क्या कुंडली से नशा मुक्ति संभव है?

By पं. अभिषेक शर्मा

द्वितीय अष्टम भाव चंद्रमा और राहु के ज्योतिषीय विश्लेषण से जानें शराब नशा और स्क्रीन एडिक्शन से मुक्ति के अचूक सात्विक उपाय

शराब और नशा मुक्ति के ज्योतिषीय योग कारण एवं सात्विक उपाय

मन का भटकाव और तामसिक वृत्तियों का बंधन

मानव जीवन में चेतना का स्तर और इंद्रियों पर नियंत्रण आत्मा के आत्मबल और मानसिक संतुलन पर निर्भर करता है। सनातन वैदिक दर्शन के अनुसार मानव शरीर पंच तत्वों और तीन प्रमुख गुणों सत्व, रज और तम से निर्मित है। जब किसी व्यक्ति के जीवन में तामसिक वृत्तियां अनियंत्रित रूप से हावी हो जाती हैं, तो वह अपने मानसिक तनाव, एकाकीपन अथवा जीवन की असफलताओं से भागने के लिए मदिरा, मादक द्रव्यों, नशीली औषधियों अथवा अत्यधिक डिजिटल स्क्रीन एडिक्शन के अंधेरे कुचक्र में फंस जाता है। सामान्य समाज इसे केवल चरित्र की दुर्बलता अथवा बुरी संगति का परिणाम मानकर व्यक्ति को तिरस्कृत करने लगता है। किंतु वैदिक ज्योतिष का गहन विज्ञान यह प्रमाणित करता है कि कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से नशे की दलदल में नहीं उतरता बल्कि उसकी जन्म पत्रिका में उपस्थित विशिष्ट ग्रह योग और कमजोर चंद्रमा उसकी निर्णय क्षमता को पंगु बना देते हैं। जब मन का स्वामी ग्रह पीड़ित होकर विवेक शून्य हो जाता है, तब जातक क्षणिक शांति की खोज में विषैले पदार्थों को अपना आश्रय बना लेता है। वैदिक ज्योतिष के प्रमाणिक सूत्र न केवल व्यसन के मूल कारणों को उजागर करते हैं अपितु सात्विक वैदिक उपायों द्वारा चेतना को पुनः जाग्रत करने का अचूक मार्ग भी प्रशस्त करते हैं।

नशे और व्यसन के मुख्य ज्योतिषीय भाव

वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार खान पान की आदतों, गुप्त व्यसनों, मानसिक संतुलन और आत्म नियंत्रण का आकलन करने के लिए कुंडली के विशिष्ट भावों का सूक्ष्म समन्वय देखा जाता है। जब इन आधारभूत भावों पर पापी और छाया ग्रहों का क्रूर प्रभाव स्थापित होता है, तब व्यक्ति नशे का शिकार बन जाता है।

नशे और बुरी आदतों को नियंत्रित करने वाले प्रमुख ज्योतिषीय भाव निम्नलिखित हैं।

  • द्वितीय भाव जन्म कुंडली का दूसरा भाव मुख, वाणी, स्वाद, भोजन की आदतों और प्राथमिक पारिवारिक संस्कारों का मुख्य केंद्र है। इस भाव का दूषित होना व्यक्ति को अखाद्य और मादक पदार्थों के सेवन की ओर धकेलता है।
  • अष्टम भाव आठवां भाव रंध्र भाव कहलाता है जो गुप्त गतिविधियों, छिपे हुए व्यसनों, विषैले रसायनों, नशीली दवाओं, अवसाद और आत्मघाती प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करता है।
  • प्रथम भाव (लग्न) लग्न भाव जातक के शरीर, आत्मबल, संकल्प शक्ति और आत्म नियंत्रण का आधार है। लग्न के कमजोर होने पर व्यक्ति अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रख पाता।
  • द्वादश भाव बारहवां भाव शयन सुख, एकांत, अचेतन मन, अस्पताल, कारावास और जीवन से पलायन करने की प्रवृत्ति का कारक माना जाता है।
  • पंचम भाव पांचवां भाव बुद्धि, विवेक और निर्णय क्षमता का स्थान है। इस भाव के पीड़ित होने पर व्यक्ति भले और बुरे का भेद भूल जाता है।
ज्योतिषीय भावनैसर्गिक प्रतिनिधित्वव्यसन में भूमिका का स्वरूप
द्वितीय भावमुख और खान पानअशुद्ध आहार, मदिरापान और तंबाकू का अनियंत्रित सेवन
अष्टम भावगुप्त आदतें और विषनशीली दवाएं, ड्रग्स और गहरे मानसिक तनाव से पलायन
प्रथम भावआत्मबल और शरीरकमजोर इच्छाशक्ति और बुरी संगति का सहज शिकार होना
द्वादश भावएकांत और व्ययबंद कमरों में नशा करना और स्क्रीन एडिक्शन में समय बर्बाद करना
पंचम भावप्रज्ञा और विवेकसही गलत की समझ का नाश और आत्म नियंत्रण खो बैठना

