By पं. संजीव शर्मा
क्रूर ग्रहों की शांति और प्रत्यधिदेवता की गुप्त वैदिक साधना

वैदिक ज्योतिष में विंशोत्तरी दशा प्रणाली को मानव जीवन के कर्म चक्र का दर्पण माना गया है। महर्षि पराशर द्वारा प्रतिपादित 120 वर्ष की इस काल गणना में प्रत्येक ग्रह अपनी महादशा और अंतर्दशा में जातक के संचित प्रारब्ध को प्रकट करता है। जब किसी व्यक्ति के जीवन में अनुकूल ग्रहों की दशा चलती है तब साधारण प्रयास भी असाधारण सफलता में बदल जाते हैं। इसके विपरीत जब राहु, केतु, शनि अथवा त्रिक भावों के स्वामियों की दशा सक्रिय होती है तब भौतिक जगत के सामान्य उपाय निष्प्रभावी प्रतीत होने लगते हैं।
शास्त्रों में प्रत्येक ग्रह के तीन स्तर बताए गए हैं जिनमें सामान्य देवता, अधिदेवता और परम शक्तिशाली प्रत्यधिदेवता सम्मिलित हैं। जब क्रूर ग्रहों का गोचर और दशा एक साथ पीड़ा पहुंचाते हैं तब दशा नाथ के प्रत्यधिदेवता की शरण में जाना ही संकट से मुक्ति का अचूक मार्ग बनता है।
| ग्रह और दशा स्वामी | सामान्य अधिष्ठाता देव | उच्च अधिदेवता | सर्वोच्च प्रत्यधिदेवता | शांत होने वाले मुख्य कष्ट |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | अग्नि देव | भगवान शिव | भगवान रुद्र | मानहानि, नेत्र विकार और पिता को कष्ट |
| चंद्रमा | जल तत्व देव | माँ पार्वती | देवाधिदेव शिव | गहन अवसाद, अनिद्रा और मानसिक भ्रम |
| मंगल | भूमि देवी | भगवान कार्तिकेय | भगवान नरसिंह | रक्त विकार, भूमि विवाद और दुर्घटना भय |
| बुध | भगवान विष्णु | नारायण स्वरूप | माँ सरस्वती | व्यापारिक पतन, वाणी दोष और स्नायु रोग |
| गुरु | देवगुरु बृहस्पति | भगवान इंद्र | भगवान ब्रह्मा | ज्ञान ह्रास, संतान कष्ट और धन हानि |
| शुक्र | माँ लक्ष्मी | इंद्राणी देवी | भगवान महेश्वर | वैवाहिक विच्छेद, भौतिक दरिद्रता और रोग |
| शनि | यमराज | भगवान प्रजापति | काल भैरव | साढ़ेसाती पीड़ा, अकाल मृत्यु भय और पक्षाघात |
| राहु | नाग देवता | माँ दुर्गा | माँ चंडी अथवा कालिका | आकस्मिक विपत्ति, विषाक्त भय और मतिभ्रम |
| केतु | चित्रगुप्त | भगवान ब्रह्मा | विघ्नहर्ता गणेश | मोक्ष मार्ग में भटकाव और असाध्य व्याधि |
जन्म कुंडली में 6ठा भाव रोग और ऋण का, 8वां भाव रंध्र अथवा आकस्मिक संकट का और 12वां भाव व्यय तथा हानि का माना जाता है। जब इन त्रिक भावों के स्वामियों की महादशा प्रारंभ होती है तब जातक का मानसिक संतुलन डगमगाने लगता है। विशेष रूप से 8वें भाव का अधिपति जब सक्रिय होता है तब जीवन में अनपेक्षित उथल पुथल मच जाती है। ऐसे समय में व्यक्ति के बने बनाए कार्य अंतिम क्षणों में बिखरने लगते हैं।
12वें भाव की दशा व्यक्ति को एकाकीपन, अनिद्रा, व्यर्थ के कानूनी विवाद और धन की भारी क्षति की ओर धकेलती है। राहु और केतु की महादशा में जब मारकेश भावों के स्वामियों की अंतर्दशा जुड़ जाती है तब औषधि भी रोग को ठीक करने में असमर्थ होने लगती है। यह स्थिति मनुष्य को यह स्मरण कराती है कि भौतिक बुद्धि की अपनी सीमाएं हैं और केवल ईश्वरीय शरणागति ही इस भंवर से पार लगा सकती है।
ऋषियों ने ग्रह शांति के लिए अत्यंत वैज्ञानिक व्यवस्था बनाई है जिसे अधिकांश लोग समझ नहीं पाते। साधारण रत्न धारण करना अथवा केवल ग्रह का नाम लेना केवल सतही स्तर पर कार्य करता है। जब संकट गहरा हो तब ग्रह के स्वामी के भी अधिपति अर्थात प्रत्यधिदेवता को जाग्रत करना अनिवार्य हो जाता है।
