By पं. सुव्रत शर्मा
यंत्र रुद्राक्ष रत्न यज्ञ और जप की गहराई

कई लोग कुंडली देखते हैं तो सबसे पहले यही प्रश्न करते हैं कि ग्रह कब अच्छे फल देंगे और वर्तमान कठिनाइयों से छुटकारा कैसे मिलेगा। जन्म के समय ग्रहों की स्थिति हमारी जन्म कुंडली में दर्ज हो जाती है और वही आगे चलकर स्वभाव घटनाओं और अवसरों के रूप में सामने आती है। फिर भी वैदिक ज्योतिष केवल भविष्य बताने तक सीमित नहीं है। यह समस्याओं से निकलने के लिए ठोस उपचारात्मक उपाय भी प्रदान करता है जिनके माध्यम से पिछली गलतियों के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
वैदिक परंपरा के अनुसार वर्तमान जन्म केवल संयोग नहीं माना जाता। पिछले जन्म के कर्मों का सूक्ष्म लेखा जोखा वर्तमान जन्म कुंडली में शुभ या अशुभ ग्रहों के रूप में दिखाई देता है। जब किसी ग्रह की स्थिति कमजोर या पीड़ित होती है तो वह जीवन के किसी क्षेत्र में रुकावट तनाव या हानि के रूप में प्रकट हो सकता है। ऐसे समय में यंत्र रुद्राक्ष रत्न यज्ञ और जप जैसे उपाय केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि कर्म शोधन के शक्तिशाली माध्यम माने जाते हैं।
प्राकृतिक नियम के अनुसार कोई भी अनुभव बिना कारण नहीं आता। हमारे पिछले जन्म के कर्मों के कारण ही इस जन्म में परिवार वातावरण और परिस्थितियां तय होती हैं। जन्म तिथि जन्म समय और जन्म स्थान भी उसी कर्मफल की कड़ी माने जाते हैं। इसलिए जब कुंडली में किसी ग्रह की पीड़ा दिखाई देती है तो उसे केवल दंड के रूप में नहीं देखा जाता बल्कि यह समझा जाता है कि आत्मा को उस क्षेत्र में सीख पूरी करनी है।
पिछले जन्मों के कुछ गलत कर्म वर्तमान जीवन में पाप या अशुभ ग्रहों के योग के रूप में सामने आते हैं। यह योग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं आर्थिक संघर्ष संबंधों में तनाव या मानसिक अशांति के रूप में जीवन को प्रभावित कर सकते हैं। इन प्रभावों को पूरी तरह मिटाया नहीं जा सकता परंतु सही उपायों से उनकी तीव्रता को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यही कारण है कि वैदिक ज्योतिष में उपचारात्मक उपाय एक अत्यंत महत्वपूर्ण शाखा मानी जाती है।
वैदिक परंपरा में पांच उपाय विशेष रूप से प्रभावी माने जाते हैं।
ये पांचों उपाय अलग अलग स्तरों पर काम करते हैं। कोई उपाय मन पर कार्य करता है कोई शरीर पर कोई ऊर्जा पर और कोई प्रत्यक्ष कर्म पर। जब किसी व्यक्ति की कुंडली को ध्यान से समझ कर इन उपायों का चयन किया जाता है तो धीरे धीरे जीवन की दिशा में हल्का सा मोड़ आने लगता है जो आगे चलकर बड़ा परिवर्तन भी बन सकता है।
संस्कृत में यंत्र शब्द का अर्थ साधन या उपकरण माना गया है। पर यह सामान्य उपकरण नहीं होता बल्कि एक विशेष ज्यामितीय संरचना होती है जो सूक्ष्म ऊर्जा को आकर्षित और केंद्रित करने के लिए बनाई जाती है। त्रिकोण वृत्त बिंदु और रेखाओं से मिलकर बने ये यंत्र उस देवता या ग्रह की शक्ति का प्रतीक होते हैं जिनसे वे जुड़े होते हैं।
यंत्र को केवल चित्र की तरह दीवार पर लगाने से ही काम पूरा नहीं होता। वैदिक परंपरा में यंत्र को सक्रिय करने की प्रक्रिया को प्राण प्रतिष्ठा कहा जाता है। प्राण प्रतिष्ठा के अंतर्गत उस यंत्र से सम्बंधित इष्ट देव के मंत्रों का जाप किया जाता है फिर विधि अनुसार पवित्र अग्नि में आहुति दी जाती है और अंत में यंत्र को पूजा स्थान पर स्थापित किया जाता है। जब यह क्रम किसी विद्वान आचार्य या ज्योतिष की देखरेख में पूरा होता है तो यंत्र साधक के लिए सचमुच एक जीवंत सहायक बन जाता है।
यंत्र केवल पूजा की वस्तु नहीं है यह ध्यान का केंद्र भी है।
