By अपर्णा पाटनी
राहु देव का प्रभाव चारों चरण और नाम से नक्षत्र तय करने के भ्रम का संपूर्ण समाधान

वैदिक ज्योतिष में किसी भी नवजात शिशु के नामकरण का प्रथम और सर्वोपरि आधार उसकी जन्म कालीन चंद्र राशि और नक्षत्र चरण होता है। शतभिषा नक्षत्र संपूर्ण भचक्र का चौबीसवां और सौ चिकित्सकों की दिव्य आरोग्य शक्ति से संपन्न अत्यंत चमत्कारी नक्षत्र है जो कुंभ राशि में 6 अंश 40 कला से आरंभ होकर 20 अंश तक पूर्ण रूप से विस्तृत रहता है। इसके अंतर्गत कुल 4 चरण आते हैं और प्रत्येक चरण के लिए प्राचीन ऋषियों ने विशिष्ट ध्वनि बीजाक्षर निर्धारित किए हैं। शतभिषा नक्षत्र में जन्म लेने वाले बालकों और बालिकाओं का नामकरण केवल इन्हीं शास्त्रीय अक्षरों से किया जाना चाहिए।
शतभिषा नक्षत्र के अंतर्गत निर्धारित 4 मुख्य नामाक्षर इस प्रकार हैं: गो सा सी सू। जब शिशु को इन विशिष्ट बीजाक्षरों से युक्त नाम से पुकारा जाता है तो उसके मस्तिष्क की तंत्रिकाओं और आभा मंडल में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है जिससे उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता वैज्ञानिक अनुसंधान दृष्टि तार्किक विवेक और गूढ़ रहस्यों को समझने के सामर्थ्य में निरंतर वृद्धि होती है।
| नक्षत्र चरण | राशि एवं अंश विस्तार | चरण का नामाक्षर | नवमांश राशि | अधिष्ठाता देवता |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम चरण | कुंभ राशि 6 अंश 40 कला से 10 अंश | गो | धनु नवमांश | वरुण देव |
| द्वितीय चरण | कुंभ राशि 10 अंश से 13 अंश 20 कला | सा | मकर नवमांश | वरुण देव |
| तृतीय चरण | कुंभ राशि 13 अंश 20 कला से 16 अंश 40 कला | सी | कुंभ नवमांश | वरुण देव |
| चतुर्थ चरण | कुंभ राशि 16 अंश 40 कला से 20 अंश | सू | मीन नवमांश | वरुण देव |
तालिका में दिए गए विवरण के अनुसार प्रथम चरण का नामाक्षर गो है जो कुंभ राशि और धनु नवमांश में आता है तथा इसमें शनि और देवगुरु बृहस्पति का संयुक्त प्रभाव होने से उच्च दार्शनिक विवेक सत्यनिष्ठा और धार्मिक अनुसंधान क्षमता समाहित रहती है। द्वितीय चरण का नामाक्षर सा है जो कुंभ राशि और मकर नवमांश में जाकर शनि देव के पूर्ण आधिपत्य में व्यावहारिक यथार्थवाद कठोर परिश्रम संगठनात्मक कुशलता और धैर्य प्रदान करता है। तृतीय चरण का नामाक्षर सी है जो कुंभ राशि और कुंभ नवमांश में वर्गोत्तम होकर शनि और राहु के समन्वय से असाधारण वैज्ञानिक दृष्टि क्रांतिकारी विचार और मानवीय समाज सुधार के गुण दर्शाता है। चतुर्थ चरण का नामाक्षर सू है जो कुंभ राशि और मीन नवमांश में पहुंचकर जल तत्व की गहराई के साथ गुरु और केतु के प्रभाव से उच्च आध्यात्मिक अंतर्ज्ञान परोपकार और पराभौतिक रहस्यों को सुलझाने की शक्ति से युक्त होता है। जब जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र चरण में गोचर कर रहा होता है उसी चरण के अक्षर को बच्चे का वास्तविक जन्म नामाक्षर माना जाता है।
सनातन वैदिक परंपरा में मानव जीवन को संस्कारित और तेजस्वी बनाने के लिए 16 पवित्र संस्कारों का विधान किया गया है। जातकर्म के उपरांत संपन्न होने वाला नामकरण संस्कार शिशु के आध्यात्मिक और मानसिक विकास की आधारशिला है। वैदिक दर्शन में नाद ब्रह्म का सिद्धांत स्पष्ट करता है कि संपूर्ण दृश्य जगत सूक्ष्म ध्वनि तरंगों के संयोजन से संचालित होता है। जब किसी व्यक्ति को किसी विशिष्ट नाम से पुकारा जाता है तो वह शब्द ध्वनि बारंबार उसके अवचेतन मन को जाग्रत करती है।
