क्या वैवाहिक विच्छेद होगा अथवा संबंध सुधरेंगे

By पं. नीलेश शर्मा

कुंडली के सप्तम भाव नवमांश और दशा से जानिए वैवाहिक संकट का समाधान

क्या तलाक होगा या संबंध सुधरेंगे जानिए ज्योतिषीय विश्लेषण

वैदिक ज्योतिष में विवाह केवल दो शरीरों का सामाजिक समझौता नहीं अपितु दो आत्माओं का पूर्वजन्म के संचित कर्मों से बंधा हुआ पवित्र गठबंधन माना गया है। जब जन्म पत्रिका में ग्रहों का संतुलन बिगड़ता है तब पति और पत्नी के मध्य गंभीर कलह, मानसिक अशांति तथा वैचारिक मतभेद उत्पन्न होने लगते हैं। कई बार यह स्थिति इतनी विकट हो जाती है कि व्यक्ति असमंजस में पड़ जाता है कि क्या यह वैवाहिक बंधन टूटकर कानूनी अलगाव में बदल जाएगा अथवा समय रहते इसमें सुधार होकर सुख शांति स्थापित हो सकेगी। जन्म कुंडली में उपस्थित विभिन्न भाव, भावेश, ग्रह दृष्टियां, सूक्ष्म नवमांश और महादशा का क्रम इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि वर्तमान संकट केवल एक क्षणिक परीक्षा है या फिर अंतिम विच्छेद की ओर ले जाने वाला प्रारब्ध है।

वैवाहिक स्थिति निर्धारित करने वाले प्रमुख ज्योतिषीय घटक

कुंडली का प्रत्येक भाव जीवन के किसी विशिष्ट आयाम को नियंत्रित करता है। दांपत्य जीवन के निर्माण, संचालन, विनाश और पुनर्निर्माण को समझने के लिए कुछ विशेष भावों और ग्रहों की स्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण अनिवार्य होता है।

ज्योतिषीय घटक वैवाहिक जीवन में मुख्य भूमिका नकारात्मक प्रभाव का परिणाम
सप्तम भाव जीवनसाथी, वैवाहिक सुख, साझेदारी जीवनसाथी से गंभीर मतभेद, तालमेल की कमी
षष्ठ भाव विवाद, शत्रुता, वाद विवाद, न्यायालयीन प्रक्रिया कानूनी मुकदमों और तलाक की अर्जी की स्थिति
अष्टम भाव वैवाहिक आयु, मांगल्य, गुप्त पीड़ा, आकस्मिक आघात वैवाहिक बंधन का टूटना, अचानक संबंध विच्छेद
द्वादश भाव शयन सुख, त्याग, दूरी, अलगाव भावनात्मक दूरी, शारीरिक संबंध का अभाव, पृथक्करण
उपपद लग्न विवाह का स्थायित्व, सामाजिक छवि, संबंध की आयु विवाह के अस्तित्व पर प्रत्यक्ष संकट
नवमांश कुंडली वैवाहिक भाग्य का सूक्ष्म फल, आंतरिक सत्य बाह्य रूप से अच्छा दिखने वाले संबंध का पतन

त्रिक भावों का वैवाहिक सुख पर प्रभाव

वैदिक सिद्धांत के अनुसार कुंडली के त्रिक भाव अर्थात 6, 8 और 12 भाव जीवन में संघर्ष, बाधाएं और हानियां लाते हैं। यदि इन भावों का सीधा संबंध सप्तम भाव या सप्तमेश के साथ बन जाता है तो वैवाहिक जीवन गंभीर संकट में घिर जाता है।

षष्ठ भाव को रोग, ऋण और रिपु के साथ साथ कानूनी मुकदमों का भाव माना जाता है। जब सप्तम भाव का स्वामी षष्ठ भाव में बैठ जाता है अथवा षष्ठेश सप्तम भाव में आकर बैठता है तो पति पत्नी एक दूसरे के विरोधी बन जाते हैं। सामान्य बातचीत भी तीखी बहस में बदल जाती है और बात पुलिस या न्यायालय तक पहुंच जाती है।

