By पं. नरेंद्र शर्मा
समय और काल के स्वरूप को समझना: ज्योतिषीय गणना और मुहूर्तों के लिए आधार

ज्योतिष केवल ग्रहों और राशियों का शास्त्र नहीं बल्कि काल को समझने की सूक्ष्म विद्या भी है। वैदिक दृष्टि में समय अपने आप में एक जीवंत शक्ति मानी गई है जो एक ओर सृष्टि का पोषण करती है और दूसरी ओर उसके लय का कारण भी बनती है। समय का सही ज्ञान न हो तो गणना, मुहूर्त, युगचक्र और यहाँ तक कि साधारण पंचांग तक की विश्वसनीयता कमज़ोर हो जाती है।
प्राचीन मनीषियों ने काल को दो रूपों में समझाया। एक वह काल जो लोकों का अंत करता है, जिसे केवल अनुभूत किया जा सकता है और दूसरी वह कलानात्मक धारणा, जो विभाजित होकर मापी जा सकती है। आगे चलकर इसी मापनीय काल को स्थूल और सूक्ष्म दो वर्गों में बाँटकर ज्योतिषीय गणना का आधार बनाया गया।
एक प्रसिद्ध परिभाषा में कहा गया है कि एक प्रकार का काल संसार के विनाश से संबंधित है और दूसरा प्रकार कलानात्मक है, जिसे भागों में बाँटकर जाना जा सकता है। यह कलानात्मक समय दो प्रकार का माना गया।
स्थूल काल वह है जिसे मापा जा सके, जैसे घड़ी, दिन, मास या वर्ष। यह मूर्त है क्योंकि इसे गणना में बाँधा जा सकता है।
सूक्ष्म काल वह स्तर है जहाँ समय का प्रवाह तो है, पर उसे साधारण साधनों से नापा नहीं जा सकता। यह अमूर्त है और केवल दार्शनिक या ध्यान की भाषा में ही समझा जाता है।
ज्योतिष शास्त्र उस स्थूल काल को अत्यन्त सूक्ष्म इकाइयों तक विभाजित करके ग्रहों, तिथियों, नक्षत्रों और युगों की गणना करता है, ताकि मानव जीवन की लय को सही संदर्भ में रखा जा सके।
ज्योतिष में काल की सबसे सूक्ष्म व्यावहारिक इकाई प्राण या असुकाल मानी गई है।
स्वस्थ व्यक्ति सुखासन में बैठकर जितने समय में एक बार श्वास लेता और छोड़ता है, उस अवधि को प्राण कहते हैं। प्राचीन गणना में
इस प्रकार 1 दिन रात = 60 × 60 × 6 = 21600 प्राण माने गए। आधुनिक समय के अनुसार 1 दिन रात = 24 घंटे = 86400 सेकण्ड होते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि
अर्थात एक स्वस्थ व्यक्ति को शांत बैठकर एक पूरा श्वास चक्र लेने में लगभग चार सेकण्ड लगते हैं।
प्राचीन काल में पल को भार की इकाई के रूप में भी उपयोग किया जाता था।
पलक झपकने की अवधि को निमेष कहा गया। निमेष से ऊपर की श्रेणियाँ इस प्रकार रखी गईं।
इस प्रकार 1 नक्षत्र दिन = 30 × 2 × 30 × 30 × 18 = 972000 निमेष के बराबर माना गया।
सूर्यसिद्धान्त के अनुसार यही संरचना प्रमाणित मानी गई है, जबकि स्कन्द पुराण में थोड़ी भिन्न संरचना मिलती है जिसमें
उस गणना से 1 दिन रात = 40500 निमेष बनते हैं। चूँकि सूर्यसिद्धान्त विशुद्ध ज्योतिषीय ग्रन्थ है और वहाँ गणना स्वयं ज्योतिषी द्वारा की गई है, इसलिए व्यवहार में उसी को अधिक प्रमाणिक आधार माना जाता है, स्कन्द पुराण में दिए गए अंकों को अनुवाद की सम्भावित त्रुटि मानकर सावधानी से देखा जाता है।
