By पं. अमिताभ शर्मा
केतु देव का प्रभाव चारों चरण और नाम से नक्षत्र तय करने के भ्रम का संपूर्ण वैदिक समाधान

वैदिक ज्योतिष में किसी भी नवजात शिशु के नामकरण का प्रथम और सर्वोपरि आधार उसकी जन्म कालीन चंद्र राशि और नक्षत्र चरण होता है। मूल नक्षत्र संपूर्ण भचक्र का उन्नीसवां और अत्यंत रहस्यमयी व आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली नक्षत्र है जो धनु राशि में 0 अंश से आरंभ होकर 13 अंश 20 कला तक पूर्ण रूप से विस्तृत रहता है। इसके अंतर्गत कुल 4 चरण आते हैं और प्रत्येक चरण के लिए प्राचीन ऋषियों ने विशिष्ट ध्वनि बीजाक्षर निर्धारित किए हैं। मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले बालकों और बालिकाओं का नामकरण केवल इन्हीं शास्त्रीय अक्षरों से किया जाना चाहिए।
मूल नक्षत्र के अंतर्गत निर्धारित 4 मुख्य नामाक्षर इस प्रकार हैं: ये यो भा भी। जब शिशु को इन विशिष्ट बीजाक्षरों से युक्त नाम से पुकारा जाता है तो उसके मस्तिष्क की तंत्रिकाओं और आभा मंडल में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है जिससे उसकी शोध क्षमता दार्शनिक दृष्टि सत्य की खोज और पुरानी विकृतियों को समाप्त कर नव निर्माण करने के संकल्प में निरंतर वृद्धि होती है।
| नक्षत्र चरण | राशि एवं अंश विस्तार | चरण का नामाक्षर | नवमांश राशि | अधिष्ठाता देवता |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम चरण | धनु राशि 0 अंश से 3 अंश 20 कला | ये | मेष नवमांश | देवी निर्ऋति |
| द्वितीय चरण | धनु राशि 3 अंश 20 कला से 6 अंश 40 कला | यो | वृषभ नवमांश | देवी निर्ऋति |
| तृतीय चरण | धनु राशि 6 अंश 40 कला से 10 अंश | भा | मिथुन नवमांश | देवी निर्ऋति |
| चतुर्थ चरण | धनु राशि 10 अंश से 13 अंश 20 कला | भी | कर्क नवमांश | देवी निर्ऋति |
तालिका में दिए गए विवरण के अनुसार प्रथम चरण का नामाक्षर ये है जो धनु राशि और मेष नवमांश में आता है तथा इसमें देवगुरु बृहस्पति और मंगल का संयुक्त प्रभाव होने से तीव्र पराक्रम क्रांतिकारी चेतना और निर्भीक अनुसंधान क्षमता समाहित रहती है। द्वितीय चरण का नामाक्षर यो है जो धनु राशि और वृषभ नवमांश में जाकर शुक्र के प्रभाव से भौतिक साधनों के सदुपयोग और व्यावहारिक स्थिरता को प्राप्त करता है। तृतीय चरण का नामाक्षर भा है जो धनु राशि और मिथुन नवमांश में बुध के प्रभाव से उत्कृष्ट बौद्धिक प्रखरता तार्किक विश्लेषण और दार्शनिक संवाद कौशल को दर्शाता है। चतुर्थ चरण का नामाक्षर भी है जो धनु राशि और कर्क नवमांश में पहुंचकर जल तत्व की गहराई के साथ चंद्रमा और गुरु के प्रभाव से उच्च भावनात्मक संवेदनशीलता आध्यात्मिक करुणा और मातृवत पोषण भाव से युक्त होता है। जब जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र चरण में गोचर कर रहा होता है उसी चरण के अक्षर को बच्चे का वास्तविक जन्म नामाक्षर माना जाता है।
सनातन वैदिक परंपरा में मानव जीवन को संस्कारित और तेजस्वी बनाने के लिए 16 पवित्र संस्कारों का विधान किया गया है। जातकर्म के उपरांत संपन्न होने वाला नामकरण संस्कार शिशु के आध्यात्मिक और मानसिक विकास की आधारशिला है। वैदिक दर्शन में नाद ब्रह्म का सिद्धांत स्पष्ट करता है कि संपूर्ण दृश्य जगत सूक्ष्म ध्वनि तरंगों के संयोजन से संचालित होता है। जब किसी व्यक्ति को किसी विशिष्ट नाम से पुकारा जाता है तो वह शब्द ध्वनि बारंबार उसके अवचेतन मन को जाग्रत करती है।
