By पं. सुव्रत शर्मा
जानें कैसे माँ तारा की साधना से दूर होता है गुरु चांडाल दोष

तिथि और मुहूर्त विवरण
दस महाविद्याओं में माँ तारा को द्वितीय स्थान प्राप्त है। इनका नाम स्वयं उनकी शक्ति का परिचायक है। तारा का अर्थ है तारने वाली, अर्थात संकट से उद्धार करने वाली, भवसागर से पार ले जाने वाली। यह केवल एक नाम नहीं, वरन् एक सनातन सत्य है कि जब मानव अज्ञान के घोर अंधकार में फंस जाता है, जब बुद्धि भ्रमित हो जाती है, जब निर्णय शक्ति समाप्त हो जाती है तब माँ तारा की कृपा ही एकमात्र मार्गदर्शक बनती है।
वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति ग्रह को देवगुरु की संज्ञा दी गई है। यह ग्रह ज्ञान, विद्या, धर्म, न्याय, संतान, धन और आध्यात्मिक उन्नति का कारक माना जाता है। जब बृहस्पति अपनी उच्च अवस्था में होता है, तो व्यक्ति को असीम बुद्धि, सम्मान और वैभव प्राप्त होता है। परंतु जब यह ग्रह पीड़ित होता है, जब इस पर राहु या शनि की दृष्टि पड़ती है, जब गुरु चांडाल दोष बनता है तब वही व्यक्ति अचानक अज्ञानी, भ्रमित, आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक रूप से अपमानित होने लगता है।
माँ तारा और बृहस्पति का संबंध अत्यंत गूढ़ और सूक्ष्म है। तंत्र शास्त्र के अनुसार माँ तारा ही बृहस्पति की अधिष्ठात्री देवी हैं। जिस प्रकार बृहस्पति देवताओं के गुरु हैं, उसी प्रकार माँ तारा स्वयं बृहस्पति की भी गुरु हैं। वे उस परम ज्ञान की स्रोत हैं, जो बृहस्पति के माध्यम से संपूर्ण सृष्टि में प्रवाहित होता है।
पुराणों में एक प्रसंग वर्णित है जिसमें बृहस्पति की पत्नी तारा का हरण चंद्रमा द्वारा कर लिया गया था। इस घटना ने बृहस्पति को गहरा आघात पहुंचाया। क्रोध, दुःख और अपमान की वेदना से देवगुरु विचलित हो उठे। इसी संकट काल में माँ तारा का स्वरूप प्रकट हुआ। उन्होंने न केवल बृहस्पति को मानसिक शांति प्रदान की, वरन् उन्हें उस अंधकार से बाहर निकाला जो उनके ज्ञान पर छा गया था।
यह कथा केवल एक पौराणिक घटना नहीं है। यह एक गहन ज्योतिषीय और आध्यात्मिक संकेत है। जब जातक की कुंडली में बृहस्पति पीड़ित होता है, तो उसे वही मानसिक वेदना होती है। निर्णय लेने की क्षमता समाप्त हो जाती है। धन का ह्रास होने लगता है। संतान पक्ष से कष्ट मिलते हैं। विवाह में बाधाएं आती हैं। ऐसे समय में माँ तारा की साधना करने से बृहस्पति की पीड़ा शांत होती है और जातक को पुनः ज्ञान, धन और सम्मान प्राप्त होता है।
माँ तारा को नील सरस्वती के रूप में भी पूजा जाता है। नील का अर्थ है गहरा, अपार। सरस्वती का अर्थ है वाणी और विद्या। अर्थात माँ तारा वह गूढ़ वाणी और परम विद्या हैं, जो मनुष्य को अज्ञान के सागर से पार ले जाती हैं। जब बृहस्पति कमजोर होता है, तो व्यक्ति की वाणी में प्रभाव नहीं रहता। उसके शब्दों में वजन नहीं होता। माँ तारा की कृपा से वाक् सिद्धि प्राप्त होती है, अर्थात व्यक्ति जो बोलता है, वह सत्य और प्रभावशाली हो जाता है।
ज्योतिष शास्त्र में गुरु चांडाल दोष एक गंभीर दोष माना गया है। यह दोष तब बनता है जब बृहस्पति और राहु एक ही भाव में युति बनाते हैं। बृहस्पति जहां धर्म, ज्ञान और पवित्रता का कारक है, वहीं राहु भ्रम, माया और अधर्म का प्रतीक है। जब ये दोनों एक साथ आते हैं, तो व्यक्ति का धर्म भ्रष्ट हो जाता है। वह गलत मार्ग पर चलने लगता है। उसकी बुद्धि विपरीत दिशा में कार्य करने लगती है।
इस दोष से ग्रसित व्यक्ति को अचानक धन हानि, सामाजिक अपमान, नौकरी में बाधा, विवाह में रुकावट और संतान संबंधी कष्ट झेलने पड़ते हैं। ऐसे में माँ तारा की साधना अत्यंत प्रभावकारी सिद्ध होती है। तंत्र शास्त्र में स्पष्ट कहा गया है कि गुरु चांडाल दोष के निवारण के लिए माँ तारा का अनुष्ठान सर्वोत्तम उपाय है।
माँ तारा की कृपा से राहु का दुष्प्रभाव कम होता है और बृहस्पति पुनः अपनी शुभ शक्ति प्रदान करने लगता है। जातक को अद्भुत वाक शक्ति प्राप्त होती है। उसकी बुद्धि में तेज आता है। धन के स्रोत खुलने लगते हैं। वह जो कार्य करता है, उसमें सफलता मिलती है।
माँ तारा की साधना करने के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन आवश्यक है। यह साधना केवल मंत्र जाप नहीं है, वरन् एक संपूर्ण आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
