक्वता अधिक दिखाता है। जल तत्व का ग्रह होने के कारण घर में स्नेह और अपनापन बना रहता है बशर्ते भावनाओं को सही दिशा दी जाए।
मंगल को ऊर्जा साहस और संघर्ष का प्रतिनिधि माना जाता है। इसका दूसरा नाम अंगारक भी है जिसका अर्थ है गरम कोयला या चिंगारी। जब यही ग्रह सप्तम भाव में आकर बैठता है तो संबंधों में एक प्रकार की तीव्रता आ जाती है। जीवनसाथी आत्मविश्वासी होता है बोल्ड होता है और जीवन के हर क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाना पसंद करता है।
ऐसे योग में साथी के भीतर जोश अधिक रहता है। अपने प्रियजनों के लिए लड़ने की क्षमता उसमें स्वाभाविक होती है। यदि कोई व्यक्ति आपको तकलीफ पहुंचाए तो सबसे पहले वही आगे बढ़कर आपका पक्ष लेगा। कठिन समय में वह पीछे नहीं हटेगा बल्कि संघर्ष में आपके साथ खड़ा रहेगा। यही कारण है कि मंगल सप्तम भाव में हो तो साथी सुरक्षा कवच की तरह व्यवहार करता है।
दूसरी ओर यही उग्रता कभी कभी क्रोध में बदल जाती है। निर्णय जल्दी लेने की आदत के कारण कई बार बिना सोचे समझे ऐसे वचन या फैसले हो जाते हैं जिनका परिणाम बाद में पछतावा बन सकता है। यदि कुंडली में अन्य संयोजन भी ऐसे हों तो मांगलिक दोष की स्थिति बन सकती है जो वैवाहिक जीवन को तनावपूर्ण बना देती है। ऐसे समय में धैर्य संवाद और कुछ आध्यात्मिक अनुशासन संबंधों को संतुलित करने में सबसे बड़ा सहारा बनते हैं।
बुध बुद्धि वाणी तर्क और व्यापारिक समझ का ग्रह है। जब यह सप्तम भाव में स्थित होता है तो जीवनसाथी के व्यक्तित्व में एक अलग ही आकर्षण दिखाई देता है। ऐसा व्यक्ति आमतौर पर बातचीत से लोगों का मन जीत लेता है। उसकी भाषा सरल लेकिन प्रभावशाली होती है और वह मजाकिया होते हुए भी सीमा नहीं लांघता।
सप्तम भाव में बुध की स्थिति आपको ऐसा साथी देती है जिसके साथ बैठकर बातें करने में समय का पता नहीं चलता। विचारों का स्तर अच्छा होता है और वह परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता रखता है। कठिन समय आए तो भी वह घबराने के बजाय व्यावहारिक समाधान खोजने की कोशिश करता है। इसी कारण ऐसा साथी केवल जीवनसाथी ही नहीं बल्कि एक अच्छा मित्र भी सिद्ध होता है जिससे हर विषय पर खुलकर चर्चा की जा सके।
कई बार बुध की तीक्ष्ण बुद्धि आलोचनात्मक प्रवृत्ति में बदल जाती है। तब साथी छोटी छोटी बातों पर टिप्पणी करने लगता है या निर्णय लेने में अधिक सोच विचार के कारण उलझ जाता है। यह स्थिति अनिर्णय की ओर ले जाती है जिससे संबंधों में ठहराव महसूस हो सकता है। यदि दोनों पक्ष एक दूसरे की बात धैर्य से सुनें और संवाद को सम्मानजनक रखें तो यह योग वैवाहिक जीवन को बहुत बौद्धिक और आनंददायक बना सकता है।
| ग्रह | सकारात्मक गुण | संभावित कमजोरियां |
|---|---|---|
| बुध | मजाकिया, समझदार, स्पष्टवादी | अधिक आलोचना, अनिर्णय की प्रवृत्ति |
बृहस्पति को गुरु भी कहा जाता है। यह ग्रह ज्ञान विस्तार संरक्षण और भाग्य का सूचक है। जब बृहस्पति सप्तम भाव में स्थित होता है तो यह स्थिति वैवाहिक जीवन के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। ऐसा योग जीवनसाथी के रूप में एक ऐसा व्यक्ति देता है जो केवल साथी ही नहीं बल्कि मार्गदर्शक भी बन जाता है।
