By पं. नीलेश शर्मा
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से कुंडली और स्वभाव समझें

कई कुंडलियां पहली नजर में बहुत समान लगती हैं। ग्रह भी मिलते जुलते दिखते हैं। फिर भी दो लोगों की प्रकृति अलग होती है। किसी के भीतर आग जैसी जल्दी होती है। कोई शांत जल की तरह हर बात को भीतर उतारता है। किसी की सोच हवा की तरह तेज दौड़ती है। किसी का जीवन पृथ्वी की तरह स्थिर चलता है। वैदिक ज्योतिष इसी अंतर को एक सरल भाषा में समझाता है। वह भाषा है पंचमहाभूत।
पंचमहाभूत को केवल शरीर के तत्व मान लेना अधूरा होगा। यह जीवन की वह नींव है जिस पर मन का ढांचा बनता है। यही नींव व्यवहार के रंग तय करती है। यही नींव स्वास्थ्य की कुछ प्रवृत्तियां भी दिखाती है। इसलिए जब कुंडली में तत्वों का संतुलन देखा जाता है तब ग्रहों की कहानी अधिक साफ दिखती है।
वैदिक परंपरा में पांच तत्व माने गए हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। इन्हें पंचमहाभूत कहा जाता है। उपनिषदों और वेदांत की धारणा में यह पांचों तत्व केवल पदार्थ नहीं हैं। यह ऐसे गुण हैं जो स्थूल और सूक्ष्म दोनों स्तर पर काम करते हैं। शरीर में यह अंगों की भाषा बनते हैं। मन में यह प्रतिक्रिया और विचारों की गति बनते हैं।
यह दृष्टि प्रतीक पर नहीं टिकी रहती। यह प्रकृति की ताकतों को वास्तविक मानती है। इसलिए वैदिक ज्योतिष में जब कहा जाता है कि किसी कुंडली में अग्नि अधिक है तो उसका अर्थ केवल साहस नहीं होता। उसका अर्थ होगा कि जीवन में प्रेरणा तेज है पर संयम सीखना जरूरी है। उसी तरह जल अधिक हो तो संवेदना गहरी होती है और भावनात्मक सीमाएं बनानी सीखनी होती है।
इसी आधार को आयुर्वेद भी स्वीकार करता है। वहां वात, पित्त और कफ की व्याख्या भी तत्वों से जुड़ती है। सांख्य और योग दर्शन में यह तत्व मन, इंद्रियों और प्रकृति के संबंध को समझाने में सहायक होते हैं। ज्योतिष में यह तत्व अक्सर शांत तरीके से काम करते हैं पर असर गहरा रखते हैं।
कुंडली में ग्रह बताएंगे कि क्या प्रवृत्ति है। तत्व बताएंगे कि वह प्रवृत्ति किस गति से चलती है और किस रंग में व्यक्त होती है। यह अंतर बहुत व्यावहारिक है। एक व्यक्ति नेतृत्व करे पर क्रोध न बढ़े। दूसरा व्यक्ति संवेदनशील हो पर टूटे नहीं। तीसरा व्यक्ति बहुत सोचता हो पर निर्णय टाले नहीं। इन प्रश्नों का उत्तर अक्सर तत्वों के संतुलन में छिपा होता है।
तत्वों का अध्ययन किसी को एक बॉक्स में बंद नहीं करता। यह व्यक्ति की ऊर्जा का तापमान बताता है। यही कारण है कि कुंडली पढ़ते समय तत्वों का संतुलन देखना सलाह को अधिक मानवीय बनाता है।
वैदिक ज्योतिष में बारह राशियां चार मुख्य तत्वों से जुड़ी मानी जाती हैं। अग्नि, पृथ्वी, वायु और जल। पांचवां तत्व आकाश किसी एक राशि से सीधे नहीं जोड़ा जाता। आकाश वह सूक्ष्म स्थान है जिसमें बाकी तत्व काम करते हैं। इसलिए कुंडली में आकाश को अनुभव की तरह पढ़ा जाता है।
नीचे चार तत्वों के अनुसार राशियों का सरल विभाजन दिया गया है।
| तत्व | राशियां |
|---|---|
| अग्नि | मेष, सिंह, धनु |
| पृथ्वी | वृषभ, कन्या, मकर |
| वायु | मिथुन, तुला, कुंभ |
| जल | कर्क, वृश्चिक, मीन |
यह विभाजन सरल है पर प्रभावशाली है। यदि किसी कुंडली में अग्नि राशि में ग्रह अधिक हों तो काम शुरू करने की ऊर्जा अधिक होगी। यदि पृथ्वी राशि में ग्रह अधिक हों तो धैर्य, योजना और स्थिर परिणाम की चाह बढ़ेगी। यदि वायु राशि में ग्रह अधिक हों तो सोच, संवाद और विचारों की गति बढ़ेगी। यदि जल राशि में ग्रह अधिक हों तो भाव, स्मृति और अंतर्ज्ञान का प्रभाव बढ़ेगा।
