By अपर्णा पाटनी
श्रीयंत्र स्थापना विधि लाभ और सावधानियों की सम्पूर्ण समझ

कई घरों में देखा जाता है कि मेहनत भरपूर होती है पर घर के हालात फिर भी तंग बने रहते हैं। कभी अचानक खर्च बढ़ जाते हैं तो कभी धन टिकता ही नहीं। ऐसे समय में मन स्वाभाविक रूप से किसी ऐसे उपाय की खोज करता है जो केवल दिखावा न हो बल्कि घर के वातावरण और भाग्य दोनों को धीरे धीरे बदल सके। श्रीयंत्र को वैदिक परंपरा में ऐसा ही प्रभावी साधन माना गया है जो सही विधि से स्थापित हो तो घर की ऊर्जा और समृद्धि दोनों का स्वर बदल सकता है।
श्रीयंत्र को लक्ष्मी का आधार स्थान कहा गया है। यह केवल एक धातु की पट्टी या मूरत जैसा वस्तु नहीं है बल्कि एक सूक्ष्म ज्यामितीय संरचना है जो धन समृद्धि और सौभाग्य की ऊर्जा को आकर्षित करने का माध्यम मानी गई है। जिस स्थान पर पूरे नियम से श्रीयंत्र की स्थापना और पूजा होती है वहां सुख संपत्ति और मानसिक शांति का वातावरण बन सकता है बशर्ते साधक नियम और शुद्धता का ध्यान रखे।
श्रीयंत्र नौ त्रिकोणों से बना एक अत्यंत सूक्ष्म यंत्र है जिसमें ऊपर की ओर देख रहे त्रिकोण शिव तत्व और नीचे की ओर सूक्ष्म देवी तत्व का संकेत माने जाते हैं। इनका संतुलित मेल ही समृद्धि और स्थिरता का आधार बनता है। इस यंत्र के मध्य बिंदु में bindu रहता है जिसे महात्रिपुरसुंदरी का आसन माना जाता है और यहीं से लक्ष्मी कृपा की तरंगें फैलती हैं।
धन की देवी माँ लक्ष्मी के आह्वान के लिए श्रीयंत्र की पूजा को अत्यंत शुभ माना गया है। परंपरा है कि जहाँ श्रीयंत्र का निवास होता है वहाँ लक्ष्मी स्वयं जाकर निवास करती हैं। इसी कारण अनेक लोग अपने घर दुकान या कार्यालय में श्रीयंत्र स्थापित करके प्रतिदिन उसकी पूजा आराधना करते हैं। श्रीयंत्र का प्रभाव केवल धन तक सीमित नहीं रहता बल्कि मन के भय और अभाव भावना को भी धीरे धीरे बदलने का काम करता है।
इसीलिए श्रीयंत्र को केवल सजावट की वस्तु न मानकर जीवंत ऊर्जा केंद्र की तरह देखना आवश्यक है।
एक प्राचीन कथा में बताया गया है कि एक समय पृथ्वी पर दरिद्रता इतनी बढ़ गई कि माँ लक्ष्मी पृथ्वी से अप्रसन्न होकर वैकुंठ चली गईं। उनके जाने से धरती पर दुःख और अभाव का बादल छा गया। तब वशिष्ठ मुनि ने निश्चय किया कि किसी प्रकार माता को प्रसन्न करके पृथ्वी पर वापस लाना होगा।
वशिष्ठ मुनि ने भगवान नारायण की तपस्या की। जब नारायण प्रसन्न हुए तो उनसे प्रार्थना की गई कि बिना लक्ष्मी के धरती पर अंधकार छा रहा है। सभी देव और मनुष्य दुखी हैं। नारायण वशिष्ठ मुनि को साथ लेकर माँ लक्ष्मी के पास गये पर माता ने वापस आने से इनकार कर दिया।
माँ लक्ष्मी ने कहा कि पृथ्वी पर पवित्रता की कमी है। मन और घर दोनों अशुद्ध हैं और ऐसे स्थान पर मेरा वास संभव नहीं है। यह सुनकर देवता और मनुष्य सब देवगुरु बृहस्पति के पास मार्गदर्शन के लिए गए।
