आँखों की कमजोरी का ज्योतिषीय कारण क्या है?

By पं. संजीव शर्मा

सूर्य चंद्रमा और शुक्र के प्रभाव से दृष्टि दोष चश्मा और नेत्र रोगों का संपूर्ण वैदिक निदान

आँखों की कमजोरी और चश्मा लगने का ज्योतिषीय समाधान

नयनों की दिव्यता और ज्योतिषीय आधार

सृष्टि के प्रत्यक्ष दर्शन और ज्ञान की प्राप्ति का सबसे प्रमुख माध्यम मानव नेत्र हैं। वैदिक परंपरा में नेत्रों को केवल भौतिक अंग नहीं माना गया है अपितु इन्हें आत्मा की ज्योति और ऊर्जा का केंद्र स्वीकार किया गया है। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में वर्णन मिलता है कि विराट पुरुष के नेत्रों से सूर्य देव का प्राकट्य हुआ था। इसी दिव्य सिद्धांत के आधार पर वैदिक ज्योतिष में दृष्टि और नेत्र स्वास्थ्य का सीधा संबंध ब्रह्मांडीय प्रकाश पुंजों से जोड़ा गया है।

जब आकाशमंडल में स्थित ग्रहों का प्रभाव मानव शरीर के संवेदनशील केंद्रों पर पड़ता है तब उसका प्रभाव दृष्टि क्षमता पर भी दिखाई देता है। आधुनिक युग में दृष्टि का क्षीण होना अल्पायु में चश्मा लगना अथवा मोतियाबिंद और रेटिना के विकार सामान्य होते जा रहे हैं। भौतिक स्तर पर इसका कारण जीवनशैली हो सकता है किंतु ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यह जन्म कुंडली में स्थित विशिष्ट भावों और ग्रहों की दुर्बलता का परिणाम होता है।

द्वितीय और द्वादश भाव का दृष्टि संबंध

जन्म कुंडली के बारह भावों में से दो भाव विशेष रूप से नेत्रों की संरचना और उनकी कार्यप्रणाली का प्रतिनिधित्व करते हैं। कालपुरुष के मुख मंडल और अंगों के विभाजन के अनुसार द्वितीय भाव दाहिनी आँख का कारक माना जाता है जबकि द्वादश भाव बाईं आँख का अधिष्ठाता है। जब इन दोनों भावों पर शुभ ग्रहों का प्रभाव होता है तब जातक को तेजस्वी और तीक्ष्ण दृष्टि प्राप्त होती है।

यदि द्वितीय भाव अथवा इसके स्वामी पर पापी ग्रहों का प्रभाव हो तो दाहिनी आँख में विकार उत्पन्न होते हैं। इसके विपरीत जब द्वादश भाव पीड़ित होता है तो बाईं आँख की दृष्टि प्रभावित होती है। इन भावों में स्थित राशियां और उन पर पड़ने वाली दृष्टियां यह तय करती हैं कि दृष्टि दोष किस आयु में और किस तीव्रता से प्रकट होगा। यदि दोनों भाव एक साथ पीड़ित हो जाएं तो व्यक्ति को दोनों आँखों से संबंधित गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

नेत्र ज्योति के प्रमुख कारक ग्रह

ज्योतिष शास्त्र में दृष्टि और नेत्र ज्योति का निर्धारण मुख्य रूप से तीन ग्रहों के समन्वय से होता है। प्रत्यक्ष प्रकाश के स्वामी सूर्य देव दाहिनी आँख के नैसर्गिक कारक हैं और वे दृष्टि की तीव्रता को नियंत्रित करते हैं। रात्रि के अधिपति चंद्रमा बाईं आँख के कारक हैं जो आँखों की नमी और रेटिना की संवेदनशीलता को संभालते हैं। इसके अतिरिक्त शुक्र को नेत्र ज्योति अर्थात दृष्टि की स्पष्टता और सुंदरता का स्वामी माना गया है।

