By पं. अमिताभ शर्मा
जन्मपत्री और समय के माध्यम से ब्रह्मांडीय संरचना और कर्म को समझना

वेदिक परम्परा में विराट पुरुष और काल दोनों को सृष्टि की संरचना समझने की मूल कुंजी माना गया है। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में जिस विराट पुरुष का वर्णन है, वहीं पुरुष आगे चलकर ज्योतिषशास्त्र में कालपुरुष की संकल्पना के रूप में दिखाई देता है। संपूर्ण सृष्टि, स्थावर और जङ्गम सभी पदार्थों की उत्पत्ति का मूल कारण इसी विराट, चेतन पुरुष को माना गया है जिसे काल के साथ जोड़ा जाए तो वह कालपुरुष बन जाता है।
अथर्ववेद के काल सूक्त में समय की नितांत सूक्ष्म और विस्तृत व्याख्या मिलती है। उसी महान वैदिक परम्परा को ज्योतिषशास्त्र के आचार्यों ने स्वीकार करके अपने शास्त्र की बुनियाद बनाया। इसीलिए कालपुरुष को समझे बिना ग्रह, राशि और भाव के गूढ़ अर्थ पूरी तरह स्पष्ट नहीं होते, चाहे चर्चा भाग्य की हो या कर्म की।
प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों में यह श्लोक प्रसिद्ध है
"विधात्रा लिखिता याऽसौ ललाटे अक्षरमालिका।
दैवज्ञस्ता पठेद्व्यक्तं होरा निर्मल चक्षुषा।।"
अर्थ यह कि भाग्य की जो अक्षरमाला विधाता ने ललाट पर लिख दी है, उसे दैवज्ञ शुद्ध दृष्टि से होरा शास्त्र के माध्यम से पढ़ सकता है। यही होरा, काल और पुरुष की संयुक्त समझ पर टिका है।
बृहत्पाराशरहोराशास्त्र, वृहज्जातक, सरावली, फलदीपिका, ज्योतिषकल्पतरु, फलित मार्तण्ड, होरारत्नम और सर्वार्थचिन्तामणि जैसे कालजयी ग्रंथों में कालपुरुष का सिद्धांत विस्तार से मिलता है। इन सभी में एक बात समान है कि कालपुरुष को साधारण रूपक नहीं बल्कि सीधे जातक से अभिन्न माना गया है।
मनुष्य के शरीर में शिर, नेत्र, मुख, वक्ष, उदर जैसे अंग हैं, वैसे ही कालपुरुष के भी अनेकों बाह्य और आन्तरिक अंग कल्पित किए गए हैं। इनका संबंध मेषादि द्वादश राशियों और सूर्यादि ग्रहों से जोड़ा गया है। मानव जीवन में सुख, दुःख, त्रिविध ताप, ज्ञान, हर्ष और विषाद जिन कारणों से आते हैं, उन कारणों की मीमांसा अन्य शास्त्र अपने अपने ढंग से करते हैं, जबकि ज्योतिष इन्हें कालपुरुष और ग्रह राशियों के माध्यम से समझाता है।
इन सिद्धांतों से यह स्पष्ट हो जाता है कि कालपुरुष और जातक के मध्य गहरा अभेद है। आत्मबल, मानसिक स्थिरता, सत्त्व की मात्रा, वाक्पटुता, ज्ञान, सुख, हर्ष, विषाद यह सब भविष्य की दिशा बदल देते हैं। इसी महत्व को देखते हुए कालपुरुष के आन्तरिक अवयवों जैसे आत्मा, चित्त, मन, सत्त्व, वाणी, ज्ञान, काम, सुख और दुख आदि की भी कल्पना की गई है और हर एक को किसी न किसी ग्रह से जोड़ा गया है।
ज्योतिष में वर्णित कालपुरुष के आन्तरिक अवयवों को विशेष रूप से ग्रहों के द्वारा सूचित माना गया है। यह विभाजन इस प्रकार समझा जाता है।
