नवग्रह स्तोत्र और महर्षि वेदव्यास की रचना

By पं. नरेंद्र शर्मा

नौ श्लोकों में छिपा ब्रह्मांडीय ऊर्जा और ग्रह शांति का रहस्य

नवग्रह स्तोत्र पाठ विधि और लाभ

नवग्रह स्तोत्र साधना विधि और दैनिक नियम

सनातन परंपरा में ब्रह्मांडीय ऊर्जा को अनुकूल बनाने के लिए महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित नवग्रह स्तोत्र एक अनुपम और सिद्ध स्तुति है। जब कोई जातक नियमित रूप से प्रातःकाल इन 9 श्लोकों का सस्वर पाठ करता है तब नौ ग्रहों के अधिष्ठाता देवताओं की कृपा से जीवन के समस्त विघ्न शांत होने लगते हैं।

ग्रह बीज स्वरूप और वर्ण संबंधित अधिष्ठाता देव निवारित होने वाले कष्ट और फल
सूर्य जपाकुसुम समान रक्त वर्ण भगवान शिव और अग्नि देव आत्मबल में वृद्धि और पिता का सुख
चंद्रमा शंख और हिम समान श्वेत वर्ण माँ पार्वती और जल तत्व मानसिक स्थिरता और तनाव से मुक्ति
मंगल विद्युत प्रभा समान रक्त वर्ण भगवान कार्तिकेय और पृथ्वी देवी पराक्रम वृद्धि और रक्त विकार शांति
बुध प्रियंगु कलिका समान हरित वर्ण भगवान विष्णु और नारायण तीव्र बुद्धि और व्यापारिक सफलता
गुरु सुवर्ण समान पीत वर्ण भगवान ब्रह्मा और इंद्र देव ज्ञान प्राप्ति और संतान सुख
शुक्र कुंद पुष्प समान उज्ज्वल श्वेत महर्षि भृगु और माँ लक्ष्मी दांपत्य सुख और भौतिक संपन्नता
शनि नील अंजन समान श्याम वर्ण यमराज और भगवान प्रजापति कर्म शुद्धि और अकाल मृत्यु भय नाश
राहु अर्धकाय और घोर तिमिर वर्ण काल और सर्प देवता भ्रम निवारण और आकस्मिक संकट नाश
केतु पलाश पुष्प समान धूम्र वर्ण भगवान चित्रगुप्त और ब्रह्मा मोक्ष मार्ग प्रशस्त और गूढ़ ज्ञान

व्यास रचित स्तोत्र का ब्रह्मांडीय आधार

महाभारत और 18 पुराणों के रचयिता महर्षि वेदव्यास ने संपूर्ण सौरमंडल के सूक्ष्म स्पंदनों को 9 छंदबद्ध श्लोकों में समाहित किया है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार जातक के जीवन की प्रत्येक घटना इन 9 खगोलीय पिंडों के चुंबकीय और आध्यात्मिक प्रभाव से संचालित होती है। जब जन्म कुंडली में क्रूर या पापी ग्रहों की दशा आती है तब जातक के कर्म चक्र में रुकावटें आने लगती हैं।

यह स्तोत्र केवल कुछ शब्दों का समूह नहीं है बल्कि यह एक ध्वन्यात्मक विज्ञान है। इसके प्रत्येक श्लोक में संबंधित ग्रह के रूप, रंग, वाहन और उनके दिव्य गुणों का ऐसा सूक्ष्म चित्रण किया गया है जो साधक की चेतना को सीधे ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ देता है। जब साधक इन श्लोकों का उच्चारण करता है तब उसकी वाणी से उत्पन्न ध्वनि तरंगें शरीर के सूक्ष्म ऊर्जा केंद्रों को शुद्ध करती हैं।

नवग्रह स्वरूप और उनके गूढ़ मंत्र रहस्य

महर्षि वेदव्यास ने प्रत्येक ग्रह की स्तुति में उनके विशिष्ट स्वरूप और वर्ण का जो वर्णन किया है वह ध्यान योग का सर्वोच्च स्तर है।

  • जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम् से प्रारंभ होने वाला प्रथम श्लोक सूर्य देव के तेजोमय स्वरूप को नमन करता है जो अज्ञान के अंधकार और समस्त पापों का नाश करते हैं
  • दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव सम्भवम् के माध्यम से चंद्र देव के अमृतमय और शांत स्वरूप का ध्यान किया जाता है जिससे मन के समस्त विकार शांत होते हैं
  • धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् मंगल देव के शौर्य और पृथ्वी पुत्र होने के गौरव को प्रकट कर शारीरिक शक्ति प्रदान करता है
  • प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् बुध देव के सौम्य और अतुलनीय रूप का स्मरण कराकर विवेक और वाणी को शुद्ध करता है
  • देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसन्निभम् देवगुरु बृहस्पति के सुवर्ण तेज का ध्यान कर साधक को बुद्धिमान और तीनों लोकों में पूज्य बनाता है
  • हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् दैत्यगुरु शुक्राचार्य के सर्वशास्त्र प्रवक्ता स्वरूप को नमन कर कला और ज्ञान का वरदान देता है
  • नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् शनि देव के धीमे और न्यायप्रिय स्वरूप का स्मरण कर व्यक्ति को संयम और धैर्य सिखाता है
  • अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम् राहु के पराक्रम और छाया स्वरूप को शांत कर जीवन से अनपेक्षित भय दूर करता है
  • पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह Goचरम् केतु देव के ध्वजाकार और मोक्षदायी स्वरूप का ध्यान कर सांसारिक बंधनों से मुक्ति का मार्ग दिखाता है

