By पं. संजीव शर्मा
अहंकार कटने पर वासना कैसे ओजस और सूक्ष्म दृष्टि बनती है

साधना मुहूर्त और मूल नियम
कुछ रूप ऐसे होते हैं जो पहले नेत्र को झकझोरते हैं और बाद में बुद्धि को शांत करते हैं। माँ छिन्नमस्ता का रूप उनमें सबसे तीक्ष्ण है। वे स्वयं अपना शीश काटती हैं। कटे सिर को एक हाथ में धारण करती हैं। गर्दन से तीन धाराएं निकलती हैं। दो धाराएं सहचरियों को तृप्त करती हैं। तीसरी धारा उनके अपने कटे मुख में जाती है। यह दृश्य हिंसा का उत्सव नहीं है। यह उस क्षण का चित्र है जब अहंकार का केंद्र टूटता है और प्राण फिर भी बहता रहता है।
वैदिक ज्योतिष में राहु उसी कटे हुए शीश का ग्रह है। राहु शरीर रहित सिर है। इच्छा है, पर पूर्णता नहीं है। दृष्टि है, पर स्थिर आधार नहीं है। इसलिए राहु जब अनियंत्रित होता है तो मन उन्माद की ओर दौड़ता है। व्यक्ति अधिक चाहता है, अधिक दिखाता है, अधिक तुलना करता है और अंत में अपने ही विचारों से घिर जाता है। वासना बढ़ती है। नींद बिगड़ती है। निर्णय टूटते हैं। यश अचानक आता है और अचानक लज्जा बन जाता है।
माँ छिन्नमस्ता उसी राहु शक्ति को काटती नहीं, उसे परिष्कृत करती हैं। वे बताती हैं कि सिर काटना शरीर का नाश नहीं है। सिर काटना अहंकार का विसर्जन है। जब मैंपन कटता है तब वही ऊर्जा जो पहले वासना बनकर बिखरती थी, ओजस बनकर ऊपर उठती है। तंत्र शास्त्र में यही ऊर्ध्वगमन कुण्डलिनी का जागरण कहा गया है। सहस्रार पर जब यह शक्ति खुलती है तब व्यक्ति को वह दृष्टि मिलती है जिसे लोक भाषा में अलौकिक कहा जाता है। वास्तव में वह दृष्टि बाहर की जादूगरी नहीं है। वह भीतर की निर्मल देखने की क्षमता है।
प्राणतोषिणी तंत्र और शाक्त परंपरा में एक प्रसंग आता है। देवी मंदकिनी के तट पर विहार करती हैं। सहचरियां डाकिनी और वर्णिनि, जिन्हें कहीं जया विजया भी कहा गया है, अत्यंत क्षुब्ध और क्षुधित हो जाती हैं। वे माँ से जीवन रस मांगती हैं। माँ बिना विलंब अपने नख से अपना शीश काट देती हैं। तीन रक्त धाराएं फूटती हैं। दो सहचरियों को तृप्त करती हैं। एक धारा स्वयं माँ के कटे मुख में लौटती है। भूख शांत होती है। चेतना समाप्त नहीं होती।
यह कथा घर गृहस्थी के लिए भी एक गूढ़ पाठ है। जब भीतर की शक्तियां भूखी रहती हैं तब मनुष्य दूसरों से ऊर्जा छीनने लगता है। वह मान चाहता है। वह भोग चाहता है। वह नियंत्रण चाहता है। माँ छिन्नमस्ता सिखाती हैं कि सच्ची तृप्ति दूसरों को निचोड़ने से नहीं आती। सच्ची तृप्ति तब आती है जब साधक अपने अहंकार को काटकर अपनी ही शक्ति को शुद्ध रूप में बांटता है। रक्त यहां हिंसा नहीं है। रक्त प्राण है। प्राण जब इड़ा पिंगला और सुषुम्ना में संतुलित बहता है तब जीवन स्वयं यज्ञ बन जाता है।
माँ का खड़ा होना भी अर्थपूर्ण है। वे काम और रति के ऊपर खड़ी मानी गई हैं। इसका अर्थ भोग का तिरस्कार नहीं है। इसका अर्थ है भोग पर अधिकार। वासना नीचे है। चेतना ऊपर है। जो व्यक्ति वासना का दास होता है, उसका राहु उसे नचाता है। जो व्यक्ति वासना को देख सकता है और उसे काट सकता है, उसका राहु उसे सूक्ष्म दृष्टि देता है।
बहुत से लोग राहु को केवल अशुभ मान लेते हैं। यह अधूरी दृष्टि है। राहु वृद्धि करता है। राहु विदेशी क्षेत्र, तकनीक, भीड़, यश, रहस्य, व्यसन और मानसिक वेग का कारक है। राहु जब शुभ भाव में संयमित हो तो शोध, सूझ, जनसंपर्क और असाधारण सफलता देता है। राहु जब पीड़ित या अनियंत्रित हो तो वही शक्ति उन्माद बन जाती है।