इन दोनों दृष्टिकोणों को समेटकर एक और महत्वपूर्ण संबंध निकाला गया।
इस तरह मानव श्वास, पलक झपकना और घड़ी की टिक एक ही समय की अलग अलग परतों में बँध जाते हैं।
ज्योतिष में मास भी एकरूप नहीं है बल्कि चार मुख्य प्रकार से देखा जाता है।
| मास का प्रकार | आधार क्या है | सामान्य अवधि |
|---|---|---|
| सौर मास | सूर्य की संक्रांति से संक्रांति तक | लगभग 30 से 31 दिन |
| चन्द्र मास | चन्द्र के दो पक्षों का योग | लगभग 29 से 30 दिन |
| नाक्षत्र मास | चन्द्र का अश्विनी से रेवती तक भ्रमण | लगभग 27 दिन |
| सावन मास | व्यवहारिक तीस दिन का मास | निश्चित 30 दिन |
सौर मास का आरम्भ सूर्य की संक्रांति से होता है। सूर्य मंडल का केंद्र जिस समय एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, उसी क्षण दूसरी राशि की संक्रांति मानी जाती है।
एक संक्रांति से अगली संक्रांति के मध्य का समय सौर मास कहलाता है। कुल 12 राशियों के आधार पर 12 ही सौर मास होते हैं। इनमें से कोई लगभग 30 या 31 दिन का होता है, कभी कभी 29 या 32 दिन के आसपास भी जा सकता है।
सूर्य जब पृथ्वी के निकट होता है, लगभग जनवरी के प्रारंभ में तब उसकी कोणीय गति तेज होती है, इसलिए वह एक राशि जल्दी पार करता है और सौर मास छोटा हो जाता है। जुलाई के आसपास सूर्य पृथ्वी से अपेक्षाकृत दूर होने पर कोणीय गति मंद होती है, फलतः सौर मास लंबा हो जाता है।
औसत रूप में सौर मास की अवधि लगभग 30.44 सौर दिन मानी जाती है।
चन्द्रमा की ह्रास वृद्धि वाले दो पक्षों का योग एक चन्द्र मास कहलाता है। यह दो प्रकार से देखा जाता है।
तिथियों की ह्रास वृद्धि के कारण चन्द्र मास कभी 29, 28, 27 या 30 दिन का भी हो सकता है।
जिस समय में चन्द्रमा अश्विनी से लेकर रेवती तक सभी 27 नक्षत्रों की यात्रा पूरी करता है, वह नाक्षत्र मास कहलाता है। यह लगभग 27 दिनों का होता है।
सावन मास सीधे 30 दिनों से बनाया जाता है। यह किसी भी तिथि से शुरू होकर तीसवें दिन समाप्त होता है। व्यापार, लेनदेन और व्यवहार में सामान्यतः इसी सावन मास का उपयोग होता है।
सावन मास भी कभी सौर आधार पर, कभी चन्द्र आधार पर गिना जाता है।
तिथि चन्द्र और सूर्य के बीच कोणीय अंतर का माप है।
जब चन्द्रमा सूर्य के अत्यन्त निकट पहुँच जाता है और सूर्य तथा पृथ्वी के बीच में स्थित होता है तब अमावस्या होती है। अमावस्या के बाद चन्द्रमा सूर्य से पूर्व दिशा की ओर आगे बढ़ने लगता है।
जब सूर्य और चन्द्र के बीच लगभग 120 कला का अंतर होता है तब पहली तिथि यानी प्रथमा पूर्ण मानी जाती है।
इसके बाद 1800 से 1920 कला तक आगे रहने पर फिर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, 1920 से 2040 कला तक द्वितीया और इसी प्रकार क्रम चलता है।
