पितरों की तस्वीर का स्थान

By पं. नीलेश शर्मा

देवस्थान और पितृ स्मरण की मर्यादा को समझने का संतुलित मार्ग

पितरों की तस्वीर मंदिर में रखनी चाहिए क्या

श्रद्धा की दो अलग दिशाएं

घर के मंदिर में स्वर्गीय माता पिता, दादा दादी या अन्य पितरों की तस्वीर रखने को लेकर अनेक परिवारों में भ्रम रहता है। भावनात्मक रूप से यह स्वाभाविक है, क्योंकि पूर्वजों के प्रति प्रेम, कृतज्ञता और सम्मान गहरा होता है। फिर भी देवताओं की पूजा और पितरों का स्मरण, दोनों श्रद्धा के विषय होते हुए भी परंपरा में अलग स्थान और अलग विधि से जुड़े माने गए हैं।

घर के मंदिर का स्थान सामान्यतः देवी देवताओं की नित्य आराधना, मंत्र जप, दीपक, ध्यान और सात्विक पूजा के लिए रखा जाता है। पितरों की तस्वीरों को उसी स्थान पर रखना देवताओं को नाराज करता है, ऐसा भय रखना उचित नहीं है। किंतु सनातन परंपरा और वास्तु की प्रचलित मान्यताओं में पितरों के चित्रों को देव प्रतिमाओं से अलग, सम्मानजनक स्थान देने की सलाह दी जाती है।

यह भेद किसी को ऊंचा या नीचा बताने के लिए नहीं है। देवता ब्रह्मांडीय चेतना, धर्म और उपासना के केंद्र माने जाते हैं, जबकि पितर परिवार की स्मृति, वंश, संस्कार और कृतज्ञता से जुड़े होते हैं। दोनों के प्रति सम्मान आवश्यक है, पर उनकी स्मृति और पूजा की व्यवस्था अलग रखना अधिक संतुलित माना जाता है।

देवस्थान और पितृस्थान का अंतर

घर का मंदिर केवल वस्तुएं रखने का स्थान नहीं है। वह परिवार के मन को प्रार्थना, शांति और सदाचार की ओर मोड़ने वाला स्थान होता है। देव प्रतिमाएं, शिवलिंग, देव चित्र, दीपक, जल पात्र और पूजा सामग्री वहां इस भाव से रखी जाती है कि व्यक्ति प्रतिदिन ईश्वर का स्मरण कर सके।

पितरों की तस्वीरें परिवार के इतिहास और संबंधों की स्मृति होती हैं। उनका स्थान घर में उतना ही आदरणीय हो सकता है, पर उसे देवालय के भीतर रखना आवश्यक नहीं है। अलग स्थान देने से नित्य देव पूजा और पितृ स्मरण दोनों अपनी मर्यादा के साथ बने रहते हैं।

विषय देवस्थान पितृस्थान
देवताओं का स्वरूप उपासना और ईश्वर स्मरण परिवार की स्मृति और कृतज्ञता
मुख्य भाव भक्ति, ध्यान और सदाचार आदर, स्मरण और पितृ ऋण का भाव
दैनिक व्यवस्था नित्य पूजा, दीपक और जप शांत स्मरण और विशेष तिथियों पर श्रद्धांजलि
उपयुक्त स्थान स्वच्छ घर मंदिर अलग स्वच्छ दीवार या शांत कक्ष
प्रमुख उद्देश्य आंतरिक शुद्धि और आध्यात्मिक प्रेरणा वंश परंपरा और पारिवारिक सम्मान

देवस्थान और पितृस्थान की अलग व्यवस्था घर में अनुशासन तथा स्पष्टता लाती है। इससे परिवार को दोनों प्रकार की श्रद्धा को उचित ढंग से निभाने का अवसर मिलता है।

क्या पितरों की तस्वीर मंदिर में रखनी चाहिए

पितरों की तस्वीरों को घर के मंदिर के भीतर, देव प्रतिमाओं के साथ रखना सामान्यतः उचित नहीं माना जाता। इसका अर्थ यह नहीं है कि पूर्वजों की तस्वीर अपवित्र है या उनका सम्मान देवताओं से कम है। पितर परिवार के आधार हैं और उनका आदर भारतीय जीवन दृष्टि का महत्वपूर्ण भाग है।

