By अपर्णा पाटनी
मंगल देव का प्रभाव नक्षत्र चरण और नाम से राशि तय करने के भ्रम का संपूर्ण वैदिक समाधान

वैदिक ज्योतिष में किसी भी नवजात शिशु के नामकरण का प्रथम और सर्वोपरि आधार उसकी जन्म कालीन चंद्र राशि और नक्षत्र चरण होता है। वृश्चिक राशि भचक्र की अष्टम राशि है जिसके अंतर्गत कुल 9 नक्षत्र चरणों का समावेश होता है। इन 9 चरणों के आधार पर प्राचीन ऋषियों ने 9 विशिष्ट ध्वनियों अथवा नामाक्षरों का निर्धारण किया है। वृश्चिक राशि में जन्म लेने वाले बालकों और बालिकाओं का नामकरण केवल इन्हीं अक्षरों से किया जाना चाहिए।
वृश्चिक राशि के अंतर्गत निर्धारित 9 मुख्य नामाक्षर इस प्रकार हैं: तो ना नी नू ने नो या यी यू। जब शिशु को इन विशिष्ट बीजाक्षरों से युक्त नाम से पुकारा जाता है तो उसके मस्तिष्क की तंत्रिकाओं और आभा मंडल में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है जिससे उसकी एकाग्रता शोध क्षमता और आत्मिक शक्ति में निरंतर वृद्धि होती है।
| नक्षत्र का नाम | नक्षत्र चरण | चरण का नामाक्षर | नक्षत्र स्वामी ग्रह | अधिष्ठाता देवता |
|---|---|---|---|---|
| विशाखा | चतुर्थ चरण | तो | गुरु देव | देवराज इंद्र और अग्नि |
| अनुराधा | प्रथम चरण | ना | शनि देव | मित्र आदित्य देव |
| अनुराधा | द्वितीय चरण | नी | शनि देव | मित्र आदित्य देव |
| अनुराधा | तृतीय चरण | नू | शनि देव | मित्र आदित्य देव |
| अनुराधा | चतुर्थ चरण | ने | शनि देव | मित्र आदित्य देव |
| ज्येष्ठा | प्रथम चरण | नो | बुध देव | देवराज इंद्र |
| ज्येष्ठा | द्वितीय चरण | या | बुध देव | देवराज इंद्र |
| ज्येष्ठा | तृतीय चरण | यी | बुध देव | देवराज इंद्र |
| ज्येष्ठा | चतुर्थ चरण | यू | बुध देव | देवराज इंद्र |
तालिका में दिए गए विवरण के अनुसार विशाखा नक्षत्र का केवल अंतिम चतुर्थ चरण वृश्चिक राशि में आता है जिससे तो अक्षर प्राप्त होता है। इसके प्रारंभिक तीन चरण तुला राशि में रहते हैं। अनुराधा नक्षत्र के चारों चरणों से ना नी नू ने अक्षर निकलते हैं। ज्येष्ठा नक्षत्र के चारों चरण वृश्चिक राशि में आते हैं जिससे नो या यी यू अक्षर प्राप्त होते हैं। जब जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र और चरण में उपस्थित होता है उसी चरण के अक्षर को बच्चे का वास्तविक जन्म नामाक्षर माना जाता है।
सनातन वैदिक परंपरा में मानव जीवन को संस्कारित और तेजस्वी बनाने के लिए 16 पवित्र संस्कारों का विधान किया गया है। जातकर्म के उपरांत संपन्न होने वाला नामकरण संस्कार शिशु के आध्यात्मिक और मानसिक विकास की आधारशिला है। वैदिक दर्शन में नाद ब्रह्म का सिद्धांत स्पष्ट करता है कि संपूर्ण दृश्य जगत सूक्ष्म ध्वनि तरंगों के संयोजन से संचालित होता है। जब किसी व्यक्ति को किसी विशिष्ट नाम से पुकारा जाता है तो वह शब्द ध्वनि बारंबार उसके अवचेतन मन को जाग्रत करती है।
