By पं. अभिषेक शर्मा
पंचतत्व शुद्धि और अधिष्ठाता देवताओं का वैदिक ज्ञान

सनातन परंपरा में समय को केवल एक भौतिक गणना नहीं बल्कि साक्षात काल पुरुष का स्वरूप माना गया है। पंचांग शब्द का निर्माण पंच और अंग से मिलकर हुआ है जिसका अर्थ काल पुरुष के पांच पवित्र अंग होता है। सृष्टि का संपूर्ण विस्तार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पांच महाभूतों से निर्मित है। मानव शरीर और चेतना भी इन्हीं पंचतत्वों की परस्पर क्रिया पर आधारित है। पंचांग के पांच अंग सीधे तौर पर ब्रह्मांडीय चेतना और मनुष्य के आंतरिक तत्वों के बीच एक सेतु की तरह कार्य करते हैं।
| पंचांग अंग | संबंधित तत्व | अधिष्ठाता देव | आध्यात्मिक और भौतिक प्रभाव |
|---|---|---|---|
| तिथि | जल तत्व | माँ पार्वती और महालक्ष्मी | मानसिक शांति और धन समृद्धि |
| वार | अग्नि तत्व | सूर्य देव और नवग्रह | ओज तेज और दीर्घायु की प्राप्ति |
| नक्षत्र | वायु तत्व | विशिष्ट वैदिक देवता | प्रारब्ध शुद्धि और पापों का नाश |
| योग | आकाश तत्व | भगवान शिव और भगवान विष्णु | दैहिक आरोग्यता और आत्मिक संतुलन |
| करण | पृथ्वी तत्व | भगवान श्री गणेश और ब्रह्मा | कार्य सिद्धि और व्यावहारिक स्थिरता |
चंद्रमा और सूर्य के बीच की कोणीय दूरी जब 12 अंश बढ़ती है तब एक तिथि का निर्माण होता है। ज्योतिष शास्त्र में तिथि का स्वामी जल तत्व माना गया है। जल का संबंध मानव शरीर के रक्त, रस, भावनाओं और मन की गहराइयों से होता है। इसी कारण तिथि की अधिष्ठात्री देवी माँ पार्वती और धन धान्य की देवी महालक्ष्मी हैं।
जब कोई व्यक्ति प्रतिदिन प्रातःकाल की तिथि का श्रद्धापूर्वक स्मरण करता है तब उसका चित्त शांत होता है। जीवन में धन के आगमन के मार्ग खुलते हैं और मन के चंचल विचारों पर स्वाभाविक नियंत्रण स्थापित होने लगता है।
सूर्य के एक उदय से दूसरे उदय तक के काल को वार अथवा सौर दिवस कहा जाता है। सप्ताह के 7 वारों का आधिपत्य प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से नवग्रहों के पास है। वार का संबंध अग्नि तत्व से है जो पाचन शक्ति, जीवन ऊर्जा, संकल्प और पराक्रम का केंद्र है।
अग्नि तत्व शुद्ध होने से शरीर में आलस्य और जड़ता का नाश होता है। प्रतिदिन प्रातः जिस वार का उदय होता है उसके स्वामी ग्रह और सूर्य देव का ध्यान करने से व्यक्ति को दीर्घायु प्राप्त होती है। प्राचीन ऋषियों का कथन है कि वार का स्मरण करने से जीवनी शक्ति इतनी सुदृढ़ हो जाती है कि अकाल मृत्यु और असाध्य रोगों का भय समाप्त होने लगता है। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और साधक को तेजस्वी बनाता है।
आकाश मंडल में 360 अंश के वृत्त को 27 समान भागों में विभाजित किया गया है जिन्हें नक्षत्र कहते हैं। प्रत्येक नक्षत्र वायु तत्व की ऊर्जा का संवाहक है। वायु तत्व का मूल स्वभाव गतिशीलता और प्राण शक्ति का प्रवाह है। 27 नक्षत्रों के अपने अपने विशिष्ट अधिष्ठाता देवता हैं जैसे अश्विनी नक्षत्र के अश्विनी कुमार और कृतिका के अग्नि देव।
जब साधक नित्य नक्षत्र के देवता को प्रणाम करता है तब उसके विचार पवित्र होते हैं। नकारात्मक कर्मों का भार हल्का होता है और चेतना में नई स्फूर्ति का संचार होने लगता है।
सूर्य और चंद्रमा के भोगांशों का कुल योग जब 13 अंश 20 कला होता है तब एक योग बनता है। कुल 27 योग बताए गए हैं जिनमें से कुछ अत्यंत शुभ और कुछ सतर्कता बरतने योग्य होते हैं। योग का तत्व आकाश है और इसके अधिष्ठाता देव देवाधिदेव भगवान शिव तथा पालनहार भगवान विष्णु हैं।