फिर भी पूजा घर में देवताओं की प्रतिमा के साथ पितरों के चित्र रखने से नित्य पूजा की व्यवस्था मिश्रित हो सकती है। देवताओं को नैवेद्य, जल, फूल और दीपक अर्पित करने की विधि अलग है। पितरों के स्मरण, तर्पण, श्राद्ध और कृतज्ञता का भाव अलग परंपरा से जुड़ा है। दोनों को अपने अपने स्थान पर रखना मर्यादा का विषय है।

इन बातों का ध्यान रखें:

  1. पितरों की तस्वीर को देव प्रतिमाओं के बीच न रखें।
  2. तस्वीर को मंदिर की वेदी या पूजा चौकी पर न रखें।
  3. पितरों के चित्र पर नियमित देव पूजन की सामग्री न चढ़ाएं।
  4. देवताओं की तस्वीरों और पितरों की तस्वीरों का अलग स्थान रखें।
  5. तस्वीर को साफ, सुरक्षित और सम्मानजनक जगह पर लगाएं।
  6. पितरों की स्मृति को भय से नहीं, कृतज्ञता से देखें।
  7. किसी पारिवारिक परंपरा का पालन हो तो उसे विनम्रता से निभाएं।
  8. तस्वीरों को उपेक्षित, धूल भरे या असम्मानजनक स्थान पर न रखें।

पितृ सम्मान का अर्थ केवल तस्वीर लगाना नहीं है। परिवार के संस्कार, सत्यनिष्ठा और जिम्मेदारियों को आगे बढ़ाना भी पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

तस्वीर के लिए सही दिशा

वास्तु की प्रचलित मान्यताओं के अनुसार पितरों की तस्वीर दक्षिण या पश्चिम दिशा की दीवार पर लगाना उपयुक्त माना जाता है। दक्षिण दिशा को यम और पितृ संबंधी स्मरण से जोड़ा जाता है, जबकि पश्चिम दिशा भी स्मृति, स्थिरता और गंभीरता के भाव से संबंधित मानी जाती है। तस्वीर लगाते समय यह ध्यान रखा जाता है कि उसका स्थान स्वच्छ, शांत और सुरक्षित हो।

दिशा के विषय में घर की बनावट, उपलब्ध स्थान और परिवार की परंपरा भी महत्वपूर्ण हैं। केवल दिशा के कारण चिंता में पड़ना उचित नहीं है। यदि दक्षिण या पश्चिम दिशा व्यावहारिक रूप से उपयुक्त न हो, तो घर में ऐसा स्थान चुनें जहां चित्र का सम्मान बना रहे और वह देवस्थान से अलग हो।

स्थिति संतुलित व्यवस्था
दक्षिण दीवार उपलब्ध हो पितरों का चित्र वहां सम्मान से लगाया जा सकता है
पश्चिम दीवार अधिक उपयुक्त हो स्वच्छ और शांत स्थान पर चित्र लगाएं
घर में सीमित जगह हो देवस्थान से अलग एक सुरक्षित दीवार चुनें
कई पितरों के चित्र हों उन्हें व्यवस्थित रूप से एक ही स्थान पर रखें
तस्वीर पुरानी या क्षतिग्रस्त हो नया फ्रेम लगवाएं या सम्मान से सुरक्षित करें
मंदिर ही एकमात्र शांत स्थान हो मंदिर के बाहर निकट की अलग दीवार या कक्ष चुनें

तस्वीर का मुख किस दिशा में रहे, इसे लेकर घरों में अलग परंपराएं मिलती हैं। इसलिए स्थानीय पारिवारिक रीति को सम्मान देना उचित है। मुख्य बात यह है कि चित्र देव प्रतिमाओं के साथ मिश्रित न हो और उसका स्थान गरिमापूर्ण रहे।

पितरों की ऊर्जा का अर्थ

पितरों की ऊर्जा को भय या किसी अदृश्य दबाव की तरह नहीं समझना चाहिए। यह परिवार की जड़ों, स्मृतियों, मूल्यों और उन लोगों के प्रति कृतज्ञता का भाव है जिनके जीवन, श्रम और संस्कारों से वर्तमान पीढ़ी को आधार मिला। किसी घर में पूर्वजों का आदर होने का अर्थ है कि वहां इतिहास, संबंध और जिम्मेदारी को महत्व दिया जाता है।

