अष्टकवर्ग गणना: ब्रह्मांडीय अंकन की संपूर्ण चरण दर चरण मार्गदर्शिका

By पं. नीलेश शर्मा

ग्रहीय शक्ति को संख्यात्मक बिंदुओं में परिवर्तित करने की प्राचीन प्रणाली

अष्टकवर्ग गणना: वैदिक ज्योतिष में ग्रहीय शक्ति का संपूर्ण विश्लेषण

सामग्री तालिका

ब्रह्मांड के रहस्यमय नियमों को समझना मनुष्य के जीवन के लिए सर्वदा महत्वपूर्ण रहा है। वैदिक ज्योतिष के इतिहास में अष्टकवर्ग एक ऐसी प्राचीन और विज्ञानसम्मत प्रणाली है जो गुणात्मक ग्रहीय संबंधों को मापनीय संख्यात्मक स्कोर में रूपांतरित करती है। इसके माध्यम से जातक के जीवन में किन राशियों और भावों में सफलता, समृद्धि और वृद्धि सर्वाधिक संभावित है, यह ज्ञान प्राप्त होता है। अष्टकवर्ग पद्धति न केवल एक गणितीय संरचना है, बल्कि यह कर्मफल के विश्लेषण का एक परिपूर्ण मानचित्र प्रदान करती है जो प्रत्येक व्यक्ति के भाग्य के कण्ठस्थल को परिभाषित करता है।

मूल अवधारणा: आकाशीय गणन पद्धति

अष्टकवर्ग प्रणाली को समझने के लिए सर्वप्रथम इसके बुनियादी सिद्धांत को ग्रहण करना आवश्यक है। संस्कृत में अष्ट का अर्थ है आठ और वर्ग का अर्थ है विभाजन अथवा स्रोत। इस समस्त प्रणाली को एक "गणनापत्र" के रूप में समझा जा सकता है जहाँ बिंदु नामक अंक प्रत्येक राशि को प्रदान किए जाते हैं। ये बिंदु आठ विभिन्न स्रोतों से आते हैं। यह प्रणाली आपके जन्मपत्र के प्रत्येक बारह राशियों के लिए एक विस्तृत स्कोरबोर्ड तैयार करती है।

जो कुछ भी गणना की जा रही है उसे विस्तार से समझने के लिए हमें यह जानना आवश्यक है कि अष्टकवर्ग में कौन से तत्व सम्मिलित हैं और कौन से नहीं। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि ये सातों क्लासिकल ग्रह अष्टकवर्ग गणना में सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त लग्न अर्थात आरोही भी आठवें स्रोत के रूप में कार्य करता है। परंतु राहु और केतु किसी भी परिस्थिति में अष्टकवर्ग गणना में सम्मिलित नहीं किए जाते क्योंकि ये छायाग्रह हैं और इनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है।

अष्टकवर्ग की द्वैध गणना संरचना

अष्टकवर्ग गणना की प्रक्रिया दो स्पष्ट और विभिन्न स्तरों में विभाजित है। प्रथम स्तर को भिन्न अष्टकवर्ग कहा जाता है जो प्रत्येक ग्रह के लिए व्यक्तिगत स्कोरकार्ड का कार्य करता है। द्वितीय स्तर को सर्व अष्टकवर्ग कहा जाता है जो सभी ग्रहों के स्कोरों को समूहित करके एक महान कुल स्कोरबोर्ड का निर्माण करता है। ये दोनों ही स्तर महत्वपूर्ण हैं और पहले भिन्न अष्टकवर्ग की गणना किए बिना सर्व अष्टकवर्ग का निर्माण नहीं किया जा सकता।

भिन्न अष्टकवर्ग: व्यक्तिगत ग्रहीय योगदान

अंकन प्रणाली को समझना

भिन्न अष्टकवर्ग प्रणाली में प्रत्येक ग्रह के लिए बारह राशियों में से प्रत्येक में एक अंक प्रदान किया जाता है। इस अंक को बिंदु कहा जाता है और यह शून्य से आठ तक का हो सकता है। प्रत्येक बिंदु का अर्थ है कि आठ स्रोतों में से कितने स्रोत उस ग्रह को उस विशेष राशि में शुभ प्रभाव प्रदान करते हैं। बिंदु का अर्थ होता है शुभ अथवा अनुकूल बिंदु जिसका मान एक होता है। रेखा का अर्थ होता है अशुभ अथवा प्रतिकूल बिंदु जिसका मान शून्य होता है।

बिंदु वितरण की प्रणाली अत्यंत सुव्यवस्थित है। ब्रह्मपराशर होरा शास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों से व्युत्पन्न नियमों के अनुसार प्रत्येक ग्रह को निर्धारित भावों में ही शुभ बिंदु दिए जाते हैं। ये नियम सार्वभौमिक हैं और सभी जातकों के चार्ट में समान रूप से लागू होते हैं। इस प्रणाली में कोई व्यक्तिगत विचलन नहीं होता और सभी गणनाएं विज्ञानसम्मत तरीके से संपादित की जाती हैं।

प्रत्येक ग्रह के लिए निर्धारित नियम

सूर्य के अष्टकवर्ग नियम

सूर्य का अष्टकवर्ग गणना करते समय सूर्य स्वयं से गिनकर पहली, दूसरी, चौथी, सातवीं, आठवीं, नवमी, दशमी और ग्यारहवीं भाव में एक बिंदु देता है। चंद्रमा से गिनकर सूर्य को तीसरी, छठी, दशमी और ग्यारहवीं भाव में बिंदु प्राप्त होते हैं। मंगल से गिनकर सूर्य को पहली, दूसरी, चौथी, सातवीं, आठवीं, नवमी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं। बुध से गिनकर सूर्य को तीसरी, पाँचवीं, छठी, नवमी, दशमी, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों से बिंदु प्राप्त होते हैं। बृहस्पति से सूर्य को पाँचवीं, छठी, नवमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु दिए जाते हैं। शुक्र से गिनकर सूर्य को छठी, सातवीं और बारहवीं भावों में ही बिंदु मिलते हैं। शनि से गिनकर सूर्य को पहली, दूसरी, चौथी, सातवीं, आठवीं, नवमी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। लग्न से गिनकर सूर्य को तीसरी, चौथी, छठी, दशमी, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं।