आकाश को किसी एक राशि के खांचे में रखना कठिन है क्योंकि यह भौतिक नहीं है। आकाश का संबंध मौन, अंतरदृष्टि, विस्तार, एकांत और आध्यात्मिक रुझान से जोड़ा जाता है। कुंडली में आकाश अक्सर गुरु, केतु और कुछ स्थितियों में राहु के प्रभाव से महसूस होता है। जब ये ग्रह उच्च भावों से जुड़ें और मन को भीतर की ओर मोड़ें तब आकाश की उपस्थिति अधिक स्पष्ट लगती है।
यहां एक बात महत्वपूर्ण है। राहु का स्वरूप छाया ग्रह का है। इसका भौतिक शरीर नहीं माना जाता। इसलिए जब राहु जीवन को सीमा तोड़ने वाले अनुभव दे और व्यक्ति को अमूर्त चीजों की ओर खींचे तब आकाश तत्व की भाषा समझ में आने लगती है। तकनीक, दूर देश, आभासी दुनिया और अनुभव की तीव्रता जैसे क्षेत्र भी इसी प्रकार के संकेत दे सकते हैं।
हर तत्व का अपना गुण है। हर गुण का अपना संतुलन है। संतुलन रहे तो तत्व ताकत देता है। असंतुलन हो तो वही तत्व चुनौती बन जाता है।
| तत्व | मूल गुण | संतुलन में संकेत | असंतुलन में संकेत |
|---|---|---|---|
| पृथ्वी | स्थिरता और अनुशासन | भरोसा और निरंतरता | जड़ता और अत्यधिक लगाव |
| जल | संवेदना और स्मृति | करुणा और जुड़ाव | भय और भावनात्मक निर्भरता |
| अग्नि | ऊर्जा और दिशा | साहस और नेतृत्व | क्रोध और थकावट |
| वायु | विचार और गति | संवाद और सीखने की भूख | बेचैनी और बिखराव |
| आकाश | मौन और विस्तार | भीतर की स्पष्टता | वास्तविकता से दूरी |
अग्नि ऊर्जा, प्रेरणा और लक्ष्य की दिशा देता है। यह तत्व साहस बढ़ाता है। यह नेतृत्व का ताप देता है। संतुलित अग्नि व्यक्ति को समय पर निर्णय लेने की क्षमता देती है। वह आलस्य को तोड़ती है और जीवन में आगे बढ़ने का दम देती है।
अग्नि अधिक हो तो जल्दबाजी, चिड़चिड़ापन और टकराव बढ़ सकता है। शरीर में थकावट भी जल्दी आ सकती है क्योंकि ऊर्जा का बहाव लगातार चलता रहता है। अग्नि कम हो तो प्रेरणा घट सकती है और मन में सुस्ती बढ़ सकती है।
पृथ्वी स्थिरता, जिम्मेदारी और परिणाम से जुड़ी है। यह तत्व दिनचर्या और संरचना देता है। पृथ्वी अधिक हो तो व्यक्ति भरोसेमंद बनता है। वह धीरे चलता है पर टिकता है। वह काम को अंत तक ले जाने की क्षमता रखता है।
पृथ्वी बहुत अधिक हो जाए तो बदलाव से डर बढ़ सकता है। आराम और सुविधा से अत्यधिक लगाव बन सकता है। पृथ्वी कम हो तो जीवन का आधार हिलता दिख सकता है। विचार अच्छे हों फिर भी टिकने की शक्ति कम पड़ सकती है।
वायु विचार, संवाद और मानसिक गति का तत्व है। यह जिज्ञासा देता है। यह सीखने की ललक देता है। वायु अधिक हो तो व्यक्ति तेज दिमाग वाला बनता है और बातचीत में निपुण हो सकता है।
वायु का असंतुलन बेचैनी बनकर दिखता है। बहुत अधिक सोच, निर्णय में देरी और एक साथ कई चीजों पर ध्यान चला जाना इसका संकेत हो सकता है। वायु कम हो तो व्यक्ति अपने विचार व्यक्त करने में कठिनाई महसूस कर सकता है या सोच कठोर हो सकती है।
जल भावना, अंतर्ज्ञान, स्मृति और सहानुभूति से जुड़ा है। यह तत्व रिश्तों में गहराई बनाता है। यह भीतर की दुनिया को समृद्ध करता है। जल अधिक हो तो करुणा बढ़ती है और व्यक्ति दूसरों की बात बिना कहे समझ सकता है।
जल अधिक हो तो भावनात्मक बोझ भी बढ़ सकता है। मन जल्दी आहत हो सकता है। डर और असुरक्षा भी बढ़ सकती है। जल कम हो तो व्यक्ति भावनाओं से कटता हुआ दिख सकता है और संबंधों में दूरी बढ़ सकती है।
आकाश मौन, जगह और चेतना का संकेत है। यह वह खुलापन है जिसमें विचार भी उठते हैं और गिरते भी हैं। संतुलित आकाश व्यक्ति को भीतर से शांत करता है। वह बड़े अर्थ की ओर खींच सकता है। वह जीवन के शोर के बीच भी स्पष्टता दे सकता है।
