By पं. अभिषेक शर्मा
देवगुरु बृहस्पति का प्रभाव चारों चरण और नाम से नक्षत्र तय करने के भ्रम का संपूर्ण समाधान

वैदिक ज्योतिष में किसी भी नवजात शिशु के नामकरण का प्रथम और सर्वोपरि आधार उसकी जन्म कालीन चंद्र राशि और नक्षत्र चरण होता है। पूर्वभाद्रपद नक्षत्र संपूर्ण भचक्र का पच्चीसवां और अत्यंत रहस्यमयी तपस्वी व रूपांतरणकारी ऊर्जा से संपन्न नक्षत्र है जो कुंभ राशि में 20 अंश से आरंभ होकर मीन राशि में 3 अंश 20 कला तक पूर्ण रूप से विस्तृत रहता है। इसके अंतर्गत कुल 4 चरण आते हैं और प्रत्येक चरण के लिए प्राचीन ऋषियों ने विशिष्ट ध्वनि बीजाक्षर निर्धारित किए हैं। पूर्वभाद्रपद नक्षत्र में जन्म लेने वाले बालकों और बालिकाओं का नामकरण केवल इन्हीं शास्त्रीय अक्षरों से किया जाना चाहिए।
पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के अंतर्गत निर्धारित 4 मुख्य नामाक्षर इस प्रकार हैं: से सो दा दी। जब शिशु को इन विशिष्ट बीजाक्षरों से युक्त नाम से पुकारा जाता है तो उसके मस्तिष्क की तंत्रिकाओं और आभा मंडल में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है जिससे उसकी दार्शनिक प्रज्ञा तपस्या का बल त्याग की भावना और सत्य के मार्ग पर अडिग रहने के सामर्थ्य में निरंतर वृद्धि होती है।
| नक्षत्र चरण | राशि एवं अंश विस्तार | चरण का नामाक्षर | नवमांश राशि | अधिष्ठाता देवता |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम चरण | कुंभ राशि 20 अंश से 23 अंश 20 कला | से | मेष नवमांश | अज एकपाद रुद्र |
| द्वितीय चरण | कुंभ राशि 23 अंश 20 कला से 26 अंश 40 कला | सो | वृषभ नवमांश | अज एकपाद रुद्र |
| तृतीय चरण | कुंभ राशि 26 अंश 40 कला से 30 अंश | दा | मिथुन नवमांश | अज एकपाद रुद्र |
| चतुर्थ चरण | मीन राशि 0 अंश से 3 अंश 20 कला | दी | कर्क नवमांश | अज एकपाद रुद्र |
तालिका में दिए गए विवरण के अनुसार प्रथम चरण का नामाक्षर से है जो कुंभ राशि और मेष नवमांश में आता है तथा इसमें शनि और मंगल का संयुक्त प्रभाव होने से प्रचंड आत्मबल क्रांतिकारी विचार और निर्भीक पराक्रम समाहित रहता है। द्वितीय चरण का नामाक्षर सो है जो कुंभ राशि और वृषभ नवमांश में जाकर शुक्र के प्रभाव से भौतिक यथार्थवाद स्थिरता और गहन सौंदर्यबोध प्राप्त करता है। तृतीय चरण का नामाक्षर दा है जो कुंभ राशि और मिथुन नवमांश में बुध के प्रभाव से उत्कृष्ट बौद्धिक प्रखरता दार्शनिक विश्लेषण और तार्किक संवाद क्षमता को दर्शाता है। चतुर्थ चरण का नामाक्षर दी है जो मीन राशि और कर्क नवमांश में पहुंचकर जल तत्व की असीम गहराई के साथ चंद्रमा और गुरु के प्रभाव से परम आध्यात्मिक करुणा मोक्ष भावना और अंतर्मुखी ज्ञान से युक्त होता है। जब जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र चरण में गोचर कर रहा होता है उसी चरण के अक्षर को बच्चे का वास्तविक जन्म नामाक्षर माना जाता है।
सनातन वैदिक परंपरा में मानव जीवन को संस्कारित और तेजस्वी बनाने के लिए 16 पवित्र संस्कारों का विधान किया गया है। जातकर्म के उपरांत संपन्न होने वाला नामकरण संस्कार शिशु के आध्यात्मिक और मानसिक विकास की आधारशिला है। वैदिक दर्शन में नाद ब्रह्म का सिद्धांत स्पष्ट करता है कि संपूर्ण दृश्य जगत सूक्ष्म ध्वनि तरंगों के संयोजन से संचालित होता है। जब किसी व्यक्ति को किसी विशिष्ट नाम से पुकारा जाता है तो वह शब्द ध्वनि बारंबार उसके अवचेतन मन को जाग्रत करती है।