पूर्णिमा के बाद चन्द्रमा प्रतिदिन सूर्यास्त के समय से लगभग दो घड़ी यानी लगभग 48 मिनट पीछे निकलता जाता है। यही कारण है कि चन्द्रमा के उदय अस्त का समय प्रतिदिन लगभग समान अंतर से बदलता दिखाई देता है।
परंपरागत चन्द्र मासों के नाम हैं।
चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष या मृगशिरा, पौष, माघ और फाल्गुन।
ये नाम अमावस्या या पूर्णिमा से जुड़े चन्द्र चक्र के अनुसार तय किए जाते हैं और इन्हीं के आधार पर धार्मिक पर्वों की तिथियाँ निर्धारित होती हैं।
ज्योतिष और पुराण परम्परा में मनुष्यों के समय से ऊपर दिव्य समय की भी कल्पना की गई है।
मनुष्यों का एक सौर वर्ष देवताओं का एक दिन माना गया है। उत्तरायण देवताओं का दिन और दक्षिणायण उनकी रात कही गई है। पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव देवताओं का स्थान और दक्षिणी ध्रुव असुरों का स्थान माना जाता है।
साल में दो बार, विषुव के समय, दिन और रात बराबर होते हैं। छह महीने सूर्य विषुवत के उत्तर और छह महीने दक्षिण रहते हैं।
जब सूर्य उत्तर की ओर होता है, उत्तरी ध्रुव पर लगातार छह महीने सूर्य दिखाई देता है, जबकि दक्षिणी ध्रुव पर वह नहीं दिखता। इस अवधि को देवताओं का दिन और दक्षिण पक्ष की रात कहा जाता है।
जब सूर्य दक्षिण की ओर रहता है तब दक्षिणी ध्रुव पर निरंतर प्रकाश और उत्तरी ध्रुव पर अंधकार रहता है, इसलिए यह अवधि देवताओं की रात और असुरों के दिन के रूप में समझी गई है। इस दृष्टि से मनुष्य के 12 मास देवताओं अथवा असुरों के एक अहोरात्र के समान बताए गए हैं।
देवताओं का 1 दिन यानी 1 सौर वर्ष के आधार पर
आगे चलकर युगों की अवधि दिव्य वर्षों से इस प्रकार व्यक्त की गई।
एक चतुर्युग में चार युग होते हैं।
हर युग के आरम्भ और अंत में संधि मानी गई है।
जैसे एक अहोरात्र में प्रातः और सायं दो संध्याएँ हैं, वैसे ही हर युग के आरम्भ में आदि संध्या और अंत में संध्यांश होता है। प्रत्येक युग की दोनों संधियाँ मिलकर युग के छठे भाग के बराबर मानी गई हैं, यानी एक संध्या उसके बारहवें भाग जितनी।
इस प्रकार
इन संध्याओं को मिलाकर ही ऊपर दी गई कुल अवधि बनती है।
71 चतुर्युगों का एक मन्वंतर माना गया है और हर मन्वंतर के अंत में सतयुग के समान एक संध्या भी होती है, जिसमें जलप्रलय का वर्णन मिलता है।
संधि सहित 14 मन्वंतर मिलकर एक कल्प बनाते हैं। कल्प के आरम्भ में भी सतयुग के बराबर एक संध्या होती है।
इस प्रकार एक कल्प में
मनुस्मृति के अनुसार
कुल मिलाकर
आर्यभट की आर्यभटीय में 1 मनु = 72 चतुर्युग और 14 मनुओं के योग से 1008 चतुर्युग का कल्प वर्णित है, जबकि सूर्यसिद्धान्त में 1000 चतुर्युग का कल्प माना गया है। ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्यसिद्धान्त की गणना अधिक प्रचलित और स्वीकार्य मानी जाती है।
एक कल्प ब्रह्मा के एक दिन के समान और उतनी ही अवधि ब्रह्मा की रात कही गई है। प्राचीन कथन के अनुसार वर्तमान समय में ब्रह्मा की आधी आयु व्यतीत हो चुकी है और शेष आधी का यह प्रथम कल्प चल रहा है।