संदर्भ स्रोत अनुकूल भाव
सूर्य स्वयं1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11
चंद्रमा3, 6, 10, 11
मंगल1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11
बुध3, 5, 6, 9, 10, 11, 12
बृहस्पति5, 6, 9, 11
शुक्र6, 7, 12
शनि1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11
लग्न3, 4, 6, 10, 11, 12

चंद्रमा के अष्टकवर्ग नियम

चंद्रमा के भिन्न अष्टकवर्ग की गणना करने के लिए भी समान प्रक्रिया अपनाई जाती है लेकिन चंद्रमा के लिए अनुकूल भाव अलग होते हैं। सूर्य से गिनकर चंद्रमा को तीसरी, छठी, सातवीं, आठवीं, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। चंद्रमा स्वयं से पहली, तीसरी, छठी, सातवीं, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु देता है। मंगल से चंद्रमा को दूसरी, तीसरी, पाँचवीं, छठी, नवमी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं। बुध से गिनकर चंद्रमा को पहली, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, सातवीं, आठवीं, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। बृहस्पति से चंद्रमा को पहली, चौथी, सातवीं, आठवीं, दशमी, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में बिंदु दिए जाते हैं। शुक्र से चंद्रमा को तीसरी, चौथी, पाँचवीं, सातवीं, नवमीं, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं। शनि से गिनकर चंद्रमा को तीसरी, पाँचवीं, छठी और ग्यारहवीं भावों में ही बिंदु प्राप्त होते हैं। लग्न से चंद्रमा को तीसरी, छठी, दशमी, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं।

संदर्भ स्रोत अनुकूल भाव
सूर्य3, 6, 7, 8, 10, 11
चंद्रमा स्वयं1, 3, 6, 7, 10, 11
मंगल2, 3, 5, 6, 9, 10, 11
बुध1, 3, 4, 5, 7, 8, 10, 11
बृहस्पति1, 4, 7, 8, 10, 11, 12
शुक्र3, 4, 5, 7, 9, 10, 11
शनि3, 5, 6, 11
लग्न3, 6, 10, 11, 12

मंगल के अष्टकवर्ग नियम

मंगल ग्रह का अष्टकवर्ग अलग सूत्रों के अनुसार निर्धारित किया जाता है क्योंकि मंगल अपनी ऊर्जा और साहस के कारण भिन्न प्रकार की कार्यप्रणाली दर्शाता है। सूर्य से गिनकर मंगल को तीसरी, पाँचवीं, छठी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। चंद्रमा से मंगल को तीसरी, छठी और ग्यारहवीं भावों में ही बिंदु मिलते हैं। मंगल स्वयं से पहली, दूसरी, चौथी, सातवीं, आठवीं, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु देता है। बुध से गिनकर मंगल को तीसरी, पाँचवीं, छठी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। बृहस्पति से मंगल को छठी, दशमी, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में बिंदु दिए जाते हैं। शुक्र से गिनकर मंगल को छठी, आठवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं। शनि से मंगल को पहली, चौथी, सातवीं, आठवीं, नवमी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। लग्न से मंगल को पहली, तीसरी, छठी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं।

संदर्भ स्रोत अनुकूल भाव
सूर्य3, 5, 6, 10, 11
चंद्रमा3, 6, 11
मंगल स्वयं1, 2, 4, 7, 8, 10, 11
बुध3, 5, 6, 11
बृहस्पति6, 10, 11, 12
शुक्र6, 8, 11, 12
शनि1, 4, 7, 8, 9, 10, 11
लग्न1, 3, 6, 10, 11

बुध के अष्टकवर्ग नियम

बुध ग्रह बुद्धि और वाणी का प्रतीक है और इसका अष्टकवर्ग भी विशेष नियमों के अनुसार निर्धारित किया जाता है। सूर्य से गिनकर बुध को पाँचवीं, छठी, नवमीं, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। चंद्रमा से बुध को दूसरी, चौथी, छठी, आठवीं, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं। मंगल से गिनकर बुध को पहली, दूसरी, चौथी, सातवीं, आठवीं, नवमी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। बुध स्वयं से पहली, तीसरी, पाँचवीं, छठी, नवमी, दशमी, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में बिंदु देता है। बृहस्पति से बुध को छठी, आठवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में बिंदु दिए जाते हैं। शुक्र से गिनकर बुध को पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, आठवीं, नवमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं। शनि से बुध को पहली, दूसरी, चौथी, सातवीं, आठवीं, नवमी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। लग्न से बुध को पहली, दूसरी, चौथी, छठी, आठवीं, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं।

संदर्भ स्रोत अनुकूल भाव
सूर्य3, 5, 6, 10, 11
चंद्रमा3, 6, 11
मंगल स्वयं1, 2, 4, 7, 8, 10, 11
बुध3, 5, 6, 11
बृहस्पति6, 10, 11, 12
शुक्र6, 8, 11, 12
शनि1, 4, 7, 8, 9, 10, 11
लग्न1, 3, 6, 10, 11