कालपुरुष के चक्र में पूर्वभाद्रपद नक्षत्र दोनों पैरों की पिंडलियों टखनों के जोड़ और तलवों के ऊपरी भाग का प्रतिनिधित्व करता है। इस पावन नक्षत्र के अधिपति ग्रह ज्ञान धर्म और आध्यात्मिक विस्तार के अधिष्ठाता देवगुरु बृहस्पति हैं जबकि इसके अधिष्ठाता देवता भगवान देवाधिदेव महादेव के अत्यंत उग्र स्वरूप साक्षात अज एकपाद हैं। अज एकपाद का शाब्दिक अर्थ है अजन्मा और एक पैर पर स्थित होकर संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण करने वाला ब्रह्मांडीय अग्नि स्तंभ। पूर्वभाद्रपद का अर्थ होता है पूर्व का शुभ चरण अथवा मंगलकारी गति। इस नक्षत्र का पावन प्रतीक चिन्ह दो मुख वाला व्यक्ति खड्ग अथवा शव शय्या के अगले दो पाए हैं जो भौतिक जगत और आध्यात्मिक जगत के मध्य संतुलन पुरानी विकृतियों के संहार और आत्मिक पुनरुत्थान का परिचायक है। जब किसी शिशु का जन्म पूर्वभाद्रपद नक्षत्र में होता है तो गुरु की सात्विक प्रज्ञा और अज एकपाद का तपोबल मिलकर जातक को असाधारण चिंतन शक्ति प्रदान करते हैं। यह जातक सामान्य सांसारिक सुखों से आगे बढ़कर जीवन के गूढ़ रहस्यों को सुलझाने का संकल्प रखते हैं। कुंभ राशि के स्वामी शनि देव का वैराग्य और मीन राशि के स्वामी गुरु का मोक्ष मिलकर जातक को एक क्रांतिकारी विचारक और मार्गदर्शक बनाते हैं। इसलिए पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के बच्चों का नामकरण शास्त्र सम्मत अक्षरों पर ही होना चाहिए ताकि अज एकपाद का रक्षा कवच और गुरु का ईश्वरीय ज्ञान जीवनभर उसका पोषण कर सके।
आधुनिक युग में इंटरनेट और पत्रिकाओं के सतही ज्ञान के कारण जनसामान्य में एक बहुत बड़ा भ्रम फैल गया है। अधिकांश लोग किसी व्यक्ति के केवल प्रचलित नाम अथवा स्कूल सर्टिफिकेट में दर्ज पुकार नाम के पहले अक्षर को देखकर उसका नक्षत्र मान लेते हैं। यह एक अत्यंत गंभीर भूल है जिसका वैदिक फलित ज्योतिष से कोई संबंध नहीं है। भारतीय ज्योतिष का स्पष्ट और अकाट्य नियम है कि नाम से नक्षत्र कभी नहीं निकाला जा सकता बल्कि नक्षत्र से नाम निकाला जाता है।
अनेक माता पिता बिना कुंडली देखे केवल अपनी पसंद से बच्चे का नाम सोमेश अथवा दिनेश रख देते हैं। बाद में वे समाचार पत्रों में स अथवा द अक्षर देखकर यह मान लेते हैं कि बच्चे का जन्म पूर्वभाद्रपद नक्षत्र में हुआ है। यह धारणा पूरी तरह भ्रामक है। यह कतई आवश्यक नहीं है कि सोमेश या दिनेश नाम वाले व्यक्ति का जन्म पूर्वभाद्रपद नक्षत्र में ही हुआ हो। बहुत संभव है कि उसके जन्म के समय चंद्रमा रोहिणी हस्त स्वाति अनुराधा अथवा उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में गोचर कर रहा हो। यदि जन्म के समय चंद्रमा स्वाति नक्षत्र में था तो उसका वास्तविक जन्म नक्षत्र स्वाति ही कहलाएगा और उसके जीवन पर राहु देव का प्रभाव रहेगा न कि देवगुरु बृहस्पति और अज एकपाद का।
जब ऐसा व्यक्ति जीवन में आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के उपाय करने लगता है अथवा बिना कुंडली जांचे पुखराज रत्न धारण कर लेता है तो उसे कोई लाभ नहीं मिलता बल्कि भारी मानसिक अशांति और ऊर्जा असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। विवाह हेतु नाड़ी मिलान गण मिलान महादशा और अंतर्दशा का प्रभाव तथा आध्यात्मिक उत्थान का संपूर्ण विचार केवल और केवल जन्म कालीन चंद्र नक्षत्र से ही किया जाता है। पुकार नाम केवल सामाजिक व्यवहार का एक माध्यम है किंतु जातक का प्रारब्ध जन्म कालीन ग्रहों और नक्षत्रों की वास्तविक खगोलीय स्थिति से ही संचालित होता है।
शास्त्रों में नामकरण संस्कार को एक अत्यंत पवित्र यज्ञीय अनुष्ठान माना गया है। पूर्वभाद्रपद नक्षत्र में जन्म लेने वाले बालक अथवा बालिका का नामकरण करते समय कुछ अनिवार्य वैदिक नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए।