| आन्तरिक अवयव | कालपुरुष में अर्थ | ग्रह प्रतिनिधि |
|---|---|---|
| आत्मा | मूल चेतना, जीवन का केंद्र | सूर्य |
| मन या चित्त | भाव, चिन्तन, स्मृति | चन्द्रमा |
| बल या सत्त्व | पराक्रम, धैर्य, साहस | मंगल |
| वाणी | वचन, अभिव्यक्ति, संवाद | बुध |
| ज्ञान | विवेक, शास्त्र बोध | बृहस्पति |
| सुख | भोग, आराम, आनन्द | शुक्र |
| मद या अहं | अहंकार, उन्माद | राहु |
| दुःख | कष्ट, रुकावट, पीड़ा | शनि |
ऋग्वेद में भी कहा गया है "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च", यानी सूर्य को जगत और स्थित प्राणियों की आत्मा कहा गया है। उसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए चन्द्र को कालपुरुष का मन, मंगल को सत्त्व और ताकत, बुध को वाणी, बृहस्पति को ज्ञान, शुक्र को सुख और राहु को मद अर्थात अहंकार कहा गया। शनि को कालपुरुष का दुःख माना गया, इसीलिए यह वाक्य भी प्रचलित है "शनि: काल नरस्य दुःखम्"।
इस आत्मादि विभाजन का अर्थ यह है कि जब किसी जातक की जन्मकुंडली में ये ग्रह बलवान या निर्बल हों, तो उसी अनुपात में उसके भीतर आत्मबल, मन, वाणी, सुख, ज्ञान और अहं की स्थिति भी बदलती है। कालपुरुष के भीतर जो घटता है, वही सूक्ष्म रूप से देहधारी मनुष्य में प्रक्षिप्त हो जाता है।
जब ज्योतिष के ग्रंथ कालपुरुष का वर्णन करते हैं, तो केवल आन्तरिक अवयवों तक ही सीमित नहीं रहते। वे कालपुरुष के मस्तक, नेत्र, कान, नाक, गला, गाल, ठोढ़ी, मुख, ग्रीवा, कंधे, हाथ, बगल, छाती, पेट, नाभि, वस्ति, उपस्थ, गुदा, अण्डकोष, जांघ, घुटने, पिंडलियाँ और पैर तक के अंगों को क्रम से राशियों और भावों से जोड़ते हैं।
यहाँ द्रेष्काण की अवधारणा अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रत्येक राशि के तीन द्रेष्काण होते हैं और जन्म के समय लग्न जिस द्रेष्काण में हो, उसी के अनुसार कालपुरुष के अंगों का क्रम तय किया जाता है।
यदि जन्म समय में लग्न राशि का प्रथम द्रेष्काण उदित हो तो कालपुरुष के अंगों का विभाजन इस प्रकार माना जाता है।
यदि लग्नस्थ राशि का द्वितीय द्रेष्काण हो तो अंगों का क्रम बदल जाता है।
जब लग्न में राशि का तृतीय द्रेष्काण हो, तो चित्र और बदल जाता है।
इस क्रम से स्पष्ट होता है कि कल्याण वर्मा और अन्य आचार्यों ने शरीर के सूक्ष्म मानचित्र को कालपुरुष और द्रेष्काण के माध्यम से गोचर बनाया है, ताकि रोग, चोट और चिन्हों के फलादेश में सूक्ष्म भेद पकड़ा जा सके।
एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जहाँ अंग दो हों, जैसे आंख, कान, हाथ या पैर, वहाँ दाएँ और बाएँ का विभाजन कैसे होगा। इस जिज्ञासा का समाधान आचार्यों ने सरल रूप में दिया।