बृहस्पति के अष्टकवर्ग नियम

बृहस्पति सौभाग्य और विस्तार का ग्रह है और इसका अष्टकवर्ग विशेषतः महत्वपूर्ण होता है। सूर्य से गिनकर बृहस्पति को पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, सातवीं, आठवीं, नवमी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। चंद्रमा से बृहस्पति को दूसरी, पाँचवीं, सातवीं, नवमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं। मंगल से गिनकर बृहस्पति को पहली, दूसरी, चौथी, सातवीं, आठवीं, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। बुध से बृहस्पति को पहली, दूसरी, चौथी, पाँचवीं, छठी, नवमी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु दिए जाते हैं। बृहस्पति स्वयं से पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, सातवीं, आठवीं, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु देता है। शुक्र से गिनकर बृहस्पति को दूसरी, पाँचवीं, छठी, नवमी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं। शनि से बृहस्पति को तीसरी, पाँचवीं, छठी और बारहवीं भावों में ही बिंदु प्राप्त होते हैं। लग्न से बृहस्पति को पहली, दूसरी, चौथी, पाँचवीं, छठी, सातवीं, नवमी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं।

संदर्भ स्रोत अनुकूल भाव
सूर्य5, 6, 9, 11, 12
चंद्रमा2, 4, 6, 8, 10, 11
मंगल1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11
बुध स्वयं1, 3, 5, 6, 9, 10, 11, 12
बृहस्पति6, 8, 11, 12
शुक्र1, 2, 3, 4, 5, 8, 9, 11
शनि1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11
लग्न1, 2, 4, 6, 8, 10, 11

शुक्र के अष्टकवर्ग नियम

शुक्र प्रेम, सौंदर्य और आनंद का ग्रह है और इसका अष्टकवर्ग भी विशेष महत्व रखता है। सूर्य से गिनकर शुक्र को आठवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में ही बिंदु प्राप्त होते हैं। चंद्रमा से शुक्र को पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, आठवीं, नवमी, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं। मंगल से गिनकर शुक्र को तीसरी, पाँचवीं, छठी, नवमी, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। बुध से शुक्र को तीसरी, पाँचवीं, छठी, नवमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु दिए जाते हैं। बृहस्पति से गिनकर शुक्र को पाँचवीं, आठवीं, नवमी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं। शुक्र स्वयं से पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, आठवीं, नवमी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु देता है। शनि से गिनकर शुक्र को छठी, चौथी, पाँचवीं, आठवीं, नवमी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। लग्न से शुक्र को पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, आठवीं और नवमी भावों में बिंदु मिलते हैं।

संदर्भ स्रोत अनुकूल भाव
सूर्य5, 6, 9, 11, 12
चंद्रमा2, 4, 6, 8, 10, 11
मंगल1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11
बुध स्वयं1, 3, 5, 6, 9, 10, 11, 12
बृहस्पति6, 8, 11, 12
शुक्र1, 2, 3, 4, 5, 8, 9, 11
शनि1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11
लग्न1, 2, 4, 6, 8, 10, 11

शनि के अष्टकवर्ग नियम

शनि कर्म और समय का ग्रह है और इसका अष्टकवर्ग गहन परिणाम दर्शाता है। सूर्य से गिनकर शनि को पहली, दूसरी, चौथी, सातवीं, आठवीं, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। चंद्रमा से शनि को तीसरी, छठी और ग्यारहवीं भावों में ही बिंदु मिलते हैं। मंगल से गिनकर शनि को तीसरी, पाँचवीं, छठी, दशमी, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। बुध से शनि को छठी, आठवीं, नवमी, दशमी, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में बिंदु दिए जाते हैं। बृहस्पति से गिनकर शनि को पाँचवीं, छठी, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं। शुक्र से शनि को छठी, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में ही बिंदु प्राप्त होते हैं। शनि स्वयं से तीसरी, पाँचवीं, छठी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु देता है। लग्न से शनि को पहली, तीसरी, चौथी, छठी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं।

संदर्भ स्रोत अनुकूल भाव
सूर्य1, 2, 4, 7, 8, 10, 11
चंद्रमा3, 6, 11
मंगल3, 5, 6, 10, 11, 12
बुध6, 8, 9, 10, 11, 12
बृहस्पति5, 6, 11, 12
शुक्र6, 11, 12
शनि स्वयं3, 5, 6, 11
लग्न1, 3, 4, 6, 10, 11

लग्न के अष्टकवर्ग नियम

लग्न अर्थात आरोही जातक का आत्मतत्व और व्यक्तित्व का प्रतीक है और इसका अष्टकवर्ग भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। सूर्य से गिनकर लग्न को तीसरी, चौथी, छठी, दशमी, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। चंद्रमा से लग्न को तीसरी, छठी, दशमी, ग्यारहवीं और बारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं। मंगल से गिनकर लग्न को पहली, तीसरी, छठी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। बुध से लग्न को पहली, दूसरी, चौथी, छठी, आठवीं, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु दिए जाते हैं। बृहस्पति से गिनकर लग्न को पहली, दूसरी, चौथी, पाँचवीं, छठी, सातवीं, नवमी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं। शुक्र से लग्न को पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, आठवीं और नवमी भावों में बिंदु प्राप्त होते हैं। शनि से गिनकर लग्न को पहली, तीसरी, चौथी, छठी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु मिलते हैं। लग्न स्वयं से तीसरी, छठी, दशमी और ग्यारहवीं भावों में बिंदु देता है।

संदर्भ स्रोत अनुकूल भाव
सूर्य1, 2, 4, 7, 8, 10, 11
चंद्रमा3, 6, 11
मंगल3, 5, 6, 10, 11, 12
बुध6, 8, 9, 10, 11, 12
बृहस्पति5, 6, 11, 12
शुक्र6, 11, 12
शनि स्वयं3, 5, 6, 11
लग्न1, 3, 4, 6, 10, 11