इस शास्त्रीय रहस्य को समझकर की गई साधना कठिन से कठिन ग्रह दशा की नकारात्मकता को 90 प्रतिशत तक क्षीण कर देती है।
अनेक साधकों के मन में यह संशय रहता है कि क्या बिना भारी कर्मकांड के केवल नाम जप और मानसिक ध्यान से क्रूर दशा का निवारण संभव है। सनातन दर्शन का स्पष्ट उद्घोष है कि कलियुग में मानस पूजा और नाम संकीर्तन ही सर्वश्रेष्ठ साधन हैं। जब कोई व्यक्ति संकट काल में अपने दशा नाथ के प्रत्यधिदेवता के नाम का 108 बार नित्य जप करता है तब उसके अंतःकरण में दिव्य प्रकाश का संचार होता है।
मानसिक जप से वाणी और प्राण वायु शुद्ध होती है। यह शुद्धि सीधे अवचेतन मन में बैठे हुए भय को नष्ट कर देती है। जब मन का भय समाप्त हो जाता है तब 8वें और 12वें भाव के अशुभ स्पंदन जातक के आभामंडल को भेद नहीं पाते। इस प्रकार नाम जप एक ऐसा सुरक्षा कवच तैयार करता है जो व्यक्ति को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों धरातलों पर सुरक्षित रखता है।
ग्रह पीड़ा से मुक्ति और आत्मिक बल की वृद्धि के लिए दैनिक जीवन में एक नियमित साधना क्रम स्थापित करना आवश्यक है।
इस सरल नित्य क्रम को निरंतर 41 दिनों तक करने से अशांत वातावरण स्वतः शांत होने लगता है और अनुकूल अवसर मिलने लगते हैं।
ग्रह कभी किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत शत्रु नहीं होते अपितु वे केवल न्यायप्रिय न्यायाधीश की भांति कर्मों का फल वितरित करते हैं। जब मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर दशा नाथ के परम आराध्य के चरणों में आत्मसमर्पण कर देता है तब ग्रहों का दृष्टिकोण बदल जाता है। दंड देने वाली शक्तियां ही कृपा बरसाने वाली बन जाती हैं। दशा का संकट साधक के लिए आध्यात्मिक उत्थान का द्वार बन जाता है और जीवन में अखंड शांति की स्थापना होती है।
दशा नाथ के प्रत्यधिदेवता की पहचान कैसे की जाती है? विंशोत्तरी दशा में चल रहे महादशा स्वामी ग्रह के सर्वोच्च नियामक देव को प्रत्यधिदेवता कहा जाता है जैसे राहु के लिए माँ दुर्गा और केतु के लिए भगवान गणेश।
क्या 8वें भाव के स्वामी की दशा हमेशा अशुभ फल देती है? नहीं ऐसा नहीं है। 8वें भाव का स्वामी यदि आध्यात्मिक साधना, शोध और वैराग्य के मार्ग पर लगाया जाए तो वह जातक को गहन ज्ञान और अकूत आध्यात्मिक संपदा भी देता है।
राहु की महादशा में किस देवी या देवता की आराधना सबसे फलदायी मानी जाती है? राहु की महादशा में माँ दुर्गा, माँ काली और भगवान भैरव की आराधना सबसे अधिक प्रभावशाली मानी जाती है जो राहु के भ्रम और भय को समूल नष्ट करती है।
क्या रत्नों के बिना भी केवल मंत्र जप से क्रूर दशा को शांत किया जा सकता है? हाँ शास्त्रों के अनुसार मंत्र जप, स्तोत्र पाठ और दान रत्न धारण करने की तुलना में अधिक गहरे और स्थायी फल प्रदान करते हैं।
दशा शांति के लिए किया जाने वाला जप कितने दिनों में अपना प्रभाव दिखाता है? सच्चे भाव और नियम पूर्वक किया गया जप सामान्यतः 21 से 41 दिनों के भीतर मानसिक शांति और परिस्थितियों में सकारात्मक बदलाव दिखाने लगता है।
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