इस प्रकार यंत्र साधक के भीतर उस देवता की भावना जागृत करने में सेतु बनता है।
यंत्र की नियमित पूजा और ध्यान से निम्न प्रकार के लाभ की आशा की जाती है।
यह लाभ तभी स्थायी बनते हैं जब व्यक्ति स्वयं भी अपने व्यवहार में सुधार लाने का प्रयास करे। केवल यंत्र स्थापित कर छोड़ देने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते।
वैदिक ग्रंथों में रुद्राक्ष शब्द दो भागों से बना माना गया है रुद्र और अक्ष। रुद्र भगवान शिव का एक नाम है और अक्ष का अर्थ है अश्रु या आँसू। परंपरा में यह मान्यता है कि रुद्राक्ष शिव के करुणा भरे आँसुओं से उत्पन्न हुए इसलिए इन्हें शिव की जीवंत कृपा का प्रतीक माना जाता है।
रुद्राक्ष के दानों में प्राकृतिक रूप से बनी रेखाएं या मुख होते हैं जिन्हें मुखी कहा जाता है। एक मुखी से लेकर कई मुखी रुद्राक्ष पाए जाते हैं और हर प्रकार का संबंध अलग ग्रह या देवता से माना जाता है। इसी कारण किसी भी व्यक्ति को रुद्राक्ष पहनने से पहले उसकी कुंडली देखकर यह देखना आवश्यक माना गया है कि कौन सा मुखी रुद्राक्ष उसके लिए शुभ रहेगा।
रुद्राक्ष को भी साधारण दाने की तरह नहीं धारण किया जाता।
रुद्राक्ष दानों में सूक्ष्म विद्युत चुम्बकीय तरंगों की उपस्थिति का उल्लेख भी अनेक ग्रंथों में मिलता है। गले में धारण करने पर यह क्षेत्र हृदय और मस्तिष्क के करीब होता है जिससे भावनात्मक और मानसिक स्थिति दोनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। चिकित्सा अनुसंधानों में भी यह संकेत मिला है कि रुद्राक्ष धारण करने से तनाव में कमी और हृदय की कार्यप्रणाली पर शांत प्रभाव पड़ सकता है।
रुद्राक्ष सही चयन और विधि से धारण किया जाए तो यह कई स्तरों पर सहायता कर सकता है।
चूँकि रुद्राक्ष पर भगवान शिव का आशीर्वाद माना जाता है इसलिए इसे धारण करने वाले व्यक्ति के जीवन में कई बार ऐसे संयोग बनने लगते हैं जो कठिन परिस्थितियों से बाहर निकालने में सहायक होते हैं।
रत्न उपाय वैदिक ज्योतिष में बहुत लोकप्रिय हैं क्योंकि इनका प्रभाव अपेक्षाकृत प्रत्यक्ष और दीर्घकालिक माना जाता है। प्रत्येक ग्रह का अपना एक प्रमुख रत्न होता है जैसे सूर्य के लिए माणिक्य चंद्र के लिए मोती बुध के लिए पन्ना गुरु के लिए पुखराज शुक्र के लिए हीरा शनि के लिए नीला नीलम राहु के लिए गोमेद और केतु के लिए लहसुनिया।
कुंडली में जब कोई ग्रह अत्यधिक कमजोर या पीड़ित अवस्था में होता है तो उस ग्रह का रत्न सही विधि से धारण करने की सलाह दी जाती है। रत्न सूक्ष्म ऊर्जा के संवाहक की तरह काम करते हैं। यह ऊर्जा अंगूठी या आभूषण के माध्यम से शरीर में प्रवेश करके धीरे धीरे उस ग्रह के क्षेत्र में मजबूती लाने लगती है।
किसी भी रत्न से पूर्ण लाभ पाने के लिए उसे धारण करने से पहले शुद्ध करना अनिवार्य माना गया है।
रत्न को प्रायः सोने चांदी या तांबे की अंगूठी या आभूषण में इस प्रकार जड़वाया जाता है कि रत्न का निचला हिस्सा सीधे त्वचा को स्पर्श करे। साथ ही उस ग्रह के मंत्र का कम से कम 108 बार जप कर रत्न को ऊर्जित करने की परंपरा है।
| ग्रह | संबंधित रत्न | मुख्य उद्देश्य |
|---|---|---|
| सूर्य | माणिक्य | आत्मविश्वास और पहचान |
| चंद्र | मोती | मानसिक शांति |
| बुध | पन्ना | बुद्धि और व्यापार |
| गुरु | पुखराज | ज्ञान और समृद्धि |
| शुक्र | हीरा | सौंदर्य और संबंध |
| शनि | नीला नीलम | स्थिरता और कर्मफल |
| राहु | गोमेद | भय पर नियंत्रण |
| केतु | लहसुनिया | आध्यात्मिक प्रगति |
सही रत्न धारण करने से नकारात्मक प्रभाव कम हो सकते हैं और शुभ फल प्रबल हो सकते हैं परंतु गलत रत्न कई बार विपरीत परिणाम भी दे सकता है। इसलिए रत्न केवल अनुभवी ज्योतिष की सलाह से ही धारण करने चाहिए।