गणना प्रक्रिया: चरण दर चरण मार्गदर्शिका

प्रथम चरण: जन्मपत्र की तैयारी

अष्टकवर्ग की गणना आरंभ करने से पहले आपके जन्मपत्र को सही ढंग से तैयार करना आवश्यक है। इसके लिए सातों ग्रहों के सही भाव स्थान और लग्न की जानकारी होनी अनिवार्य है। प्रत्येक ग्रह के बारे में यह जानकारी होनी चाहिए कि वह किस राशि में स्थित है। राशि को संख्याओं से दर्शाया जाता है जहाँ मेष राशि पहली राशि है और मीन राशि बारहवीं राशि है। उदाहरण के लिए यदि सूर्य मेष राशि में है तो उसे 1 से दर्शाया जाता है। यदि सूर्य वृषभ राशि में है तो उसे 2 से दर्शाया जाता है और यह क्रम इसी प्रकार चलता रहता है। लग्न भी किसी न किसी राशि में होता है और उसकी राशि संख्या भी निर्धारित करनी आवश्यक है।

उदाहरण चार्ट के लिए निम्नलिखित ग्रह स्थान माना जा सकता है:

संदर्भ स्रोत अनुकूल भाव
सूर्य3, 4, 6, 10, 11, 12
चंद्रमा3, 6, 10, 11, 12
मंगल1, 3, 6, 10, 11
बुध1, 2, 4, 6, 8, 10, 11
बृहस्पति1, 2, 4, 5, 6, 7, 9, 10, 11
शुक्र1, 2, 3, 4, 5, 8, 9
शनि1, 3, 4, 6, 10, 11
लग्न स्वयं3, 6, 10, 11

द्वितीय चरण: सूर्य का भिन्न अष्टकवर्ग गणना

सूर्य का भिन्न अष्टकवर्ग निकालने के लिए सूर्य की प्रत्येक राशि में शक्ति की गणना करनी पड़ती है। चूँकि हमारे उदाहरण में सूर्य मेष राशि में है, हमें मेष राशि से लेकर सभी बारह राशियों तक की गणना करनी है। मेष राशि से ही हम गिनती शुरू करते हैं और यह पहली राशि है। मेष से मेष की दूरी पहली भाव है, मेष से वृषभ की दूरी दूसरी भाव है और इसी प्रकार आगे चलता है।

मेष राशि में सूर्य के लिए हमें यह देखना है कि आठों स्रोत मेष में कितने अनुकूल हैं। सूर्य स्वयं मेष में है और उसकी सूची में मेष से 1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11 भाव अनुकूल हैं। मेष से मेष 1 भाव है तो यह अनुकूल है और बिंदु मिलता है। अब चंद्रमा के बारे में सोचते हैं जो कर्क राशि में है। कर्क मेष से चौथी राशि है अर्थात चौथी भाव है। चंद्रमा की सूची में 3, 6, 10, 11 भाव अनुकूल हैं। चौथी भाव इस सूची में नहीं है तो बिंदु नहीं मिलता। मंगल सिंह राशि में है जो मेष से पाँचवीं राशि है अर्थात पाँचवीं भाव है। मंगल की सूची में 1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11 भाव अनुकूल हैं। पाँचवीं भाव इस सूची में नहीं है तो बिंदु नहीं मिलता।

बुध वृषभ राशि में है जो मेष से दूसरी राशि है अर्थात दूसरी भाव है। बुध की सूची में 3, 5, 6, 9, 10, 11, 12 भाव अनुकूल हैं। दूसरी भाव इस सूची में नहीं है तो बिंदु नहीं मिलता। बृहस्पति धनु राशि में है जो मेष से नवमी राशि है अर्थात नवमी भाव है। बृहस्पति की सूची में 5, 6, 9, 11 भाव अनुकूल हैं। नवमी भाव इस सूची में है तो बिंदु मिलता है। शुक्र मिथुन राशि में है जो मेष से तीसरी राशि है अर्थात तीसरी भाव है। शुक्र की सूची में 6, 7, 12 भाव अनुकूल हैं। तीसरी भाव इस सूची में नहीं है तो बिंदु नहीं मिलता। शनि तुला राशि में है जो मेष से सातवीं राशि है अर्थात सातवीं भाव है। शनि की सूची में 1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11 भाव अनुकूल हैं। सातवीं भाव इस सूची में है तो बिंदु मिलता है। लग्न कन्या राशि में है जो मेष से छठी राशि है अर्थात छठी भाव है। लग्न की सूची में 3, 4, 6, 10, 11, 12 भाव अनुकूल हैं। छठी भाव इस सूची में है तो बिंदु मिलता है।

तो मेष राशि में सूर्य को कुल 5 बिंदु मिलते हैं। यह प्रक्रिया प्रत्येक राशि के लिए दोहराई जाती है और सूर्य के लिए एक संपूर्ण तालिका बनाई जाती है।

स्रोत राशि भाव अनुकूल? परिणाम
सूर्यमेष1हाँ1
चंद्रमाकर्क4नहीं0
मंगलसिंह5नहीं0
बुधवृषभ2नहीं0
बृहस्पतिधनु9हाँ1
शुक्रमिथुन3नहीं0
शनितुला7हाँ1
लग्नकन्या6नहीं0
मेष में कुल3