कालपुरुष के चक्र में मूल नक्षत्र दोनों पैरों के तलवों पिंडलियों और मेरुदंड के मूल आधार केंद्र का प्रतिनिधित्व करता है। इस पावन नक्षत्र के अधिपति ग्रह मोक्ष वैराग्य और पराविद्या के कारक छाया ग्रह केतु हैं जबकि इसकी अधिष्ठात्री देवी समस्त बंधनों और अज्ञान को नष्ट करने वाली साक्षात देवी निर्ऋति हैं। निर्ऋति का अर्थ होता है वह शक्ति जो भौतिक जकड़न को तोड़कर आत्मा को रूपांतरित कर देती है। मूल का शाब्दिक अर्थ जड़ अथवा नींव होता है। इस नक्षत्र का पावन प्रतीक चिन्ह बंधे हुए जड़ों का गुच्छा अथवा अंकुश है जो यह दर्शाता है कि यह नक्षत्र किसी भी समस्या की गहराई तक उतरकर उसके मूल कारण को बाहर निकालने का सामर्थ्य रखता है। जब किसी शिशु का जन्म मूल नक्षत्र में होता है तो केतु की आध्यात्मिक गहराई और धनु राशि के स्वामी देवगुरु बृहस्पति का दिव्य ज्ञान मिलकर जातक को एक विलक्षण चिंतक शोधकर्ता और दार्शनिक बनाते हैं। यह जातक किसी भी बात को सतही रूप में स्वीकार नहीं करते और समाज में स्थापित पुरानी संकीर्ण मान्यताओं को तोड़कर एक नई व्यवस्था का सृजन करते हैं। इसलिए मूल नक्षत्र के बच्चों का नामकरण शास्त्र सम्मत अक्षरों पर ही होना चाहिए ताकि निर्ऋति की रूपांतरणकारी ऊर्जा और केतु का आत्मज्ञान जीवनभर उसका पोषण कर सके।
आधुनिक युग में इंटरनेट और पत्रिकाओं के सतही ज्ञान के कारण जनसामान्य में एक बहुत बड़ा भ्रम फैल गया है। अधिकांश लोग किसी व्यक्ति के केवल प्रचलित नाम अथवा स्कूल सर्टिफिकेट में दर्ज पुकार नाम के पहले अक्षर को देखकर उसका नक्षत्र मान लेते हैं। यह एक अत्यंत गंभीर भूल है जिसका वैदिक फलित ज्योतिष से कोई संबंध नहीं है। भारतीय ज्योतिष का स्पष्ट और अकाट्य नियम है कि नाम से नक्षत्र कभी नहीं निकाला जा सकता बल्कि नक्षत्र से नाम निकाला जाता है।
अनेक माता पिता बिना कुंडली देखे केवल अपनी पसंद से बच्चे का नाम भारत अथवा भीम रख देते हैं। बाद में वे समाचार पत्रों में भ अथवा भी अक्षर देखकर यह मान लेते हैं कि बच्चे का जन्म मूल नक्षत्र के तृतीय अथवा चतुर्थ चरण में हुआ है। यह धारणा पूरी तरह भ्रामक है। यह कतई आवश्यक नहीं है कि भारत या भीम नाम वाले व्यक्ति का जन्म मूल नक्षत्र में ही हुआ हो। बहुत संभव है कि उसके जन्म के समय चंद्रमा रोहिणी मघा हस्त विशाखा अथवा उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में गोचर कर रहा हो। यदि जन्म के समय चंद्रमा मघा नक्षत्र में था तो उसका वास्तविक जन्म नक्षत्र मघा ही कहलाएगा और उसके जीवन पर मघा के नियमों का प्रभाव रहेगा न कि मूल और देवी निर्ऋति का।
जब ऐसा व्यक्ति जीवन में आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए मूल नक्षत्र के उपाय करने लगता है अथवा बिना कुंडली जांचे लहसुनिया या पुखराज रत्न धारण कर लेता है तो उसे कोई लाभ नहीं मिलता बल्कि भारी मानसिक तनाव और ऊर्जा असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। विवाह हेतु नाड़ी मिलान गण मिलान महादशा और अंतर्दशा का प्रभाव तथा जीवन की दिशा का संपूर्ण विचार केवल और केवल जन्म कालीन चंद्र नक्षत्र से ही किया जाता है। पुकार नाम केवल सामाजिक व्यवहार का एक माध्यम है किंतु जातक का प्रारब्ध जन्म कालीन ग्रहों और नक्षत्रों की वास्तविक खगोलीय स्थिति से ही संचालित होता है।
