By पं. नीलेश शर्मा
सूर्य और शनि के प्रभाव से हड्डियों रीढ़ और जोड़ों के रोगों का वैदिक समाधान

वैदिक ज्योतिष और आयुर्वेद के अनुसार मानव शरीर पंचमहाभूतों तथा नवग्रहों की सूक्ष्म ऊर्जा का एक सजीव प्रतिरूप है। भौतिक देह को सुदृढ़ आधार देने वाला कंकाल तंत्र केवल कैल्शियम और खनिजों का ढांचा मात्र नहीं है बल्कि यह सौर मंडल के प्रमुख ग्रहों के ऊर्जावान संतुलन का दर्पण है। जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवाह अनुकूल होता है तब अस्थियां दृढ़ रहती हैं और जोड़ों में आवश्यक गतिशीलता बनी रहती है। इसके विपरीत जब जन्म कुंडली में विशिष्ट ग्रहों का संतुलन बिगड़ता है तब अस्थि संस्थान निर्बल होने लगता है।
शरीर की आंतरिक संरचना में हड्डियों का निर्माण अस्थि धातु के अंतर्गत आता है जिसके अधिष्ठाता ग्रह प्रत्यक्ष देव सूर्य हैं। इसके साथ ही संधियों अर्थात जोड़ों की संरचना स्नायु तंत्र और संपूर्ण शरीर में गति का नियमन शनि के प्रभाव क्षेत्र में आता है। जब इन दो प्रमुख ग्रहों का परस्पर संबंध किसी अशुभ भाव में बनता है अथवा इन पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव पड़ता है तब व्यक्ति रीढ़ की हड्डी के विकार और गठिया जैसी पीड़ादायक व्याधियों से ग्रस्त हो जाता है।
ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को जीवन शक्ति आत्मा और हड्डियों का प्राकृतिक कारक माना गया है। सूर्य का तेज ही शरीर में विटामिन डी के निर्माण और कैल्शियम के अवशोषण को नियंत्रित करता है। जन्म कुंडली में यदि सूर्य अपनी नीच राशि तुला में स्थित हो अथवा राहु और केतु के अक्ष में आकर ग्रहण दोष से पीड़ित हो जाए तो शरीर में अस्थि घनत्व तीव्रता से घटने लगता है। इस स्थिति में व्यक्ति को ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिससे हड्डियां भीतर से खोखली और कमजोर हो जाती हैं।
दूसरी ओर शनि देव शरीर में वात दोष जोड़ों के तरल पदार्थ अर्थात साइनोवियल फ्लूइड और नसों के कारक हैं। शनि की प्रकृति शीतल रूक्ष और संकुचित करने वाली है। जब कुंडली में शनि अशुभ प्रभाव में होता है तो वह जोड़ों के प्राकृतिक स्नेहक तत्व को सुखा देता है। इसके परिणामस्वरूप जोड़ों में घर्षण कठोरता और यूरिक एसिड का संचय होने लगता है जिसे सामान्य भाषा में गठिया या संधिशूल कहा जाता है।
| ग्रह और कारक तत्व | नियंत्रित शारीरिक संरचना | दुर्बल स्थिति का परिणाम | वैदिक ज्योतिषीय अवस्था |
|---|---|---|---|
| सूर्य (अग्नि तत्व) | अस्थि धातु और कैल्शियम संतुलन | ऑस्टियोपोरोसिस और अस्थि निर्बलता | तुला राशि में नीच अथवा राहु से युति |
| शनि (वायु तत्व) | जोड़ स्नायु और साइनोवियल फ्लूइड | जोड़ों में सूखापन और गठिया | मेष राशि में नीच अथवा छठे भाव में स्थित |
| मंगल (अग्नि तत्व) | मज्जा और अस्थि संरचना में रक्त | तीव्र सूजन और रीढ़ में जकड़न | शनि के साथ युति अथवा दृष्टि संबंध |
| राहु (छाया ग्रह) | अप्रत्याशित विकार और नसों में खिंचाव | सायटिका और निदान में भ्रम | सूर्य अथवा लग्न पर अशुभ प्रभाव |
रीढ़ की हड्डी मानव शरीर का मेरुदंड है जो व्यक्ति को सीधे खड़े रहने और गति करने की शक्ति देती है। कालपुरुष कुंडली में रीढ़ की हड्डी का संबंध मुख्य रूप से सिंह राशि और दशम भाव से देखा जाता है जबकि पृष्ठ भाग का नियंत्रण तृतीय भाव के अधीन होता है। जब मंगल और शनि का अशुभ योग कुंडली के छठे आठवें अथवा बारहवें भाव में निर्मित होता है तब रीढ़ की संरचना में गंभीर असंतुलन आ जाता है।