ऐसे जीवनसाथी का स्वभाव सामान्यतः सकारात्मक रहता है। कठिन परिस्थिति आए तो वह हिम्मत नहीं हारता बल्कि यह सोचता है कि इससे क्या सीख मिल सकती है। वह नए विचारों को खुले मन से स्वीकार करता है और रिश्तों में नैतिकता और ईमानदारी को बहुत महत्व देता है। उसके व्यक्तित्व में एक चुंबकीय आकर्षण होता है जिससे लोग स्वाभाविक रूप से प्रभावित होते हैं।
शिक्षा की दृष्टि से भी यह योग मजबूत समझा जाता है। साथी पढ़ा लिखा होता है और कई बार उच्च शिक्षा या आध्यात्मिक अध्ययन से जुड़ा होता है। उसे कानून शिक्षा धर्म या सलाहकारी क्षेत्रों में विशेष रुचि हो सकती है। हालांकि बृहस्पति की अधिकता कभी कभी अति आत्मविश्वास में बदल जाती है। पैसे के मामले में भी हाथ खुला हो सकता है जिससे खर्च बढ़ जाता है। यदि आर्थिक योजना संतुलित हो और विनम्रता बनी रहे तो यह योग जीवन भर के लिए सुरक्षा और प्रसन्नता प्रदान करता है।
शुक्र को सौंदर्य प्रेम मनोरंजन और भोग का कारक माना जाता है। जब शुक्र सप्तम भाव में आकर बैठता है तो यह योग अक्सर आदर्श विवाह का संकेत देता है। ऐसा जीवनसाथी आमतौर पर आकर्षक व्यक्तित्व वाला होता है। उसके पहनावे बोलचाल और व्यवहार में एक सहज नजाकत दिखाई देती है जो लोगों को उसकी ओर खींचती है।
ऐसे योग में संबंधों में रोमांस की कमी नहीं रहती। साथी कला संगीत सजावट या रचनात्मक कार्यों की ओर झुकाव रख सकता है। दांपत्य जीवन में एक प्रकार की कोमलता होती है जिससे विवाद भी बहुत दूर तक नहीं बढ़ते। जब भी मनमुटाव होता है तो यही शुक्र की ऊर्जा धीरे धीरे स्थिति को नरम कर देती है और दोनों पक्ष किसी सुंदर समाधान पर पहुंच जाते हैं।
नकारात्मक पक्ष में शुक्र अतिभोग या भौतिक आकर्षण की ओर खींच सकता है। तब साथी को सुंदर वस्तुओं आरामदायक जीवन शैली और विलासिता में अधिक रुचि हो सकती है। यदि यह प्रवृत्ति नियंत्रण से बाहर हो जाए तो आर्थिक दबाव या अपेक्षाओं की अधिकता से तनाव उत्पन्न हो सकता है। इसलिए इस योग में प्रेम के साथ साथ व्यावहारिक संतुलन और जिम्मेदारी का भाव बनाए रखना बहुत आवश्यक होता है।
शनि का नाम आते ही मन में कठोरता परीक्षा और देरी की भावना आती है। सप्तम भाव में शनि की स्थिति को अक्सर लोग डर के साथ देखते हैं क्योंकि इसे असफल विवाह या विलंबित विवाह से जोड़ा जाता है। परंतु शनि की ऊर्जा को केवल दंड के रूप में समझना उचित नहीं है। यह ग्रह कर्म का कारक है जो जीवन को अनुशासित और स्थिर बनाना चाहता है।
सप्तम भाव में शनि होने पर विवाह के निर्णय में देरी हो सकती है या उचित साथी मिलने में समय लग सकता है। पर जब विवाह होता है तो संबंध हल्के फुल्के भावुक निर्णय से अधिक जिम्मेदारी और वास्तविकता पर आधारित होता है। ऐसा जीवनसाथी कई बार उम्र में बड़ा होता है या स्वभाव से गंभीर और व्यावहारिक होता है। वह भावनाओं की बजाय कर्म और कर्तव्यों को प्राथमिकता देता है।