राहु और शनि का तामसिक प्रभाव

मादक पदार्थों के सेवन, मदिरा की लत और किसी भी प्रकार के गंभीर व्यसन के निर्माण में छाया ग्रह राहु और कर्म दंडाधिकारी शनि की भूमिका सर्वाधिक विनाशकारी मानी गई है।

वैदिक ज्योतिष में राहु ग्रह को समस्त प्रकार के रसायनों, विष, धुएं, शराब, भ्रम, मतिभ्रम, आभासी दुनिया और अनियंत्रित लालच का नैसर्गिक अधिपति माना गया है। राहु व्यक्ति के मस्तिष्क में ऐसा मायाजाल बुनता है जिससे जातक को नशे में ही वास्तविक सुख का भ्रम होने लगता है।

जब जन्म पत्रिका के द्वितीय भाव में राहु अपनी नीच अथवा शत्रु राशि में स्थित होते हैं अथवा क्रूर शनि के साथ युति बनाते हैं, तो जातक की खान पान की शुद्धि नष्ट हो जाती है। ऐसा व्यक्ति बहुत कम उम्र में ही मदिरा, तंबाकू अथवा गुटखे की लत में पड़ जाता है।

यदि शनि देव अपनी नीच राशि मेष में होकर द्वितीय अथवा अष्टम भाव को प्रभावित करें, तो व्यक्ति अवसाद को दबाने के लिए कठोर नशीले पदार्थों का सहारा लेता है। इसके अतिरिक्त यदि राहु का संबंध तीसरे अथवा बारहवें भाव से बन जाए, तो आज के युग में व्यक्ति अत्यधिक मोबाइल, गेमिंग और सोशल मीडिया के स्क्रीन एडिक्शन का शिकार होकर अपनी मानसिक शक्ति खो बैठता है।

चंद्रमा की पीड़ा और जल तत्व राशियों का संकट

वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को मानव मन, भावनाओं, मानसिक स्थिरता और शरीर के तरल तत्वों का स्वामी माना गया है। कोई भी व्यक्ति नशे की ओर केवल तभी आकर्षित होता है जब उसका मन भीतर से अशांत, भयभीत अथवा अकेला होता है।

जब जन्म पत्रिका में चंद्रमा जल तत्व की राशियों कर्क, वृश्चिक अथवा मीन में स्थित होकर छाया ग्रह राहु से ग्रसित होते हैं, तब अत्यंत घातक ग्रहण दोष का निर्माण होता है।