कालपुरुष के चक्र में वृश्चिक राशि जननांगों उत्सर्जन तंत्र और रीढ़ के निचले भाग का प्रतिनिधित्व करती है। यह स्थिर स्वभाव की जल तत्वीय राशि है जिसके अधिपति देव भूमिपुत्र और पराक्रम के कारक मंगल देव हैं। मंगल देव को अदम्य साहस सहनशक्ति अनुसंधान और संकट से लड़ने की शक्ति का स्वामी माना गया है। वृश्चिक राशि का प्रतीक चिन्ह वृश्चिक अर्थात बिच्छू है जो अपनी सीमाओं की रक्षा करने में अत्यंत सजग और संकट आने पर पूरी शक्ति से मुकाबला करने का परिचायक है। जब किसी शिशु का जन्म वृश्चिक राशि में होता है तो मंगल के प्रभाव से उसके व्यक्तित्व में जन्मजात निर्भीकता रणनीतिक बुद्धि और सत्य की तह तक जाने की ललक होती है। विशाखा नक्षत्र का गुरु उसे धर्म और लक्ष्यभेदन की शक्ति देता है। अनुराधा नक्षत्र का शनि उसे सांगठनिक निष्ठा और मित्रता प्रदान करता है जबकि ज्येष्ठा नक्षत्र का बुध उसे सर्वोच्च प्रशासनिक कुशलता और संकट प्रबंधन की क्षमता देता है। इसलिए वृश्चिक राशि के बच्चों का नामकरण शास्त्र सम्मत अक्षरों पर ही होना चाहिए ताकि मंगल की प्रचंड ऊर्जा सकारात्मक रूप से जीवनभर उसका पोषण कर सके।
आधुनिक युग में इंटरनेट और पत्रिकाओं के सतही ज्ञान के कारण जनसामान्य में एक बहुत बड़ा भ्रम फैल गया है। अधिकांश लोग किसी व्यक्ति के केवल प्रचलित नाम अथवा स्कूल सर्टिफिकेट में दर्ज पुकार नाम के पहले अक्षर को देखकर उसकी राशि मान लेते हैं। यह एक अत्यंत गंभीर भूल है जिसका वैदिक फलित ज्योतिष से कोई संबंध नहीं है। भारतीय ज्योतिष का स्पष्ट और अकाट्य नियम है कि नाम से राशि कभी नहीं निकाली जा सकती बल्कि राशि से नाम निकाला जाता है।
अनेक माता पिता बिना कुंडली देखे केवल अपनी पसंद से बच्चे का नाम नितिन नवीन अथवा योगेश रख देते हैं। बाद में वे समाचार पत्रों में न अथवा य अक्षर देखकर यह मान लेते हैं कि बच्चे की राशि वृश्चिक है। यह धारणा पूरी तरह भ्रामक है। यह कतई आवश्यक नहीं है कि नितिन या नवीन नाम वाले व्यक्ति की जन्म राशि वृश्चिक ही हो। बहुत संभव है कि उसके जन्म के समय चंद्रमा कुंभ मीन अथवा वृषभ राशि में गोचर कर रहा हो। यदि जन्म के समय चंद्रमा वृषभ राशि में था तो उसकी वास्तविक जन्म राशि वृषभ ही होगी और उसके जीवन पर शुक्र देव का प्रभाव रहेगा न कि मंगल देव का।
जब ऐसा व्यक्ति जीवन में आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए वृश्चिक राशि का राशिफल पढ़ने लगता है अथवा वृश्चिक राशि समझकर लाल मूंगा रत्न धारण कर लेता है तो उसे कोई लाभ नहीं मिलता बल्कि भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। विवाह हेतु कुंडली मिलान महादशा और अंतर्दशा का प्रभाव साढ़े साती और ढैया का विचार तथा करियर का फलादेश केवल और केवल जन्म कालीन चंद्र राशि से ही किया जाता है। पुकार नाम केवल सामाजिक व्यवहार का एक माध्यम है किंतु जातक का प्रारब्ध जन्म कालीन ग्रहों की स्थिति से ही संचालित होता है।
शास्त्रों में नामकरण संस्कार को एक अत्यंत पवित्र यज्ञीय अनुष्ठान माना गया है। वृश्चिक राशि में जन्म लेने वाले बालक अथवा बालिका का नामकरण करते समय कुछ अनिवार्य वैदिक नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए।