तृतीय चरण: सभी सातों ग्रहों के भिन्न अष्टकवर्ग की गणना

सूर्य के बाद चंद्रमा के लिए भी यही प्रक्रिया दोहराई जाती है। चंद्रमा कर्क राशि में है, इसलिए कर्क से शुरू करके सभी बारह राशियों के लिए गणना की जाती है। चंद्रमा की अनुकूल भावें अलग हैं और अनुकूलता की जाँच चंद्रमा की सूची के अनुसार की जाती है। इसी प्रकार मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि के लिए भी भिन्न अष्टकवर्ग की गणना की जाती है। प्रत्येक ग्रह के लिए एक अलग तालिका बनाई जाती है जिसमें सभी बारह राशियों के लिए बिंदुओं की संख्या दर्ज की जाती है। यह कार्य बहुत विस्तृत है और साधारणतः एक पूर्ण चार्ट के लिए 2 से 3 घंटे का समय लग सकता है। परंतु आधुनिक समय में इस कार्य को कंप्यूटर सॉफ्टवेयर के माध्यम से तुरंत किया जा सकता है।

प्रत्येक ग्रह के लिए भिन्न अष्टकवर्ग की गणना के बाद एक व्यापक चार्ट बनाया जाता है जिसमें निम्नलिखित जानकारी होती है:

  • मेष राशि में सूर्य के बिंदु, चंद्रमा के बिंदु, मंगल के बिंदु इत्यादि
  • वृषभ राशि में सूर्य के बिंदु, चंद्रमा के बिंदु, मंगल के बिंदु इत्यादि
  • और यह क्रम सभी बारह राशियों के लिए

चतुर्थ चरण: सर्व अष्टकवर्ग का निर्माण

सर्व अष्टकवर्ग का निर्माण सभी भिन्न अष्टकवर्गों को जोड़कर किया जाता है। प्रत्येक राशि के लिए सातों ग्रहों के बिंदुओं को जोड़ा जाता है और कुल बिंदुओं की संख्या निकाली जाती है। यह संख्या उस राशि की समग्र शक्ति को दर्शाती है।

उदाहरण के लिए, मेष राशि में यदि:

  • सूर्य के 5 बिंदु हैं
  • चंद्रमा के 4 बिंदु हैं
  • मंगल के 3 बिंदु हैं
  • बुध के 2 बिंदु हैं
  • बृहस्पति के 4 बिंदु हैं
  • शुक्र के 3 बिंदु हैं
  • शनि के 2 बिंदु हैं
  • लग्न के 2 बिंदु हैं

तो मेष राशि के लिए सर्व अष्टकवर्ग = 5 + 4 + 3 + 2 + 4 + 3 + 2 + 2 = 25 बिंदु

यह प्रक्रिया सभी बारह राशियों के लिए दोहराई जाती है और एक संपूर्ण सर्व अष्टकवर्ग तालिका तैयार की जाती है। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सभी राशियों के सर्व अष्टकवर्ग का कुल योग हमेशा 337 बिंदु होता है। यह एक स्थिर संख्या है और किसी भी जातक के चार्ट में यह संख्या कभी नहीं बदलती।

राशि सूर्य चंद्रमा मंगल बुध बृहस्पति शुक्र शनि लग्न कुल बिंदु
मेष5432432225
वृषभ3434343228
मिथुन4343443227
कर्क3523333325
सिंह4353423226
कन्या3434333326
तुला4343344227
वृश्चिक3323322220
धनु4333433225
मकर3332333222
कुंभ3232322219
मीन3333332221

सर्व अष्टकवर्ग के स्कोर का विश्लेषण और व्याख्या

बिंदु स्कोर की व्याख्या

अष्टकवर्ग में प्रत्येक राशि के बिंदुओं की संख्या बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राशि की समग्र शक्ति को दर्शाती है। 28 बिंदु को एक महत्वपूर्ण सीमा माना जाता है क्योंकि 337 बिंदुओं को 12 राशियों में बाँटने से औसत 28.08 बिंदु प्रति राशि आते हैं। इसलिए 28 बिंदु को संतुलन बिंदु माना जाता है।

30 से अधिक बिंदु वाली राशि को बहुत शुभ माना जाता है। ऐसी राशि जीवन में सुविधा, अवसर और सफलता प्रदान करती है। इस राशि में प्राकृतिक प्रवाह होता है और कार्य सहजता से संपन्न होते हैं।

28 से 30 बिंदु वाली राशि को अच्छी और अनुकूल माना जाता है। यद्यपि परिणाम सकारात्मक होते हैं पर कुछ प्रयास की आवश्यकता भी होती है। जीवन में मिश्रित परिणाम मिलते हैं।

25 से 28 बिंदु वाली राशि को औसत और तटस्थ माना जाता है। इस राशि में न तो विशेष लाभ होते हैं और न ही विशेष हानि। जीवन में संतुलित परिणाम मिलते हैं।

25 से कम बिंदु वाली राशि को कमजोर और चुनौतीपूर्ण माना जाता है। ऐसी राशि में कठिनाई, संघर्ष और कार्मिक चुनौतियाँ होती हैं। इन राशियों में सफलता के लिए अतिरिक्त प्रयास आवश्यक होता है।

बिंदु स्कोर व्याख्या जीवन अनुभव
30 या अधिकअत्यंत शुभ (शक्तिमान केंद्र)प्राकृतिक प्रवाह, अवसर, सफलता
28 से 30अच्छा और अनुकूलसकारात्मक परिणाम, कुछ प्रयास आवश्यक
25 से 28औसत और तटस्थमिश्रित परिणाम, संतुलित स्थिति
25 से कमकमजोर और चुनौतीपूर्णकठिनाई, संघर्ष, अधिक प्रयास आवश्यक

जातक के जीवन की कहानी को पढ़ना

अष्टकवर्ग के माध्यम से किसी व्यक्ति के जीवन की कहानी को बहुत स्पष्टता से समझा जा सकता है। यह समझने के लिए कि किन क्षेत्रों में जीवन प्राकृतिक रूप से सफल होगा और किन क्षेत्रों में कठिनाई का सामना करना पड़ेगा, हमें भावों के साथ राशियों के सर्व अष्टकवर्ग को जोड़ना चाहिए।

उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि किसी जातक का लग्न तुला राशि में है। तब:

  • पहली भाव तुला राशि है जिसका सर्व अष्टकवर्ग 27 है (औसत)
  • दूसरी भाव वृश्चिक राशि है जिसका सर्व अष्टकवर्ग 20 है (कमजोर)
  • तीसरी भाव धनु राशि है जिसका सर्व अष्टकवर्ग 25 है (औसत से कम)
  • चौथी भाव मकर राशि है जिसका सर्व अष्टकवर्ग 22 है (कमजोर)
  • पाँचवी भाव कुंभ राशि है जिसका सर्व अष्टकवर्ग 19 है (बहुत कमजोर)
  • छठी भाव मीन राशि है जिसका सर्व अष्टकवर्ग 21 है (कमजोर)
  • सातवीं भाव मेष राशि है जिसका सर्व अष्टकवर्ग 25 है (औसत से कम)
  • आठवीं भाव वृषभ राशि है जिसका सर्व अष्टकवर्ग 28 है (अच्छा)
  • नवमी भाव मिथुन राशि है जिसका सर्व अष्टकवर्ग 27 है (औसत)
  • दशमी भाव कर्क राशि है जिसका सर्व अष्टकवर्ग 25 है (औसत से कम)
  • ग्यारहवीं भाव सिंह राशि है जिसका सर्व अष्टकवर्ग 26 है (औसत से कम)
  • बारहवीं भाव कन्या राशि है जिसका सर्व अष्टकवर्ग 26 है (औसत से कम)

इस उदाहरण में देखा जा सकता है कि दूसरी भाव (धन) में केवल 20 बिंदु हैं जो बहुत कमजोर है। यह दर्शाता है कि इस जातक को आर्थिक रूप से संघर्ष करना पड़ सकता है। पाँचवीं भाव (संतान) में 19 बिंदु हैं जो अत्यंत कमजोर है। यह दर्शाता है कि इस जातक को संतान प्राप्ति में कठिनाई हो सकती है। सातवीं भाव (विवाह और साझेदारी) में 25 बिंदु हैं जो औसत से कम हैं, यह दर्शाता है कि विवाह में कुछ चुनौतियाँ हो सकती हैं। परंतु आठवीं भाव (विरासत और गुप्त संपत्ति) में 28 बिंदु हैं जो अच्छे हैं। यह दर्शाता है कि इस जातक को अचानक लाभ या विरासत के रूप में धन मिल सकता है।

भाव राशि सर्व अष्टकवर्ग बिंदु अर्थ
1तुला27औसत व्यक्तित्व
2वृश्चिक20कमजोर वित्त
3धनु25औसत भाई-बहन संबंध
4मकर22कमजोर घर और माता
5कुंभ19बहुत कमजोर संतान
6मीन21कमजोर स्वास्थ्य
7मेष25औसत विवाह
8वृषभ28अच्छी विरासत
9मिथुन27अच्छा भाग्य
10कर्क25औसत कैरियर
11सिंह26औसत लाभ
12कन्या26औसत व्यय

ग्रह संक्रमण और अष्टकवर्ग का अनुप्रयोग

मूल सिद्धांत: संक्रमण काल में अष्टकवर्ग की भूमिका

जब कोई ग्रह किसी राशि में संक्रमण (ट्रांजिट) करता है तो उस राशि की शक्ति ग्रह के परिणामों को निर्धारित करती है। यदि संक्रमण करने वाली राशि का सर्व अष्टकवर्ग बहुत अधिक है (30 या अधिक) तो ग्रह के प्रकृति के बावजूद सकारात्मक परिणाम मिलते हैं। यदि ग्रह स्वाभाविक रूप से शुभ नहीं है और राशि में भी कम बिंदु हैं (25 से कम) तो परिणाम नकारात्मक होते हैं।

उदाहरण के लिए, शनि को आमतौर पर कठोर माना जाता है। परंतु यदि शनि दशमी भाव (कैरियर) में संक्रमण करे और दशमी भाव के सर्व अष्टकवर्ग में 35 बिंदु हों तो शनि के द्वारा अनुशासन और कड़ी मेहनत के माध्यम से कैरियर में उल्लेखनीय सफलता मिलेगी। परंतु यदि दशमी भाव में केवल 20 बिंदु हों तो शनि के द्वारा कैरियर में बाधा, विलंब और कठिनाई आएगी।

संक्रमण सूत्र: परिणाम की गुणवत्ता

किसी भी ग्रह के संक्रमण के परिणामों की गुणवत्ता को निम्नलिखित सूत्र से समझा जा सकता है:

परिणाम की गुणवत्ता = (ग्रह का भिन्न अष्टकवर्ग उस राशि में) × (राशि का सर्व अष्टकवर्ष्ट)

यदि कोई ग्रह 6 या 7 बिंदु (उच्च शक्ति) के साथ 35 बिंदु वाली राशि में संक्रमण करे तो परिणाम असाधारण, सुनहरे और अत्यंत लाभकारी होते हैं। इस अवधि में सभी प्रयास सफल होते हैं और नई शुरुआतें विशेषतः अनुकूल होती हैं।

यदि वही ग्रह 2 या 3 बिंदु (कम शक्ति) के साथ 20 बिंदु वाली राशि में संक्रमण करे तो परिणाम कठिन, अवरुद्ध और नुकसानदेह होते हैं। इस अवधि में प्रयास विफल होते हैं और राशि की कमजोरी के कारण ग्रह की शक्ति भी सीमित रहती है।