देवगुरु बृहस्पति ने तब श्रीयंत्र का निर्माण किया। संपूर्ण विधि विधान के साथ श्रीयंत्र की साधना और शुभ लाभ की पूजा आरंभ हुई। पूजा पूर्ण होने पर माँ लक्ष्मी स्वयं वापस पृथ्वी पर अवतरित हुईं और घोषणा की कि जहाँ जहाँ श्रीयंत्र की विधिपूर्वक पूजा होती है वहाँ मैं स्वयं निवास करती हूँ।
तभी से यह मान्यता प्रचलित है कि यदि किसी साधना से लक्ष्मी प्रसन्न हों या न हों परंतु श्रीयंत्र की स्थापना और पूजा से लक्ष्मी के आगमन की संभावना बहुत प्रबल हो जाती है।
सामान्य रूप से श्रीयंत्र दो रूपों में अधिक चर्चा में रहता है।
उर्ध्वमुखी श्रीयंत्र
यह श्रीयंत्र ऊपर की दिशा में उन्नत रूप में माना जाता है। इसके त्रिकोणों की संरचना ऐसी होती है कि ऊर्जा ऊपर की ओर उठती हुई प्रतीत होती है। इसी कारण इसे अधिक प्रभावी और श्रेष्ठ माना जाता है। घर या कार्यालय में स्थायी स्थापना के लिए प्रायः इसी प्रकार को प्राथमिकता दी जाती है।
अधोमुखी श्रीयंत्र
इसमें संरचना नीचे की ओर झुकी हुई मानी जाती है। इसका लाभ भी होता है पर उर्ध्वमुखी की तुलना में इसकी प्रभाव क्षमता कम मानी जाती है। यदि किसी कारण से अधोमुखी श्रीयंत्र ही उपलब्ध हो तो भी उचित मंत्र और विधि से इसकी पूजा की जा सकती है पर समृद्धि साधना के लिए अधिकांश विद्वान उर्ध्वमुखी श्रीयंत्र को प्राथमिकता देते हैं।
इसके अतिरिक्त धातु और क्रिस्टल के आधार पर भी कई प्रकार मिलते हैं जैसे
नीचे सारणी में प्रकार और उपयोग का सरल अंतर रखा जा सकता है।
| श्रीयंत्र का प्रकार | मुख्य उपयोग | विशेषता |
|---|---|---|
| तांबे का श्रीयंत्र | व्यक्तिगत साधना और साथ रखने के लिए | इच्छा पूर्ण और आत्मविश्वास से जुड़ा |
| चाँदी का श्रीयंत्र | उपहार और गृहस्थ जीवन के लिए | सौम्य समृद्धि और शांति |
| स्फटिक पिरामिड श्रीयंत्र | आर्थिक समस्या और व्यापार वृद्धि के लिए | धन आकर्षण और स्पष्टता |
श्रीयंत्र को अत्यंत पवित्र माना जाता है इसलिए स्थापना से पहले मन और स्थान दोनों की शुद्धि पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। जल्दबाजी या लापरवाही से किया गया प्रयोग फ़ल को कम कर सकता है।
इन चरणों में जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए। जितना शांत भाव से स्थापना होगी उतनी ही गहराई से श्रीयंत्र घर की ऊर्जा से जुड़ सकेगा।
जब श्रीयंत्र सही विधि से स्थापित होकर नियमित पूजा में आ जाता है तो धीरे धीरे जीवन के कई क्षेत्र सकारात्मक संकेत देने लगते हैं।
इन लाभों को चमत्कार की तरह नहीं बल्कि धीरे धीरे बदलती ऊर्जा के परिणाम के रूप में समझना बेहतर है।
