By पं. नरेंद्र शर्मा
अलक्ष्मी भाव में कैसे मिलती है परम शांति और मोक्ष

साधना मुहूर्त और मूल नियम
जीवन में कुछ ऐसे कालखंड आते हैं जब सफलता के सभी द्वार बंद प्रतीत होते हैं। प्रयास करने पर भी परिणाम नहीं मिलता। लोग दूर हो जाते हैं। घर में सन्नाटा बैठ जाता है। धन का ह्रास होता है। स्वास्थ्य बिगड़ता है। मन में एक अजीब सी खालीपन की अनुभूति होती है। ऐसा लगता है कि ब्रह्मांड स्वयं विरुद्ध हो गया है। शास्त्र इस अवस्था को अलक्ष्मी भाव कहते हैं। यह केवल दरिद्रता नहीं है। यह एक ऐसी चेतना है जहाँ सभी सांसारिक सुख समाप्त हो जाते हैं और मनुष्य केवल अपने अस्तित्व के साथ अकेला रह जाता है।
इसी अलक्ष्मी भाव की देवी रूप में व्याख्या करने पर माँ धूमावती सामने आती हैं। दस महाविद्याओं में सातवीं माँ धूमावती विधवा स्वरूप में पूजी जाती हैं। उनका स्वरूप वृद्ध, क्रोधित, भूखा और दरिद्र बताया गया है। यह वर्णन किसी को भयभीत करने के लिए नहीं है। यह एक गहन संकेत है कि जब जीवन के सभी रस सूख जाते हैं तब जो चेतना शेष रहती है, वही परम सत्य की ओर ले जाती है। धूमावती का अर्थ है धूम्र रूपिणी, अर्थात धुएँ जैसी। धुआँ सब कुछ ढक लेता है। वैसे ही माँ धूमावती की कृपा में सांसारिक माया ढक जाती है और केवल आत्मा शेष रहती है।
वैदिक ज्योतिष में केतु ग्रह को मोक्ष कारक माना गया है। केतु वह ग्रह है जो सिर रहित है। इसका अर्थ है कि केतु बुद्धि और अहंकार से परे है। केतु अचानक अंत लाता है। केतु भ्रम तोड़ता है। केतु व्यक्ति को एकाकी कर देता है। केतु धन हर लेता है। केतु स्वास्थ्य छीन लेता है। पर केतु का अंतिम उद्देश्य विनाश नहीं है। केतु का उद्देश्य है परम वैराग्य। जब व्यक्ति सब कुछ खो देता है तब वह केवल ईश्वर के पास बचता है। यही केतु का चरम वैराग्य है।
यह लेख उसी गूढ़ संबंध को खोलता है। इसमें केवल मंत्र नहीं है। इसमें प्रारब्ध कर्मों का तर्क है, अलक्ष्मी भाव का मनोविज्ञान है, वैराग्य का आध्यात्मिक अर्थ है और वह ज्योतिषीय आधार है जिसके सहारे माँ धूमावती की सात्विक पूजा जातक के सभी प्रारब्ध कर्मों को भस्म कर परम शांति प्रदान करती है।
माँ धूमावती को दस महाविद्याओं में सबसे असामान्य देवी माना गया है। अन्य देवियाँ सुंदर, युवा और सौंदर्य से युक्त हैं। माँ धूमावती वृद्ध, क्रोधित, भूखी और विधवा हैं। उनके हाथ में वरद मुद्रा और अभय मुद्रा है। वे धूम्र वर्ण की हैं। उनके रथ में ध्वजा है जिसमें कौवा बैठा है। कौवा मृत्यु और अशुभ का प्रतीक माना जाता है। पर यही अशुभता माँ धूमावती की महिमा है।
विधवा स्वरूप का अर्थ है संबंधों से मुक्ति। विधवा वह स्त्री है जिसका पति नहीं है। शास्त्रीय दृष्टि में पति केवल व्यक्ति नहीं है। पति वह सब कुछ है जिससे स्त्री का अस्तित्व जुड़ा होता है। जब वह सब छीन लिया जाता है तब स्त्री केवल अपने अस्तित्व के साथ रह जाती है। माँ धूमावती का विधवा स्वरूप इसी चेतना का प्रतीक है। वे बताती हैं कि जब सभी संबंध टूट जाते हैं तब जो शेष रहता है, वही आत्मा है।
ज्येष्ठ मास को अलक्ष्मी भाव का मास माना गया है। इस मास में लक्ष्मी की पूजा नहीं होती। यह मास दरिद्रता, कष्ट और वियोग का प्रतीक है। माँ धूमावती इसी मास की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे बताती हैं कि लक्ष्मी के बिना जो जीवन है, वही वास्तविक जीवन है। जब धन नहीं है, जब सम्मान नहीं है, जब लोग नहीं हैं तब मनुष्य केवल अपने कर्मों के साथ रह जाता है। यही प्रारब्ध कर्मों का भस्म होने का समय है।
वैदिक ज्योतिष में केतु को छाया ग्रह माना गया है। केतु राहु का विपरीत ध्रुव है। जहाँ राहु भ्रम और इच्छा का कारक है, वहीं केतु भ्रम मोचन और वैराग्य का कारक है। केतु का प्रभाव जब किसी की कुंडली में प्रबल होता है तब व्यक्ति को अचानक अंत, एकाकीपन, शोक और वियोग का सामना करना पड़ता है।