ग्रह और भाव नियंत्रित नेत्र अंग दुर्बलता का प्रभाव ज्योतिषीय स्थिति
सूर्य देव दाहिनी आँख और पुतली दृष्टि मंदता और मोतियाबिंद तुला राशि में नीच अथवा राहु से पीड़ित
चंद्रमा बाईं आँख और जलीय तत्व दृष्टि का धुंधलापन और रेटिना विकार वृश्चिक में नीच अथवा शनि से युक्त
शुक्र देव दृष्टि की स्पष्टता और लेंस चश्मा लगना और ज्योति का क्षय षष्ठ या अष्टम भाव में क्रूर प्रभाव
मंगल ग्रह नेत्र की रक्त वाहिकाएं आँखों में जलन और रक्त विकार द्वितीय या द्वादश भाव में अंगारक योग
शनि देव स्नायु तंत्र और नेत्र नसें नसों का सूखना और दृष्टि हानि सूर्य या चंद्र के साथ युति
राहु ग्रह भ्रम और दृष्टि विकृति बचपन में मोटा चश्मा लगना शुक्र या द्वितीयेश के साथ युति

चश्मा और दृष्टि दोष उत्पन्न करने वाले प्रमुख योग

दृष्टि दोष और नेत्र रोगों की उत्पत्ति केवल एक ग्रह के कारण नहीं होती बल्कि यह कई अशुभ ग्रह योगों के परस्पर मिलने से घटित होती है। जब कुंडली में प्रकाश तत्व कमजोर हो जाता है और अंधकार तत्व बढ़ जाता है तब आँखों की प्राकृतिक रोशनी क्षीण होने लगती है।

  • जब द्वितीय अथवा द्वादश भाव में सूर्य और शनि की युति होती है तो परस्पर शत्रुता के कारण दृष्टि की नसें कमजोर हो जाती हैं जिससे व्यक्ति को अल्पायु में चश्मा लगाना पड़ता है।
  • यदि शुक्र और राहु की युति द्वितीय या द्वादश भाव में हो तो आँखों का लेंस और कॉर्निया प्रभावित होता है जिससे दृष्टि में विकृति आ जाती है।
  • मंगल का द्वितीय या द्वादश भाव में स्थित होना आँखों में तीव्र दबाव लालिमा और नसों में रक्त संचार की विकृति पैदा करता है जिससे शल्य चिकित्सा की स्थिति बन सकती है।
  • सूर्य का राहु के साथ ग्रहण योग में होना अथवा चंद्रमा का केतु के साथ पीड़ित होना मोतियाबिंद और रेटिना के क्षरण का प्रमुख कारण बनता है।
  • जब द्वितीयेश और द्वादशेश दोनों त्रिक भावों अर्थात छठे आठवें अथवा बारहवें भाव में निर्बल होकर बैठ जाएं तो जातक को जन्म से ही दृष्टि हीनता या दुर्बल दृष्टि का संकट झेलना पड़ता है।

कुंडली में नेत्र दोष के विश्लेषण की चरणबद्ध विधि

एक अनुभवी ज्योतिषी जब किसी जातक की कुंडली में नेत्र विकारों का विश्लेषण करता है तो वह एक व्यवस्थित और शास्त्रीय पद्धति का अनुसरण करता है। सबसे पहले लग्न और लग्नेश के बल का परीक्षण किया जाता है क्योंकि लग्नेश की दृढ़ता पूरे शरीर की सहनशक्ति निर्धारित करती है। यदि लग्न बलवान है तो ग्रहों के अनिष्ट प्रभाव अत्यंत न्यूनतम हो जाते हैं।

इसके पश्चात द्वितीय और द्वादश भाव के स्वामियों की स्थिति तथा उन पर पड़ने वाली दृष्टियों का सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है। तीसरे चरण में सूर्य और चंद्रमा के प्रकाशीय अंशों का मूल्यांकन किया जाता है। यदि सूर्य और चंद्रमा जल तत्व की राशियों अथवा क्रूर ग्रहों के प्रभाव में हों तो दृष्टि मंद होने की संभावना बढ़ जाती है। अंत में नवांश अर्थात डी 9 और षष्ठांश अर्थात डी 6 वर्ग कुंडलियों का विश्लेषण करके यह देखा जाता है कि रोग की जड़ें आंतरिक कर्म दोष से जुड़ी हैं अथवा वर्तमान दशा चक्र का प्रभाव हैं। इस संपूर्ण गणना के पश्चात ही दशा और गोचर के आधार पर रोग की उत्पत्ति का सही समय बताया जाता है।