आकाश तत्व समस्त तत्वों को अपने भीतर स्थान देता है और इसका गुण शब्द तथा चेतना का विस्तार है। जब योग का ध्यान किया जाता है तब शरीर की नाड़ियों और ब्रह्मांडीय ऊर्जा में सामंजस्य स्थापित होता है। इससे शारीरिक और मानसिक रोगों का शमन होता है। आकाश तत्व की शुद्धि से व्यक्ति के हृदय में करुणा, विवेक और आध्यात्मिक शांति का उदय होता है।
एक तिथि के आधे भाग को करण कहा जाता है। इस प्रकार 30 तिथियों में कुल 60 करण होते हैं जिन्हें 11 मुख्य भागों में बांटा गया है। करण का संबंध पृथ्वी तत्व से है। पृथ्वी तत्व भौतिक स्वरूप, स्थिरता, धैर्य और ठोस परिणामों का प्रतीक है।
करण के अधिष्ठाता देवता प्रथम पूज्य भगवान गणेश और सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा हैं। जब तक पृथ्वी तत्व संतुलित नहीं होगा तब तक किसी भी विचार या योजना को भौतिक धरातल पर साकार नहीं किया जा सकता। करण के देवता का स्मरण करने से व्यवसाय, आजीविका और पारिवारिक जीवन में स्थिरता आती है। यह व्यक्ति के मार्ग में आने वाले अप्रत्याशित विघ्नों को दूर कर पुरुषार्थ को सफलता में रूपांतरित करता है।
ऋषियों ने गृहस्थ और साधक दोनों के लिए पंचांग के पांचों अंगों के दैनिक पाठ का विशेष नियम बताया है। इस नियम का पालन करने के लिए बहुत जटिल कर्मकांड की आवश्यकता नहीं होती।
यह संक्षिप्त अभ्यास 2 मिनट से भी कम समय में पूर्ण हो जाता है लेकिन इसका प्रभाव दिन भर साधक के आभामंडल को सुरक्षित रखता है।
पंचांग केवल पन्नों पर छपा हुआ कोई सामान्य कैलेंडर नहीं है बल्कि यह काल के प्रवाह में बहती दिव्य शक्तियों का मानचित्र है। जब कोई व्यक्ति प्रतिदिन तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण के अधिष्ठाता देवों को अपनी चेतना में स्थान देता है तब उसके स्थूल और सूक्ष्म शरीर के पांचों तत्व स्वतः शुद्ध होने लगते हैं। जल से भावनाएं, अग्नि से ओज, वायु से प्राण, आकाश से विवेक और पृथ्वी से कर्म फल सिद्ध होते हैं। यही कारण है कि पंचांग का नित्य श्रवण और स्मरण मनुष्य को संपूर्ण आध्यात्मिक आरोग्यता और भौतिक आनंद की ओर ले जाता है।
प्रतिदिन पंचांग का स्मरण करने से कौन से मुख्य लाभ प्राप्त होते हैं? प्रतिदिन पंचांग के पांच अंगों का स्मरण करने से शरीर और आत्मा के पांचों तत्व शुद्ध होते हैं जिससे धन, दीर्घायु, पाप मुक्ति, शारीरिक आरोग्यता और कार्यों में निश्चित सफलता प्राप्त होती है।
पंचांग के पांच अंग किन पांच महाभूतों से जुड़े हैं? पंचांग में तिथि जल तत्व से, वार अग्नि तत्व से, नक्षत्र वायु तत्व से, योग आकाश तत्व से और करण पृथ्वी तत्व से सीधे तौर पर संबंधित हैं।
तिथि की अधिष्ठात्री देवी कौन हैं और उनकी कृपा से क्या मिलता है? तिथि की अधिष्ठात्री देवियां माँ पार्वती और महालक्ष्मी हैं जिनकी कृपा से मनुष्य को मानसिक शांति, भावनात्मक संतुलन और अखंड लक्ष्मी का वरदान मिलता है।
योग के अधिष्ठाता देव कौन हैं और वे किस तत्व को नियंत्रित करते हैं? योग के अधिष्ठाता देव भगवान शिव और भगवान विष्णु हैं जो आकाश तत्व को नियंत्रित करते हैं और व्यक्ति को समस्त शारीरिक तथा मानसिक रोगों से मुक्त करते हैं।
करण का नित्य ध्यान करना व्यापार और कर्म क्षेत्र में क्यों आवश्यक है? करण पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है और इसके देवता भगवान गणेश हैं इसलिए इसका ध्यान करने से कार्यों के समस्त विघ्न दूर होते हैं और व्यापार में स्थिरता आती है।
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