राहु सिर है बिना धड़ के। इसलिए वह खाता रहता है और तृप्त नहीं होता। केतु धड़ है बिना सिर के। केतु काटता है और शून्य देता है। छिन्नमस्ता इन दोनों के बीच का सेतु हैं। वे सिर को हाथ में रखती हैं। अर्थात मन पूरी तरह नष्ट नहीं होता। मन साक्षी बन जाता है। यही ज्योतिष की सबसे कोमल और कठिन सिद्धि है।
| भाव | अनियंत्रित राहु | छिन्नमस्ता ध्यान से संभावित शुद्धि |
|---|---|---|
| प्रथम | अहंकार, छवि की भूख | स्वाभाविक तेज बिना दिखावे के |
| पंचम | विषय आसक्ति, चंचल बुद्धि | ओजस, एकाग्रता, मंत्र शक्ति |
| अष्टम | गुप्त भय, उन्माद, आकस्मिक कष्ट | कुण्डलिनी का संयमित उदय |
| नवम | गुरु द्वेष, मत का आग्रह | सच्ची श्रद्धा और विवेक |
| द्वादश | निद्रा दोष, व्यसन, पलायन | समाधि जैसी शांति और त्याग |
तंत्र में शरीर केवल मांस नहीं है। शरीर नाड़ियों का नगर है। तीन प्रधान नाड़ियां हैं। इड़ा चंद्र स्वभाव की शीतल धारा है। पिंगला सूर्य स्वभाव की उष्ण धारा है। सुषुम्ना मध्य की मूक और ऊर्ध्वगामी धारा है। माँ छिन्नमस्ता की तीन रक्त धाराएं इन्हीं तीन नाड़ियों का दृश्य रूप मानी गई हैं। दो सहचरियां इड़ा पिंगला हैं। स्वयं माँ सुषुम्ना हैं। जब मध्य धारा खुलती है तब शक्ति मूलाधार से उठकर सहस्रार तक जाती है।
सहस्रार सिर के शीर्ष पर सहस्र दल कमल कहा गया है। यहीं अहंकार का अंतिम गांठ खुलता है। इसलिए माँ का शीश कटने का स्थान भी यही संकेत देता है। कटता है वह सिर जो मैं हूं कहता रहता है। बचती है वह चेतना जो देखती है। राहु इसी सहस्रार क्षेत्र को विक्षुब्ध भी कर सकता है। अनियंत्रित राहु सिर में शोर भरता है। नियंत्रित राहु सिर में प्रकाश भरता है। छिन्नमस्ता ध्यान राहु को शोर से प्रकाश की ओर ले जाता है।
शास्त्र कहते हैं कि वीर्य, मन और प्राण एक ही शक्ति के तीन रूप हैं। जब यह शक्ति नीचे बिखरती है तब वासना कहलाती है। जब यह शक्ति संयम से पकती है तब ओजस कहलाती है। ओजस आंखों में शांति देता है। वाणी में वजन देता है। शरीर में स्फूर्ति देता है। बुद्धि में तीक्ष्णता देता है। राहु वासना को बढ़ाकर ओजस चुरा लेता है। माँ छिन्नमस्ता उसी चुराई हुई शक्ति को लौटाती हैं।
यह लौटना जादू की छड़ी से नहीं होता। यह लौटना दैनिक संयम से होता है। कम व्यर्थ वाणी। कम व्यर्थ दृष्टि। कम व्यर्थ तुलना। अधिक मौन। अधिक सत्य। अधिक सेवा। तब मंत्र भूमि पाता है। बिना भूमि के मंत्र केवल कंपन रह जाता है और राहु और चंचल हो जाता है।
उग्र महाविद्या की साधना गुरु बिना पूर्ण तांत्रिक विधि से नहीं करनी चाहिए। गृहस्थ के लिए सात्विक ध्यान पर्याप्त और सुरक्षित है। ध्यान का अर्थ है रूप को समझकर बैठना, न कि रक्त का बाह्य अनुकरण करना।
| क्रम | कार्य | आंतरिक भाव |
|---|---|---|
| 1 | स्नान कर लाल वस्त्र धारण करें | शक्ति का सम्मान |
| 2 | रीढ़ सीधी रख कर स्थिर आसन बैठें | सुषुम्ना का मार्ग खोलना |
| 3 | दीप जलाकर लाल पुष्प अर्पित करें | इंद्रिय को एक दिशा देना |
| 4 | तीन श्वास नाड़ियों का स्मरण करें | इड़ा पिंगला सुषुम्ना |
| 5 | कल्पना करें कि अहंकार का गांठ कट रहा है | सिर काटना अर्थात मैंपन छोड़ना |
| 6 | ॐ ह्रीं छिन्नमस्तायै नमः का 108 जाप | नाद से राहु शमन |
| 7 | सहस्रार पर श्वेत प्रकाश का धीमा ध्यान | अलौकिक दृष्टि का बीज |
| 8 | किसी भूखे को अन्न दान | सहचरियों को तृप्त करने का लोक रूप |
ध्यान में माँ के कटे सिर को भय से नहीं, कृतज्ञता से देखना चाहिए। वह सिर हाथ में है। अर्थात मन साधक के अधीन है। मन साधक के सिर पर सवार नहीं है। यही राहु जय का गुप्त सूत्र है।
