पीड़ित ग्रह अनुसार सही रुद्राक्ष कैसे चुनें?

By पं. अमिताभ शर्मा

कुंडली के कमजोर ग्रहों की शांति और आभामंडल शुद्धि के लिए सही मुखी रुद्राक्ष का चयन और धारण विधि

पीड़ित ग्रह अनुसार रुद्राक्ष चयन की प्रामाणिक विधि

शिव कृपा और रुद्राक्ष की दिव्य ऊर्जा

सनातन परंपरा और वैदिक ज्योतिष में रुद्राक्ष को साक्षात भगवान शिव का महाप्रसाद माना गया है। श्रीमद्देवीभागवत और शिव महापुराण के अनुसार जब करुणा सागर देवाधिदेव महादेव ने जगत के कल्याण हेतु गहन समाधि के पश्चात अपने नेत्र खोले तब उनके नेत्रों से पवित्र अश्रु बिंदु गिरे जिनसे पावन रुद्राक्ष वृक्षों की उत्पत्ति हुई। यह पावन मनका केवल एक वनस्पति उत्पाद नहीं है अपितु यह ब्रह्मांडीय चेतना और दिव्य शिव ऊर्जा का साक्षात स्वरूप है।

भौतिक जगत में जब जीवात्मा अपने पूर्व जन्मों के संचित कर्मों के अनुसार इस पृथ्वी पर देह धारण करती है तो नवग्रह उसके भाग्य के नियामक बनते हैं। जब कुंडली में कोई ग्रह प्रतिकूल स्थान में बैठकर पीड़ा देता है तब व्यक्ति शारीरिक व्याधियों मानसिक संताप और आर्थिक अवरोधों से घिर जाता है। ऐसे समय में रुद्राक्ष एक अभेद्य सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है जो अपनी प्राकृतिक विद्युत चुंबकीय शक्ति से मानव शरीर के आभामंडल को शुद्ध करके अनिष्ट ग्रहों के दुष्प्रभावों को भस्म कर देता है।

रत्न और रुद्राक्ष के प्रभाव में अंतर

अनेक लोग ग्रह शांति के लिए बहुमूल्य रत्नों का आश्रय लेते हैं परंतु वैदिक मनीषियों ने रुद्राक्ष को रत्नों की तुलना में अत्यंत सुरक्षित और सर्वकल्याणकारी माना है। रत्न प्रकाश की किरणों को परावर्तित और केंद्रित करने वाले प्रिज्म की भांति कार्य करते हैं। यदि किसी मारक अथवा बाधक ग्रह का रत्न भूलवश धारण कर लिया जाए तो वह शरीर और जीवन में भयंकर विनाशकारी परिणाम ला सकता है।

इसके विपरीत रुद्राक्ष में किसी भी प्रकार का नकारात्मक या हानिकारक प्रभाव उत्पन्न करने का दोष नहीं होता है। रुद्राक्ष की जैव विद्युत चुंबकीय तरंगे शरीर के तंत्रिका तंत्र और चक्रों को स्वतः संतुलित करती हैं। यह पीड़ित ग्रह की नकारात्मक रश्मियों को सोखकर उन्हें सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित कर देता है। इसीलिए वैदिक ज्योतिषी निर्भय होकर पीड़ित ग्रह के शमन के लिए संबंधित मुखी रुद्राक्ष धारण करने का परामर्श देते हैं।

नवग्रह और विभिन्न मुखी रुद्राक्ष का संबंध

प्रत्येक मुखी रुद्राक्ष एक विशिष्ट देवता और एक निश्चित ग्रह की सूक्ष्म ऊर्जा से स्पंदित होता है। कुंडली के सबसे कमजोर अथवा क्रूर ग्रहों के प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए शास्त्रों में मुखी का स्पष्ट वर्गीकरण दिया गया है।

ग्रह मंडलअधिष्ठाता देवतानिर्धारित रुद्राक्षज्योतिषीय स्थिति और लाभ
सूर्य देवभगवान सूर्य और शिव1 मुखी अथवा 12 मुखीतुला राशि में नीच सूर्य को बल देना और नेत्र व हृदय रोग में लाभ
चंद्रमाअर्धनारीश्वर2 मुखीमानसिक अवसाद दूर करना और चित्त की एकाग्रता व शांति
मंगल ग्रहअग्नि देव3 मुखीरक्त विकार आलस्य और मांगलिक दोष के क्रोध का शमन
बुध देवभगवान ब्रह्मा4 मुखीबुद्धि विवेक वाणी दोष और तंत्रिका तंत्र की दुर्बलता का निवारण
गुरु बृहस्पतिरुद्र और सर्वेश्वर5 मुखीज्ञान संतान सुख मान सम्मान और यकृत संबंधी रोगों में सुरक्षा
शुक्र देवभगवान कार्तिकेय6 मुखीवैवाहिक सुख आकर्षण मधुमेह नियंत्रण और नेत्र ज्योति संवर्धन
शनि देवसप्तऋषि और महालक्ष्मी7 मुखी अथवा 14 मुखीसाढ़ेसाती ढैय्या वात रोग गठिया और घोर दरिद्रता से मुक्ति
राहु ग्रहभगवान श्री गणेश8 मुखीकालसर्प दोष अचानक आने वाले संकट और अज्ञात भय का नाश
केतु ग्रहनवदुर्गा9 मुखीमोक्ष प्राप्ति गुप्त शत्रु बाधा और तंत्र बाधा से परम रक्षा

जन्म कुंडली में पीड़ित ग्रह की पहचान कैसे करें?