  • जल तत्व की राशि में स्थित पीड़ित चंद्रमा व्यक्ति को अत्यधिक संवेदनशील और भावनात्मक रूप से कमजोर बना देता है।
  • ऐसा जातक वास्तविक जीवन की चुनौतियों का सामना करने में असमर्थ अनुभव करता है और मानसिक शांति पाने के लिए तरल मादक पदार्थों जैसे शराब अथवा सिरप की शरण में चला जाता है।
  • यदि चंद्रमा वृश्चिक राशि में नीच के होकर 6ठे, 8वें अथवा 12वें भाव में बैठे हों और उन पर शनि की दृष्टि हो, तो व्यक्ति के मन में निरंतर नकारात्मक विचार आते हैं जिससे वह नशे को ही अपना एकमात्र सहारा मान लेता है।
  • जब चंद्रमा बुध के साथ मिलकर पीड़ित होता है, तो व्यक्ति का तंत्रिका तंत्र कमजोर हो जाता है जिससे वह किसी भी बुरी आदत को छोड़ने का प्रयास करने पर कांपने लगता है।
ग्रह स्थितिप्रभावित राशियांनिर्मित होने वाला दोषव्यसन का वास्तविक स्वरूप
द्वितीय भाव में राहुवृषभ, मिथुन या मकरमुख दोष एवं खान पान विकारअत्यधिक मदिरापान, धूम्रपान और मांसाहार की लत
वृश्चिक में पीड़ित चंद्रमाजल तत्व राशि वृश्चिकनीच चंद्र जनित मानसिक विषादगहरे अवसाद से बचने के लिए कठोर ड्रग्स का सेवन
द्वितीय भाव में नीच शनिमेष राशितामसिक वाणी एवं आहार दोषतंबाकू, नशीली गोलियां और अस्वस्थ जीवनशैली
चंद्र और राहु की युतिकर्क अथवा मीन राशिमानसिक ग्रहण दोषशराब की लत और डिजिटल स्क्रीन एडिक्शन

गोमेद पहनने की भयंकर भूल से बचें

अनेक बार अल्पज्ञानी ज्योतिषीय सलाह के कारण लोग राहु के प्रभाव को शांत करने के लिए व्यसनी व्यक्ति को गोमेद रत्न पहना देते हैं। वैदिक ज्योतिष का गूढ़ विज्ञान यह स्पष्ट करता है कि यह एक अत्यंत आत्मघाती कदम हो सकता है।

गोमेद राहु का रत्न है और वह राहु की तामसिक ऊर्जा और तरंगों को कई गुना बढ़ा देता है। यदि किसी शराबी अथवा नशे के लती व्यक्ति को गोमेद पहना दिया जाए, तो उसके भीतर नशे की तलब और अधिक उग्र हो जाती है।

गोमेद पहनने से व्यक्ति का भ्रम, आक्रामकता और मतिभ्रम चरम सीमा पर पहुंच सकता है जिससे वह अपराध अथवा गंभीर दुर्घटनाओं का शिकार हो सकता है। राहु की तामसिक ऊर्जा को कभी भी रत्न से नहीं बल्कि भगवान शिव की सात्विक उपासना और जल तत्व की शुद्धि से ही काटा जा सकता है।

व्यसन मुक्ति और मानसिक शुद्धि के सात्विक उपाय

यदि कोई व्यक्ति अथवा परिवार का कोई सदस्य नशे की भयंकर लत से जूझ रहा हो, तो सनातन वैदिक परंपरा में उसकी आत्मा को बलवान बनाने और तामसिक ऊर्जा को समाप्त करने के अत्यंत प्रभावशाली सात्विक उपाय बताए गए हैं।

साधना क्षेत्र अधिष्ठाता देव एवं साधना सात्विक वैदिक विधान
मानसिक शांति और चंद्र बल देवाधिदेव महादेव नटराज सोमवार को शिवलिंग पर पंचामृत अभिषेक और शिव चालीसा पाठ
राहु की तामसिक ऊर्जा का शमन भगवान सदाशिव की उपासना तांबे के पात्र को छोड़कर चांदी के लोटे से नित्य शिवलिंग पर जल अर्पण
आत्मबल और इच्छाशक्ति वृद्धि भगवान सूर्यनारायण को अर्घ्य प्रातः काल तांबे के लोटे से सूर्य को जल और गायत्री महामंत्र जप
बुद्धि शुद्धि और विवेक जागरण भगवान श्री गणेश की शरण बुधवार को 21 दूर्वा अर्पित करना और संकटनाशन स्तोत्र पाठ

