By पं. सुव्रत शर्मा
हवन से जठराग्नि और यज्ञाग्नि दोनों चार्ज होते हैं

हवन मुहूर्त और मूल नियम
शरीर में एक अग्नि जलती है। वह अग्नि भोजन पचाती है। वह अग्नि रोग जलाती है। वह अग्नि ओज बनाती है। जब यह अग्नि तेज होती है तब व्यक्ति स्वस्थ, ऊर्जावान और प्रभावशाली होता है। जब यह अग्नि मंद होती है तब व्यक्ति रोगी, थका हुआ और निष्प्रभ होता है।
ब्रह्मांड में भी एक अग्नि जलती है। वह अग्नि सूर्य है। वह अग्नि यज्ञ है। वह अग्नि नक्षत्रों की ऊर्जा है। जब ब्रह्मांड की अग्नि तेज होती है तब सृष्टि पलती है। जब ब्रह्मांड की अग्नि मंद होती है तब सृष्टि रुकती है।
अग्नि देव इन दोनों अग्नियों के स्वामी हैं। शरीर में जठराग्नि और ब्रह्मांड में यज्ञाग्नि दोनों का संतुलन अग्नि देव के अधीन है। जब कुंडली में अग्नि तत्व कमजोर हो तब दोनों अग्नियां मंद पड़ जाती हैं। हवन के माध्यम से अग्नि देव को दी गई आहुतियां दोनों अग्नियों को तुरंत चार्ज कर देती हैं।
कृतिका नक्षत्र 27 नक्षत्रों में तीसरा नक्षत्र है। यह 26 डिग्री 40 मिनट मेष से 10 डिग्री वृषभ तक फैला है। इसका स्वामी सूर्य है। इसके अधिष्ठाता देवता अग्नि हैं। इसका प्रतीक खड्ग या ज्वाला है।
कृतिका का अर्थ है काटने वाली। यह नक्षत्र अशुद्धि को काटता है। यह झूठ को जलाता है। यह सत्य को उजागर करता है। इसलिए कृतिका नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति तीक्ष्ण बुद्धि के होते हैं। वे छल को जल्दी पहचानते हैं। वे सत्य बोलते हैं चाहे कोई नाराज हो जाए।
अग्नि तत्व तीन राशियों में बसता है। मेष, सिंह और धनु। मेष प्रथम अग्नि है। यह शुरुआत की अग्नि है। सिंह मध्य अग्नि है। यह स्थिरता की अग्नि है। धनु अंतिम अग्नि है। यह विस्तार की अग्नि है। जब इन तीनों राशियों में ग्रह कमजोर होते हैं तब अग्नि तत्व क्षीण हो जाता है।
| राशि | तत्व | गुण | प्रभाव |
|---|---|---|---|
| मेष | अग्नि | चर | साहस, नेतृत्व, शुरुआत |
| सिंह | अग्नि | स्थिर | गर्व, स्थिरता, अधिकार |
| धनु | अग्नि | द्विस्वभाव | ज्ञान, विस्तार, धर्म |
| वृषभ | पृथ्वी | स्थिर | स्थिरता, धन, भोग |
| कन्या | पृथ्वी | द्विस्वभाव | विश्लेषण, सेवा, स्वास्थ्य |
| मकर | पृथ्वी | चर | अनुशासन, कर्म, संघर्ष |
जठराग्नि शरीर की पाचन शक्ति है। यह अग्नि भोजन को पचाती है। यह रस बनाती है। यह रक्त बनाती है। यह ओज बनाती है। जब जठराग्नि तेज होती है तब व्यक्ति कम खाता है पर अधिक ऊर्जा पाता है। जब जठराग्नि मंद होती है तब व्यक्ति अधिक खाता है पर थका हुआ रहता है।
यज्ञाग्नि ब्रह्मांड की शक्ति है। यह अग्नि हवन कुंड में जलती है। यह आहुतियों को स्वीकार करती है। यह देवताओं तक पहुंचती है। यह आशीर्वाद लाती है। जब यज्ञाग्नि तेज होती है तब हवन का फल तुरंत मिलता है। जब यज्ञाग्नि मंद होती है तब हवन का फल देरी से मिलता है।
अग्नि देव इन दोनों अग्नियों को संतुलित करते हैं। हवन करने से यज्ञाग्नि जागती है। जागी हुई यज्ञाग्नि जठराग्नि को चार्ज करती है। चार्ज हुई जठराग्नि शरीर को स्वस्थ करती है। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन होता है। स्वस्थ मन में स्वस्थ कुंडली होती है।