कालपुरुष के चक्र में शतभिषा नक्षत्र दोनों पैरों की पिंडलियों पसलियों के निचले भाग और शरीर के सूक्ष्म ऊर्जा स्रोतों का प्रतिनिधित्व करता है। इस पावन नक्षत्र के अधिपति ग्रह गूढ़ ज्ञान और अप्रत्याशित परिवर्तनों के कारक छाया ग्रह राहु देव हैं जबकि इसके अधिष्ठाता देवता ब्रह्मांडीय नियमों के रक्षक और समस्त जल स्रोतों के स्वामी साक्षात वरुण देव हैं। शतभिषा शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है सौ चिकित्सक अथवा सौ औषधियां। इस नक्षत्र का पावन प्रतीक चिन्ह एक रिक्त वृत्त अथवा तारों का वृत्ताकार समूह है जो इस ब्रह्मांड के असीम शून्य सीमाहीन संभावनाओं और रक्षा कवच का परिचायक है। जब किसी शिशु का जन्म शतभिषा नक्षत्र में होता है तो राहु की कुशाग्र खोजी बुद्धि और वरुण देव की आरोग्यकारी शक्ति मिलकर जातक को एक अद्वितीय चिकित्सक अन्वेषक और वैज्ञानिक बनाती हैं। यह जातक किसी भी रहस्य के पीछे छिपे वास्तविक सत्य को उजागर करने में प्रवीण होते हैं और किसी भी प्रकार के मानसिक या सामाजिक दबाव के आगे नहीं झुकते। कुंभ राशि के स्वामी शनि देव का स्थायित्व और नक्षत्र स्वामी राहु की नवीन दृष्टि मिलकर जातक को चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी अंतरिक्ष विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में वैश्विक प्रतिष्ठा दिलाते हैं। इसलिए शतभिषा नक्षत्र के बच्चों का नामकरण शास्त्र सम्मत अक्षरों पर ही होना चाहिए ताकि वरुण देव का दिव्य संरक्षण और राहु की तीक्ष्ण प्रज्ञा जीवनभर उसका पोषण कर सके।
आधुनिक युग में इंटरनेट और पत्रिकाओं के सतही ज्ञान के कारण जनसामान्य में एक बहुत बड़ा भ्रम फैल गया है। अधिकांश लोग किसी व्यक्ति के केवल प्रचलित नाम अथवा स्कूल सर्टिफिकेट में दर्ज पुकार नाम के पहले अक्षर को देखकर उसका नक्षत्र मान लेते हैं। यह एक अत्यंत गंभीर भूल है जिसका वैदिक फलित ज्योतिष से कोई संबंध नहीं है। भारतीय ज्योतिष का स्पष्ट और अकाट्य नियम है कि नाम से नक्षत्र कभी नहीं निकाला जा सकता बल्कि नक्षत्र से नाम निकाला जाता है।
अनेक माता पिता बिना कुंडली देखे केवल अपनी पसंद से बच्चे का नाम सुरेश अथवा सीमा रख देते हैं। बाद में वे समाचार पत्रों में स अथवा सी अक्षर देखकर यह मान लेते हैं कि बच्चे का जन्म शतभिषा नक्षत्र के द्वितीय अथवा तृतीय चरण में हुआ है। यह धारणा पूरी तरह भ्रामक है। यह कतई आवश्यक नहीं है कि सुरेश या सीमा नाम वाले व्यक्ति का जन्म शतभिषा नक्षत्र में ही हुआ हो। बहुत संभव है कि उसके जन्म के समय चंद्रमा रोहिणी मघा हस्त अनुराधा उत्तराषाढ़ा अथवा धनिष्ठा नक्षत्र में गोचर कर रहा हो। यदि जन्म के समय चंद्रमा धनिष्ठा नक्षत्र में था तो उसका वास्तविक जन्म नक्षत्र धनिष्ठा ही कहलाएगा और उसके जीवन पर मंगल देव का प्रभाव रहेगा न कि राहु और वरुण देव का।
जब ऐसा व्यक्ति जीवन में आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए शतभिषा नक्षत्र के उपाय करने लगता है अथवा बिना कुंडली जांचे गोमेद या नीलम रत्न धारण कर लेता है तो उसे कोई लाभ नहीं मिलता बल्कि भारी मानसिक भ्रम और ऊर्जा असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। विवाह हेतु नाड़ी मिलान गण मिलान महादशा और अंतर्दशा का प्रभाव तथा आरोग्य का संपूर्ण विचार केवल और केवल जन्म कालीन चंद्र नक्षत्र से ही किया जाता है। पुकार नाम केवल सामाजिक व्यवहार का एक माध्यम है किंतु जातक का प्रारब्ध जन्म कालीन ग्रहों और नक्षत्रों की वास्तविक खगोलीय स्थिति से ही संचालित होता है।