अष्टम भाव वैवाहिक जीवन की कुल आयु और मांगल्य का प्रतीक है। अष्टम भाव में पापी ग्रहों की स्थिति अथवा अष्टमेश का सप्तम भाव पर प्रभाव दांपत्य के मूल आधार को हिला देता है। यह स्थिति वैवाहिक रिश्ते में अविश्वास, गहरा मानसिक आघात और ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करती है जहां दोनों पक्षों के लिए साथ रहना असंभव प्रतीत होने लगता है।

द्वादश भाव व्यय, शयन सुख की हानि और अंतिम त्याग का घर है। जब द्वादश भाव पीड़ित होता है अथवा द्वादशेश का सप्तम भाव पर क्रूर प्रभाव होता है तो पति पत्नी के बीच शारीरिक और भावनात्मक दूरी आ जाती है। दोनों एक ही छत के नीचे रहकर भी अलग हो जाते हैं या फिर कोई एक साथी घर छोड़कर दूर चला जाता है।

अलगाववादी ग्रहों की दृष्टि और युति का प्रभाव

वैदिक ज्योतिष में कुछ ग्रहों की मूल प्रकृति ही संबंधों को काटने और अलग करने की होती है। इनमें मुख्य रूप से राहु, केतु और मंगल की भूमिका सबसे अधिक विनाशकारी सिद्ध हो सकती है। इसके अतिरिक्त सूर्य और शनि भी परिस्थितिजन्य अलगाव उत्पन्न करते हैं।

  • राहु का प्रभाव: राहु भ्रम, असंतोष और अनैतिक संदेह का कारक है। यदि राहु सप्तम भाव में स्थित हो या सप्तमेश के साथ युति बनाए तो वह व्यक्ति के मन में साथी के प्रति अकारण अविश्वास और भ्रम भर देता है जिससे संबंध अचानक टूटते हैं।
  • केतु का अलगाव: केतु वैराग्य और विरक्ति का ग्रह है। सप्तम भाव पर केतु का प्रभाव व्यक्ति को वैवाहिक जीवन से पूरी तरह उदासीन बना देता है और जातक रिश्ते को बचाने का कोई प्रयास नहीं करता।
  • मंगल का अंगारक योग: मंगल ऊर्जा, क्रोध और हिंसा का प्रतीक है। सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में मंगल की अशुभ स्थिति वैवाहिक रिश्ते में भयंकर क्लेश, अहंकार का टकराव और शारीरिक अथवा मानसिक प्रताड़ना का कारण बनती है।

नवमांश कुंडली और उपपद लग्न की निर्णायक भूमिका

लग्न कुंडली किसी भी घटना की स्थूल रूपरेखा प्रस्तुत करती है परंतु उसका वास्तविक परिणाम और सूक्ष्म सत्य नवमांश कुंडली अर्थात डी 9 चक्र में ही देखा जाता है। जन्म लग्न में यदि सप्तम भाव बलिष्ठ दिख रहा हो लेकिन नवमांश में सप्तमेश नीच राशि में हो अथवा 6, 8, 12 भावों में फंसा हो तो वह विवाह कभी सुखमय नहीं रह सकता।

इसी प्रकार जैमिनी ज्योतिष का उपपद लग्न जो कि द्वादश भाव का आरूढ़ पद होता है, विवाह के वास्तविक स्थायित्व को दर्शाता है। यदि उपपद लग्न पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो भारी विवाद के बाद भी विवाह बच जाता है। इसके विपरीत यदि उपपद लग्न और उससे द्वितीय भाव पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो विवाह का अंत कानूनी विच्छेद में होना लगभग निश्चित हो जाता है।

क्या अनुकूल दशा और गोचर से रिश्ते का पुनरुद्धार संभव है

विवाह टूटेगा या बचेगा, इसका अंतिम निर्णय वर्तमान महादशा, अंतर्दशा और ग्रहों के गोचर से तय होता है। भले ही कुंडली में कई अशुभ योग उपस्थित हों, परंतु यदि समय अनुकूल आ जाए तो उजड़ता हुआ घर भी पुनः बस जाता है।