देवताओं की ऊर्जा को ब्रह्मांडीय, आध्यात्मिक और सार्वभौमिक चेतना से जोड़ा जाता है। पितरों का स्मरण अधिक व्यक्तिगत और पारिवारिक होता है। दोनों का यह अंतर घर की उपासना व्यवस्था में अलग स्थान देने की परंपरा को समझने में सहायता करता है।

श्रद्धा का पक्ष जीवन में उसका अर्थ
देव स्मरण सत्य, करुणा, धर्म और आत्मिक विकास
पितृ स्मरण कृतज्ञता, परिवार और वंश का सम्मान
नित्य पूजा मन की शुद्धि और अनुशासन
श्राद्ध या तर्पण पूर्वजों के प्रति स्मरण और कर्तव्य भाव
पारिवारिक संस्कार आने वाली पीढ़ियों के लिए नैतिक आधार
सेवा और दान श्रद्धा को कर्म में बदलने का माध्यम

यह व्यवस्था ऊर्जाओं का डरावना विभाजन नहीं है। यह श्रद्धा के विविध रूपों को मर्यादा और संतुलन से निभाने का तरीका है।

पितरों का सम्मान कैसे करें

पितरों का सम्मान केवल किसी विशेष दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए। स्वर्गीय माता पिता या दादा दादी की स्मृति में परिवार के भीतर अच्छे संस्कारों को जीवित रखना, उनके अधूरे दायित्वों को यथासंभव पूरा करना और संबंधों में स्नेह बनाए रखना भी पितृ श्रद्धा का रूप है।

श्राद्ध पक्ष, अमावस्या या परिवार की स्मृति तिथि पर यदि तर्पण, दान या भोजन सेवा की पारिवारिक परंपरा हो, तो उसे श्रद्धा से निभाया जा सकता है। लेकिन पितृ स्मरण को भय, दोष या अनिष्ट की आशंका से जोड़कर देखना उचित नहीं है। पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्ति को विनम्र और जिम्मेदार बनाती है।

पितृ सम्मान के सरल रूप:

  1. पितरों की तस्वीर को स्वच्छ रखें।
  2. उनकी स्मृति में परिवार के बुजुर्गों का आदर करें।
  3. जरूरतमंद को भोजन, वस्त्र या उपयोगी सामग्री दें।
  4. परिवार में सत्य और न्याय का व्यवहार रखें।
  5. बच्चों को परिवार के अच्छे संस्कारों से परिचित कराएं।
  6. श्राद्ध या तर्पण को दिखावे के बजाय श्रद्धा से करें।
  7. पारिवारिक विवाद को शांतिपूर्वक सुलझाने का प्रयास करें।
  8. पूर्वजों के नाम पर सेवा का कोई छोटा कार्य करें।

पितरों के प्रति सबसे सुंदर अर्पण वही है जो उनके जीवन मूल्यों को आगे बढ़ाए।

घर में तस्वीर लगाने की मर्यादा

पितरों की तस्वीर ऐसे स्थान पर लगानी चाहिए जहां परिवार उन्हें शांत मन से देख सके। चित्र को शयनकक्ष में बिस्तर के सामने, रसोई में, स्नानघर के निकट, सीढ़ियों के नीचे या ऐसी जगह नहीं लगाना चाहिए जहां उसका सम्मान बनाए रखना कठिन हो। बैठक, शांत गलियारा, अध्ययन कक्ष या अलग स्मृति स्थल उपयुक्त हो सकते हैं।

चित्र के सामने नियमित रूप से बहुत अधिक सामग्री जमा करना आवश्यक नहीं है। स्वच्छता, सादगी और आदर पर्याप्त हैं। परिवार की विशेष तिथि पर कुछ फूल रखना, शांत प्रार्थना करना या उनकी स्मृति में सेवा करना अधिक अर्थपूर्ण हो सकता है।

तस्वीर व्यवस्था के सरल नियम

  1. साफ और स्पष्ट तस्वीर चुनें।
  2. मजबूत तथा स्वच्छ फ्रेम का उपयोग करें।
  3. तस्वीर को आंखों के स्तर के आसपास लगाएं।
  4. उसे देव प्रतिमाओं से अलग रखें।
  5. फोटो के आसपास अव्यवस्था न होने दें।
  6. टूटे या धूल भरे फ्रेम को समय पर ठीक कराएं।
  7. तस्वीर को कूड़े, जूतों या गंदे स्थान के निकट न रखें।
  8. परिवार के सभी सदस्य उस स्थान की गरिमा बनाए रखें।