यदि किसी बालक का नाम अज्ञानतावश बिना कुंडली देखे किसी अन्य अक्षर पर रख दिया गया है अथवा पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के प्रभाव से स्वभाव में अत्यधिक क्रोध विरक्ति या मानसिक उद्वेग आ रहा हो तो शास्त्रों में इसके लिए अत्यंत सरल और प्रभावी वैदिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| जन्म समय चंद्रमा के सटीक नक्षत्र चरण से ही नाम का चयन करें | केवल आधुनिक फैशन के आधार पर बिना कुंडली देखे नाम न रखें |
| नाम का अर्थ तपस्वी गंभीर और आध्यात्मिक रूप से तेजस्वी होना चाहिए | निरर्थक कटु अथवा भ्रामक अर्थ वाले शब्दों का चयन न करें |
| कुंभ और मीन राशि के भेद को समझकर ही चरण का निर्णय लें | पुकार नाम के पहले अक्षर से अपना भविष्यफल देखने की भूल न करें |
| बालक का नाम विषम अक्षरों वाला और बालिका का सम अक्षरों वाला रखें | बिना कुंडली मिलाए बच्चे को कोई भी रत्न पहनाने की भूल न करें |
| नामकरण संस्कार शुभ मुहूर्त वार और सात्विक वातावरण में करें | रिक्ता तिथियों चतुर्थी नवमी चतुर्दशी अथवा भद्रा में नामकरण न करें |
जब किसी नवजात शिशु का नामकरण वैदिक गणित नक्षत्र सिद्धांत और नाद विज्ञान के आधार पर किया जाता है तो वह नाम उसके संपूर्ण जीवन के लिए एक दिव्य सुरक्षा कवच बन जाता है। वह केवल पुकारने का शब्द नहीं रहता बल्कि जीवन पर्यंत उसके अंतर्मन को ऊर्जावान बनाए रखने वाला एक शक्तिशाली मंत्र सिद्ध होता है। पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के स्वामी देवगुरु बृहस्पति और अधिष्ठाता देवता अज एकपाद जीवन में अदम्य तपोबल सत्यनिष्ठा त्याग और आध्यात्मिक ऊंचाइयों को छूने का वरदान प्रदान करने वाले हैं। जब शिशु अपने नक्षत्र चरण के अनुकूल पावन ध्वनि को धारण करता है तो उसके भीतर की सुप्त प्रज्ञा शक्तियां बिना किसी अवरोध के जाग्रत होती हैं और वह समाज में एक यशस्वी गंभीर दार्शनिक और अत्यंत सम्मानित नागरिक के रूप में प्रतिष्ठित होता है।
पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के बच्चों के नाम किन अक्षरों से शुरू होते हैं? पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के अंतर्गत आने वाले 4 प्रमुख नामाक्षर से सो दा और दी हैं जो इसके चार चरणों से संबंधित हैं।
क्या किसी व्यक्ति के पुकार नाम से उसका जन्म नक्षत्र तय हो सकता है? पुकार नाम से जन्म नक्षत्र कभी तय नहीं हो सकता क्योंकि वास्तविक नक्षत्र केवल जन्म के समय चंद्रमा की खगोलीय स्थिति से निर्धारित होता है।
पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के स्वामी ग्रह और अधिष्ठाता देवता कौन हैं? पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के स्वामी ग्रह देवगुरु बृहस्पति हैं और इसके अधिष्ठाता देवता भगवान शिव के उग्र स्वरूप अज एकपाद हैं।
पूर्वभाद्रपद नक्षत्र किस राशि के अंतर्गत आता है? पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के प्रथम द्वितीय और तृतीय चरण कुंभ राशि में आते हैं जबकि इसका चतुर्थ चरण मीन राशि के अंतर्गत आता है।
पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के दोष निवारण के लिए कौन सा रुद्राक्ष धारण करना चाहिए? पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के जातकों के लिए पांच मुखी अथवा ग्यारह मुखी नेपाली रुद्राक्ष धारण करना अत्यंत शुभ माना गया है जो मानसिक शांति और तपोबल को बढ़ाता है।
जन्म नक्षत्र मेरे बारे में क्या बताता है?
मेरा जन्म नक्षत्र
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इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
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