माँ मातंगी और बुध की वाणी

By पं. अमिताभ शर्मा

64 कलाएं, मधुर वाणी और किन्नर आशीष कैसे जागते हैं

मातंगी बुध: 64 कलाएं मधुर वाणी संगीत और किन्नर आशीष

साधना मुहूर्त और मूल नियम

  • सर्वोत्तम दिन: बुधवार और शुक्रवार
  • पक्ष: शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा विशेष रूप से अनुकूल
  • नक्षत्र: हस्त, रेवती, मृगशिरा, रोहिणी
  • होरा: बुध होरा या शुक्र होरा
  • दिशा: पूर्व या उत्तर पूर्व मुख
  • वस्त्र: हरा, पीला या श्वेत स्वच्छ वस्त्र
  • दीप: घी का दीपक
  • अर्पण: हरे पुष्प, तुलसी, मिश्री, केला, सुगंधित धूप, वीणा या संगीत का स्मरण
  • मूल मंत्र: ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं मातंग्यै नमः 108 बार
  • सरस्वती बीज सहित: ॐ ऐं ह्रीं श्रीं मातंगेश्वर्यै नमः 11 या 21 बार
  • अवधि: न्यूनतम 40 दिन निरंतर, कलाकारों के लिए परीक्षा या मंच से पूर्व 21 दिन
  • मूल अनुशासन: सत्य और मधुर वाणी, कटु व्यंग्य का त्याग, किसी को झूठे आकर्षण से बांधने का भाव निषिद्ध, गुरु बिना उग्र उच्छिष्ट प्रयोग न करें

जब वाणी स्वयं देवता बन जाती है

कुछ शक्तियां पुस्तक से नहीं, शब्द से उतरती हैं। एक गायक जब स्वर लगाता है तो कमरा बदल जाता है। एक अभिनेता जब संवाद बोलता है तो भीड़ चुप हो जाती है। एक वक्ता जब सरल वाक्य कहता है तो श्रोता का मन बिना दबाव के झुक जाता है। शास्त्र इस शक्ति को केवल प्रतिभा नहीं कहते। वे इसे वाक् सिद्धि कहते हैं। दस महाविद्याओं में यह सिद्धि माँ मातंगी के हाथ में है।

माँ मातंगी को उच्छिष्ट चांडालिनी कहा गया है। उच्छिष्ट का अर्थ है बचा हुआ, जो समाज शुद्ध नहीं मानता। चांडालिनी का अर्थ है वह शक्ति जो सीमा के बाहर खड़ी है। यह नाम अपमान नहीं है। यह घोषणा है कि ज्ञान केवल मंदिर की चौखट तक सीमित नहीं रहता। जो स्वर, जो कला, जो समुदाय मुख्यधारा से बाहर रखा गया, वही मातंगी की गोद में बैठता है। इसलिए इन्हें तंत्र की सरस्वती कहा गया है। सरस्वती विद्या की स्वच्छ धारा हैं। मातंगी वही विद्या हैं जब वह गली, मंच, मीडिया, संगीत और हाशिए के जीवन में उतरती है।

वैदिक ज्योतिष में यह संयुक्त शक्ति बुध और शुक्र से चलती है। बुध वाणी, बुद्धि, लेखन, संचार, गणना और मीडिया का कारक है। शुक्र संगीत, सौंदर्य, अभिनय, रस, आकर्षण और ललित कलाओं का कारक है। जब दोनों सहयोग करते हैं तब व्यक्ति केवल जानता नहीं, सुना भी जाता है। माँ मातंगी उसी योग की अधिष्ठात्री हैं। उनकी साधना से वाणी में वह मिठास आती है कि सुनने वाला सम्मोहित सा हो जाता है। यह सम्मोहन छल नहीं है। यह नाद की शुद्धता है।

उच्छिष्ट चांडालिनी का गहरा अर्थ

उच्छिष्ट साधना का स्थूल अर्थ कुछ परंपराओं में बचा हुआ नैवेद्य अर्पित करना है। गृहस्थ के लिए बिना गुरु के वह उग्र विधि आवश्यक नहीं। गहरा अर्थ यह है कि जीवन का बचा हुआ अंश भी देवी को अर्पण योग्य है। अधूरी कविता, टूटा स्वर, अस्वीकृत कलाकार, समाज से अलग रखा गया शरीर, ये सब मातंगी के द्वार पर अशुद्ध नहीं माने जाते।

