By पं. अमिताभ शर्मा
शनि देव का प्रभाव चारों चरण और नाम से नक्षत्र तय करने के भ्रम का संपूर्ण समाधान

वैदिक ज्योतिष में किसी भी नवजात शिशु के नामकरण का प्रथम और सर्वोपरि आधार उसकी जन्म कालीन चंद्र राशि और नक्षत्र चरण होता है। उत्तरभाद्रपद नक्षत्र संपूर्ण भचक्र का छब्बीसवां और अत्यंत शांत गंभीर व आंतरिक स्थिरता प्रदाता नक्षत्र है जो मीन राशि में 3 अंश 20 कला से आरंभ होकर 16 अंश 40 कला तक पूर्ण रूप से विस्तृत रहता है। इसके अंतर्गत कुल 4 चरण आते हैं और प्रत्येक चरण के लिए प्राचीन ऋषियों ने विशिष्ट ध्वनि बीजाक्षर निर्धारित किए हैं। उत्तरभाद्रपद नक्षत्र में जन्म लेने वाले बालकों और बालिकाओं का नामकरण केवल इन्हीं शास्त्रीय अक्षरों से किया जाना चाहिए।
उत्तरभाद्रपद नक्षत्र के अंतर्गत निर्धारित 4 मुख्य नामाक्षर इस प्रकार हैं: दू थ झ ञ। जब शिशु को इन विशिष्ट बीजाक्षरों से युक्त नाम से पुकारा जाता है तो उसके मस्तिष्क की तंत्रिकाओं और आभा मंडल में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है जिससे उसके अपार धैर्य शांत चित्त परोपकार की भावना योग साधना और जीवन की किसी भी परिस्थिति में विचलित न होने वाली आंतरिक स्थिरता में निरंतर वृद्धि होती है।
| नक्षत्र चरण | राशि एवं अंश विस्तार | चरण का नामाक्षर | नवमांश राशि | अधिष्ठाता देवता |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम चरण | मीन राशि 3 अंश 20 कला से 6 अंश 40 कला | दू | सिंह नवमांश | अहिरबुध्न्य रुद्र |
| द्वितीय चरण | मीन राशि 6 अंश 40 कला से 10 अंश | थ | कन्या नवमांश | अहिरबुध्न्य रुद्र |
| तृतीय चरण | मीन राशि 10 अंश से 13 अंश 20 कला | झ | तुला नवमांश | अहिरबुध्न्य रुद्र |
| चतुर्थ चरण | मीन राशि 13 अंश 20 कला से 16 अंश 40 कला | ञ | वृश्चिक नवमांश | अहिरबुध्न्य रुद्र |
तालिका में दिए गए विवरण के अनुसार प्रथम चरण का नामाक्षर दू है जो मीन राशि और सिंह नवमांश में आता है तथा इसमें गुरु और सूर्य का संयुक्त प्रभाव होने से राजसी गरिमा सात्विक नेतृत्व और उच्च आत्मबल समाहित रहता है। द्वितीय चरण का नामाक्षर थ है जो मीन राशि और कन्या नवमांश में जाकर बुध के प्रभाव से व्यावहारिक बुद्धि सूक्ष्म विश्लेषण सेवा भाव और उत्कृष्ट वाकपटुता प्राप्त करता है। तृतीय चरण का नामाक्षर झ है जो मीन राशि और तुला नवमांश में शुक्र के प्रभाव से संतुलन कलात्मक सुरुचि न्यायप्रियता और सामाजिक सौहार्द को दर्शाता है। चतुर्थ चरण का नामाक्षर ञ है जो मीन राशि और वृश्चिक नवमांश में पहुंचकर जल तत्व की असीम गहराई के साथ मंगल और गुरु के प्रभाव से अगाध योग शक्ति आध्यात्मिक अनुसंधान और गूढ़ मोक्ष चेतना से युक्त होता है। जब जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र चरण में गोचर कर रहा होता है उसी चरण के अक्षर को बच्चे का वास्तविक जन्म नामाक्षर माना जाता है।
सनातन वैदिक परंपरा में मानव जीवन को संस्कारित और तेजस्वी बनाने के लिए 16 पवित्र संस्कारों का विधान किया गया है। जातकर्म के उपरांत संपन्न होने वाला नामकरण संस्कार शिशु के आध्यात्मिक और मानसिक विकास की आधारशिला है। वैदिक दर्शन में नाद ब्रह्म का सिद्धांत स्पष्ट करता है कि संपूर्ण दृश्य जगत सूक्ष्म ध्वनि तरंगों के संयोजन से संचालित होता है। जब किसी व्यक्ति को किसी विशिष्ट नाम से पुकारा जाता है तो वह शब्द ध्वनि बारंबार उसके अवचेतन मन को जाग्रत करती है।