लग्न से पीछे की जो राशियाँ क्षितिज से नीचे अनुदित होती हैं वे कालपुरुष के दक्षिण या दाहिने अंग की प्रतिनिधि मानी जाती हैं। जो राशियाँ क्षितिज से ऊपर उदित रहती हैं, वे वाम या बाएँ अंग का प्रतिनिधित्व करती हैं।
व्यवहार में सामान्यतः मनुष्य का दाहिना भाग अधिक सबल और बायाँ भाग अपेक्षाकृत कमज़ोर माना जाता है। किन्तु जो जातक स्वभाव से बाएँ हाथ से कार्य करते हैं, उनमें यह अनुपात उल्टा भी हो सकता है। भावों की दृष्टि से लग्नार्द्ध से षष्ठ तक और सप्तमार्द्ध से द्वादश तक के भाग को अनुदित तथा उदित खण्ड कहकर यह विभाजन और स्पष्ट कर दिया गया है।
जब आत्मा, मन, बल, वाणी, ज्ञान, सुख, मद और दुःख के प्रतिनिधि ग्रहों को जन्मकुंडली में रखा जाता है, तो एक और प्रश्न उठता है कि ये ग्रह जातक को कैसे प्रभावित करते हैं। सारावली के रचयिता आचार्य कल्याण वर्मा ने इसका समाधान देते हुए ग्रहबल पर स्पष्ट संकेत दिया।
इस प्रकार ग्रहबल केवल घटनाओं पर ही नहीं बल्कि कालपुरुष के भीतर स्थित आत्मादि अवयवों और वहाँ से जातक के मन, वाणी, ज्ञान और स्वभाव पर भी गहरा असर डालता है।
राशियों की स्थिति कालपुरुष के अनेक अंगों में मानी गई है, इसलिए अलग अलग राशियों में ग्रहों का प्रवेश सीधे शरीर के विशिष्ट भाग पर संकेत देता है।
सिद्धांत यह कहता है कि जिस राशि में पाप ग्रह स्थित हों, उस राशि से संबंधित कालपुरुष के अंग में चोट, घाव या रोग की प्रवृत्ति देखी जाती है। वहीं जिस राशि में शुभ ग्रह स्थित हों, वहाँ के अंग पर तिल, मस्सा या विशेष निशान का योग देखा जा सकता है।
यहाँ ग्रहों का वर्गीकरण भी स्पष्ट किया गया है।
चन्द्र बल की व्याख्या भी सूक्ष्म रूप से की गई।
कुछ विद्वान कृष्ण पक्ष की अष्टमी के आधे भाग से शुक्ल अष्टमी के आधे भाग तक चन्द्र को क्षीण तथा बाकी अवधि के चन्द्र को बली मानते हैं। इस सूक्ष्म विभाजन से यह पता चलता है कि कालपुरुष के अंगों पर ग्रहों का प्रभाव केवल स्थिति से नहीं बल्कि बल से भी जुड़ा हुआ है।
एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि शरीर पर घाव, तिल, मस्सा या अन्य चिन्ह जन्म से ही होंगे या जीवन के किसी विशेष काल में प्रकट होंगे। इस संदर्भ में आचार्यों ने स्पष्ट सिद्धांत दिया है।
यदि कालपुरुष के अंगों को सूचित करने वाली किसी राशि में स्थित शुभ या पाप ग्रह स्वराशि या स्वनवांश में बैठे हों, तो उस अंग पर संबंधित चिन्ह जन्म से ही मौजूद रहने की संभावना बढ़ जाती है।
यदि वही ग्रह अपनी राशि या अपने नवांश में न हों, तो वे अपने दशा या अंतर्दशा के काल में उस अंग में घाव, रोग या निशान के रूप में फल दे सकते हैं। इस प्रकार कालपुरुष के अंग, राशि और ग्रहबल को मिलाकर शरीर पर होने वाली सूक्ष्म घटनाओं का समय भी अनुमानित किया जा सकता है।
ज्योतिष ग्रंथों में जहाँ कहीं कालपुरुष का उल्लेख आता है, वहाँ सूर्यादि ग्रहों का उसके व्यक्तित्व के साथ भी स्पष्ट संबंध जोड़ा गया है। ग्रहबल केवल आकार पर नहीं बल्कि आचरण और भूमिका पर भी असर डालता है।