सरस्वती जहां शुद्ध उच्चारण और शास्त्र पढ़ाती हैं, मातंगी वहां जीवित बोली पढ़ाती हैं। बाजार की भाषा, मंच का संवाद, फिल्म का गीत, समाचार की पंक्ति, किन्नर समुदाय का आशीर्वाद, ये सब वाणी के रूप हैं। मातंगी इन्हीं रूपों की स्वामिनी हैं। जो व्यक्ति अपनी वाणी से शर्माता है, जो कलाकार अपने स्वर को घटिया समझता है, जो वक्ता मंच पर कांपता है, उसी के कंठ में मातंगी बैठती हैं।

उच्छिष्ट का एक और अर्थ है अवशिष्ट ज्ञान। जो ज्ञान सभाओं में नहीं कहा जाता, जो अनुभव हाशिए पर रहता है, वही ज्ञान कभी कभी सबसे तीक्ष्ण होता है। मातंगी उसी अवशिष्ट ज्ञान को वाणी बनाती हैं। इसलिए इनकी कृपा केवल विद्यार्थी को नहीं, रचनाकार, गायक, नर्तक, पत्रकार और अभिनेता को विशेष रूप से छूती है।

बुध और शुक्र का कला योग

बुध ग्रह कुमार है। वह शब्द जोड़ता है। वह तर्क करता है। वह समाचार बनाता है। वह पटकथा लिखता है। वह साक्षात्कार देता है। जब बुध निर्बल होता है तब व्यक्ति जानता है पर कह नहीं पाता। वाक्य उलझते हैं। स्मृति परीक्षा में छूट जाती है। मीडिया में संदेश बिखर जाता है।

शुक्र ग्रह रस है। वह स्वर में पानी भरता है। वह अभिनय में भाव लाता है। वह वस्त्र, रंग, कैमरा और मंच को सुंदर बनाता है। शुक्र निर्बल हो तो कला शुष्क लगती है। गाना technically सही होता है पर हृदय नहीं छूता।

मातंगी इन दोनों को एक रस्सी में पिरोती हैं। बुध देता है अर्थ। शुक्र देता है माधुर्य। मातंगी देती हैं वह चुंबक जिससे अर्थ और माधुर्य श्रोता तक पहुंचते हैं। ज्योतिष में पंचम भाव कला और बुद्धि है। तृतीय भाव लेखन और साहस है। द्वितीय भाव वाणी है। दशम भाव प्रसिद्धि और कर्म है। ग्यारहवां भाव श्रोता और दर्शक है। इन भावों में बुध शुक्र जब मातंगी की कृपा से शुद्ध होते हैं तब कला जीविका भी बनती है और साधना भी।

भावों में कला और वाणी

भाव भूमिका मातंगी कृपा से फल
द्वितीय वाणी, स्वाद, परिवार मधुर और प्रभावशाली वचन
तृतीय लेखन, संचार, प्रयास पटकथा, संवाद, साहस
पंचम बुद्धि, संगीत, अभिनय सृजन और स्मृति
सप्तम दर्शक, साझेदारी मंच और जनसंपर्क
दशम कर्मक्षेत्र, यश मीडिया और कला व्यवसाय
एकादश श्रोता समूह, लाभ प्रशंसा और स्थायी श्रोता

चौंसठ कलाएं और मातंगी का अधिकार

भारतीय परंपरा में 64 कलाएं जीवन को पूर्ण बनाने वाले कौशल मानी गई हैं। इनमें संगीत, नृत्य, वाद्य, चित्र, माला गूथना, पाक, वस्त्र सज्जा, संवाद कौशल, नाट्य, काव्य और अनेक गृह तथा राजसी कलाएं आती हैं। मातंगी को इन कलाओं की स्वामिनी कहा गया है क्योंकि कला केवल हाथ की सफाई नहीं है। कला वाणी का विस्तार है। स्वर भी वाणी है। मुद्रा भी वाणी है। रंग भी वाणी है।

कलाकार जब केवल तकनीक सीखता है तब वह कुशल होता है। जब मातंगी छूती हैं तब वह संवादी हो जाता है। उसका गाना लोगों के पुराने घाव छूता है। उसका संवाद याद रह जाता है। उसका लेख साझा किया जाता है। यही आकर्षण है जिसे तंत्र में वशंकरी शक्ति कहा गया। गृहस्थ साधक के लिए इसका शुद्ध अर्थ है कि वचन सत्य हो, कोमल हो और दूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करे। किसी को झूठ बोलकर अपने वश में करना मातंगी नहीं, अधर्म है।