घर का हर स्थान जो स्मृति, सम्मान और शांति को संभाल सके, पितरों के चित्र के लिए उपयुक्त बन सकता है।

देवताओं का सम्मान क्यों बना रहता है

देवताओं को प्रसन्न या अप्रसन्न करने की बात को केवल भय की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। देव पूजा का सार व्यक्ति के भीतर सत्य, करुणा, अनुशासन और विनम्रता जगाना है। जब घर में देवस्थान की स्वच्छता और मर्यादा बनी रहती है, तो पूजा का भाव अधिक सहज और एकाग्र होता है।

पितरों की तस्वीर अलग रखने से देवताओं का अपमान नहीं होता बल्कि दोनों प्रकार की श्रद्धा को उचित स्थान मिलता है। देवताओं की पूजा में ईश्वर के प्रति समर्पण होता है, जबकि पितृ स्मरण में कृतज्ञता और पारिवारिक दायित्व का भाव होता है। दोनों भाव पवित्र हैं, पर उनकी अभिव्यक्ति अलग हो सकती है।

यदि किसी परिवार में वर्षों से पितरों की तस्वीर मंदिर में रखी गई हो, तो अचानक भय या अपराधबोध की आवश्यकता नहीं है। तस्वीर को शांतिपूर्वक, सम्मान से किसी उपयुक्त अलग स्थान पर रखा जा सकता है। इस परिवर्तन के समय किसी जटिल अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है। सरल प्रार्थना, स्वच्छता और कृतज्ञता का भाव पर्याप्त है।

स्मृति में संस्कार की रोशनी

पितरों की तस्वीर घर में केवल अतीत की वस्तु नहीं होती। वह परिवार को यह याद दिला सकती है कि जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का नाम नहीं है। प्रत्येक पीढ़ी को पहले की पीढ़ियों से कुछ संस्कार, संघर्ष, अवसर और जिम्मेदारियां मिलती हैं। इनका सम्मान करके व्यक्ति अपने वर्तमान को अधिक गहराई से समझ सकता है।

देवस्थान में भगवान का स्मरण जीवन को ऊंचे मूल्यों की ओर ले जाता है। पितृस्थान में पूर्वजों की स्मृति व्यक्ति को अपनी जड़ों और कर्तव्यों का बोध कराती है। जब दोनों के लिए अलग, स्वच्छ और सम्मानजनक स्थान रखा जाता है तब घर में श्रद्धा अधिक व्यवस्थित रूप से प्रकट होती है।

सच्ची श्रद्धा स्थान के भय से नहीं, स्मरण की शुद्धता, व्यवहार की विनम्रता और जीवन के सदाचार से प्रकट होती है।

FAQ

क्या मृत माता पिता की तस्वीर मंदिर में रख सकते हैं
सामान्य परंपरा में मृत माता पिता की तस्वीर को देव प्रतिमाओं के साथ मंदिर में रखने के बजाय अलग सम्मानजनक स्थान पर रखना उचित माना जाता है।

पितरों की तस्वीर किस दिशा में लगानी चाहिए
वास्तु की प्रचलित मान्यताओं में दक्षिण या पश्चिम दिशा की दीवार उपयुक्त मानी जाती है। स्थान स्वच्छ, शांत और देवस्थान से अलग होना चाहिए।

क्या पितरों की तस्वीर मंदिर में रखने से भगवान नाराज होते हैं
इसे भगवान के नाराज होने के भय से नहीं देखना चाहिए। परंपरा में देव पूजा और पितृ स्मरण को अलग स्थान देना मर्यादित और संतुलित व्यवस्था माना गया है।

पितरों की तस्वीर के सामने क्या करना चाहिए
तस्वीर को स्वच्छ रखें। विशेष तिथि पर फूल रख सकते हैं, शांत स्मरण कर सकते हैं या उनकी स्मृति में सेवा और दान कर सकते हैं।

पितरों का सम्मान करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है
परिवार के संस्कारों को आगे बढ़ाना, बुजुर्गों का आदर करना, सत्यनिष्ठा से जीना और जरूरतमंदों की सहायता करना पितरों के प्रति सच्चा सम्मान है।

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लेखक

पं. नीलेश शर्मा

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