| संकेत | कारण | समाधान |
|---|---|---|
| भोजन के बाद भारीपन | मंद जठराग्नि | हवन और अदरक |
| गैस और अपच | अग्नि असंतुलन | काले तिल और घी |
| बार बार भूख लगना | अति अग्नि | शीतल भोजन और चंदन |
| वजन बढ़ना | मंद अग्नि | हवन और व्यायाम |
| वजन घटना | अति अग्नि | दूध और घी |
| रोग प्रतिरोधक क्षमता कम | ओज क्षीण | हवन और ब्रह्मचर्य |
| नींद न आना | अग्नि असंतुलन | शिव पूजा और मौन |
हवन केवल अनुष्ठान नहीं है। यह ऊर्जा विनिमय है। जब हम घी की आहुति देते हैं तब हम सूर्य की ऊर्जा को आमंत्रित करते हैं। जब हम काले तिल डालते हैं तब हम शनि के कर्मिक बोझ को जलाते हैं। जब हम जौ अर्पित करते हैं तब हम बृहस्पति के आशीर्वाद को बुलाते हैं।
आहुति की संख्या महत्वपूर्ण है। 11 आहुति न्यूनतम है। 21 आहुति मध्यम है। 108 आहुति पूर्ण है। 1008 आहुति महाहवन है। गृहस्थ के लिए 21 या 108 आहुति पर्याप्त है।
हवन कुंड की दिशा महत्वपूर्ण है। पूर्व मुख हवन ज्ञान बढ़ाता है। दक्षिण पूर्व मुख हवन शत्रु नाश करता है। उत्तर पूर्व मुख हवन शांति देता है। पश्चिम मुख हवन धन देता है।
| सामग्री | ग्रह | फल |
|---|---|---|
| घी | सूर्य | तेज, स्वास्थ्य, नेतृत्व |
| काले तिल | शनि | कर्मिक दोष नाश, आयु |
| जौ | बृहस्पति | ज्ञान, संतान, धन |
| चावल | चंद्र | मन, शांति, मातृ सुख |
| लाल पुष्प | मंगल | साहस, शत्रु नाश, रोग मुक्ति |
| कुमकुम | मंगल | शक्ति, रक्षा, तेज |
| शहद | शुक्र | सौंदर्य, प्रेम, वैवाहिक सुख |
| गायत्री मंत्र | सभी ग्रह | सर्वग्रह शांति |
कृतिका नक्षत्र का स्वामी और देवता कौन है?
कृतिका नक्षत्र का स्वामी सूर्य है और देवता अग्नि हैं। यह नक्षत्र 26 डिग्री 40 मिनट मेष से 10 डिग्री वृषभ तक फैला है।
हवन से जठराग्नि कैसे मजबूत होती है?
हवन से यज्ञाग्नि जागती है। यज्ञाग्नि जठराग्नि को चार्ज करती है। चार्ज हुई जठराग्नि पाचन शक्ति बढ़ाती है।
अग्नि तत्व कमजोर होने के क्या संकेत हैं?
पाचन रोग, गैस, अपच, वजन बढ़ना या घटना, रोग प्रतिरोधक क्षमता कम और नींद न आना प्रमुख संकेत हैं।
हवन में कौन सी सामग्री अर्पित करनी चाहिए?
घी, काले तिल, जौ, चावल, लाल पुष्प, कुमकुम और शहद प्रमुख सामग्री हैं। प्रत्येक सामग्री का अलग फल होता है।
क्या केवल हवन से सभी समस्याएं मिटती हैं?
हवन मूल उपाय है। इसके साथ सात्विक आहार, ब्रह्मचर्य, सत्य वचन और व्यायाम आवश्यक है।
हवन कुंड में जब ज्वाला जलती है तब वह केवल लकड़ी नहीं जलाती। वह अज्ञान जलाती है। वह अहंकार जलाती है। वह रोग जलाती है। वह शत्रु जलाती है। वह पाप जलाती है।
जब जातक आहुति देता है तब उसकी आंखों में एक चमक आती है। यह चमक केवल अग्नि की नहीं होती। यह चमक अग्नि देव की कृपा की होती है। यह चमक कृतिका नक्षत्र की होती है। यह चमक सूर्य की होती है।
जठराग्नि जाग जाती है। यज्ञाग्नि जाग जाती है। कुंडली के कमजोर ग्रह चार्ज हो जाते हैं। ओज बढ़ जाता है। स्वास्थ्य सुधर जाता है। मन शांत हो जाता है। भाग्य चमक जाता है।
यही हवन का विज्ञान है। यही अग्नि देव का आशीर्वाद है। यही कृतिका नक्षत्र का रहस्य है।
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