कलाकारों के लिए विशेष क्षेत्र

  • शास्त्रीय और सुगम संगीत
  • नृत्य, नाट्य और सिनेमा अभिनय
  • लेखन, पत्रकारिता और वक्तृत्व
  • चित्र, डिजाइन और मंच सज्जा
  • शिक्षण, भाषा और अनुवाद
  • रेडियो, दूरदर्शन और डिजिटल मीडिया
  • संवाद लेखन और स्वर अभिनय

इन क्षेत्रों में सफलता के लिए केवल ग्रह बल पर्याप्त नहीं। प्रतिदिन रियाज चाहिए। मातंगी रियाज को फल देती हैं। बिना रियाज के मंत्र केवल कंपन रह जाता है।

किन्नर समुदाय और सीमा के पार की देवी

मातंगी की महिमा का एक कोमल अध्याय उन समुदायों से जुड़ा है जिन्हें समाज ने लंबे समय तक किनारे रखा। किन्नर समुदाय कला, आशीर्वाद, नृत्य और वाणी के पुराने वाहक रहे हैं। जन्म, उत्सव और द्वार पर उनका वचन कई परंपराओं में शुभ माना गया। तंत्र की दृष्टि में यह संयोग अर्थहीन नहीं है। मातंगी स्वयं उस देवी हैं जो जाति, लिंग और शुद्धता की कठोर रेखा को तोड़ती हैं।

किन्नर जीवन में वाणी ही पूंजी होती है। आशीर्वाद, गीत, हाव भाव और उपस्थिति ही उनकी शक्ति है। जब समाज उन्हें अपमान देता है तब मातंगी का रूप याद दिलाता है कि हाशिए पर खड़ा शरीर भी दिव्य हो सकता है। साधना का यह अंग किसी समुदाय का शोषण नहीं, उसके सम्मान का स्मरण है। जो साधक मातंगी का जाप करता है उसे कटु भाषा, उपहास और भेदभाव छोड़ना चाहिए। अन्यथा मंत्र और आचरण एक दूसरे को काटते हैं।

मनोवैज्ञानिक स्तर पर मातंगी वह अनुमति हैं जिससे व्यक्ति अपनी असली आवाज निकाल सके। कई कलाकार इसलिए नहीं चमकते कि उनमें स्वर नहीं है। वे इसलिए दबते हैं क्योंकि किसी ने कहा था कि तुम्हारी बोली, तुम्हारा शरीर, तुम्हारा परिवार शुद्ध नहीं। मातंगी उसी गांठ को खोलती हैं।

मातंगी साधना से वाणी में आकर्षण कैसे आता है

वाणी तीन स्तरों पर चलती है। मन में विचार। कंठ में स्वर। लोक में प्रभाव। बुध विचार को क्रम देता है। शुक्र स्वर को रस देता है। मातंगी प्रभाव को धर्म से जोड़ती हैं। जब तीनों मिलते हैं तब सुनने वाला सम्मोहित लगता है क्योंकि उसे झूठ नहीं, उपस्थिति सुनाई देती है।

तंत्र कहता है कि जिह्वा पर देवी बैठती हैं। कटु वचन देवी को हटा देता है। मधुर पर झूठा वचन भी हटा देता है। इसलिए साधना का पहला अंग वाणी व्रत है। एक सप्ताह तक निंदा कम करना। आवाज धीमी रखना। गाने से पहले मौन। बोलने से पहले अर्थ देखना। तब ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं मातंग्यै नमः भूमि पाता है। ऐं सरस्वती बीज है। ह्रीं शक्ति बीज है। मातंगी इन दोनों को लोक व्यवहार में उतारती हैं।

दैनिक साधना विधि

क्रम कार्य भाव
1 स्नान कर हरा या पीला वस्त्र धारण करें कला और बुध की शुद्धि
2 मातंगी का हरित वर्ण चित्र या वीणा स्मरण रखें नाद का आसन
3 घी दीप और सुगंधित धूप जलाएं वातावरण में रस
4 हरे पुष्प और मिश्री अर्पित करें वाणी की मिठास
5 ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं मातंग्यै नमः का 108 जाप वाक् सिद्धि का बीज
6 कुछ पंक्तियां गाएं या स्वर साधें शुक्र का जागरण
7 एक पृष्ठ लिखें या संवाद बोलें बुध का अभ्यास
8 किसी कलाकार, शिक्षक या किन्नर बंधु का सम्मान करें उच्छिष्ट द्वार का सत्कार