नेत्र रक्षा और दृष्टि संवर्धन के वैदिक उपाय

वैदिक ज्योतिष में रोगों के निवारण हेतु केवल उपचार नहीं अपितु प्रकृति और मंत्र शक्ति के सामंजस्य से युक्त आध्यात्मिक प्रक्रियाएं बताई गई हैं। यदि नेत्रों में दुर्बलता आ रही हो अथवा चश्मे का नंबर लगातार बढ़ रहा हो तो शास्त्रों में वर्णित अनुभूत उपायों का नियमपूर्वक पालन करना चाहिए।

  • नेत्र ज्योति की रक्षा और संवर्धन के लिए प्रतिदिन प्रातः काल चाक्षुषोपनिषद का श्रद्धापूर्वक पाठ करना अत्यंत चमत्कारी माना गया है।
  • तांबे के लोटे में जल भरकर प्रातः कालीन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दें और अपने दोनों हाथों को रगड़कर आँखों पर लगाएं।
  • त्रिफला चूर्ण को रात्रि में शुद्ध जल में भिगोकर रखें और प्रातः उस जल को बारीक वस्त्र से छानकर उससे आँखों को धोएं जिससे आँखों की शीतलता और दृष्टि बढ़ती है।
  • प्रतिदिन सूर्योदय के समय सूर्य नमस्कार के 12 चक्र पूर्ण करें जिससे शरीर में अग्नि तत्व और रक्त संचार का संतुलन बनता है।
  • भोजन में शुद्ध देशी गाय का घी और हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन बढ़ाएं तथा देर रात तक जागने की आदत का त्याग करें।
  • शुक्रवार के दिन सफेद वस्तुओं जैसे दूध चावल और मिश्री का दान करने से शुक्र की शुभता प्राप्त होती है जिससे नेत्र ज्योति सुरक्षित रहती है।

आत्मिक ज्योति और दृष्टि का संरक्षण

नेत्र केवल इस बाह्य जगत को देखने की खिड़की नहीं हैं बल्कि ये मनुष्य की अंतरात्मा की अभिव्यक्ति का दर्पण भी हैं। जब हम अपने जीवन में तामसिक आहार अनियंत्रित दिनचर्या और प्राकृतिक प्रकाश की उपेक्षा को स्थान देते हैं तब हमारे नेत्रों का तेज धीरे धीरे समाप्त होने लगता है। सूर्य और चंद्रमा के दिव्य सिद्धांतों को जीवन में उतारकर तथा वैदिक साधनाओं के माध्यम से हम न केवल अपनी भौतिक दृष्टि की रक्षा कर सकते हैं अपितु अपने भीतर के आत्मिक प्रकाश को भी उज्ज्वल बनाए रख सकते हैं।

FAQ

आँखों की रोशनी के लिए कौन सा ग्रह मुख्य रूप से उत्तरदायी होता है? आँखों की रोशनी के नैसर्गिक कारक सूर्य देव दाहिनी आँख के लिए और चंद्रमा बाईं आँख के लिए उत्तरदायी होते हैं जबकि शुक्र दृष्टि की स्पष्टता प्रदान करता है।

बचपन में ही मोटा चश्मा लगने का मुख्य ज्योतिषीय कारण क्या है? द्वितीय या द्वादश भाव में शुक्र और राहु की युति अथवा सूर्य पर शनि की क्रूर दृष्टि होने पर बचपन में ही दृष्टि कमजोर हो जाती है और मोटा चश्मा लग जाता है।

मोतियाबिंद और रेटिना के विकारों का कुंडली से क्या संबंध है? जब सूर्य या चंद्रमा राहु और केतु के अक्ष में आकर ग्रहण दोष से पीड़ित होते हैं तब मोतियाबिंद और रेटिना की दुर्बलता उत्पन्न होती है।

नेत्र रोगों से मुक्ति के लिए किस वैदिक पाठ को सर्वश्रेष्ठ माना गया है? नेत्रों की दुर्बलता को दूर करने और दृष्टि की रक्षा के लिए चाक्षुषोपनिषद का नित्य पाठ शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ और अचूक उपाय माना गया है।

आँखों की ज्योति को प्राकृतिक रूप से बढ़ाने के लिए कौन सा घरेलू वैदिक उपाय करना चाहिए? रात्रि में भिगोए गए त्रिफला के छने हुए जल से आँखों को धोना और उगते सूर्य के सम्मुख बैठकर त्राटक व सूर्य नमस्कार करना अत्यंत लाभकारी होता है।

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पं. संजीव शर्मा

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