व्यसन से मुक्ति पाने के प्रमुख सात्विक नियम निम्नलिखित हैं।

  • दाहिने हाथ में ठोस चांदी का कड़ा धारण करना चंद्रमा को मजबूत करने और राहु के तामसिक प्रभाव को समाप्त करने के लिए किसी शुभ सोमवार अथवा पूर्णिमा के दिन गंगाजल से शुद्ध करके बिना जोड़ वाला ठोस चांदी का कड़ा दाहिने हाथ में धारण करना चाहिए।
  • भगवान शिव का नित्य कच्चा दूध मिश्रित जलाभिषेक प्रतिदिन प्रातः काल शिवलिंग पर शुद्ध जल में थोड़ा सा गाय का कच्चा दूध मिलाकर अर्पित करें और ॐ नमः शिवाय का 108 बार जप करें। भगवान शिव ने हलाहल विष का पान किया था, अतः वे समस्त विषैले व्यसनों को भस्म करने वाले परम शक्तिमान देव हैं।
  • खान पान में पूर्ण सात्विक बदलाव व्यसनी व्यक्ति के भोजन में तामसिक तत्वों जैसे प्याज, लहसुन, अत्यधिक तीखे मसाले, बासी भोजन और मांसाहार को तुरंत बंद कर देना चाहिए तथा ताजे मौसमी फल, देसी गाय का दूध और हरी पत्तेदार सब्जियां देनी चाहिए।
  • पक्षियों और गौ माता की निस्वार्थ सेवा प्रतिदिन भोजन की पहली रोटी गौ माता को खिलाना और पक्षियों को सात प्रकार का अनाज डालना राहु और शनि के तामसिक कंपन को पूरी तरह शांत कर देता है।

आत्म नियंत्रण और चेतना की विजय

वैदिक सनातन दर्शन यह सिखाता है कि मनुष्य की आत्मा मूल रूप से शुद्ध, बुद्ध और सच्चिदानंद स्वरूप है। कोई भी नशा अथवा बुरी आदत आत्मा के मूल स्वभाव का हिस्सा नहीं है बल्कि वह केवल मन पर चढ़ी हुई तामसिक धूल की एक परत मात्र है। जब कोई व्यक्ति अथवा उसके परिजन वैदिक ज्योतिषीय ज्ञान के आलोक में अपनी जन्म पत्रिका के ग्रह दोषों को समझकर पूर्ण निष्ठा, सात्विक आचरण और ईश्वरीय साधना के साथ आगे बढ़ते हैं, तो बड़े से बड़ा व्यसन भी जड़ से समाप्त हो जाता है। अनुकूल ग्रह दशाएं और देवाधिदेव महादेव का आशीर्वाद मनुष्य को आत्म नियंत्रण और अखंड शांति प्रदान करते हैं। ईश्वर के प्रति अटूट आस्था, आहार शुद्धि और दृढ़ संकल्प शक्ति ही नशे के अंधकार पर विजय प्राप्त करने का एकमात्र शाश्वत और दिव्य मार्ग है।

FAQ

क्या कुंडली देखकर यह पता लगाया जा सकता है कि व्यक्ति को किस प्रकार का नशा होगा? हां, द्वितीय भाव में राहु मदिरा और स्क्रीन एडिक्शन देता है, नीच शनि तंबाकू व नशीली गोलियां देता है और पीड़ित चंद्रमा तरल मादक पदार्थों की लत का कारण बनता है।

नशे की लत छुड़ाने के लिए गोमेद रत्न क्यों नहीं पहनना चाहिए? गोमेद राहु के तामसिक कंपन को कई गुना बढ़ा देता है जिससे नशे की तलब घटने के बजाय और अधिक उग्र हो जाती है, इसलिए गोमेद पहनना सर्वथा वर्जित है।

चांदी का कड़ा पहनने से नशा मुक्ति में कैसे सहायता मिलती है? ठोस चांदी चंद्रमा का कारक है जो जल तत्व को संतुलित करके मन को स्थिर बनाता है और राहु के तामसिक भ्रम को काटकर आत्म नियंत्रण बढ़ाता है।

नशे से मुक्ति के लिए भगवान शिव की पूजा सबसे उत्तम क्यों मानी गई है? भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को अपने कंठ में धारण किया था, इसलिए वे समस्त प्रकार के विषैले रसायनों और व्यसनों को शांत करने वाले सर्वोच्च देवता हैं।

व्यसन से पीड़ित व्यक्ति को प्रतिदिन कौन सा मंत्र जपना चाहिए? व्यसन से मुक्ति और मानसिक शांति के लिए प्रतिदिन 108 बार ॐ नमः शिवाय अथवा महामृत्युंजय मंत्र का मानसिक जप करना सर्वोत्तम माना गया है।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

पं. अभिषेक शर्मा (63)


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