यह योग संबंधों में परीक्षा तो लाता है पर साथ ही सहनशक्ति भी देता है। वैवाहिक जीवन में जो व्यक्ति धैर्य रखता है और संबंध को निभाने का प्रयास करता है उसके लिए शनि अंततः सुरक्षा और स्थायित्व का वरदान बन जाता है। कई बार देखा जाता है कि ऐसे लोग शुरू में संघर्ष करते हैं पर उम्र के साथ उनका विवाह दूसरों की तुलना में अधिक स्थिर और गहरा हो जाता है।
राहु को छाया ग्रह माना जाता है जिसकी प्रकृति असामान्य और असंतुलित मानी जाती है। सप्तम भाव में राहु की उपस्थिति विवाह और साझेदारी के क्षेत्र में अचानक घटनाओं और अनपेक्षित मोड़ों का संकेत देती है। ऐसा योग कई बार विदेशी पृष्ठभूमि के जीवनसाथी या अलग संस्कृति के व्यक्ति से विवाह की संभावना भी बढ़ा देता है।
राहु सप्तम भाव में हो तो जीवनसाथी में साहस और जोखिम लेने की क्षमता देखी जा सकती है। कठिन परिस्थिति में वह हिम्मत दिखाता है और पारंपरिक सोच से हटकर निर्णय ले सकता है। परंतु यही स्वभाव कभी चालाकी या स्वार्थ के रूप में भी सामने आ सकता है। मनमौजी होना और सीमाएं न समझ पाना वैवाहिक जीवन में खींचातानी का कारण बनता है।
अक्सर इस योग में विवाह में देरी की संभावना रहती है या विवाह के बाद मतभेद बढ़ें तो अलगाव की स्थिति बन सकती है। इसलिए ऐसी कुंडली में सही समय और सही रिश्ता चुनना बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि व्यक्ति जागरूक होकर संबंधों में पारदर्शिता और अनुशासन लाए तो राहु के कारण मिलने वाली तीव्रता को सकारात्मक दिशा दी जा सकती है।
केतु भी छाया ग्रह है पर इसकी प्रकृति राहु से अलग मानी जाती है। यह ग्रह वैराग्य आध्यात्मिक झुकाव और भीतर की खोज का द्योतक है। जब केतु सप्तम भाव में आकर बैठता है तो जीवनसाथी अक्सर साधारण जीवन शैली पसंद करने वाला होता है जिसे बाहरी दिखावे से अधिक भीतर की शांति की खोज रहती है।
ऐसा साथी भावनात्मक रूप से स्थिर हो सकता है और अत्यधिक नाटकीयता से दूर रहता है। खुशी हो या दुख वह दोनों स्थितियों में अपेक्षाकृत संतुलित दिखाई देता है। कठिन समय में चुपचाप साथ खड़े रहना उसकी विशेषता होती है। उसे धन संपत्ति नाम या सामाजिक प्रतिष्ठा का विशेष लोभ नहीं होता और यही कारण है कि वह आलंकारिक बातों से प्रभावित नहीं होता।
दूसरी ओर केतु के कारण जीवन की दिशा को लेकर कभी कभी भ्रम भी रह सकता है। साथी के भीतर स्पष्ट लक्ष्य की कमी हो या निर्णय बदलने की प्रवृत्ति दिखे तो वैवाहिक जीवन में आपको अतिरिक्त जिम्मेदारी उठानी पड़ सकती है। कई बार फिजूलखर्ची या बिखरी हुई योजना भी समस्या बनती है। ऐसे समय में धैर्यपूर्वक मार्गदर्शन और संयुक्त योजना बनाकर संबंध को सुरक्षित दिशा दी जा सकती है।
| ग्रह | मुख्य विशेषता | संभावित चुनौती |
|---|---|---|
| राहु | साहसी, निर्णय लेने वाला | विवाह में देरी या अलगाव |
| केतु | आध्यात्मिक और वैराग्यशील | दिशा की कमी, फिजूलखर्ची |
सप्तम भाव में स्थित ग्रह यह बताते हैं कि व्यक्ति अपने जीवन में कैसी ऊर्जा और किस प्रकार के साथी को आकर्षित करता है। सूर्य हो तो प्रतिष्ठा और नेतृत्व वाला साथी आता है चंद्रमा हो तो भावनात्मक गहराई प्रकट होती है मंगल हो तो संघर्ष की घड़ी में साथ देने वाला योद्धा मिलता है बुध हो तो मित्रवत संवादशील साथी मिलता है।