इस प्रकार ग्रहों के बल से कालपुरुष का बाह्य व्यक्तित्व, उसकी भूमिका और जातक का जीवन पथ दोनों प्रभावित होते हैं।
यदि जन्मकुंडली में सूर्य अधिक बलवान हो तो कालपुरुष कुछ विशेष शारीरिक और स्वभावगत लक्षणों से युक्त माना जाता है।
ऐसे कालपुरुष के केश थोड़ा घुंघराले, रूप और बुद्धि सुंदर, वाणी गंभीर और प्रभावशाली होती है। ऊँचाई सामान्य या मध्यम, नेत्र में लालिमा, स्वभाव में शौर्य, प्रताप, स्थिरमति और चंचलता का अभाव देखा जाता है। शरीर पर लाल और श्याम वर्ण का मिश्रण दिख सकता है। पैर थोड़े छिपे हुए या कम प्रकट, पित्त की प्रवृत्ति अधिक, हड्डियों में अच्छा बल, शरीर चौकोर और व्यक्तित्व अत्यंत गंभीर माना जाता है।
बलवान चन्द्रमा कालपुरुष को शांत, कोमल और आकर्षक बनाता है।
ऐसा कालपुरुष शोभायुक्त नेत्र से युक्त, मधुर बोलने वाला, गोरा या स्वच्छ वर्ण वाला तथा शरीर से थोड़ा कृश माना जाता है। युवावस्था वाली आभा, छोटे काले घुंघराले बाल, विद्वत्ता, मृदु स्वभाव, सत्त्वगुण की प्रधानता, सुंदरता और वात कफ प्रकृति का मिश्रण दिखाई देता है।
मित्रों से अत्यधिक प्रेम, रक्त में बल, कुछ हद तक घृणा की प्रवृत्ति और अपने से अधिक आयु वाली स्त्रियों के प्रति आकर्षण का संकेत भी चन्द्र प्रधान कालपुरुष में मिलता है। सफेद वस्त्रों और स्वच्छता के प्रति रुझान भी इसी से जुड़ा है।
जब मंगल बलवान हो तो कालपुरुष तेज, सक्रिय और कुछ हद तक उग्र स्वभाव वाला होता है।
ऐसी स्थिति में कद अपेक्षाकृत छोटा, नेत्र पिंगल, शरीर मजबूत और तेजस्वी, जली हुई अग्नि जैसी आभा, चंचलता, चर्बी में अच्छा बल और लाल वस्त्रों की पसंद दिखाई देती है। स्वभाव से चतुर, शूर, सिद्ध वचन वाला, बाल छोटे घुंघराले और चमकदार, पित्त प्रकृति से युक्त, तमोगुण की हल्की छाया, पराक्रमी, संघर्षप्रिय और युद्ध कौशल में निपुणता का संकेत भी मिलता है।
वर्ण सफेद पर लालिमा की आभा या सफेद रंग के प्रति विशेष आकर्षण भी मंगल प्रधान व्यक्ति में देखा जाता है।
बलवान बुध कालपुरुष को अत्यंत अनुकूलनशील और कुशल बनाता है।
ऐसे कालपुरुष की आँखें अपेक्षाकृत बड़ी लालिमा लिए हुए, वाणी मधुर और स्पष्ट, वर्ण दूर्वा के समान हरित कृष्ण हो सकता है। त्वचा में अच्छी मजबूती, रजोगुण की प्रबलता, स्वच्छता प्रेम, संयत और स्पष्ट वचन, त्रिदोषात्मक प्रकृति यानी वात पित्त कफ का संतुलित मिश्रण उसकी विशेषता बनते हैं।
मन प्रसन्न, कद मध्यम, देह गोलाई वाली, त्वचा पर नसों की उपस्थिति स्पष्ट, वेश और वाणी बदलकर सब से मेल खाने की क्षमता और हरे रंग के वस्त्रों से लगाव भी बुध के प्रभाव से जुड़ा हुआ है।
जब बृहस्पति जन्म के समय अधिक प्रभावी हो तो कालपुरुष में स्थिरता और गरिमा दोनों आती हैं।