कालपुरुष के चक्र में उत्तरभाद्रपद नक्षत्र दोनों पैरों के तलवों और पैरों की उंगलियों का प्रतिनिधित्व करता है। इस पावन नक्षत्र के अधिपति ग्रह न्याय कर्म और तपस्या के कारक शनि देव हैं जबकि इसके अधिष्ठाता देवता पाताल लोक के सर्प और गहरे समुद्र में स्थित रुद्र स्वरूप साक्षात अहिरबुध्न्य हैं। अहिरबुध्न्य का शाब्दिक अर्थ है गहराइयों में स्थित सर्प अथवा अगाध जल में निवास करने वाली कुंडली शक्ति। उत्तरभाद्रपद का अर्थ होता है बाद का मंगलकारी चरण। इस नक्षत्र का पावन प्रतीक चिन्ह दो मुख वाला व्यक्ति गहरा समुद्र अथवा शव शय्या के पिछले दो पाए हैं जो भौतिक जीवन की सीमाओं को समाप्त कर अनंत शांति और मोक्ष प्राप्त करने का परिचायक है। जब किसी शिशु का जन्म उत्तरभाद्रपद नक्षत्र में होता है तो शनि देव का कठोर अनुशासन और अहिरबुध्न्य की गहन ज्ञान शक्ति मिलकर जातक को एक अत्यंत धैर्यवान गंभीर और परोपकारी व्यक्तित्व प्रदान करती हैं। मीन राशि के स्वामी देवगुरु बृहस्पति का सात्विक ज्ञान और नक्षत्र स्वामी शनि का वैराग्य मिलकर जातक को उच्च कोटि का योगी दार्शनिक और निस्वार्थ समाज सेवक बनाते हैं। इसलिए उत्तरभाद्रपद नक्षत्र के बच्चों का नामकरण शास्त्र सम्मत अक्षरों पर ही होना चाहिए ताकि अहिरबुध्न्य का दिव्य संरक्षण और शनि का तपोबल जीवनभर उसका पोषण कर सके।
आधुनिक युग में इंटरनेट और पत्रिकाओं के सतही ज्ञान के कारण जनसामान्य में एक बहुत बड़ा भ्रम फैल गया है। अधिकांश लोग किसी व्यक्ति के केवल प्रचलित नाम अथवा स्कूल सर्टिफिकेट में दर्ज पुकार नाम के पहले अक्षर को देखकर उसका नक्षत्र मान लेते हैं। यह एक अत्यंत गंभीर भूल है जिसका वैदिक फलित ज्योतिष से कोई संबंध नहीं है। भारतीय ज्योतिष का स्पष्ट और अकाट्य नियम है कि नाम से नक्षत्र कभी नहीं निकाला जा सकता बल्कि नक्षत्र से नाम निकाला जाता है।
अनेक माता पिता बिना कुंडली देखे केवल अपनी पसंद से बच्चे का नाम दुर्गेश अथवा थनेश रख देते हैं। बाद में वे समाचार पत्रों में द अथवा थ अक्षर देखकर यह मान लेते हैं कि बच्चे का जन्म उत्तरभाद्रपद नक्षत्र में हुआ है। यह धारणा पूरी तरह भ्रामक है। यह कतई आवश्यक नहीं है कि दुर्गेश या थनेश नाम वाले व्यक्ति का जन्म उत्तरभाद्रपद नक्षत्र में ही हुआ हो। बहुत संभव है कि उसके जन्म के समय चंद्रमा रोहिणी मघा हस्त स्वाति अनुराधा पूर्वाषाढ़ा अथवा शतभिषा नक्षत्र में गोचर कर रहा हो। यदि जन्म के समय चंद्रमा स्वाति नक्षत्र में था तो उसका वास्तविक जन्म नक्षत्र स्वाति ही कहलाएगा और उसके जीवन पर राहु देव का प्रभाव रहेगा न कि शनि और अहिरबुध्न्य का।
जब ऐसा व्यक्ति जीवन में आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए उत्तरभाद्रपद नक्षत्र के उपाय करने लगता है अथवा बिना कुंडली जांचे नीलम या पुखराज रत्न धारण कर लेता है तो उसे कोई लाभ नहीं मिलता बल्कि भारी मानसिक अशांति और ऊर्जा असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। विवाह हेतु नाड़ी मिलान गण मिलान महादशा और अंतर्दशा का प्रभाव तथा आध्यात्मिक उत्थान का संपूर्ण विचार केवल और केवल जन्म कालीन चंद्र नक्षत्र से ही किया जाता है। पुकार नाम केवल सामाजिक व्यवहार का एक माध्यम है किंतु जातक का प्रारब्ध जन्म कालीन ग्रहों और नक्षत्रों की वास्तविक खगोलीय स्थिति से ही संचालित होता है।