शास्त्रों में नामकरण संस्कार को एक अत्यंत पवित्र यज्ञीय अनुष्ठान माना गया है। शतभिषा नक्षत्र में जन्म लेने वाले बालक अथवा बालिका का नामकरण करते समय कुछ अनिवार्य वैदिक नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए।
यदि किसी बालक का नाम अज्ञानतावश बिना कुंडली देखे किसी अन्य अक्षर पर रख दिया गया है अथवा शतभिषा नक्षत्र के प्रभाव से स्वभाव में अत्यधिक एकाकीपन अनिद्रा या मानसिक भ्रम उत्पन्न हो रहा है तो शास्त्रों में इसके लिए अत्यंत सरल और प्रभावी वैदिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| जन्म समय चंद्रमा के सटीक नक्षत्र चरण से ही नाम का चयन करें | केवल आधुनिक फैशन के आधार पर बिना कुंडली देखे नाम न रखें |
| नाम का अर्थ आरोग्यकारी ज्ञानवर्धक और गरिमापूर्ण होना चाहिए | निरर्थक कटु अथवा भ्रामक अर्थ वाले शब्दों का चयन न करें |
| कुंभ राशि के स्वामी शनि और नक्षत्र स्वामी राहु का ध्यान रखें | पुकार नाम के पहले अक्षर से अपना भविष्यफल देखने की भूल न करें |
| बालक का नाम विषम अक्षरों वाला और बालिका का सम अक्षरों वाला रखें | बिना कुंडली मिलाए बच्चे को कोई भी रत्न पहनाने की भूल न करें |
| नामकरण संस्कार शुभ मुहूर्त वार और सात्विक वातावरण में करें | रिक्ता तिथियों चतुर्थी नवमी चतुर्दशी अथवा भद्रा में नामकरण न करें |
जब किसी नवजात शिशु का नामकरण वैदिक गणित नक्षत्र सिद्धांत और नाद विज्ञान के आधार पर किया जाता है तो वह नाम उसके संपूर्ण जीवन के लिए एक दिव्य सुरक्षा कवच बन जाता है। वह केवल पुकारने का शब्द नहीं रहता बल्कि जीवन पर्यंत उसके अंतर्मन को ऊर्जावान बनाए रखने वाला एक शक्तिशाली मंत्र सिद्ध होता है। शतभिषा नक्षत्र के स्वामी राहु देव और अधिष्ठाता देवता वरुण देव जीवन में असाधारण आरोग्य क्षमता स्वतंत्र चिंतन वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक रहस्यों को सुलझाने का सामर्थ्य प्रदान करने वाले हैं। जब शिशु अपने नक्षत्र चरण के अनुकूल पावन ध्वनि को धारण करता है तो उसके भीतर की सुप्त शोध प्रतिभाएं बिना किसी अवरोध के जाग्रत होती हैं और वह समाज में एक यशस्वी प्रखर विद्वान सफल अन्वेषक और अत्यंत सम्मानित नागरिक के रूप में प्रतिष्ठित होता है।
शतभिषा नक्षत्र के बच्चों के नाम किन अक्षरों से शुरू होते हैं? शतभिषा नक्षत्र के अंतर्गत आने वाले 4 प्रमुख नामाक्षर गो सा सी और सू हैं जो इसके चार चरणों से संबंधित हैं।
क्या किसी व्यक्ति के पुकार नाम से उसका जन्म नक्षत्र तय हो सकता है? पुकार नाम से जन्म नक्षत्र कभी तय नहीं हो सकता क्योंकि वास्तविक नक्षत्र केवल जन्म के समय चंद्रमा की खगोलीय स्थिति से निर्धारित होता है।
शतभिषा नक्षत्र के स्वामी ग्रह और अधिष्ठाता देवता कौन हैं? शतभिषा नक्षत्र के स्वामी ग्रह छाया ग्रह राहु हैं और इसके अधिष्ठाता देवता समस्त ब्रह्मांडीय जल और नैतिक नियमों के अधिपति वरुण देव हैं।
शतभिषा नक्षत्र में जन्म लेने वाले बच्चों का स्वभाव कैसा होता है? इस नक्षत्र में जन्मे बच्चों में गूढ़ शोध क्षमता स्वतंत्र विचार वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सौ चिकित्सकों जैसी आरोग्यकारी प्रज्ञा स्वाभाविक रूप से पाई जाती है।
शतभिषा नक्षत्र के दोष निवारण के लिए कौन सा रुद्राक्ष धारण करना चाहिए? शतभिषा नक्षत्र के जातकों के लिए आठ मुखी अथवा चार मुखी नेपाली रुद्राक्ष धारण करना अत्यंत शुभ माना गया है जो राहु के अशुभ प्रभाव को शांत करके बुद्धि को स्थिर करता है।
जन्म नक्षत्र मेरे बारे में क्या बताता है?
मेरा जन्म नक्षत्रअनुभव: 20
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