By अपर्णा पाटनी
ज्योतिष की सीमाओं से परे आत्मसमर्पण और भाग्य परिवर्तन का सत्य

वैदिक वांग्मय में काल को अनादि और अनंत माना गया है। इस दृश्यमान जगत में जन्म लेने वाला प्रत्येक प्राणी अपने पूर्व संचित कर्मों की अदृश्य डोर से बंधा हुआ आता है। महर्षि पराशर और भगवान वेदव्यास ने ज्योतिष शास्त्र को काल पुरुष का नेत्र कहा है जो भूत, वर्तमान और भविष्य के कर्म चक्र को स्पष्ट रूप से उद्घाटित करता है। प्रायः लोग यह मान बैठते हैं कि नवग्रह उनके जीवन में सुख अथवा दुःख का निर्माण करते हैं किंतु सत्य इसके सर्वथा विपरीत है। ग्रह न तो किसी व्यक्ति से शत्रुता रखते हैं और न ही किसी पर अकारण प्रसन्न होते हैं।
ग्रह केवल ब्रह्मांडीय न्यायालय के निष्पक्ष दूत हैं जो जातक के संचित कर्मों का लेखा जोखा सही समय पर दशा और गोचर के माध्यम से उपस्थित करते हैं। जब तक मनुष्य इस सत्य को नहीं समझता तब तक वह ग्रहों से भयभीत होकर केवल बाह्य उपायों में उलझा रहता है।
| कर्म प्रकार | कर्म का सूक्ष्म स्वरूप | ग्रहीय प्रतिनिधि | निवारण और आध्यात्मिक उपाय |
|---|---|---|---|
| संचित कर्म | जन्म जन्मांतर के एकत्रित कर्मों का अथाह भंडार | कुंडली के नवम और द्वादश भाव | ईश्वर शरणागति और आत्मज्ञान |
| प्रारब्ध कर्म | संचित कर्मों का वह भाग जो वर्तमान जन्म में फलित होता है | जन्म लग्न और वर्तमान महादशा | तप, धैर्य और सात्विक आचरण |
| क्रियमाण कर्म | वर्तमान समय में किए जा रहे दैनिक कर्म | कुंडली का तृतीय और दशम भाव | निष्काम कर्म योग और विवेक |
| आगमी कर्म | भविष्य के लिए तैयार होने वाले संभावित विचार और कर्म | पंचम भाव और शुभ संकल्प | सदग्रंथ पठन और गुरु सेवा |
लोक मानस में ज्योतिष को लेकर यह भ्रांति गहराई से बैठी है कि कुंडली में लिखे हुए अशुभ योग अमिट होते हैं। वैदिक तत्वज्ञान स्पष्ट करता है कि ग्रह केवल सूचना देने वाले दर्पण हैं। दर्पण में धूल होने पर दर्पण को दोष देना व्यर्थ है क्योंकि मैल तो चेहरे पर लगा होता है। ठीक इसी प्रकार जब जन्म कुंडली में कालसर्प योग, साढ़ेसाती अथवा मारकेश जैसी प्रतिकूल दशाएं दिखाई देती हैं तो वे केवल यह संकेत करती हैं कि आत्मा पर पूर्व जन्म के कुछ भारी ऋण अवशेष हैं।
जब साधक इस रहस्य को जान लेता है तब वह ग्रहों की पूजा केवल भयवश नहीं करता अपितु अपने आंतरिक विकारों को दूर करने के लिए ईश्वरीय सत्ता से जुड़ता है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने घोषणा की है कि जो अनन्य भाव से परमपिता परमात्मा का चिंतन करते हुए उनकी शरण में आते हैं उनका योगक्षेम स्वयं ईश्वर वहन करते हैं। आत्मसमर्पण वह परम आध्यात्मिक रसायन है जो प्रारब्ध की कठोर शिला को भी पिघलाने का सामर्थ्य रखता है। जब जीवात्मा अपने अहंकार और कर्तापन के भाव को विसर्जित करके यह मान लेती है कि सृष्टि का प्रत्येक कण केवल परमात्मा की इच्छा से संचालित है तब समस्त ग्रहीय दोष निष्प्रभावी हो जाते हैं।
समर्पण का अर्थ अकर्मण्यता नहीं है बल्कि अपने समस्त कर्मों के फलों की चिंता त्यागकर ईश्वरीय इच्छा में आनंदित रहना है। जब साधक का मन सर्वसमर्पण की अवस्था में पहुंचता है तब 8वें और 12वें भाव की भयंकर पीड़ा भी आत्म जागरण का साधन बन जाती है। देवी भागवत और शिव पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि जो जीव निष्कपट भाव से प्रभु के चरणों में आश्रय लेता है नवग्रह उसके चरणों के सेवक बन जाते हैं।
कुंडली के ग्रह दोषों से मुक्ति पाने और भाग्य को बदलने के लिए ऋषियों ने बाह्य पत्थरों और आडंबरों के स्थान पर आंतरिक शुद्धि का मार्ग प्रशस्त किया है।
यह 5 साधना सूत्र मनुष्य की चेतना को भौतिक बंधनों से उठाकर परा चेतना में स्थापित कर देते हैं जहां कोई भी ग्रहीय कष्ट जातक को स्पर्श नहीं कर पाता।
ज्योतिष की वास्तविक सार्थकता भविष्य जानकर भयभीत होने में नहीं बल्कि अपने जीवन को धर्म और भक्ति के पथ पर अग्रसर करने में है। जब मनुष्य कर्म, ग्रह और ईश्वर के इस त्रिकोण को समझ लेता है तब उसका दृष्टिकोण पूरी तरह बदल जाता है। वह ग्रहों से लड़ना बंद कर देता है और अपने भीतर के परमात्मा को जगाने में लग जाता है। ईश्वरीय कृपा का एक कण भी जीवन में उतर आए तो करोड़ों अशुभ योग क्षण भर में भस्म हो जाते हैं और साधक परम आनंद और मोक्ष का अधिकारी बन जाता है।
क्या जन्म कुंडली में लिखा हुआ भाग्य पूरी तरह बदला जा सकता है? हाँ सच्चे आत्मसमर्पण, सत्कर्म और ईश्वरीय साधना द्वारा प्रारब्ध के कठोर कष्टों को अत्यंत सरल और सहज बनाया जा सकता है।
ग्रहों का मूल कार्य मनुष्य के जीवन में क्या होता है? ग्रह केवल मनुष्य के पूर्व जन्मों में संचित अच्छे और बुरे कर्मों का निष्पक्ष फल समय पर प्रदान करने वाले ब्रह्मांडीय संदेशवाहक हैं।
क्रूर ग्रहों की पीड़ा से बचने का सबसे सुरक्षित मार्ग क्या है? क्रूर ग्रहों की पीड़ा से बचने का सबसे सुरक्षित मार्ग अहंकार का त्याग करके भगवान की अनन्य शरण में जाना और निष्काम कर्म करना है।
क्या पूजा पाठ से संचित कर्मों का क्षय हो सकता है? हाँ शास्त्रों के अनुसार नियमित मंत्र जप, ध्यान और ईश्वरीय भक्ति से मन के मलिन संस्कार नष्ट होते हैं जिससे संचित कर्मों का भार समाप्त हो जाता है।
ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन करने का वास्तविक उद्देश्य क्या है? ज्योतिष का वास्तविक उद्देश्य अपने प्रारब्ध को समझकर आत्म परिष्कार करना और ईश्वरीय सत्ता के प्रति कृतज्ञ होकर मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होना है।
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