जब केतु पीड़ित होता है तब ये प्रभाव अत्यधिक हो जाते हैं। व्यक्ति को लगता है कि जीवन व्यर्थ है। कोई उद्देश्य नहीं है। कोई दिशा नहीं है। यह अवस्था चरम वैराग्य की पूर्व संध्या है। केतु व्यक्ति को इसी बिंदु पर लाता है जहाँ वह सब कुछ छोड़ने को तैयार हो जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ माँ धूमावती की कृपा आरंभ होती है।
| भाव | प्रभाव | वैराग्य का स्वरूप |
|---|---|---|
| प्रथम | अहंकार का क्षय, शरीर में कष्ट | स्वयं से विरक्ति |
| चतुर्थ | घर और मन की शांति का ह्रास | गृह वैराग्य |
| सप्तम | वैवाहिक संबंध में वियोग | दाम्पत्य वैराग्य |
| अष्टम | मृत्यु, रहस्य, आकस्मिक परिवर्तन | मृत्यु वैराग्य |
| द्वादश | मोक्ष, त्याग, एकांत, विदेश | परम वैराग्य |
इन भावों में केतु जब प्रबल होता है तब व्यक्ति को उसी क्षेत्र में वैराग्य अनुभव होता है। माँ धूमावती की साधना इसी वैराग्य को सकारात्मक दिशा देती है।
अलक्ष्मी का अर्थ है लक्ष्मी का अभाव। लक्ष्मी धन, वैभव, सौंदर्य, सुख और समृद्धि की देवी हैं। अलक्ष्मी वह अवस्था है जब ये सभी तत्व समाप्त हो जाते हैं। शास्त्र में अलक्ष्मी को देवी नहीं, पर एक भाव माना गया है। यह भाव ज्येष्ठ मास में प्रबल होता है। इस मास में लक्ष्मी की पूजा वर्जित है।
दरिद्रता के दो रूप हैं। एक है बाह्य दरिद्रता। इसमें धन, वस्त्र, भोजन और आश्रय की कमी होती है। दूसरा है आंतरिक दरिद्रता। इसमें मन की शांति, प्रेम, सम्मान और आध्यात्मिक रस की कमी होती है। माँ धूमावती दोनों रूपों की देवी हैं। वे बाह्य दरिद्रता को स्वीकार करना सिखाती हैं और आंतरिक दरिद्रता को भस्म करती हैं।
जब व्यक्ति लगातार विफलता, एकाकीपन और शोक का समय झेलता है तब वह अलक्ष्मी भाव में प्रवेश करता है। इस भाव में व्यक्ति के पास दो मार्ग होते हैं। एक मार्ग है विद्रोह, क्रोध, ईर्ष्या और अधर्म। दूसरा मार्ग है स्वीकार, समर्पण, श्रद्धा और धर्म। माँ धूमावती की सात्विक पूजा व्यक्ति को दूसरा मार्ग दिखाती है।
प्रारब्ध कर्म वे कर्म हैं जो इस जन्म में भोगने के लिए निर्धारित हैं। इन्हें टाला नहीं जा सकता। इन्हें भोगना ही पड़ता है। पर शास्त्र कहते हैं कि सात्विक साधना से प्रारब्ध कर्मों का फल हल्का हो जाता है। कुछ कर्म तो पूर्णतः भस्म हो जाते हैं।
माँ धूमावती की साधना प्रारब्ध कर्मों को भस्म करने का एक प्रबल उपाय है। जब व्यक्ति श्रद्धा से, समर्पण से और सत्य भाव से माँ धूमावती का स्मरण करता है तब निम्न प्रक्रिया आरंभ होती है।
यह प्रक्रिया रातों रात नहीं होती। न्यूनतम ४० दिन की निरंतर साधना आवश्यक है। कुछ जातकों को कई महीने लगते हैं। पर जो व्यक्ति इस मार्ग पर चलता है, उसे परम शांति अवश्य प्राप्त होती है।
माँ धूमावती की साधना उग्र नहीं, सात्विक होनी चाहिए। उग्र साधना से केतु और पीड़ित होता है। सात्विक साधना से केतु शांत होता है और वैराग्य सकारात्मक बनता है।
| क्रम | कार्य | भाव |
|---|---|---|
| १ | स्नान कर काला या धूसर वस्त्र धारण करें | अहंकार का त्याग |
| २ | दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आसन ग्रहण करें | केतु की दिशा |
| ३ | तिल के तेल का दीपक जलाएं | अंधकार का नाश |
| ४ | तिल, काला वस्त्र, काली उड़द अर्पित करें | दरिद्रता का स्वीकार |
| ५ | धूप और भस्म का प्रयोग करें | माया का धूम्र रूप |
| ६ | ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा का १०८ बार जाप करें | मंत्र सिद्धि |
| ७ | ११ या २१ बार ॐ धूं धूमावत्यै नमः का जाप करें | बीज मंत्र |
| ८ | कुछ क्षण मौन बैठें | केतु की शांति |
| ९ | किसी दरिद्र को दान करें | अलक्ष्मी का निवारण |
माँ धूमावती की सात्विक पूजा से निम्न लाभ प्राप्त होते हैं।
माँ धूमावती सात्विक भाव से प्रसन्न होती हैं। उग्र भाव से वे क्रोधित होती हैं।
माँ धूमावती कौन हैं और उनका स्वरूप क्यों विधवा है?