एक कुशल ज्योतिषी जब अस्थि विकारों का विश्लेषण करता है तो वह केवल एक ग्रह को देखकर निष्कर्ष नहीं निकालता है। इस प्रक्रिया में सर्वप्रथम लग्न और लग्नेश के बल की जांच की जाती है क्योंकि लग्नेश ही संपूर्ण देह की रोग प्रतिरोधक क्षमता का आधार है। यदि लग्नेश निर्बल हो तो साधारण ग्रह दोष भी शरीर पर गहरा प्रभाव डालते हैं।
इसके पश्चात षष्ठ भाव जिसे रोग भाव कहा जाता है और अष्टम भाव जिसे दीर्घकालिक व्याधियों का स्थान माना गया है उनका सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है। साथ ही षष्ठांश अर्थात डी 6 वर्ग कुंडली का विश्लेषण करके यह देखा जाता है कि रोग की प्रकृति वात जनित है अथवा पित्त जनित। जब वायु तत्व की राशियों मिथुन तुला और कुंभ में क्रूर ग्रहों का जमावड़ा होता है तब जोड़ों में वायु भरकर तीव्र संधिशूल की स्थिति उत्पन्न होती है। इस प्रकार ग्रहों की दशा अंतर्दशा और गोचर का सटीक मिलान करके ही रोग की उत्पत्ति और उसके समय का निर्धारण किया जाता है।
ज्योतिषीय निदान केवल समस्या की पहचान तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें प्रकृति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ तालमेल बैठाकर आरोग्य प्राप्त करने के दिव्य मार्ग बताए गए हैं। अस्थियों और रीढ़ को स्वस्थ रखने के लिए सूर्य की ऊर्जा को ग्रहण करना और शनि के वात प्रकोप को शांत करना अत्यंत आवश्यक होता है।
वैदिक दर्शन यह स्पष्ट करता है कि शरीर में उत्पन्न होने वाला कोई भी रोग केवल भौतिक कारणों से नहीं आता बल्कि वह सूक्ष्म ऊर्जा के असंतुलन का परिणाम होता है। सूर्य हमारे आत्मविश्वास और आत्मिक तेज के प्रतीक हैं जबकि शनि अनुशासन और कर्म के कारक हैं। जब व्यक्ति अपने जीवन में अनुशासनहीनता लाता है और सूर्य के प्राकृतिक प्रकाश से दूर रहता है तब उसकी अस्थियां निर्बल होने लगती हैं। नियमित दिनचर्या सूर्योपासना और वात नाशक उपायों को अपनाकर व्यक्ति न केवल रीढ़ और जोड़ों के रोगों से मुक्ति पा सकता है बल्कि अपनी आंतरिक चेतना को भी दीर्घायु और तेजस्वी बना सकता है।
हड्डियों की कमजोरी के लिए कौन सा ग्रह मुख्य रूप से जिम्मेदार होता है? हड्डियों की मजबूती और घनत्व के अधिष्ठाता ग्रह सूर्य हैं और जब कुंडली में सूर्य नीच राशि में या राहु से पीड़ित होते हैं तो हड्डियां कमजोर हो जाती हैं।
रीढ़ की हड्डी में स्लिप डिस्क और सायटिका का ज्योतिषीय कारण क्या है? मंगल और शनि का अशुभ योग तथा छठे या आठवें भाव में इन ग्रहों का प्रभाव रीढ़ की डिस्क में विकृति मांसपेशियों में खिंचाव और सायटिका दर्द का मुख्य कारण बनता है।
गठिया रोग और जोड़ों में यूरिक एसिड बढ़ने का संबंध किस ग्रह से है? जोड़ों के स्वास्थ्य और वात विकार के स्वामी शनि हैं और कुंडली में शनि के अशुभ प्रभाव से साइनोवियल फ्लूइड सूखने लगता है जिससे यूरिक एसिड बढ़कर गठिया बन जाता है।
अस्थि विकारों से मुक्ति के लिए कौन सा तेल मालिश के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है? वात शमन और जोड़ों की गतिशीलता को पुनः स्थापित करने के लिए दशमूल तेल और शुद्ध तिल के तेल की नियमित मालिश को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
कमजोर हड्डियों और विटामिन डी की कमी को दूर करने के लिए क्या वैदिक उपाय करना चाहिए? प्रतिदिन तांबे के लोटे से सूर्य देव को जल अर्पित करना गायत्री मंत्र का जाप करना और प्रातः कालीन सूर्य की धूप का सेवन करना सबसे प्रभावशाली वैदिक उपाय है।
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