शास्त्रों में नामकरण संस्कार को एक अत्यंत पवित्र यज्ञीय अनुष्ठान माना गया है। मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले बालक अथवा बालिका का नामकरण करते समय कुछ अनिवार्य वैदिक नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए।
यदि किसी बालक का नाम अज्ञानतावश बिना कुंडली देखे किसी अन्य अक्षर पर रख दिया गया है अथवा मूल नक्षत्र के गंडमूल प्रभाव से स्वास्थ्य अथवा परिवार में बाधाएं आ रही हों तो शास्त्रों में इसके लिए अत्यंत सरल और प्रभावी वैदिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| जन्म समय चंद्रमा के सटीक नक्षत्र चरण से ही नाम का चयन करें | केवल आधुनिक फैशन के आधार पर बिना कुंडली देखे नाम न रखें |
| प्रथम चरण में जन्म होने पर 27वें दिन गंडमूल शांति अवश्य कराएं | गंडमूल शांति किए बिना नामाक्षर के प्रभाव को हल्के में न लें |
| नाम का अर्थ गंभीर शोधपरक और गरिमापूर्ण होना चाहिए | निरर्थक कटु अथवा भ्रामक अर्थ वाले शब्दों का चयन न करें |
| बालक का नाम विषम अक्षरों वाला और बालिका का सम अक्षरों वाला रखें | पुकार नाम के पहले अक्षर से अपना भविष्यफल देखने की भूल न करें |
| नामकरण संस्कार शुभ मुहूर्त वार और सात्विक वातावरण में करें | रिक्ता तिथियों चतुर्थी नवमी चतुर्दशी अथवा भद्रा में नामकरण न करें |
जब किसी नवजात शिशु का नामकरण वैदिक गणित नक्षत्र सिद्धांत और नाद विज्ञान के आधार पर किया जाता है तो वह नाम उसके संपूर्ण जीवन के लिए एक दिव्य सुरक्षा कवच बन जाता है। वह केवल पुकारने का शब्द नहीं रहता बल्कि जीवन पर्यंत उसके अंतर्मन को ऊर्जावान बनाए रखने वाला एक शक्तिशाली मंत्र सिद्ध होता है। मूल नक्षत्र के स्वामी केतु और अधिष्ठात्री देवी निर्ऋति जीवन में गहन आत्मज्ञान सत्य का अनुसंधान और जटिलतम अवरोधों को जड़ से समाप्त करने का सामर्थ्य प्रदान करने वाले हैं। जब शिशु अपने नक्षत्र चरण के अनुकूल पावन ध्वनि को धारण करता है तो उसके भीतर की सुप्त प्रज्ञा शक्तियां बिना किसी अवरोध के जाग्रत होती हैं और वह समाज में एक प्रखर शोधकर्ता आध्यात्मिक मार्गदर्शक और अत्यंत सम्मानित नागरिक के रूप में प्रतिष्ठित होता है।
मूल नक्षत्र के बच्चों के नाम किन अक्षरों से शुरू होते हैं? मूल नक्षत्र के अंतर्गत आने वाले 4 प्रमुख नामाक्षर ये यो भा और भी हैं जो इसके चार चरणों से संबंधित हैं।
क्या किसी व्यक्ति के पुकार नाम से उसका जन्म नक्षत्र तय हो सकता है? पुकार नाम से जन्म नक्षत्र कभी तय नहीं हो सकता क्योंकि वास्तविक नक्षत्र केवल जन्म के समय चंद्रमा की खगोलीय स्थिति से निर्धारित होता है।
मूल नक्षत्र के स्वामी ग्रह और अधिष्ठाता देवता कौन हैं? मूल नक्षत्र के स्वामी ग्रह छाया ग्रह केतु हैं और इसकी अधिष्ठात्री देवी रूपांतरण की प्रतीक देवी निर्ऋति हैं।
मूल नक्षत्र का कौन सा चरण सर्वाधिक संवेदनशील माना जाता है? मूल नक्षत्र का प्रथम चरण वृश्चिक और धनु राशि के संधि स्थल पर होने के कारण तीव्र गंडांत और अभुक्त मूल कहलाता है जिसकी शांति अनिवार्य है।
मूल नक्षत्र के दोष निवारण के लिए कौन सा रुद्राक्ष धारण करना चाहिए? मूल नक्षत्र के जातकों के लिए नौ मुखी नेपाली रुद्राक्ष धारण करना अत्यंत शुभ माना गया है जो केतु के प्रभाव को संतुलित करके मानसिक शांति प्रदान करता है।
जन्म नक्षत्र मेरे बारे में क्या बताता है?
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