उदाहरण के लिए, यदि बृहस्पति (भाग्य का ग्रह) ग्यारहवीं भाव में संक्रमण करे जहाँ का सर्व अष्टकवर्ग 40 बिंदु है (बहुत शक्तिशाली) और बृहस्पति का उस राशि में भिन्न अष्टकवर्ग 7 है (उच्च) तो ग्यारहवीं भाव (आय, लाभ, मित्र) के माध्यम से बहुत बड़ी और अप्रत्याशित समृद्धि मिलेगी। इस अवधि में व्यावसायिक विस्तार, लॉटरी, उत्तराधिकार या बड़े लाभ की संभावना अत्यधिक होती है।

व्यावहारिक गणना के लिए सुझाव

पहली बात: आधुनिक सॉफ्टवेयर का उपयोग

अष्टकवर्ग की गणना पूरी तरह से स्वचालित तरीके से आधुनिक ज्योतिष सॉफ्टवेयर द्वारा की जा सकती है। हजारों जातकों के चार्ट के लिए यह विधि सबसे तेज और सबसे सटीक है। सॉफ्टवेयर में केवल जन्म की तारीख, समय और स्थान दर्ज करना होता है और सर्व अष्टकवर्ग तुरंत प्राप्त हो जाता है। यह सॉफ्टवेयर सभी परिकलनों को सटीकता से करते हैं और मानवीय त्रुटि की संभावना को समाप्त करते हैं।

दूसरी बात: मैनुअल गणना के लिए सावधानी

यदि कोई मैनुअल रूप से अष्टकवर्ग की गणना करना चाहता है तो निम्नलिखित सावधानियाँ आवश्यक हैं। सबसे पहले किसी एक ग्रह के भिन्न अष्टकवर्ग को पूरी तरह से समाप्त करने से पहले अगले ग्रह पर न जाएँ। प्रत्येक ग्रह के लिए एक स्पष्ट और सुव्यवस्थित तालिका बनाएँ। हर पंक्ति और स्तंभ की जाँच दोहराएँ क्योंकि एक छोटी सी गलती पूरे परिणाम को गलत कर सकती है।

प्रत्येक राशि के लिए भावों की गणना करते समय ध्यान रखें कि भाव की गणना उस ग्रह की राशि से की जानी है, न कि लग्न की राशि से। इस भ्रांति के कारण अक्सर त्रुटियाँ होती हैं। एक एक्सेल शीट का उपयोग करें जिससे सभी जोड़-घटाव स्वचालित हो जाएँ और मानवीय गणना में त्रुटि की संभावना कम हो।

तीसरी बात: सामान्य गलतियों से बचना

अष्टकवर्ग गणना में सामान्य गलतियों को समझना और उनसे बचना बहुत महत्वपूर्ण है। सबसे पहली गलती यह है कि भावों को आरोही (लग्न) से गिना जाता है न कि उस ग्रह की राशि से। उदाहरण के लिए, यदि बृहस्पति धनु राशि में है तो हमें धनु से भाव गिनने चाहिएँ, मेष से नहीं। दूसरी गलती राहु और केतु को शामिल करना है। राहु और केतु किसी परिस्थिति में भी अष्टकवर्ग में सम्मिलित नहीं किए जाते। तीसरी गलती लग्न के योगदान को भूलना है। लग्न भी आठवें स्रोत के रूप में कार्य करता है और इसे कभी भी भूलना नहीं चाहिए। चौथी गलती निर्धारित नियमों को गलत तरीके से लागू करना है। प्रत्येक ग्रह के लिए निर्धारित भाव अलग होते हैं और इन्हें बिना त्रुटि के लागू किया जाना चाहिए।

चौथी बात: सिद्धांत को समझना, न कि केवल याद करना

अष्टकवर्ग की गणना को सही ढंग से करने के लिए पूरे सिद्धांत को समझना आवश्यक है। यह केवल याद करने की चीज़ नहीं है। समझ लीजिए कि प्रत्येक ग्रह के पास अपने अनुकूल भाव होते हैं क्योंकि ये भाव उस ग्रह की प्रकृति और शक्ति के अनुरूप हैं। समझ लीजिए कि 28 बिंदु संतुलन बिंदु क्यों है क्योंकि यह औसत है। समझ लीजिए कि क्यों भावों को उस ग्रह की राशि से गिना जाता है और लग्न से नहीं। जब आप सिद्धांत को समझ लेते हैं तो गणना करना बहुत आसान हो जाता है और त्रुटियों की संभावना कम हो जाती है।

दाता बनाम प्राप्तकर्ता की उन्नत अवधारणा

प्राप्तकर्ता चार्ट क्या है

प्राप्तकर्ता चार्ट वह होता है जो हमने अभी तक गणना की है। यह दर्शाता है कि प्रत्येक राशि कितने बिंदु प्राप्त करती है। यह चार्ट प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग होता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के ग्रहों की राशि भिन्न होती है। किसी दूसरे जातक के चार्ट में मेष राशि में अलग बिंदु होंगे।

प्राप्तकर्ता चार्ट के माध्यम से व्यक्तिगत भविष्यवाणीयाँ दी जाती हैं। यदि किसी जातक का दूसरा भाव (धन) में सर्व अष्टकवर्ग 32 है तो इसका अर्थ है कि उस जातक को आर्थिक सफलता मिलेगी। यह सूचना केवल उस विशेष जातक के लिए सार्थक है।

दाता चार्ट क्या है

दाता चार्ट एक स्थिर चार्ट है जो सभी होरोस्कोपों के लिए समान होता है। यह दर्शाता है कि जब कोई ग्रह अपनी किसी विशेष राशि में होता है तो वह कितने बिंदु देता है। उदाहरण के लिए, सूर्य जब भी किसी चार्ट में मेष राशि में होता है तो सूर्य सभी बारह राशियों को बिंदु देता है, लेकिन हर राशि को समान संख्या में नहीं।