ऐसा कालपुरुष हल्के पीतवर्ण नेत्र और कर्ण वाला, सिंह के समान गंभीर शब्द वाला, सत्त्व प्रधान, तपे हुए सोने जैसा शरीर और वर्ण रखने वाला माना जाता है। छाती चौड़ी और उन्नत, कद तुलनात्मक रूप से लघु पर व्यक्तित्व ऊँचा, धर्म में रुचि, नम्रता, चतुराई, स्थिर और उत्कृष्ट दृष्टि, क्षमाशीलता और पीले वस्त्रों से प्रेम उसकी पहचान है।
कफ प्रकृति के गुण और चर्बी में बल की अनुभूति भी बृहस्पति की प्रबलता का परिणाम माने जाते हैं।
बलवान शुक्र कालपुरुष को सौंदर्य, आकर्षण और भोग की क्षमता से भर देता है।
ऐसा कालपुरुष मनोहर स्वरूप वाला, लंबे हाथ, विस्तृत वक्ष और मुख वाला, वीर्य की अधिकता, चेष्टावान और सक्रिय माने जाते हैं। बाल काले, घुंघराले, पतले और कुछ लंबे, दूर्वा समान श्यामल वर्ण, काम प्रवृत्ति, वात कफ प्रकृति, अत्यधिक सौभाग्य, अनेक रंगों के वस्त्रों का प्रेम, रजोगुण की प्रधानता और केलिकुशल अर्थात काम कला में निपुणता इन सबका मेल शुक्र की प्रधानता से दिखता है।
नेत्र बड़े और आकर्षक, कन्धे मजबूत और समतल होते हैं।
जब जन्मकुंडली में शनि अधिक बलवान हो या लग्न पर उसका प्रभाव तीव्र हो तो कालपुरुष का स्वरूप अधिक कठोर और गंभीर हो जाता है।
ऐसे में नेत्र गहरे कपिल, शरीर पतला और लंबा, नसें उभरी हुई, स्वभाव से आलसी, वर्ण काला या गहरा श्याम, वात प्रधान प्रकृति, चुगलखोरी की प्रवृत्ति, स्नायुओं में बल, कुछ हद तक निर्दयता और मूर्खतापूर्ण आचरण की संभावना भी देखी जाती है।
नाखून और दाँत मोटे, वेश मलिन, चेष्टाहीनता, अपवित्रता की ओर झुकाव, तामसिक प्रकृति, भयप्रद स्वरूप, क्रोधी स्वभाव, वृद्ध जैसी छवि और काले वस्त्रों से प्रेम भी शनि प्रधान कालपुरुष की लक्षणावली का हिस्सा हो सकते हैं।
कालपुरुष की कार्यकुशलता, यानी दिन या रात में किस समय अधिक बल रहता है, यह भी ग्रहबल से जुड़ा हुआ है।
इसी सिद्धांत से यह भी समझा जा सकता है कि किस जातक को दिन के कौन से समय में महत्वपूर्ण कार्य करने से सहज सहयोग मिलता है।
कालपुरुष के खानपान पर भी ग्रहों का आधिपत्य माना गया है। किसी ग्रह की प्रबलता से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि किस प्रकार का स्वाद या भोजन उसे प्रिय होगा।
इस मानक से कालपुरुष के माध्यम से जातक की भोजन रुचि और उससे जुड़ी स्वास्थ्य प्रवृत्तियों को भी समझा जा सकता है।
जन्मकुंडली में ग्रहबल केवल रूप और भोजन तक सीमित नहीं बल्कि स्त्रीसुलभ, नपुंसक या पुरुषत्व गुणों पर भी प्रभाव डालता है।
यह विभाजन केवल बाहरी लिंग पहचान नहीं बल्कि भीतर की ऊर्जा और व्यवहार की दिशा पर भी संकेत देता है।
सम्पूर्ण विचार से यह स्पष्ट होता है कि कालपुरुष कोई केवल दार्शनिक कल्पना नहीं है। यह वह सूक्ष्म मानव रूप समय है जिसमें ग्रह, राशि, भाव, शरीर और मन सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।