बृहस्पति की स्थिति उच्च आदर्श और नैतिकता वाला जीवनसाथी देती है। शुक्र विवाह में माधुर्य और आनंद बढ़ाता है। शनि कड़वे अनुभवों के माध्यम से स्थायित्व सिखाता है और राहु केतु जीवन को अचानक मोड़ों और आध्यात्मिक सीखों से भर देते हैं। हर ग्रह अपने ढंग से यह दिखाता है कि व्यक्ति संबंधों में क्या सीखने आया है और किस प्रकार की संगति उसके लिए उचित है।
जो व्यक्ति अपने सप्तम भाव की स्थिति को समझ लेता है वह विवाह को केवल भाग्य का खेल मानकर नहीं चलता बल्कि स्वयं की ऊर्जा पर भी काम करने लगता है। जब भीतर की धारणा संबंधों के प्रति परिपक्व होती है तो कुंडली की चुनौतियां भी अवसर में बदलने लगती हैं। ग्रहों की स्थिति यह संकेत देती है कि सच्चा वैवाहिक सुख केवल सही साथी मिलने से नहीं बल्कि सही दृष्टिकोण विकसित करने से भी प्राप्त होता है।
सप्तम भाव को मजबूत कैसे किया जा सकता है
मन में संबंधों के प्रति सम्मान बढ़ाना सबसे पहला उपाय है। साथ ही संबंधित ग्रहों के लिए उपयुक्त दान मंत्र जाप और सेवा कार्य करने से भी ऊर्जा संतुलित होती है। नियमित रूप से विवाहिता स्त्रियों बुजुर्ग दंपतियों और जरूरतमंद परिवारों की सहायता करना भी इस भाव को बल देता है।
विवाह में देरी के ज्योतिषीय संकेत क्या होते हैं
शनि या राहु की कड़ी दृष्टि या स्थिति अक्सर देरी का संकेत देती है। इसके अलावा सप्तम भाव के स्वामी की कमजोर स्थिति या उसकी पाप ग्रहों से पीड़ा भी देर से विवाह की ओर इशारा करती है। साथ ही चल रही दशा और गोचर भी समय निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
क्या ग्रहों के उपाय से जीवनसाथी का स्वभाव बदला जा सकता है
पूरी तरह किसी का स्वभाव बदलना संभव नहीं लेकिन वातावरण को शांत और सहयोगपूर्ण बनाना उपायों से आसान हो जाता है। जब दोनों पक्ष अपने व्यवहार और प्रतिक्रिया पर सजगता रखें तो ग्रहों से होने वाले टकराव काफी कम हो जाते हैं। मंत्र जाप सत्संग और संयुक्त प्रार्थना संबंधों में स्नेह बढ़ाने में सहायक होती है।
कुंडली मिलान के समय सप्तम भाव पर इतना जोर क्यों दिया जाता है
क्योंकि यही भाव वैवाहिक सुख असंतोष या अलगाव की जड़ दिखाता है। जब दोनों पक्षों की कुंडली में सप्तम भाव और उसके स्वामी की स्थिति एक दूसरे के अनुकूल हो तो साथ चलने की संभावना बढ़ जाती है। गुण मिलान के साथ साथ व्यवहारिक मिलान और परिवारिक पृष्ठभूमि भी देखना जरूरी होता है।
सप्तम भाव के ग्रहों का प्रभाव कब स्पष्ट रूप से दिखाई देता है
अक्सर विवाह के बाद या संबंधित ग्रह की दशा और अंतरदशा के समय यह प्रभाव अधिक स्पष्ट हो जाते हैं। कुछ लोगों में तो सगाई या गंभीर संबंध बनते ही सप्तम भाव सक्रिय हो जाता है और जीवन की दिशा बदलने लगता है। इसीलिए समय समय पर कुंडली का पुनः विश्लेषण करना लाभदायक रहता है।
सटीक कुंडली मिलान परिणाम पाएं
कुंडली मिलानअनुभव: 25
इनसे पूछें: करियर, पारिवारिक मामले, विवाह
इनके क्लाइंट: छ.ग., म.प्र., दि.
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