By पं. नीलेश शर्मा
जन्म के समय ग्रहों की स्थिति और प्रत्येक घंटे का महत्व

जन्म के क्षण में केवल राशि और लग्न ही नहीं बनते, उस समय की हर घड़ी अपने भीतर अलग प्रकार की ऊर्जा लिए होती है। वैदिक ज्योतिष में इसी सूक्ष्म ऊर्जा को समझने के लिए जिस वर्ग कुंडली का प्रयोग किया जाता है, उसे होरा कुंडली या द्वितीय विभाजन कुंडली कहा जाता है।
होरा शब्द स्वयं घंटे के अर्थ से जुड़ा है। जैसे दिन के भीतर हर घड़ी का स्वभाव अलग होता है, वैसे ही होरा कुंडली यह दिखाती है कि जन्म के समय ग्रह किस प्रकार की घड़ी में स्थित थे और वह घड़ी धन, संसाधन और भौतिक सुरक्षा को कितना समर्थन दे रही थी।
वैदिक ज्योतिष में कुल सोलह प्रमुख वर्ग कुंडलियों को षोडशवर्ग कहा जाता है। कुछ विद्वान इन्हीं में से छह को चुनकर षड्वर्ग के रूप में भी प्रयोग करते हैं। इन वर्ग कुंडलियों की सूची इस प्रकार है।
| क्रम | वर्ग कुंडली का नाम |
|---|---|
| 1 | जन्म लग्न या क्षेत्र |
| 2 | होरा |
| 3 | दृष्टकाण |
| 4 | सप्तमांश |
| 5 | नवांश |
| 6 | द्वादशांश |
| 7 | त्रिंशांश |
| 8 | चतुर्थांश |
| 9 | दशांश |
| 10 | षोडशांश |
| 11 | विंशांश |
| 12 | चतुर्विंशांश |
| 13 | भांश |
| 14 | खवेदांश |
| 15 | अक्षवेदांश |
| 16 | षष्ट्यांश |
अधिकतर लोग केवल जन्म लग्न और नवांश से परिचित होते हैं, लेकिन किसी भी गंभीर फलित से पहले अनुभवी ज्योतिषी इन वर्ग कुंडलियों को भी अवश्य देखते हैं। होरा कुंडली इनमें एक मूलभूत चार्ट की तरह है, जो विशेष रूप से धन की स्थिति और आर्थिक प्रवाह को समझने के लिए उपयोग की जाती है।
होरा कुंडली द्वितीय विभाजन कुंडली है, अर्थात यह प्रत्येक राशि को दो भागों में बाँटकर बनाई जाती है।
होरा चार्ट की एक विशेषता यह है कि इसमें केवल दो राशियाँ या दो लग्न माने जाते हैं।
अर्थात द्वितीय विभाजन कुंडली में ग्रहों की स्थिति अंततः कर्क या सिंह के होरा भाग में ही आकर स्थित होती है। ये दोनों होरा भाग क्रमशः चंद्र और सूर्य की ऊर्जा को दर्शाते हैं।
होरा कुंडली में ग्रह किस होरा में जाएगा, यह राशि के लिंग स्वभाव पर आधारित नियम से तय होता है। राशियों को यहाँ पुरुष और स्त्री राशियों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
पुरुष राशियाँ हैं
स्त्री राशियाँ हैं
अब होरा विभाजन के नियम को सरल रूप में देखें।
अर्थात यदि कोई ग्रह मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु या कुंभ में शून्य से पंद्रह अंश के भीतर हो, तो वह द्वितीय विभाजन कुंडली में सिंह होरा में जाएगा। यदि वही ग्रह पंद्रह से तीस अंश के बीच हो, तो वह कर्क होरा में स्थित माना जाएगा।
इसलिए यदि कोई ग्रह वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर या मीन में शून्य से पंद्रह अंश के बीच हो, तो वह कर्क होरा में और पंद्रह से तीस अंश के बीच हो तो सिंह होरा में चला जाएगा।
इसी नियम के आधार पर जन्म लग्न और सभी ग्रहों की डिग्री को द्वितीय विभाजन कुंडली में पुनः स्थापित किया जाता है और वहाँ से होरा कुंडली का विश्लेषण शुरू होता है।
होरा कुंडली का मुख्य उद्देश्य धन, संसाधन और आर्थिक स्थिरता के सूक्ष्म आकलन से जुड़ा है।
सामान्य जन्म कुंडली में
सूचक माने जाते हैं। लेकिन होरा कुंडली यह दिखाती है कि
सूर्य की होरा में बैठा सशक्त ग्रह आत्मबल, प्रतिष्ठा और बाहरी अधिकार से जुड़े धन को दिखा सकता है, जबकि चंद्र की होरा संवेदनशील, परिवार केंद्रित, पोषण और संरक्षण से जुड़े संसाधनों की ओर संकेत कर सकती है।
होरा कुंडली दो मूल देव शक्तियों के सिद्धांत पर चलती है।
जन्म के समय सभी लोग या तो सूर्य होरा या चंद्र होरा की अवधि में जन्म लेते हैं। सामान्य परंपरा में
कुछ ग्रह विशेष रूप से इन दो होरा में बलवान माने जाते हैं।
इससे यह समझा जा सकता है कि धन योग केवल राशि और भाव से नहीं बल्कि ग्रह जिस होरा में बैठे हैं, उस ऊर्जा से भी प्रभावित होते हैं।