| चरण | विधि | महत्व |
|---|---|---|
| १ | बृहस्पतिवार को स्नान के पश्चात स्वच्छ पीत वस्त्र पहनें | बृहस्पति की कृपा प्राप्त होती है |
| २ | उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन ग्रहण करें | सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है |
| ३ | घी का दीपक जलाएं और पीले पुष्प अर्पित करें | माँ तारा प्रसन्न होती हैं |
| ४ | ॐ ह्रीं श्रीं हूं फट् मंत्र का १०८ बार जाप करें | मंत्र सिद्धि प्राप्त होती है |
| ५ | कम से कम ४० दिन तक निरंतर साधना करें | पूर्ण फल प्राप्त होता है |
जब बृहस्पति ग्रह पीड़ित होता है, तो व्यक्ति के जीवन में कुछ विशिष्ट लक्षण दिखाई देते हैं। इन लक्षणों को पहचानकर समय पर उपाय करना आवश्यक है।
तंत्र शास्त्र में माँ तारा को अक्षोभ्य शिव के साथ जोड़ा गया है। अक्षोभ्य का अर्थ है जो कभी विचलित न हो। शिव का अर्थ है मंगल और कल्याण। जब माँ तारा की साधना अक्षोभ्य शिव के साथ की जाती है, तो साधक को अद्भुत वाक शक्ति, ज्ञान और धन प्राप्त होता है।
यह संबंध इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान और भक्ति का संगम ही संपूर्ण सफलता देता है। माँ तारा ज्ञान की देवी हैं और शिव भक्ति और तप के देवता हैं। जब ये दोनों शक्तियां मिलती हैं, तो साधक का उद्धार अवश्यंभावी हो जाता है।
जो व्यक्ति गंभीर अज्ञान, आर्थिक कंगाली या गुरु चांडाल दोष से ग्रसित है, उसके लिए माँ तारा और अक्षोभ्य शिव की साधना वरदान सिद्ध होती है। इस साधना से न केवल भौतिक समस्याएं दूर होती हैं, वरन् आध्यात्मिक उन्नति भी होती है।
माँ तारा के कई मंत्र हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट प्रभाव है। इन मंत्रों का जाप करने से साधक को विभिन्न लाभ प्राप्त होते हैं।
| मंत्र | प्रभाव | जाप संख्या |
|---|---|---|
| ॐ ह्रीं श्रीं हूं फट् | ज्ञान, धन और रक्षा | १०८ बार |
| ॐ तारे स्वाहा | बाधा निवारण और सफलता | १००८ बार |
| ॐ श्रीं तारादेव्यै नमः | आशीर्वाद और मार्गदर्शन | १०८ बार |
| ह्रीं श्रीं हूं फट् | धन और समृद्धि | १००८ बार |
इन मंत्रों का जाप करने के लिए शुद्ध मन और श्रद्धा आवश्यक है। मंत्र जाप के समय सात्विक भोजन करें, ब्रह्मचर्य का पालन करें और नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
माँ तारा की कृपा प्राप्त करने के लिए केवल मंत्र जाप ही पर्याप्त नहीं है। कुछ अतिरिक्त उपाय भी किए जाने चाहिए।
माँ तारा की साधना कब करनी चाहिए?
माँ तारा की साधना बृहस्पतिवार, शुक्ल पक्ष में करनी चाहिए। पुष्य नक्षत्र या गुरु होरा में आरंभ करना शुभ होता है।
गुरु चांडाल दोष क्या है?
जब बृहस्पति और राहु एक ही भाव में युति बनाते हैं, तो गुरु चांडाल दोष बनता है। इससे धन हानि, भ्रम और अधर्म की प्रवृत्ति होती है।
माँ तारा का मूल मंत्र क्या है?
माँ तारा का मूल मंत्र ॐ ह्रीं श्रीं हूं फट् है। इस मंत्र का १०८ बार जाप करने से बृहस्पति की कृपा प्राप्त होती है।
तारा देवी की साधना से क्या लाभ होता है?
तारा देवी की साधना से ज्ञान, धन, वाक् सिद्धि, शत्रु नाश और अंततः मोक्ष प्राप्त होता है।
बृहस्पति पीड़ा के क्या लक्षण हैं?
बृहस्पति पीड़ा के लक्षण हैं: अचानक धन हानि, निर्णय में भ्रम, गुरुजनों से मतभेद, संतान कष्ट और विवाह में बाधा।
माँ तारा और बृहस्पति का संबंध केवल ज्योतिषीय गणना नहीं है। यह एक गहन आध्यात्मिक सत्य है। जब व्यक्ति अज्ञान के अंधकार में फंस जाता है, जब उसकी बुद्धि भ्रमित हो जाती है, जब धन और सम्मान का ह्रास होता है तब माँ तारा की कृपा ही एकमात्र सहारा बनती है।
जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ माँ तारा की साधना करता है, उसे कभी निराश नहीं होना पड़ता। माँ तारा स्वयं आकर उसके संकट को हर लेती हैं। वे उसे ज्ञान का प्रकाश देती हैं, धन की समृद्धि देती हैं और वाक सिद्धि प्रदान करती हैं।
इसलिए जो व्यक्ति गंभीर अज्ञान, आर्थिक कंगाली या गुरु चांडाल दोष से ग्रसित है, उसे माँ तारा और अक्षोभ्य शिव की साधना अवश्य करनी चाहिए। यह साधना उसके जीवन को पूर्णतः परिवर्तित कर देगी और उसे संकट से उद्धार करेगी।
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