जब कुंडली में राहु चंद्र को ग्रसता है तब मन तरंगों में डूबता है। जब राहु बुध को ग्रसता है तब विचार झूठ और चतुराई की ओर मुड़ते हैं। जब राहु पंचम या अष्टम में उग्र हो तब कामना और गुप्त भय साथ चलते हैं। चिकित्सा जहां आवश्यक हो वहां चिकित्सा अनिवार्य है। मंत्र चिकित्सा का विकल्प नहीं है। मंत्र मन को अर्थ देता है। अर्थ मिलने पर औषधि और संयम दोनों फलते हैं।
छिन्नमस्ता ध्यान इसलिए काम करता है क्योंकि वह राहु की भाषा बोलता है। राहु साधारण सौम्य रूप नहीं मानता। राहु तीव्र प्रतीक मानता है। कटा सिर एक तीव्र प्रतीक है। वह प्रतीक मन को झटका देता है और पूछता है कि तू कौन है। जब यह प्रश्न ईमानदारी से बैठता है तब उन्माद की गति धीमी पड़ती है। व्यक्ति अपने विचार को विचार की तरह देखने लगता है। यही अलौकिक दृष्टि का पहला चरण है।
अलौकिक दृष्टि का अर्थ भविष्य की तमाशाबीनी नहीं है। उसका अर्थ है छल को छल की तरह देख लेना। अपने भीतर की भूख को भूख की तरह देख लेना। दूसरों के नाटक को नाटक की तरह देख लेना। ऐसी दृष्टि से व्यवसाय में भी भूल कम होती है। संबंध में भी छल कम लगता है। साधना में भी अहंकार कम घुसता है।
माँ स्वयं अपना शीश काटती हैं। वे दूसरे का शीश नहीं मांगतीं। जो साधक दूसरों को काटने निकलता है, वह माँ से नहीं, अपने राहु से बात कर रहा होता है।
माँ छिन्नमस्ता अपना सिर क्यों काटती हैं?
शीश काटना अहंकार और सीमित मैंपन का विसर्जन है। चेतना नष्ट नहीं होती। प्राण तीन धाराओं में बहकर सहचरियों और स्वयं को तृप्त करता है।
छिन्नमस्ता और राहु का क्या संबंध है?
राहु कटा हुआ शीश है, शरीर रहित इच्छा है। छिन्नमस्ता उसी कटे शीश को हाथ में साक्षी भाव से धारण करती हैं और राहु के उन्माद को ओजस में बदलती हैं।
कुण्डलिनी और सहस्रार का इस रूप से क्या नाता है?
तीन रक्त धाराएं इड़ा पिंगला सुषुम्ना हैं। मध्य धारा के खुलने पर शक्ति सहस्रार तक उठती है। सिर कटना उसी उच्च केंद्र के खुलने का संकेत है।
राहु से मानसिक उन्माद हो तो छिन्नमस्ता ध्यान कैसे करें?
सात्विक विधि से ॐ ह्रीं छिन्नमस्तायै नमः का 108 जाप, संयम, दान और स्थिर श्वास करें। उग्र तंत्र और जबरदस्ती कुण्डलिनी न जगाएं। आवश्यक हो तो चिकित्सक से भी परामर्श करें।
वासना ओजस में कैसे बदलती है?
इंद्रिय वेग को काटकर मौन, ब्रह्मचर्य या दांपत्य संयम और सत्य से प्राण ऊर्ध्व होता है। वही पकी शक्ति ओजस बनती है और दृष्टि को निर्मल करती है।
संसार सिर को सबसे अधिक पूजता है। सिर में नाम है। सिर में उपाधि है। सिर में राय है। सिर में राहु बैठकर कहता है कि मैं ही सब कुछ हूं। माँ छिन्नमस्ता उसी सिर को प्रेम से काटती हैं और हाथ में थाम लेती हैं। काटना द्वेष नहीं है। काटना मुक्ति है। हाथ में थामना यह विश्वास है कि मन शत्रु नहीं, सेवक बन सकता है।
जब जीवन में राहु उन्माद लाता है तब अधिक योजनाएं काम नहीं आतीं। काम आता है एक साफ कट। व्यसन का कट। तुलना का कट। झूठी छवि का कट। उस कट के बाद जो खालीपन आता है, वही कुण्डलिनी का द्वार है। जो साधक उस खालीपन को भय से नहीं, श्रद्धा से भरता है, उसकी वासना ओजस बनती है। उसकी दृष्टि बाहर की चमक नहीं मांगती। वह भीतर तक देख लेती है।
माँ छिन्नमस्ता और राहु का यह योग केवल ग्रहों की टेबल नहीं है। यह मनुष्य के सबसे गहरे भय का उत्तर है। भय यह है कि यदि मैं कट गया तो मैं नहीं रहूंगा। सत्य यह है कि जब मैं कटता है तब जो रहता है वही प्रकाश है। उसी प्रकाश में साधक चलता है, घर संभालता है, कर्म करता है और फिर भी किसी झूठे सिर का दास नहीं रहता।
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