जब किसी जातक की कुंडली देखी जाती है, तो उसी क्षण की कालपुरुष संरचना के साथ उसका सूक्ष्म मिलान भी हो रहा होता है, चाहे वह सीधे शब्दों में कहा जाए या नहीं। शरीर के अंग, रोग, निशान, स्वभाव, आत्मबल, सुख, दुःख, भोजन रुचि, दिन रात की ऊर्जा और यहाँ तक कि स्त्रियोचित या पुरुषत्व गुण भी इन सब के मेल से समझ में आते हैं।
जो साधक कालपुरुष के इस गहन सिद्धांत को धैर्य से समझता है, वह केवल फलादेश में ही नहीं बल्कि स्वयं के शरीर, मन और कर्म की दिशा को भी अधिक स्पष्ट रूप से देख पाता है और उचित जीवनशैली, साधना तथा व्यवहार से अपने जीवन को संतुलित कर सकता है।
क्या कालपुरुष केवल रूपक है या व्यावहारिक ज्योतिषीय उपकरण भी है
कालपुरुष की संकल्पना वेदों के विराट पुरुष और कालतत्त्व से निकली है, पर ज्योतिष में इसे व्यावहारिक रूप से ग्रह, राशि और शरीर के अंगों के साथ जोड़ा गया है। इसीलिए रोग, चिन्ह, स्वभाव और आत्मबल समझने में यह प्रत्यक्ष सहायक बन जाता है।
आत्मा, मन, सत्त्व और सुख जैसी सूक्ष्म अवस्थाओं को ग्रहों से क्यों जोड़ा गया है
क्योंकि सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और राहु मानव अनुभव के अलग अलग स्तरों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी स्थिति और बल से स्पष्ट दिखने लगता है कि जातक का आत्मबल, मन, ज्ञान, वाणी, सुख और अहं किस दिशा में काम कर रहे हैं।
द्रेष्काण के आधार पर कालपुरुष के अंग देखने का व्यावहारिक लाभ क्या है
द्रेष्काण से यह पता लगाया जा सकता है कि शरीर के किस भाग पर चोट, रोग या विशेष चिन्ह की संभावना अधिक है। लग्न किस द्रेष्काण में है और वहाँ कौन से ग्रह हैं, यह देखने से शरीर और स्वास्थ्य से जुड़ी सूक्ष्म बातें भी फलादेश में शामिल की जा सकती हैं।
शुभ और पाप ग्रहों से बनने वाले तिल, मस्सा या घाव जन्म से ही रहते हैं या बाद में आते हैं
यदि संबंधित ग्रह अपनी ही राशि या स्वनवांश में हों तो चिन्ह जन्म के साथ ही उपस्थित हो सकते हैं। यदि ऐसा न हो तो उस ग्रह की दशा या अंतर्दशा के समय, किसी घटना के माध्यम से या स्वाभाविक रूप से वे निशान या रोग प्रकट हो सकते हैं।
कालपुरुष के कालबल और भोजन रुचि को जानकर साधक को क्या लाभ होता है
यह समझकर कि कौन से ग्रह दिन या रात में कालपुरुष को बल देते हैं और कौन सा स्वाद किस ग्रह की प्रबलता से जुड़ा है, साधक अपने लिए अनुकूल समय और आहार चुन सकता है। इससे स्वास्थ्य, साधना और कार्यक्षमता तीनों को धीरे धीरे बेहतर दिशा में ले जाया जा सकता है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 32
इनसे पूछें: विवाह, करियर, व्यापार, स्वास्थ्य
इनके क्लाइंट: छ.ग., उ.प्र., म.प्र., दि.
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