एक योग्य ज्योतिषी जातक की जन्म पत्रिका का अध्ययन करते समय पीड़ित ग्रहों के स्वभाव और उनकी दुर्बलता के कारणों की विस्तृत मीमांसा करता है। ग्रह केवल नीच राशि में होने से पीड़ित नहीं होते बल्कि उनकी पीड़ा के अनेक ज्योतिषीय आयाम होते हैं।

  • जब कोई ग्रह अपनी नीच राशि में बैठा हो जैसे सूर्य का तुला में होना अथवा चंद्रमा का वृश्चिक में होना तो वह अपने शुभ फल देने में सर्वथा असमर्थ हो जाता है।
  • जब कोई शुभ ग्रह सूर्य के अत्यंत निकट आकर अस्त हो जाता है तब उसका प्रकाशीय प्रभाव शून्य हो जाता है और उसके संबंधित जीवन क्षेत्र में संघर्ष बढ़ जाता है।
  • कुंडली के त्रिक भावों अर्थात 6 8 और 12वें भाव में स्थित ग्रह गंभीर रोग ऋण और मानसिक तनाव उत्पन्न करते हैं।
  • जब चंद्रमा अथवा सूर्य पर राहु या केतु का ग्रहण दोष लग जाए अथवा शनि की तृतीय दशम या सप्तम दृष्टि पड़ रही हो तो वह ग्रह अत्यंत पीड़ित माना जाता है।
  • यदि कुंडली का लग्नेश अथवा भाग्येश निर्बल होकर शत्रु राशि में फंसा हो तो जातक का संपूर्ण जीवन दिशाहीन होने लगता है।

रुद्राक्ष धारण की शास्त्रीय विधि और नियम

रुद्राक्ष की वास्तविक ऊर्जा को जागृत करने के लिए शास्त्रीय प्राण प्रतिष्ठा और शुद्धिकरण अनिवार्य है। बिना सिद्ध किया हुआ रुद्राक्ष केवल एक आभूषण बनकर रह जाता है जबकि मंत्र सिद्ध मनका साक्षात कल्पवृक्ष समान फल देता है।

  • रुद्राक्ष धारण करने के लिए सोमवार सावन मास प्रदोष व्रत अथवा महाशिवरात्रि का दिन सर्वोत्तम माना जाता है।
  • प्रातः काल स्नानादि से निवृत्त होकर पूजा स्थल पर बैठें और तांबे अथवा चांदी के पात्र में रुद्राक्ष को रखें।
  • पंचामृत अर्थात गाय का कच्चा दूध दही देसी घी शहद और गंगाजल से रुद्राक्ष को विधिपूर्वक स्नान कराएं।
  • इसके पश्चात रुद्राक्ष पर श्वेत अथवा रक्त चंदन लगाएं और धूप दीप व अक्षत अर्पित करके भगवान शिव का ध्यान करें।
  • संबंधित ग्रह के बीज मंत्र अथवा भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र नमः शिवाय का कम से कम 108 बार श्रद्धापूर्वक जाप करें।
  • अंत में रुद्राक्ष को लाल पीले अथवा रेशमी धागे में पिरोकर या चांदी सोने के कवच में बनवाकर गले अथवा दाहिनी भुजा पर धारण करें।

आभामंडल की शुद्धि और आत्मिक उत्थान

रुद्राक्ष केवल ग्रहों की शांति का साधन नहीं है बल्कि यह साधक के चित्त को शांत कर उसे आत्म साक्षात्कार के मार्ग पर अग्रसर करता है। जब मनुष्य विधिपूर्वक शुद्ध मन से रुद्राक्ष धारण करता है तो उसके चारों ओर एक सकारात्मक आध्यात्मिक आभामंडल निर्मित हो जाता है। यह आभामंडल नकारात्मक विचारों तांत्रिक कुप्रभावों और अनपेक्षित दुर्घटनाओं से रक्षा करता है। ग्रहों की पीड़ा को शिव कृपा में बदलकर जीवन को धन धान्य उत्तम स्वास्थ्य और मोक्ष की ओर ले जाने की अद्भुत सामर्थ्य केवल रुद्राक्ष में ही निहित है।

FAQ

क्या रुद्राक्ष धारण करने से कोई नकारात्मक नुकसान हो सकता है? रुद्राक्ष कभी किसी व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है क्योंकि यह शिव का साक्षात कल्याणकारी स्वरूप है और केवल सकारात्मक ऊर्जा ही प्रदान करता है।

सूर्य ग्रह की दुर्बलता को दूर करने के लिए कौन सा रुद्राक्ष पहनना चाहिए? कुंडली में सूर्य के पीड़ित अथवा नीच होने पर 1 मुखी अथवा 12 मुखी रुद्राक्ष धारण करना सबसे अधिक फलदायी माना गया है।

शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के प्रभाव को कम करने के लिए कौन सा रुद्राक्ष उपयुक्त है? शनि के कष्टों से मुक्ति पाने और वात रोगों के शमन के लिए 7 मुखी अथवा 14 मुखी रुद्राक्ष धारण करना अत्यंत लाभकारी होता है।

राहु और केतु के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए क्या धारण करें? राहु के अनिष्ट निवारण हेतु 8 मुखी रुद्राक्ष और केतु के कष्टों से रक्षा पाने के लिए 9 मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

क्या महिलाएं भी सभी प्रकार के रुद्राक्ष धारण कर सकती हैं? शास्त्रों के अनुसार रुद्राक्ष पर सभी मानव जाति का समान अधिकार है इसलिए महिलाएं भी शुचिता के नियमों का पालन करते हुए रुद्राक्ष धारण कर सकती हैं।

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पं. अमिताभ शर्मा

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