यह वर्तमान कल्प श्वेतवराह कल्प कहलाता है। इसमें अब तक छह मन्वंतर बीत चुके हैं और सातवें मन्वंतर वैवस्वत के भीतर 27 महायुग पूरे हुए हैं, अट्ठाईसवें महायुग का सतयुग समाप्त हो चुका है और वर्तमान में कलियुग के कुछ हजार वर्ष बीत चुके हैं।
एक सौर वर्ष में 12 सौर मास और लगभग 365.2585 मध्यम सावन दिन होते हैं।
12 चन्द्रमास मिलकर लगभग 354.36705 मध्यम सावन दिन देते हैं। इस प्रकार एक चन्द्र वर्ष सौर वर्ष से लगभग 10.89170 दिन छोटा होता है।
लगभग 33 महीनों में यह अंतर एक पूरे चन्द्रमास के बराबर हो जाता है। जिस सौर वर्ष में यह अंतर एक महीने के बराबर हो जाए, उस वर्ष में 12 के स्थान पर 13 चन्द्रमास स्वीकार किए जाते हैं। इस अतिरिक्त मास को अधिमास या मलमास कहा जाता है।
यदि अधिमास का सिद्धांत न रखा जाए तो चन्द्रमास के आधार पर मनाए जाने वाले पर्व वर्ष दर वर्ष ऋतु से खिसकते चले जाएँगे और कुछ दशकों में उनकी ऋतु पहचान समाप्त हो जाएगी। भारतीय पंचांग में अधिमास के माध्यम से ही सौर और चन्द्र गणना का समन्वय स्थापित किया गया है।
अधिमास की तरह ही कभी कभी क्षयमास भी बन जाता है।
नवम्बर से फरवरी तक सूर्य की कोणीय गति अपेक्षाकृत तेज होती है, जिससे संक्रांतियों के बीच समय अंतर कम हो जाता है। यदि किसी चन्द्रमास में अमावस्या का अंत संक्रांति से थोड़ी ही पहले हो जाए और उसी चन्द्र चक्र के भीतर दो संक्रांतियाँ आ जाएँ तो उस स्थिति में एक मास का क्षय माना जाता है।
क्षयमास केवल कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष और माघ जैसे मासों में, अर्थात नवम्बर से फरवरी के बीच संभव होता है। यह विशेष स्थिति विरल होती है परन्तु पंचांग में उसका विशेष ध्यान रखना पड़ता है।
प्रत्येक घड़ी या होरा का स्वामी भी किसी ग्रह को माना गया है। इसके लिए ग्रहों का क्रम पृथ्वी से दूरी के आधार पर इस तरह रखा गया।
शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्रमा।
इसी क्रम से होरा के स्वामी बदलते हैं। मान लें पहले घंटे का स्वामी शनि है।
जिस दिन के पहले घंटे का स्वामी जो ग्रह होता है, उसी के नाम से उस दिन का नाम रखा गया।
यदि किसी दिन पहले घंटे का स्वामी शनि हो तो वह दिन शनिवार कहलाता है। शनिवासर का दूसरा घंटा गुरु का, तीसरा मंगल का और इसी क्रम से चलते चलते
अब जो 25वाँ घंटा होगा, वह अगले दिन का पहला घंटा रहेगा। इस पहले घंटे का स्वामी क्रम से सूर्य होगा, इसीलिए शनिवार के बाद रविवार आता है।
रविवार के 25वें घंटे का स्वामी क्रम से चन्द्रमा होता है, इसलिए उसके अगले दिन का नाम सोमवार पड़ा। इसी नियम से
आदि क्रम बनता है।
ग्रह क्रम में शनि से चौथा ग्रह सूर्य और सूर्य से चौथा चन्द्रमा है। इसलिए प्रत्येक दिन का स्वामी उसके पिछले दिन के स्वामी से चौथा ग्रह होता है। यह सरल नियम वार क्रम को स्पष्ट कर देता है।