यदि जातक की कुंडली में देवगुरु बृहस्पति अथवा नैसर्गिक शुभ ग्रह शुक्र की महादशा या अंतर्दशा प्रारंभ हो जाए तो दोनों पक्षों के मध्य सुलह की राह खुल जाती है। गुरु की अमृतमयी दृष्टि जब गोचर में सप्तम भाव अथवा सप्तमेश पर पड़ती है तो वह अहंकार और कड़वाहट को समाप्त कर देती है। ऐसे समय में परिवार के वरिष्ठ जन अथवा मध्यस्थ आगे आकर दोनों पक्षों में समझौता करा देते हैं और कानूनी प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। इसके विपरीत यदि दशा किसी मारक अथवा त्रिक भाव के स्वामी की चल रही हो तो संबंध का अंत अलगाव में ही होता है।

वैवाहिक शांति और सामंजस्य के वैदिक उपाय

यदि कुंडली में अलगाव के योग बन रहे हों परंतु दशा में थोड़ा भी शुभ प्रभाव शेष हो तो कुछ पारंपरिक वैदिक उपायों से दांपत्य जीवन की रक्षा की जा सकती है।

  1. गुरु ग्रह का सुदृढ़ीकरण: देवगुरु बृहस्पति की कृपा प्राप्त करने के लिए नियमित रूप से भगवान विष्णु की आराधना करें और गुरुवार को चने की दाल तथा हल्दी का दान करें।
  2. शिव शक्ति की संयुक्त पूजा: वैवाहिक जीवन के क्लेशों को दूर करने के लिए प्रतिदिन पारद शिवलिंग पर जल चढ़ाएं और माता पार्वती के साथ भगवान शिव का ध्यान करें।
  3. मंगल और राहु की शांति: यदि कुंडली में मांगलिक दोष या राहु की क्रूर दृष्टि के कारण विवाद हो रहा हो तो संबंधित ग्रहों के वैदिक मंत्रों का जप और शांति अनुष्ठान कराएं।
  4. गौरी शंकर रुद्राक्ष धारण: वैवाहिक संबंधों में मधुरता और भावनात्मक एकता पुनः स्थापित करने के लिए विधिवत प्राण प्रतिष्ठित गौरी शंकर रुद्राक्ष धारण करना लाभकारी माना जाता है।

FAQ

क्या कुंडली में केवल एक क्रूर ग्रह की दृष्टि से तलाक हो सकता है? नहीं, केवल एक ग्रह की दृष्टि से कभी तलाक नहीं होता। तलाक के लिए सप्तम भाव, सप्तमेश, कारक ग्रह, नवमांश और उपपद लग्न पर कई पाप ग्रहों का संयुक्त प्रभाव तथा अशुभ दशा का होना अनिवार्य है।

सप्तम भाव में राहु होने पर क्या विवाह निश्चित रूप से टूट जाता है? नहीं, सप्तम में राहु होने से विवाह में भ्रम और परेशानियां आती हैं परंतु यदि उस पर बृहस्पति की शुभ दृष्टि हो अथवा नवमांश बलिष्ठ हो तो संबंध टूटने से बच जाता है।

गोचर में गुरु का सप्तम भाव पर प्रभाव क्या परिणाम देता है? जब बृहस्पति गोचरवश जन्म कुंडली के सप्तम भाव को देखते हैं तो यह कड़वाहट को दूर करता है और अलगाव के कगार पर पहुंचे रिश्ते में भी समझौते और पुनर्मिलन की संभावना बनाता है।

विवाह टूटने में षष्ठ भाव और अष्टम भाव की क्या भूमिका होती है? षष्ठ भाव वैवाहिक जीवन में कानूनी विवाद, कलह और कोर्ट कचहरी की स्थिति उत्पन्न करता है जबकि अष्टम भाव वैवाहिक आयु को समाप्त करके अचानक संबंध विच्छेद करवाता है।

क्या नवमांश कुंडली देखे बिना तलाक की भविष्यवाणी की जा सकती है? नहीं, नवमांश कुंडली विवाह का वास्तविक फलित दर्पण है। जन्म लग्न के साथ नवमांश का मिलान किए बिना वैवाहिक विच्छेद का अंतिम निष्कर्ष निकालना ज्योतिषीय रूप से अपूर्ण माना जाता है।

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लेखक

पं. नीलेश शर्मा

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