श्रीयंत्र के साथ सबसे महत्वपूर्ण शब्द है शुद्धता। माँ लक्ष्मी को स्वच्छता अत्यंत प्रिय मानी जाती हैं और चूंकि यह यंत्र लक्ष्मी का निवास स्थान माना गया है इसलिए इसके आस पास की सफाई बहुत जरूरी है।
इन बातों का ध्यान रखकर श्रीयंत्र को केवल वस्तु नहीं बल्कि घर के सबसे पवित्र केंद्र के रूप में मानना चाहिए।
| कार्य | मुख्य बिंदु |
|---|---|
| तैयारी | स्नान, स्वच्छ वस्त्र, स्थान की सफाई |
| शुद्धि | गंगाजल और पंचामृत से स्नान |
| स्थापना स्थान | ईशान कोण, लाल या गुलाबी कपड़ा |
| दिशा | साधक का मुख पूर्व या उत्तर |
| मंत्र | Om Shreem Hreem Shreem Namah |
| नियमितता | प्रतिदिन दीपक और संक्षिप्त जप |
श्रीयंत्र की पूजा के साथ एक subtle परिवर्तन यह भी देखा जाता है कि व्यक्ति के भीतर अभाव की मानसिकता थोड़ा थोड़ा घुलने लगती है। पहले जो व्यक्ति हर समय कमी पर ध्यान देता था वही धीरे धीरे अवसर और संभावना को देखने लगता है। यह परिवर्तन केवल बाहरी धन से नहीं बल्कि भीतर की सोच से आता है।
लक्ष्मी का संबंध केवल नोट और आभूषण से नहीं बल्कि संतोष और कृतज्ञता से भी है। श्रीयंत्र के सामने बैठकर यदि प्रतिदिन कुछ क्षण यह स्मरण किया जाए कि जीवन में पहले से क्या क्या उपलब्ध है तो भीतर की असंतुष्टि नरम हो सकती है। यही संतुलित दृष्टि आगे चलकर सही निर्णय और सही निवेश की ओर ले जाती है।
क्या हर व्यक्ति अपने घर में श्रीयंत्र स्थापित कर सकता है
हाँ कर सकता है पर स्थापना से पहले थोड़ा समय निकालकर विधि को समझना और स्थान की शुद्धता पर ध्यान देना आवश्यक है। बहुत तंग या गंदे स्थान पर श्रीयंत्र स्थापित करना उचित नहीं माना जाता।
श्रीयंत्र को कितनी बार गंगाजल या पंचामृत से शुद्ध करना चाहिए
स्थापना के समय शुद्धि अवश्य करें। बाद में समय समय पर विशेष रूप से दीपावली या महत्वपूर्ण पर्व पर हल्की शुद्धि की जा सकती है। रोज स्नान आवश्यक नहीं पर सफाई और जप की निरंतरता जरूरी है।
क्या केवल श्रीयंत्र स्थापित कर देने से ही धन आ जाता है
श्रीयंत्र अवसर और ऊर्जा को सहायक बनाता है पर कर्म का स्थान अलग है। मेहनत ईमानदारी और समझदार निर्णय आवश्यक हैं। यंत्र उनका फल बढ़ाने का माध्यम बन सकता है।
क्या श्रीयंत्र को बेडरूम में रख सकते हैं
आदर्श रूप से श्रीयंत्र पूजा स्थान या ऐसा कोना जहाँ स्वच्छता और शांत वातावरण हो वहाँ रखना बेहतर है। बेडरूम में यदि टीवी या अव्यवस्था अधिक हो तो वहाँ स्थापना उचित नहीं मानी जाती।
यदि श्रीयंत्र टूट जाए या खराब हो जाए तो क्या करना चाहिए
ऐसी स्थिति में उसे सम्मान के साथ किसी नदी जल में प्रवाहित किया जा सकता है या मिट्टी में सुरक्षित दबाया जा सकता है। उसके बाद नई ऊर्जा के साथ दूसरा श्रीयंत्र विधिपूर्वक स्थापित करना चाहिए।
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