प्राचीन विचारकों ने यह भी देखा कि चन्द्र वर्ष और सौर वर्ष के बीच एक दीर्घकालिक चक्र बनता है।
यूनानी खगोलविद मिटन ने लगभग 433 ईसा पूर्व में पाया कि
इन दोनों के बीच केवल लगभग एक घंटे से भी कम का अंतर रहता है। इस 19 वर्ष के पैटर्न को मैटोनिक चक्र कहा गया।
इससे यह स्पष्ट हुआ कि हर 19 सौर वर्षों में लगभग 235 चन्द्रमास होते हैं, जबकि सामान्यतः 19 × 12 = 228 सौर मास होते। यानी 7 चन्द्रमास अतिरिक्त हो जाते हैं। यदि इस अंतर की परवाह न की जाए तो लगभग 32.5 सौर वर्षों में 33.5 चन्द्र वर्ष हो जाएँगे।
ऐसी स्थिति में यदि कोई पर्व, जैसे दीपावली, किसी समय नवम्बर में आता है तो 19 वर्ष बाद वह लगभग सात महीने पहले खिसककर अप्रैल के आसपास पहुँच सकता है। भारतीय पंचांग में अधिमास आदि चुनकर इसी समन्वय को साधा जाता है, ताकि पर्व सदैव अपनी उचित ऋतु के आसपास ही रहें।
आकाश में सूर्य जिस मार्ग से चलता हुआ प्रतीत होता है, उसे कान्तिवृत्त या क्रान्तिवृत्त कहा जाता है। इस वृत्त को बारह समान भागों में बाँट दिया जाए तो प्रत्येक भाग को राशि कहा जाता है।
यह पूरा वृत्त जिस पर नवग्रह घूमते दिखाई देते हैं, वही राशिचक्र है। एक प्रकार से यह पृथ्वी की कक्षा के चारों ओर का 360 अंश वाला परिपथ है, जिसे समान 30 अंश के बारह खण्डों में विभाजित किया जाता है।
इस प्रकार
राशियों का क्रम और उनका अंश इस प्रकार माना जाता है।
| अंश सीमा | राशि का नाम |
|---|---|
| 0 से 30 | मेष |
| 30 से 60 | वृष |
| 60 से 90 | मिथुन |
| 90 से 120 | कर्क |
| 120 से 150 | सिंह |
| 150 से 180 | कन्या |
| 180 से 210 | तुला |
| 210 से 240 | वृश्चिक |
| 240 से 270 | धनु |
| 270 से 300 | मकर |
| 300 से 330 | कुम्भ |
| 330 से 360 | मीन |
यह राशिचक्र ही वह मंच है जिस पर ग्रहों की गति को देखकर कुंडली बनाई जाती है।
आकाश में तारों के समूह से जो अलग अलग आकार बनते हैं, जैसे अश्व, शकट, सर्प या हाथ, उन्हें नक्षत्र कहा जाता है। एक अर्थ में नक्षत्र आकाशीय दूरी मापने की इकाइयाँ भी हैं, जैसे पृथ्वी पर मील या कोस।
राशिचक्र को 27 बराबर भागों में बाँटने पर 27 नक्षत्र बनते हैं।
पृथ्वी के 360 अंश के परिपथ को नक्षत्रों के लिए 27 भागों में बाँटा गया है, इसलिए
प्रत्येक नक्षत्र को आगे 4 चरण या पाद में विभाजित किया गया।
चूँकि 1 राशि 30 अंश की होती है, इसलिए सवा दो नक्षत्र या 9 चरण मिलकर एक राशि का पूरा विस्तार भरते हैं।
नक्षत्रों के नाम और उनके अधिष्ठाता देवता परम्परा में इस प्रकार दिए जाते हैं।
अभिजीत को 28वाँ विशेष नक्षत्र माना गया है। यह उत्तराषाढ़ा के अंतिम 15 घटी और श्रवण के प्रारम्भिक 4 घटी, कुल 19 घटी के मान वाला है। अभिजीत नक्षत्र लगभग सभी कार्यों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