माँ धूमावती दस महाविद्याओं में सातवीं देवी हैं। उनका विधवा स्वरूप संबंधों से मुक्ति और आत्म चेतना का प्रतीक है।
केतु ग्रह और माँ धूमावती का क्या संबंध है?
केतु वैराग्य और मोक्ष का कारक है। माँ धूमावती केतु की अधिष्ठात्री देवी हैं और दोनों चरम वैराग्य का प्रतिनिधित्व करते हैं।
अलक्ष्मी भाव क्या है और यह कैसे दूर होता है?
अलक्ष्मी भाव लक्ष्मी का अभाव है। माँ धूमावती की सात्विक पूजा से यह भाव दूर होता है और दरिद्रता का स्वीकार आध्यात्मिक शक्ति बन जाता है।
प्रारब्ध कर्मों को भस्म कैसे किया जा सकता है?
माँ धूमावती की सात्विक पूजा, सत्य भाव, समर्पण और नियमित दान से प्रारब्ध कर्मों का फल हल्का होता है या भस्म हो जाता है।
माँ धूमावती का मूल मंत्र क्या है और कैसे जपें?
मूल मंत्र है ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा। शनिवार या मंगलवार को रात्रि में १०८ बार, न्यूनतम ४० दिन जपें।
माँ धूमावती का स्वरूप धुएँ जैसा है। धुआँ सब कुछ ढक लेता है। रूप ढक जाता है। नाम ढक जाता है। पहचान ढक जाती है। केवल अस्तित्व शेष रहता है। जब व्यक्ति के जीवन में लगातार विफलता, एकाकीपन और शोक का समय आता है तब वह धुएँ में खड़ा होता है। उसे कुछ दिखाई नहीं देता। उसे केवल अपना अस्तित्व दिखाई देता है।
यही वह बिंदु है जहाँ माँ धूमावती की कृपा आरंभ होती है। वे व्यक्ति को बताती हैं कि जो ढक गया है, वह माया थी। जो शेष है, वही सत्य है। जो व्यक्ति इस सत्य को स्वीकार करता है, उसके सभी प्रारब्ध कर्म भस्म हो जाते हैं। उसे परम शांति प्राप्त होती है।
केतु उसी धुएँ का ग्रह है। केतु सब कुछ छीन लेता है। पर केतु का उद्देश्य व्यक्ति को खाली करना नहीं है। केतु का उद्देश्य है व्यक्ति को परम वैराग्य देना। जब व्यक्ति सब कुछ खो देता है तब वह केवल ईश्वर के पास बचता है। यही केतु का चरम वैराग्य है।
माँ धूमावती और केतु का संबंध केवल ज्योतिषीय गणना नहीं है। यह एक गहन आध्यात्मिक सत्य है। जो व्यक्ति श्रद्धा और समर्पण से माँ धूमावती की सात्विक पूजा करता है, उसे कभी निराश नहीं होना पड़ता। माँ धूमावती स्वयं आकर उसके संकट को हर लेती हैं। वे उसे वैराग्य देती हैं, शांति प्रदान करती हैं और मोक्ष की ओर ले जाती हैं।
इसलिए जो व्यक्ति लगातार विफलता, एकाकीपन और शोक से ग्रसित है, उसे माँ धूमावती की सात्विक पूजा अवश्य करनी चाहिए। यह पूजा उसके जीवन को पूर्णतः परिवर्तित कर देगी और उसे संकट से उद्धार करेगी।
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