शास्त्रों में नामकरण संस्कार को एक अत्यंत पवित्र यज्ञीय अनुष्ठान माना गया है। उत्तरभाद्रपद नक्षत्र में जन्म लेने वाले बालक अथवा बालिका का नामकरण करते समय कुछ अनिवार्य वैदिक नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए।
यदि किसी बालक का नाम अज्ञानतावश बिना कुंडली देखे किसी अन्य अक्षर पर रख दिया गया है अथवा उत्तरभाद्रपद नक्षत्र के प्रभाव से स्वभाव में अत्यधिक उदासी आलस्य या वैराग्य की भावना आ रही हो तो शास्त्रों में इसके लिए अत्यंत सरल और प्रभावी वैदिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| जन्म समय चंद्रमा के सटीक नक्षत्र चरण से ही नाम का चयन करें | केवल आधुनिक फैशन के आधार पर बिना कुंडली देखे नाम न रखें |
| नाम का अर्थ शांत गंभीर और परोपकारी होना चाहिए | निरर्थक कटु अथवा भ्रामक अर्थ वाले शब्दों का चयन न करें |
| मीन राशि के स्वामी गुरु और नक्षत्र स्वामी शनि का ध्यान रखें | पुकार नाम के पहले अक्षर से अपना भविष्यफल देखने की भूल न करें |
| बालक का नाम विषम अक्षरों वाला और बालिका का सम अक्षरों वाला रखें | बिना कुंडली मिलाए बच्चे को कोई भी रत्न पहनाने की भूल न करें |
| नामकरण संस्कार शुभ मुहूर्त वार और सात्विक वातावरण में करें | रिक्ता तिथियों चतुर्थी नवमी चतुर्दशी अथवा भद्रा में नामकरण न करें |
जब किसी नवजात शिशु का नामकरण वैदिक गणित नक्षत्र सिद्धांत और नाद विज्ञान के आधार पर किया जाता है तो वह नाम उसके संपूर्ण जीवन के लिए एक दिव्य सुरक्षा कवच बन जाता है। वह केवल पुकारने का शब्द नहीं रहता बल्कि जीवन पर्यंत उसके अंतर्मन को ऊर्जावान बनाए रखने वाला एक शक्तिशाली मंत्र सिद्ध होता है। उत्तरभाद्रपद नक्षत्र के स्वामी शनि देव और अधिष्ठाता देवता अहिरबुध्न्य जीवन में असीम धैर्य शांत मन परोपकार और आध्यात्मिक गहराई प्रदान करने वाले हैं। जब शिशु अपने नक्षत्र चरण के अनुकूल पावन ध्वनि को धारण करता है तो उसके भीतर की सुप्त साधना शक्तियां बिना किसी अवरोध के जाग्रत होती हैं और वह समाज में एक यशस्वी गंभीर मार्गदर्शक और अत्यंत सम्मानित नागरिक के रूप में प्रतिष्ठित होता है।
उत्तरभाद्रपद नक्षत्र के बच्चों के नाम किन अक्षरों से शुरू होते हैं? उत्तरभाद्रपद नक्षत्र के अंतर्गत आने वाले 4 प्रमुख नामाक्षर दू थ झ और ञ हैं जो इसके चार चरणों से संबंधित हैं।
क्या किसी व्यक्ति के पुकार नाम से उसका जन्म नक्षत्र तय हो सकता है? पुकार नाम से जन्म नक्षत्र कभी तय नहीं हो सकता क्योंकि वास्तविक नक्षत्र केवल जन्म के समय चंद्रमा की खगोलीय स्थिति से निर्धारित होता है।
उत्तरभाद्रपद नक्षत्र के स्वामी ग्रह और अधिष्ठाता देवता कौन हैं? उत्तरभाद्रपद नक्षत्र के स्वामी ग्रह शनि देव हैं और इसके अधिष्ठाता देवता पाताल के सर्प रूप अहिरबुध्न्य रुद्र हैं।
उत्तरभाद्रपद नक्षत्र में जन्म लेने वाले बच्चों का स्वभाव कैसा होता है? इस नक्षत्र में जन्मे बच्चों में अपार धैर्य शांत चित्त परोपकार की भावना योग साधना और आंतरिक स्थिरता स्वाभाविक रूप से पाई जाती है।
उत्तरभाद्रपद नक्षत्र के दोष निवारण के लिए कौन सा रुद्राक्ष धारण करना चाहिए? उत्तरभाद्रपद नक्षत्र के जातकों के लिए सात मुखी नेपाली रुद्राक्ष धारण करना अत्यंत शुभ माना गया है जो शनि के प्रभाव को संतुलित करके मानसिक शांति प्रदान करता है।
जन्म नक्षत्र मेरे बारे में क्या बताता है?
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