उच्छिष्ट चांडालिनी की उग्र तांत्रिक विधि श्मशान या जूठे नैवेद्य की जटिल प्रक्रिया गुरु बिना नहीं करनी चाहिए। गृहस्थ के लिए बचा हुआ अहंकार अर्पित करना ही पर्याप्त उच्छिष्ट है। अर्थात यश का घमंड, बोली का तिरस्कार और कला का दुरुपयोग छोड़ देना।

किन जातकों को यह साधना विशेष फल देती है

  • जिनके बुध या शुक्र पीड़ित हों और वाणी में रस न हो
  • जो संगीत, अभिनय, लेखन या मीडिया से जुड़े हों
  • जो मंच भय, तुतलाहट या कठोर स्वर से जूझते हों
  • जिनका पंचम या द्वितीय भाव शिथिल हो
  • जो 64 कलाओं में से किसी एक को जीविका बनाना चाहते हों
  • जो सामाजिक अपमान के कारण अपनी आवाज दबाए बैठे हों
  • किन्नर समुदाय के साधक जो आशीर्वाद और कला से जीवन चलाते हों

क्या नहीं करना चाहिए

  • किसी को अनैतिक रूप से आकर्षित या नियंत्रित करने का जाप नहीं
  • झूठी खबर, भड़काऊ संवाद और निंदा के साथ साधना नहीं
  • गुरु बिना उग्र उच्छिष्ट तंत्र नहीं
  • कला में अश्लीलता को सिद्धि समझना नहीं
  • किन्नर या हाशिए के समुदाय का उपहास नहीं
  • केवल प्रसिद्धि के लालच में मंत्र नहीं

मातंगी वाणी की देवी हैं। वाणी यदि हिंसा बने तो देवी विमुख होती हैं।

FAQ

माँ मातंगी को तंत्र की सरस्वती क्यों कहते हैं?

सरस्वती विद्या और वाणी की देवी हैं। मातंगी वही शक्ति हैं जब विद्या मंच, संगीत, मीडिया और समाज के किनारे तक उतरती है। इसलिए इन्हें तंत्र की सरस्वती कहा गया है।

बुध और शुक्र का मातंगी से क्या संबंध है?

बुध वचन, बुद्धि और संचार देता है। शुक्र संगीत, रस और कला देता है। मातंगी दोनों को जोड़कर वाणी में आकर्षण लाती हैं।

उच्छिष्ट चांडालिनी का अर्थ क्या है?

उच्छिष्ट बचा हुआ अंश है। चांडालिनी सीमा के बाहर की शक्ति है। यह रूप सिखाता है कि हाशिए का जीवन और अधूरी कला भी दिव्य अर्पण हो सकती है।

क्या मातंगी साधना संगीत और मीडिया में सफलता देती है?

नियमित जाप, रियाज और मधुर सत्य वाणी से संगीत, अभिनय, लेखन और मीडिया में प्रभाव बढ़ता है। केवल मंत्र से अभ्यास का स्थान नहीं लिया जा सकता।

किन्नर समुदाय के लिए मातंगी क्यों महत्वपूर्ण हैं?

मातंगी सामाजिक रेखाओं के पार की देवी हैं। किन्नर समुदाय कला और आशीर्वाद की वाणी से जुड़ा है। इनकी कृपा सम्मान, स्वर और जीविका में सहारा बनती है।

वह स्वर जो द्वार खोलता है

संसार हथियार से नहीं, वाक्य से जीता जाता है। एक कठोर वाक्य घर तोड़ देता है। एक मधुर सत्य वाक्य घर जोड़ देता है। माँ मातंगी इसी नाजुक द्वार पर बैठी हैं। वे बुध को शब्द देती हैं। शुक्र को स्वर देती हैं। कलाकार को साहस देती हैं। किन्नर द्वार पर खड़े आशीर्वाद को गरिमा देती हैं। उच्छिष्ट चांडालिनी बनकर वे याद दिलाती हैं कि जिसे समाज फेंक दे वही कभी कभी सबसे पवित्र नाद बन जाता है।

जो साधक 40 दिन सत्य बोलने का व्रत लेकर ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं मातंग्यै नमः जपता है, उसके कंठ से धीरे धीरे कड़वाहट घटती है। सुनने वाला इसलिए रुकता है कि वचन में वजन और मिठास साथ चलते हैं। यही सम्मोहन है। यही 64 कलाओं का द्वार है। यही बुध शुक्र का वह योग है जो मंच पर भी टिकता है और पूजा घर में भी। मातंगी जब प्रसन्न होती हैं तब व्यक्ति प्रसिद्ध हो या न हो, उसकी वाणी अवश्य पूजी जाती है।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

पं. अमिताभ शर्मा (63)


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