नक्षत्रों के फलादेश में इनके अधिष्ठाता देवताओं के स्वभाव को आधार माना जाता है। जिस देवता की प्रकृति जैसी, उस नक्षत्र की वृत्ति भी प्रायः वैसी ही मानी जाती है।
समय की यह विस्तृत संरचना, निमेष से लेकर प्राण, पल, दिन, मास, वर्ष और कल्प तक, केवल गणित का अभ्यास नहीं है। यह दिखाती है कि ज्योतिष में हर घटना, हर मुहूर्त और हर युग को काल के सही संदर्भ में देखे बिना निर्णय अधूरा रहता है।
जो जातक इन इकाइयों को समझ लेता है, वह पंचांग, तिथि, वार, नक्षत्र, अधिमास, युग और कल्प की भाषा को अधिक सहजता से समझ पाता है। इससे न केवल गणित सशक्त होता है बल्कि साधना, त्योहारों की ऋतु, होरा का चयन और दीर्घकालिक दृष्टि भी स्पष्ट होती जाती है।
काल को सही रूप में समझना किसी भी ज्योतिष साधक के लिए वह आधार है जिस पर आगे ग्रह, राशियाँ, भाव और दाशाएँ अर्थपूर्ण रूप से खड़ी हो सकती हैं।
प्राण, पल और निमेष को जानने से साधारण साधक को क्या व्यावहारिक लाभ होता है
इन इकाइयों से पता चलता है कि प्राचीन गणना सीधे मानव शरीर की लय, श्वास और पलक झपकने से जुड़ी है। इससे ध्यान, प्राणायाम और मुहूर्त को एक ही धारा में समझना सरल होता है और श्वास के साथ समय की गिनती सहज बनती है।
सौर मास, चन्द्र मास, नाक्षत्र मास और सावन मास में से किसे अधिक महत्वपूर्ण मानना चाहिए
यह उपयोग पर निर्भर है। सौर मास ऋतु और सूर्य की स्थिति बताते हैं, चन्द्र मास व्रत, पर्व और तिथियों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं, नाक्षत्र मास नक्षत्र आधारित गणना के लिए और सावन मास व्यवहारिक गणना के लिए उपयोगी होता है। सभी अपने स्थान पर आवश्यक हैं।
अधिमास और क्षयमास के बिना पंचांग में क्या समस्या उत्पन्न हो सकती है
यदि अधिमास न जोड़ा जाए और क्षयमास का ध्यान न रखा जाए तो चन्द्र कैलेंडर धीरे धीरे ऋतुओं से कट जाएगा। कुछ दशकों में ही पर्व अलग अलग ऋतुओं में पहुँच जाएंगे और उनका ऋतु से जुड़ा प्रतीकात्मक अर्थ कमज़ोर हो जाएगा।
वारों के क्रम में ग्रहों का चौथा चौथा नियम क्यों अपनाया गया
ग्रहों का क्रम पृथ्वी से दूरी के अनुसार रखा गया और होरा स्वामित्व उसी क्रम से चलता है। पहले घंटे के स्वामी से चौथे ग्रह को अगले दिन का स्वामी मानने से सातों ग्रह बारी बारी से सप्ताह के सातों दिन का शासन करते हैं और ग्रह, वार और होरा के बीच एक सुसंगत संरचना बनती है।
राशि और नक्षत्र दोनों की जानकारी साथ में क्यों ज़रूरी मानी जाती है
राशि 30 अंश का बड़ा खंड है और नक्षत्र 13 अंश 20 कला का सूक्ष्म खंड। ग्रह किस राशि में है, यह उसका सामान्य स्वभाव दिखाता है, जबकि किस नक्षत्र और चरण में है, यह प्रकृति के गहरे गुण और फलादेश की बारीकियाँ बताता है। दोनों को साथ देखने से निर्णय अधिक सटीक होता है।
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