दाता चार्ट के माध्यम से पारगमन (ट्रांजिट) की भविष्यवाणी में सहायता मिलती है। जब सूर्य ट्रांजिट करते समय किसी राशि से गुजरता है तो दाता चार्ट के आधार पर समझा जा सकता है कि सूर्य किन किन राशियों को शुभ प्रभाव दे रहा है। यह सूचना सार्वभौमिक है और सभी जातकों के लिए समान है।

निष्कर्ष और चिंतनशील दृष्टिकोण

अष्टकवर्ग ब्रह्मांडीय बुद्धिमत्ता की एक अद्भुत संरचना है जो हजारों वर्षों से प्राचीन ग्रंथों में संरक्षित है। इस प्रणाली के माध्यम से मनुष्य अपने कर्मफल को समझ सकता है। 337 बिंदु जो बारह राशियों में वितरित होते हैं, वे आपके भाग्य के एक परिमाणित मानचित्र को दर्शाते हैं। जहाँ आपके बिंदु अधिक हैं, वहाँ ब्रह्मांड की धारा आपके समर्थन में है। जहाँ आपके बिंदु कम हैं, वहाँ आपको अपनी आत्मशक्ति को सक्रिय करना पड़ता है।

यह प्रणाली न तो भाग्यवादी है और न ही मुक्तिवादी। यह बताती है कि आपका भाग्य कहाँ प्रवाहित होता है और कहाँ आपको विरुद्ध प्रवाह में तैरना पड़ता है। कम बिंदु वाली राशि में सफलता संभव है, लेकिन इसके लिए अतिरिक्त बुद्धिमत्ता, सामर्थ्य और धैर्य आवश्यक है। अधिक बिंदु वाली राशि में सफलता सहज है, लेकिन सावधानी न बरतने से वह भी जा सकती है।

अष्टकवर्ग की गणना, समझ और अनुप्रयोग एक गहन आध्यात्मिक यात्रा है जो जातक को अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य से परिचित कराती है। इस ज्ञान के साथ, कोई भी व्यक्ति अपनी सचेत जिंदगी का निर्माण कर सकता है और अपनी वास्तविक संभावनाओं को पूरी तरह से विकसित कर सकता है।

सामान्य प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: क्या अष्टकवर्ग की गणना आवश्यक रूप से सॉफ्टवेयर से ही करनी चाहिए?

नहीं, अष्टकवर्ग की गणना मैनुअल रूप से भी की जा सकती है, परंतु यह समय लेने वाली और जटिल प्रक्रिया है। सॉफ्टवेयर से गणना करना अधिक तेज़ और सटीक है, विशेषकर जब हजारों चार्ट के साथ काम करना हो। मैनुअल गणना तब उपयोगी है जब कोई व्यक्ति प्रणाली को गहराई से समझना चाहता है और हर चरण को विस्तार से सीखना चाहता है।

प्रश्न 2: यदि किसी राशि में बहुत कम बिंदु हैं, क्या उस क्षेत्र में सफलता असंभव है?

नहीं, कम बिंदु वाली राशि में भी सफलता संभव है। कम बिंदु का अर्थ है कि आपको अधिक प्रयास करना पड़ेगा। यह आपके कर्म और निर्णय शक्ति की परीक्षा है। यदि आप सही निर्णय लेते हैं और कड़ी मेहनत करते हैं तो आप अपनी इच्छा को पूरा कर सकते हैं। कम बिंदु वाली राशि में समृद्धि के साथ-साथ गहरा संतुष्टि भी आता है क्योंकि आपने कठिन परिस्थितियों में सफलता प्राप्त की है।

प्रश्न 3: अष्टकवर्ग का कुल योग हमेशा 337 ही क्यों होता है?

यह एक गणितीय नियम है जो इस प्रणाली में निर्मित है। प्रत्येक ग्रह और लग्न की बिंदु देने की क्षमता पहले से निर्धारित है। चाहे कोई भी जातक हो, चाहे ग्रह किसी भी राशि में हों, कुल बिंदु सर्वदा 337 होते हैं। यह संख्या 12 राशियों की संरचना और 8 स्रोतों के संयोजन से आती है। यह एक ब्रह्मांडीय स्थिरांक है जो सभी होरोस्कोपों में समान रहता है।

प्रश्न 4: ग्रह संक्रमण के दौरान अष्टकवर्ग का उपयोग कैसे किया जाता है?

जब कोई ग्रह किसी राशि में संक्रमण करता है, तब उस राशि का सर्व अष्टकवर्ग यह निर्धारित करता है कि संक्रमण कितना लाभकारी या हानिकारक होगा। यदि राशि में अधिक बिंदु हैं तो ग्रह के परिणाम सकारात्मक होंगे, भले ही ग्रह स्वाभाविक रूप से कठोर हो। यदि राशि में कम बिंदु हैं तो ग्रह के परिणाम नकारात्मक हो सकते हैं, भले ही ग्रह स्वाभाविक रूप से शुभ हो। इस प्रकार अष्टकवर्ग संक्रमण की भविष्यवाणी के लिए एक सटीक उपकरण है।

प्रश्न 5: क्या अष्टकवर्ग एकमात्र ऐसी प्रणाली है जो जीवन के क्षेत्रों की शक्ति को मापती है?

नहीं, वैदिक ज्योतिष में कई अन्य प्रणालियाँ भी हैं जो भावों की शक्ति को मापती हैं। दशा प्रणाली, गोचर, व्रत, योग और अन्य कई प्रणालियाँ हैं। परंतु अष्टकवर्ग विशेषतः अनूठी है क्योंकि यह प्रणाली परिमाणीय है और प्रत्येक राशि के लिए स्पष्ट संख्याएँ प्रदान करती है। यह भविष्य की भविष्यवाणी के लिए एक अत्यंत विश्वसनीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।

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लेखक

पं. नीलेश शर्मा

पं. नीलेश शर्मा (63)


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