धन की सूक्ष्म स्थिति का आकलन करने के लिए होरा कुंडली में ग्रहों को अंक देकर भी देखा जाता है। यह एक व्यावहारिक पद्धति है, जिससे यह समझा जा सकता है कि
सामान्य रूप से ग्रहों को निम्न प्रकार अंक दिए जाते हैं।
| ग्रह की स्थिति | प्राप्त अंक |
|---|---|
| उच्च स्थिति वाला ग्रह | 5 |
| होरा स्वामी ग्रह | 4 |
| मित्र की होरा या मित्र राशि में स्थित ग्रह | 3 |
| तटस्थ होरा में ग्रह | 2 |
| शत्रु होरा में ग्रह | 1 |
| नीच स्थिति में ग्रह | 0 |
कुछ विशेष स्थितियाँ भी ध्यान देने योग्य होती हैं।
इस प्रकार हर ग्रह के लिए अलग अलग अंक जोड़कर यह समझा जाता है कि जन्म कुंडली के भीतर धन और संसाधन के संदर्भ में ग्रह कितने समर्थ हैं।
ग्रहों को अंक देते समय केवल उच्च और नीच ही नहीं बल्कि
भी देखी जाती है। ग्रह यदि
दिए जाते हैं।
एक और महत्वपूर्ण नियम यह है कि
इससे यह स्पष्ट होता है कि होरा विश्लेषण केवल दो राशियों तक सीमित नहीं बल्कि पूरे ग्रह संबंधों और लिंग स्वभाव के संतुलन को भी ध्यान में रखता है।
धन और व्यय के संतुलन को समझने के लिए होरा कुंडली में विशेष रूप से
पर ध्यान दिया जाता है।
यदि
तो यह संकेत देता है कि जातक को जीवन में धन अर्जन और संचय की अच्छी क्षमता मिलेगी।
दूसरी ओर
तो आर्थिक जीवन में खर्च, दान, व्यय और कभी कभी बाध्यात्मक हानि की मात्रा बढ़ सकती है।
कभी ऐसा भी हो सकता है कि
अंकों में लगभग समान हों। ऐसी स्थिति में व्यक्ति बहुत अधिक धन संचय न कर पाए, लेकिन अपने हिस्से की विरासत या उपलब्ध धन को संभालकर चलने में सफल रह सकता है।
अंक पद्धति और भाव विश्लेषण के बाद यह देखा जाता है कि
यदि
तो जीवन में संचय, स्थिरता और पोषणकारी धन योग अधिक प्रबल हो सकते हैं।
यदि
तो व्यक्ति बहुत कमाता तो है, लेकिन खर्च, दान, प्रतिष्ठा या जिम्मेदारियों के कारण धन रुका हुआ कम दिखाई देता है।
इस प्रकार होरा कुंडली यह स्पष्ट कर देती है कि जन्म के समय किस ऊर्जा की घड़ी सक्रिय थी और वही घड़ी जीवन भर धन के प्रवाह, संचय और व्यय की शैली पर गहरा प्रभाव डालती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
होरा कुंडली का मुख्य उपयोग क्या है
होरा कुंडली का मुख्य उपयोग जन्म कुंडली में धन, संचय, आय और व्यय की सूक्ष्म स्थिति को समझने में होता है। यह बताती है कि कौन से ग्रह धन के पक्ष में सहयोग कर रहे हैं और कहाँ से खर्च या हानि की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
क्या केवल होरा देखकर धन का स्तर तय किया जा सकता है
केवल होरा से अंतिम निर्णय निकालना उचित नहीं है। जन्म कुंडली, द्वितीय और एकादश भाव, दशा और गोचर के साथ होरा कुंडली को जोड़कर देखा जाए तो धन योग का वास्तविक स्वरूप स्पष्ट होता है।
कर्क और सिंह होरा में मूल अंतर क्या माना जाता है
कर्क होरा सामान्यतः चंद्र के स्वभाव के अनुसार पोषण, सुरक्षा, परिवार और भावनात्मक आश्रय से जुड़े धन को दिखाती है। सिंह होरा सूर्य के रूप में आत्मबल, नेतृत्व, प्रतिष्ठा और राजसिक खर्च व वैभव से जुड़े संसाधनों का संकेत देती है।
कौन से ग्रह होरा कुंडली में विशेष ध्यान देने योग्य होते हैं
द्वितीय और एकादश भाव के स्वामी, लग्नेश, सूर्य, चंद्र और शुभ ग्रह गुरु, शुक्र और बुध की होरा स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। ये ग्रह धन संचय, आय, निवेश और व्यय की शैली को काफी प्रभावित करते हैं।
होरा के अंक दोगुना या आधा कब माने जाते हैं
जब ग्रह या लग्न अपने समान लिंग वाली राशि में हों, तो होरा में प्राप्त अंकों का प्रभाव अधिक माना जाता है। विपरीत लिंग वाली राशि में होने पर अनेक परंपराओं में उन अंकों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम आँका जाता है, ताकि व्याख्या अधिक सूक्ष्म रह सके।
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