By पं. अभिषेक शर्मा
जानें कैसे भुवनेश्वरी साधना से प्राप्त होता है प्रबल राजयोग

पूजा और साधना का शुभ मुहूर्त
दस महाविद्याओं में माँ भुवनेश्वरी को चौथा स्थान प्राप्त है। इनका नाम स्वयं उनकी शक्ति का परिचायक है। भुवनेश्वरी का अर्थ है संपूर्ण भुवनों की ईश्वरी, अर्थात तीनों लोकों की स्वामिनी। यह केवल एक नाम नहीं, वरन् एक सनातन सत्य है कि जब मानव अपने अस्तित्व के संकट में फंस जाता है, जब उसे समाज में मान-सम्मान नहीं मिलता, जब राजनीतिक या सामाजिक पद से वंचित रहना पड़ता है तब माँ भुवनेश्वरी की कृपा ही एकमात्र मार्गदर्शक बनती है।
वैदिक ज्योतिष शास्त्र में पंचम भाव को ब्रह्मांडीय चेतना, राजयोग, आकर्षण, बुद्धि, विद्या, संतान और पूर्व पुण्य का कारक माना गया है। यह भाव व्यक्ति के जीवन में उसकी प्रतिष्ठा, सामाजिक स्थिति और आध्यात्मिक उन्नति का निर्धारण करता है। जब पंचम भाव मजबूत होता है, तो व्यक्ति को समाज में उच्च स्थान, राजनीतिक पद, आकर्षक व्यक्तित्व और ब्रह्मांडीय चेतना प्राप्त होती है।
माँ भुवनेश्वरी और पंचम भाव का संबंध अत्यंत गूढ़ और सूक्ष्म है। तंत्र शास्त्र के अनुसार माँ भुवनेश्वरी ही पंचम भाव की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे उस परम शक्ति की स्रोत हैं, जो पंचम भाव के माध्यम से संपूर्ण सृष्टि में प्रवाहित होती है। जब जातक की कुंडली में पंचम भाव कमजोर होता है तब माँ भुवनेश्वरी की साधना से वह भाव पुनः सशक्त होता है।
वैदिक ज्योतिष में सूर्य ग्रह को आत्मा, अहंकार, प्रतिष्ठा, राजसत्ता, पिता और आध्यात्मिक चेतना का कारक माना गया है। सूर्य जब अपनी उच्च अवस्था में होता है, तो व्यक्ति को समाज में उच्च स्थान, मान-सम्मान, नेतृत्व क्षमता और आध्यात्मिक जागृति प्राप्त होती है।
बुध ग्रह को बुद्धि, वाणी, व्यापार, गणित, तकनीकी कौशल और संचार का कारक माना गया है। जब बुध मजबूत होता है, तो व्यक्ति में तीक्ष्ण बुद्धि, प्रभावशाली वाणी, व्यापारिक सफलता और तकनीकी प्रतिभा होती है।
जब सूर्य और बुध दोनों अपनी उच्च अवस्था में होते हैं और पंचम भाव में युति बनाते हैं तब एक अद्भुत राजयोग का निर्माण होता है। ऐसे व्यक्ति को समाज में उच्च प्रतिष्ठा, राजनीतिक पद, आकर्षक व्यक्तित्व और ब्रह्मांडीय चेतना प्राप्त होती है। परंतु जब ये ग्रह कमजोर होते हैं या पीड़ित होते हैं तब व्यक्ति को मान-सम्मान की कमी, राजनीतिक असफलता, बुद्धि में मंदता और आध्यात्मिक पतन झेलना पड़ता है।
माँ भुवनेश्वरी स्वयं सूर्य और बुध के मिले-जुले उच्च प्रभाव की देवी हैं। वे उस शक्ति का स्रोत हैं, जो सूर्य की प्रतिष्ठा और बुध की बुद्धि को एक साथ प्रदान करती है। यही कारण है कि माँ भुवनेश्वरी की साधना से व्यक्ति को प्रबल राजयोग प्राप्त होता है।
ज्योतिष शास्त्र में पंचम भाव को सबसे शुभ भावों में से एक माना गया है। यह भाव व्यक्ति के जीवन में निम्नलिखित क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है:
जब पंचम भाव मजबूत होता है, तो व्यक्ति को इन सभी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होती है। वह समाज में प्रतिष्ठित बनता है। उसे राजनीतिक पद मिलते हैं। उसका व्यक्तित्व आकर्षक होता है। उसकी बुद्धि तीक्ष्ण होती है। वह उच्च शिक्षा प्राप्त करता है। उसे संतान सुख मिलता है।
परंतु जब पंचम भाव कमजोर होता है तब व्यक्ति को इन सभी क्षेत्रों में असफलता झेलनी पड़ती है। उसे समाज में मान-सम्मान नहीं मिलता। राजनीति में असफलता होती है। व्यक्तित्व में आकर्षण की कमी होती है। बुद्धि मंद हो जाती है। शिक्षा में बाधाएं आती हैं। संतान से कष्ट मिलते हैं।
ऐसे समय में माँ भुवनेश्वरी की साधना अत्यंत प्रभावकारी सिद्ध होती है। वे स्वयं पंचम भाव की अधिष्ठात्री देवी हैं और उनकी कृपा से कमजोर पंचम भाव पुनः सशक्त होता है।
जब जातक की कुंडली में कमजोर ग्रह होते हैं, विशेष रूप से सूर्य, बुध, गुरु या शुक्र, तो व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान नहीं मिल पाता। ऐसे व्यक्ति के जीवन में निम्नलिखित समस्याएं दिखाई देती हैं:
इन सभी समस्याओं का समाधान माँ भुवनेश्वरी की साधना में निहित है। वे स्वयं उन सभी ग्रहों की अधिष्ठात्री देवी हैं, जो पंचम भाव के कारक हैं।
तंत्र शास्त्र में ह्रीं बीज मंत्र को अत्यंत शक्तिशाली माना गया है। यह मंत्र स्वयं माँ भुवनेश्वरी का स्वरूप है। ह्रीं बीज मंत्र का अर्थ है ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक। जब इस मंत्र का जाप किया जाता है तब साधक के भीतर ब्रह्मांडीय चेतना जागृत होती है।