क्या नवग्रह स्तोत्र का पाठ संपूर्ण नवग्रह शांति के लिए पर्याप्त है

सामान्यतः जब किसी व्यक्ति की कुंडली में कोई एक ग्रह अशुभ फल देता है तब ज्योतिषी उस ग्रह विशेष के रत्न, दान अथवा अलग से 108 माला जप का सुझाव देते हैं। कई बार निर्धन या व्यस्त जातकों के लिए अलग अलग ग्रहों के महंगे अनुष्ठान करना संभव नहीं होता।

वेदव्यास जी द्वारा रचित इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एक साथ सभी नौ ग्रहों को संतुष्ट करता है। जब किसी एक ग्रह को शांत करने का प्रयास किया जाता है तो कभी कभी उससे संबंधित मित्र या शत्रु ग्रह असंतुलित हो जाते हैं। किंतु नवग्रह स्तोत्र के नित्य पाठ से संपूर्ण नवग्रह मंडल में एक अद्भुत सामंजस्य स्थापित हो जाता है। यह जातक के चारों ओर एक ऐसा सुरक्षा कवच बना देता है जिसे कोई भी नकारात्मक ग्रहीय दृष्टि भेद नहीं सकती।

नित्य पाठ की प्रामाणिक विधि और आचार नियम

इस दिव्य स्तोत्र की पूर्ण ऊर्जा प्राप्त करने के लिए कुछ सरल और शास्त्रीय नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक माना गया है।

  1. प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय के समय स्नानादि करके शुद्ध श्वेत या पीले वस्त्र धारण करें
  2. अपने पूजा घर में पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठें
  3. एक तांबे के पात्र में शुद्ध जल, लाल चंदन और लाल पुष्प डालकर भगवान सूर्य को अर्घ्य दें
  4. शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और भगवान गणेश का स्मरण करने के पश्चात स्तोत्र का पाठ आरंभ करें
  5. प्रत्येक श्लोक का उच्चारण स्पष्ट और शांत चित्त से करें ताकि उसकी ध्वनि तरंगे आपके आभामंडल में गूंज सकें
  6. पाठ के उपरांत हाथ जोड़कर नवग्रह देवताओं से अपने जाने अनजाने हुए पापों की क्षमा याचना करें

यदि किसी जातक पर विशेष रूप से साढ़ेसाती, ढैया अथवा कालसर्प जैसी कठिन दशाएं चल रही हों तो वह प्रतिदिन 3 या 11 बार इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है।

चेतना का उत्थान और ग्रहीय कृपा का अमृत

ग्रह वास्तव में मनुष्य के संचित कर्मों के केवल संदेशवाहक हैं। वे न तो किसी के शत्रु हैं और न ही मित्र। जब साधक महर्षि वेदव्यास की इस अमूल्य वाणी का आश्रय लेता है तब उसके भीतर का अहंकार, क्रोध और अज्ञान गलने लगता है। नवग्रह स्तोत्र का नित्य पाठ मनुष्य की अंतःचेतना को जागृत करता है और उसे सांसारिक बाधाओं से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक शांति और भौतिक वैभव दोनों प्रदान करता है।

FAQ

नवग्रह स्तोत्र का पाठ किस समय करना सबसे अधिक फलदायी होता है? नवग्रह स्तोत्र का पाठ प्रातःकाल सूर्योदय के समय पूर्व दिशा की ओर मुख करके करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि उस समय ब्रह्मांडीय ऊर्जा अत्यंत सात्विक होती है।

क्या महिलाएं भी नवग्रह स्तोत्र का नित्य पाठ कर सकती हैं? हाँ नवग्रह स्तोत्र एक स्तुति है और कोई भी शुद्ध मन और श्रद्धा के साथ इसका पाठ कर सकता है। इसमें किसी प्रकार का कोई शास्त्रीय निषेध नहीं है।

यदि संस्कृत उच्चारण में कठिनाई हो तो क्या इसका पाठ किया जा सकता है? प्रारंभ में धीरे धीरे शुद्ध उच्चारण का अभ्यास करना चाहिए। यदि संस्कृत क्लिष्ट लगे तो शांत मन से इसके अर्थ को समझकर ध्यान पूर्वक सुनना भी उतना ही कल्याणकारी होता है।

क्या इस स्तोत्र के पाठ से शनि और राहु के गंभीर दोष भी शांत होते हैं? हाँ इस स्तोत्र में शनि, राहु और केतु की विशेष स्तुति की गई है जो उनके उग्र स्वभाव को शांत कर जातक को सुरक्षा और मानसिक धैर्य प्रदान करती है।

नवग्रह स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए? दैनिक जीवन में 1 बार पाठ करना अत्यंत शुभ है किंतु विशेष ग्रह बाधा निवारण के लिए 3 बार, 7 बार अथवा 11 बार पाठ करने का विधान बताया गया है।

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पं. नरेंद्र शर्मा

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