आकाश बहुत अधिक हो तो व्यक्ति बहुत अमूर्त हो सकता है। व्यवहारिक जीवन में रुचि घट सकती है। आकाश कम हो तो व्यक्ति केवल भौतिक स्तर पर टिक सकता है और भीतर की आवाज दब सकती है।
तत्वों का संतुलन व्यक्तित्व का रंग बनाता है। कई बार यह ग्रहों के नाम से अधिक साफ संकेत देता है।
तत्वों की कमी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि पृथ्वी कम हो तो स्थिरता की कमी हो सकती है। यदि जल कम हो तो भावनात्मक जुड़ाव में कठिनाई हो सकती है। यदि वायु कम हो तो विचारों की अभिव्यक्ति दब सकती है। यदि अग्नि कम हो तो प्रेरणा और इच्छा शक्ति कम पड़ सकती है। यदि आकाश कम हो तो भीतर की शांति बनाने में कठिनाई हो सकती है।
राशि तत्व की जमीन देती है। ग्रह उस जमीन पर गतिविधि शुरू करते हैं। इसलिए ग्रहों की स्थिति से तत्वों की ताकत बढ़ती है। वही स्थिति बिगड़ जाए तो तत्व असंतुलित भी हो सकते हैं।
| तत्व | प्रमुख ग्रह | सामान्य संकेत |
|---|---|---|
| अग्नि | सूर्य, मंगल | नेतृत्व, साहस, क्रिया शक्ति |
| पृथ्वी | शनि, बुध | अनुशासन, व्यावहारिक सोच, धैर्य |
| वायु | बुध, शुक्र, राहु | संवाद, विचार, जिज्ञासा, गति |
| जल | चंद्र, शुक्र | भावना, सौंदर्य बोध, लगाव |
| आकाश | गुरु, केतु और कुछ स्थितियों में राहु | विस्तार, वैराग्य, अंतरदृष्टि |
तत्वों का अध्ययन केवल वर्णन नहीं है। यह सलाह बनाने का आधार भी है। तत्व देखकर यह समझ आता है कि व्यक्ति किस प्रकार का वातावरण चाहता है। किस प्रकार का काम उसे थकाता है। किस प्रकार की दिनचर्या उसे संभालती है।
एक सरल तरीका अपनाया जा सकता है।
इसके बाद लग्न, चंद्र और सूर्य की तत्वीय प्रकृति को एक साथ रखें। इससे व्यक्ति का मूल तापमान समझ में आता है। फिर दशा काल में जब किसी तत्व से जुड़ा ग्रह सक्रिय हो तो वही तत्व जीवन में अधिक दिखने लगता है। यह समझ व्यक्ति को समय पर सही कदम लेने में मदद कर सकती है।
तत्वों का संतुलन जीवन शैली से भी होता है। वैदिक दृष्टि में संतुलन का अर्थ है अति से बाहर आना।
1. राशि तत्व और ग्रह तत्व में क्या अंतर है
राशि तत्व बताता है कि तत्व का मंच कहां है। ग्रह तत्व बताता है कि उस मंच पर ऊर्जा कैसे काम करेगी। दोनों मिलकर कुंडली का वास्तविक स्वभाव बनाते हैं।
2. क्या किसी कुंडली में सभी तत्व समान हो सकते हैं
यह संभव है पर बहुत दुर्लभ है। अधिकतर कुंडलियों में किसी एक या दो तत्व का प्रभाव अधिक होता है। इसी से व्यक्तित्व की विशिष्टता बनती है। समझदारी यह है कि असंतुलन को पहचानकर संतुलन की दिशा बनाई जाए।
3. यदि कोई तत्व बहुत कमजोर हो तो क्या संकेत मिलते हैं
कमजोर तत्व अपने क्षेत्र में कमी दिखा सकता है। पृथ्वी कमजोर हो तो स्थिरता और नियमितता में कठिनाई हो सकती है। जल कमजोर हो तो भावनात्मक जुड़ाव कम हो सकता है। वायु कमजोर हो तो संवाद में बाधा आ सकती है। अग्नि कमजोर हो तो प्रेरणा घट सकती है। आकाश कमजोर हो तो भीतर की शांति बनाना कठिन हो सकता है।
4. आकाश तत्व इतना महत्वपूर्ण क्यों है जब यह किसी राशि से नहीं जुड़ा
आकाश वह जगह है जिसमें बाकी तत्व काम करते हैं। यह मौन और विस्तार का संकेत देता है। कुंडली में यह अक्सर गुरु, केतु और कुछ स्थितियों में राहु के संकेत से समझ में आता है। यह जीवन को भीतर से देखने की क्षमता बढ़ाता है।
5. क्या दशा के साथ तत्वों का प्रभाव बदलता है
हां। दशा काल में जिस ग्रह की सक्रियता बढ़ती है उससे संबंधित तत्व का अनुभव भी बढ़ता है। मंगल काल में अग्नि अधिक सक्रिय लग सकती है। चंद्र काल में जल का प्रभाव अधिक हो सकता है। यही बदलाव जीवन के अलग चरणों में मन की भाषा बदल देता है।
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