यदि किसी बालक का नाम अज्ञानतावश बिना कुंडली देखे किसी अन्य अक्षर पर रख दिया गया है और अब स्कूल या आधिकारिक दस्तावेजों में उसे बदलना संभव नहीं है तो शास्त्रों में इसके लिए अत्यंत सरल और प्रभावी वैदिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| जन्म समय चंद्रमा के सटीक नक्षत्र चरण से ही नाम का चयन करें | केवल आधुनिक फैशन के आधार पर बिना कुंडली देखे नाम न रखें |
| नाम का अर्थ गंभीर ओजस्वी साहसी और कल्याणकारी होना चाहिए | निरर्थक कटु अथवा भ्रामक अर्थ वाले शब्दों का चयन न करें |
| बालक का नाम विषम अक्षरों वाला और बालिका का सम अक्षरों वाला रखें | पुकार नाम के पहले अक्षर से अपना भविष्यफल देखने की भूल न करें |
| नामकरण संस्कार शुभ मुहूर्त वार और सात्विक वातावरण में करें | रिक्ता तिथियों चतुर्थी नवमी चतुर्दशी अथवा भद्रा में नामकरण न करें |
जब किसी नवजात शिशु का नामकरण वैदिक गणित नक्षत्र सिद्धांत और नाद विज्ञान के आधार पर किया जाता है तो वह नाम उसके संपूर्ण जीवन के लिए एक दिव्य सुरक्षा कवच बन जाता है। वह केवल पुकारने का शब्द नहीं रहता बल्कि जीवन पर्यंत उसके अंतर्मन को ऊर्जावान बनाए रखने वाला एक शक्तिशाली मंत्र सिद्ध होता है। वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल देव जीवन में अदम्य साहस शोध बुद्धि और कठिन परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करने वाले हैं। जब शिशु अपनी जन्म राशि और नक्षत्र चरण के अनुकूल पावन ध्वनि को धारण करता है तो उसके भीतर की सुप्त प्रतिभाएं बिना किसी अवरोध के जाग्रत होती हैं और वह समाज में एक प्रतापी निष्ठावान और अत्यंत सम्मानित नागरिक के रूप में प्रतिष्ठित होता है।
वृश्चिक राशि के बच्चों के नाम किन अक्षरों से शुरू होते हैं? वृश्चिक राशि के अंतर्गत आने वाले 9 प्रमुख नामाक्षर तो ना नी नू ने नो या यी और यू हैं जो विशाखा अनुराधा और ज्येष्ठा नक्षत्र के चरणों से निकलते हैं।
क्या किसी व्यक्ति के पुकार नाम से उसकी जन्म राशि तय हो सकती है? पुकार नाम से जन्म राशि कभी तय नहीं हो सकती क्योंकि वास्तविक राशि केवल जन्म के समय चंद्रमा की खगोलीय स्थिति से निर्धारित होती है।
वृश्चिक राशि का स्वामी ग्रह कौन सा है और उसका नाम पर क्या प्रभाव पड़ता है? वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल देव हैं जिनकी कृपा से अनुकूल नाम बच्चे के जीवन में असीम साहस एकाग्रता अनुसंधान क्षमता और रणनीतिक बुद्धि प्रदान करता है।
यदि बच्चे का नाम गलत अक्षर पर रख दिया गया हो तो क्या उपाय करें? कुंडली बनवाकर बच्चे का सही नक्षत्र नामाक्षर ज्ञात करें और घर पर उसे उसी नक्षत्र अक्षर पर आधारित नाम से पुकारना आरंभ करें तथा तीन मुखी रुद्राक्ष धारण कराएं।
वृश्चिक राशि के नामकरण संस्कार के लिए कौन सा दिन सबसे शुभ माना जाता है? वृश्चिक राशि के अधिपति मंगल और नक्षत्र स्वामियों के आधार पर मंगलवार और गुरुवार का दिन नामकरण संस्कार के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।
जन्म नक्षत्र मेरे बारे में क्या बताता है?
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