यज्ञ शब्द का अर्थ है पूजा दान और समर्पण। वैदिक विधान में अग्नि को देवताओं तक आहुति पहुँचाने का माध्यम माना गया है। जब मंत्रों के साथ आहुति दी जाती है तो यह प्रक्रिया केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं रहती बल्कि साधक के भीतर भी त्याग और निस्वार्थ भाव को मजबूत करती है।
यज्ञ आमतौर पर दो प्रकार की स्थितियों में कराये जाते हैं।
वैदिक परंपरा में अनेक प्रकार के यज्ञ वर्णित हैं जिनमें से कुछ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
इनमें से शुरुआती दो यज्ञ वर्तमान समय में अधिक प्रचलित हैं। नवग्रह शांति यज्ञ ग्रहों के दुष्प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से किया जाता है जबकि महामृत्युंजय यज्ञ दीर्घायु और रोगों से रक्षा के लिए विशेष प्रभावी माना जाता है।
यज्ञ के दौरान दिया जाने वाला भोग यह संकेत करता है कि साधक अपने लोभ और स्वार्थ को छोड़कर निस्वार्थ भाव से ईश्वर की शरण में जा रहा है। जब यह भाव सच्चे मन से आता है तो कर्मों की दिशा भी धीरे धीरे बदलने लगती है।
पाँचों उपायों में यदि सबसे सरल और व्यक्तिगत उपाय की बात की जाए तो वह है जप। जप का अर्थ है किसी मंत्र या ईश्वर के नाम का बार बार स्मरण। यह स्मरण केवल होंठों से नहीं होता बल्कि धीरे धीरे हृदय की गहराई तक उतरने लगता है।
जप दो स्तरों पर कार्य करता है।
जप के लिए प्रायः माला का उपयोग किया जाता है ताकि गिनती और लय दोनों में स्थिरता बनी रहे। हर व्यक्ति अपनी कुंडली की स्थिति और परिस्थिति के अनुसार अलग मंत्र चुन सकता है। शिव मंत्र गायत्री मंत्र बीज मंत्र और इष्टदेव के स्वनाम मंत्र इस दिशा में प्रमुख माने जाते हैं।
सही मंत्र का चयन अकेले करना आसान नहीं होता।
अनुभवी ज्योतिष मार्गदर्शन देकर यह बता सकते हैं कि किसी मंत्र का जप कितने दिन तक और प्रतिदिन कितनी माला करनी चाहिए ताकि अपेक्षित फल प्राप्त हो सके।
अक्सर लोग केवल एक उपाय पर अधिक भरोसा कर लेते हैं और बाकी साधन छोड़ देते हैं जबकि संतुलित दृष्टि यह कहती है कि हर उपाय की अपनी भूमिका है।
जब इन उपायों में से जो आवश्यक हो उसका चयन कुंडली और परिस्थिति के अनुसार किया जाता है तो वैदिक ज्योतिष केवल भविष्यवाणी का विषय नहीं रह जाता बल्कि जीवन को संतुलित करने का व्यावहारिक साधन बन जाता है।
क्या हर व्यक्ति को रत्न धारण करना चाहिए
जरूरी नहीं। यदि कुंडली में कोई ग्रह बहुत अधिक पीड़ित है तब ही रत्न उचित रहता है। कई बार केवल जप और दान से भी पर्याप्त संतुलन आ सकता है।
क्या बिना प्राण प्रतिष्ठा के यंत्र प्रभावी होते हैं
यंत्र की ऊर्जात्मक शक्ति जागृत करने के लिए प्राण प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण मानी जाती है। बिना इसके यंत्र केवल चित्र की तरह रह जाता है।
क्या रुद्राक्ष सभी के लिए समान फल देता है
रुद्राक्ष सामान्य रूप से शुभ माना जाता है पर उसके मुख के अनुसार प्रभाव बदलता है। इसलिए सही मुख चयन के लिए कुंडली और मार्गदर्शन आवश्यक है।
जप के लिए दिन का कौन सा समय उत्तम रहता है
सुबह ब्रह्ममुहूर्त सबसे श्रेष्ठ माना गया है। यदि यह संभव न हो तो किसी एक निश्चित समय को रोज़ के लिए तय कर लेना भी लाभदायक रहता है।
क्या केवल यज्ञ करवा लेने से ग्रहों का दोष पूरी तरह मिट जाता है
यज्ञ दोष कम करने में मदद करता है परंतु कर्मों की दिशा बदले बिना स्थायी परिणाम नहीं मिलते। उपाय के साथ विचार आचरण और जीवनशैली में भी सुधार लाना आवश्यक है।
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