माँ भुवनेश्वरी इस मंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे स्वयं इस मंत्र में निवास करती हैं। जब साधक श्रद्धा और भक्ति के साथ इस मंत्र का जाप करता है तब माँ भुवनेश्वरी स्वयं आकर उसके संकट को हर लेती हैं।
ह्रीं बीज मंत्र के प्रमुख प्रभाव
माँ भुवनेश्वरी की साधना करने के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन आवश्यक है। यह साधना केवल मंत्र जाप नहीं है, वरन् एक संपूर्ण आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
| चरण | विधि | महत्व |
|---|---|---|
| १ | रविवार या बुधवार को स्नान के पश्चात स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र पहनें | सूर्य और बुध दोनों की कृपा प्राप्त होती है |
| २ | पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन ग्रहण करें | सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है |
| ३ | घी का दीपक जलाएं और लाल या पीले पुष्प अर्पित करें | माँ भुवनेश्वरी प्रसन्न होती हैं |
| ४ | ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः मंत्र का १०८ बार जाप करें | मंत्र सिद्धि प्राप्त होती है |
| ५ | कम से कम ४० दिन तक निरंतर साधना करें | पूर्ण फल प्राप्त होता है |
पंचम भाव को मजबूत करने के लिए केवल माँ भुवनेश्वरी की साधना ही पर्याप्त नहीं है। कुछ अतिरिक्त उपाय भी किए जाने चाहिए।
राजयोग प्राप्त करने के लिए कुछ विशेष उपाय किए जा सकते हैं।
माँ भुवनेश्वरी के कई मंत्र हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट प्रभाव है। इन मंत्रों का जाप करने से साधक को विभिन्न लाभ प्राप्त होते हैं।
| मंत्र | प्रभाव | जाप संख्या |
|---|---|---|
| ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः | राजयोग, मान-सम्मान और ब्रह्मांडीय चेतना | १०८ बार |
| ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भुवनेश्वर्यै नमः | धन, प्रतिष्ठा और आकर्षण | १००८ बार |
| ॐ ऐं क्लीं सौः भुवनेश्वर्यै नमः | बुद्धि, विद्या और आध्यात्मिक उन्नति | १०८ बार |
| ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्यै स्वाहा | पंचम भाव का सशक्तिकरण और राजयोग | १००८ बार |
इन मंत्रों का जाप करने के लिए शुद्ध मन और श्रद्धा आवश्यक है। मंत्र जाप के समय सात्विक भोजन करें, ब्रह्मचर्य का पालन करें और नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
माँ भुवनेश्वरी कौन हैं?
माँ भुवनेश्वरी दस महाविद्याओं में चौथी देवी हैं। वे संपूर्ण भुवनों की स्वामिनी हैं और पंचम भाव की अधिष्ठात्री देवी हैं।
पंचम भाव का क्या महत्व है?
पंचम भाव ब्रह्मांडीय चेतना, राजयोग, आकर्षण, बुद्धि, विद्या, संतान और पूर्व पुण्य का कारक है।
ह्रीं बीज मंत्र क्या है?
ह्रीं बीज मंत्र माँ भुवनेश्वरी का मूल मंत्र है। इसका जाप करने से ब्रह्मांडीय चेतना जागृत होती है और राजयोग प्राप्त होता है।
माँ भुवनेश्वरी साधना से क्या लाभ होता है?
इस साधना से राजयोग, मान-सम्मान, ब्रह्मांडीय चेतना, बुद्धि में तेज, आकर्षक व्यक्तित्व और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
कमजोर ग्रहों से मान-सम्मान की कमी कैसे दूर हो?
माँ भुवनेश्वरी की साधना, सूर्य और बुध की पूजा, गुरु का सम्मान और धर्म के कार्य करने से कमजोर ग्रहों का प्रभाव कम होता है।
माँ भुवनेश्वरी और पंचम भाव का संबंध केवल ज्योतिषीय गणना नहीं है। यह एक गहन आध्यात्मिक सत्य है। जब व्यक्ति अपने अस्तित्व के संकट में फंस जाता है, जब उसे समाज में मान-सम्मान नहीं मिलता, जब राजनीतिक पद से वंचित रहना पड़ता है तब माँ भुवनेश्वरी की कृपा ही एकमात्र सहारा बनती है।
जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ माँ भुवनेश्वरी की साधना करता है, उसे कभी निराश नहीं होना पड़ता। माँ भुवनेश्वरी स्वयं आकर उसके संकट को हर लेती हैं। वे उसे ब्रह्मांडीय चेतना देती हैं, राजयोग प्रदान करती हैं और मान-सम्मान देती हैं।
इसलिए जो व्यक्ति कमजोर ग्रहों के कारण समाज में मान-सम्मान या राजनीतिक पद नहीं पा रहा है, उसे माँ भुवनेश्वरी की साधना अवश्य करनी चाहिए। यह साधना उसके जीवन को पूर्णतः परिवर्तित कर देगी और उसे संकट से उद्धार करेगी।
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