By पं. संजीव शर्मा
जन्म कुंडली के भावों ग्रहों और षडाष्टक योग से समझें माता पिता और भाई बहनों के बीच कलह के ज्योतिषीय कारण

मानव जीवन में परिवार केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं है अपितु यह पूर्व जन्मों के संचित कर्मों और ऋणानुबंध का एक अत्यंत गूढ़ ताना बाना है। जब एक ही छत के नीचे पले बढ़े सगे भाई बहनों के मध्य अकारण द्वेष पनपने लगे अथवा पूजनीय माता पिता के साथ संबंधों में असहनीय कड़वाहट और अविश्वास का विष घुल जाए, तो यह केवल साधारण सांसारिक मतभेद नहीं होता। सनातन वैदिक दर्शन के अनुसार प्रत्येक आत्मा अपने विशिष्ट कर्म संस्कारों को लेकर जन्म लेती है। जब पारिवारिक सदस्यों की जन्म पत्रिकाओं में स्थित ऊर्जा तरंगें आपस में टकराती हैं अथवा अलगाववादी ग्रहों का क्रूर प्रभाव रक्त संबंधों के भावों पर पड़ता है, तब घनिष्ठतम रिश्तों में भी शत्रुता, संपत्ति विवाद और भारी मानसिक तनाव उत्पन्न हो जाता है। प्रेम और आदर का स्थान कटु संवाद, ईर्ष्या और भावनात्मक दूरी ले लेती है।
वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जन्म कुंडली का प्रत्येक भाव जीवन के विशिष्ट संबंध और उससे जुड़ी ऊर्जा का निर्धारण करता है। किसी भी जातक के पारिवारिक सौहार्द अथवा वैमनस्य का विश्लेषण करने के लिए कुछ विशिष्ट भावों और उनके अधिपति ग्रहों का सूक्ष्म अध्ययन अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
पारिवारिक रिश्तों का निर्धारण करने वाले प्रमुख भाव निम्नलिखित हैं।
| ज्योतिषीय भाव | नैसर्गिक संबंध | मुख्य कारक ग्रह | अशुभ प्रभाव का स्वरूप |
|---|---|---|---|
| तृतीय भाव | छोटे भाई बहन | मंगल | सहोदरों से ईर्ष्या और कटुता |
| एकादश भाव | बड़े भाई बहन | गुरु और शनि | बड़े भाई बहनों से उपेक्षा और दूरी |
| चतुर्थ भाव | माता और गृह शांति | चंद्रमा | मातृ सुख में कमी और घरेलू कलह |
| नवम भाव | पिता और पितृ धर्म | सूर्य और गुरु | पिता के साथ वैचारिक मतभेद |
| दशम भाव | पिता और कुल परंपरा | सूर्य | पिता से अधिकार और सम्मान का टकराव |
कुंडली में रक्त संबंधों के विखंडन का सबसे बड़ा कारण अलगाववादी ग्रहों का प्रतिकूल प्रभाव और पारस्परिक अशुभ दृष्टि संबंध होता है। वैदिक ज्योतिष में सूर्य, शनि, राहु और केतु को नैसर्गिक रूप से अलगाव कराने वाले ग्रह माना गया है।
जब लग्न भाव के स्वामी और तृतीय, चतुर्थ, नवम अथवा एकादश भाव के स्वामियों के बीच षडाष्टक योग बनता है, तो रिश्तों में असहनीय कड़वाहट आ जाती है। षडाष्टक योग का अर्थ है कि दो संबंधित ग्रहों का एक दूसरे से 6ठे और 8वें भाव में स्थित होना। 6ठा भाव शत्रुता, वाद विवाद और मुकदमों का कारक है, जबकि 8वां भाव आकस्मिक आघात, विश्वासघात और संबंधों के अंत को दर्शाता है। यदि लग्नेश और चतुर्थेश के मध्य षडाष्टक संबंध बन जाए, तो व्यक्ति का अपनी सगी माता के साथ कभी वैचारिक तालमेल नहीं बैठ पाता। इसी प्रकार यदि लग्नेश और नवमेश आपस में 6ठे और 8वें भाव में बैठे हों, तो पिता और पुत्र के बीच अकारण शत्रुता जैसी स्थिति निर्मित हो जाती है।
राहु और शनि की युति अथवा दृष्टि जब इन भावों पर पड़ती है, तो वह परिवार में गहरे अविश्वास, संशय और षड्यंत्र का वातावरण तैयार करती है। राहु व्यक्ति के मन में भ्रम और लोभ उत्पन्न करता है, जिससे वह अपने ही रक्त संबंधियों को शंका की दृष्टि से देखने लगता है।
पारिवारिक कलह के मूल में प्रायः दो मुख्य प्रवृत्तियां कार्य करती हैं, जिनमें पहला है ग्रह जनित अहंकार और दूसरा है संपत्ति अथवा अधिकारों को लेकर उत्पन्न विवाद।
वैदिक ज्योतिष केवल समस्या की पहचान तक सीमित नहीं रहता अपितु यह काल गणना के माध्यम से उस सटीक समय का भी बोध कराता है जब पारिवारिक क्लेश समाप्त होकर सुलह का मार्ग प्रशस्त होता है।
पारिवारिक रिश्तों में सुधार मुख्यतः शुभ ग्रहों की अनुकूल दशा, अंतर्दशा और गोचर पर निर्भर करता है।
रक्त संबंधों की पवित्रता को पुनर्स्थापित करने और ग्रहों के क्रूर प्रभाव को शांत करने के लिए वैदिक परंपरा में अत्यंत प्रभावशाली सात्विक उपाय बताए गए हैं। इन उपायों के श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और परिवार में स्नेह का संचार होता है।
| लक्षित संबंध | अधिष्ठाता देव एवं साधना | सात्विक वैदिक उपाय |
|---|---|---|
| माता के साथ संबंध | माता पार्वती और चंद्र देव उपासना | पूर्णिमा के दिन दूध और जल का अर्घ्य देना तथा माता के चरण स्पर्श |
| पिता के साथ संबंध | भगवान सूर्यनारायण की पूजा | नित्य प्रातः तांबे के लोटे से सूर्य को अर्घ्य और आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ |
| भाई बहनों से संबंध | भगवान कार्तिकेय और श्री हनुमान साधना | मंगलवार को सुंदरकांड पाठ तथा भाई बहनों को उपहार भेंट करना |
| संपूर्ण परिवार शुद्धि | भगवान शिव परिवार की संयुक्त आराधना | घर में रुद्राभिषेक तथा नियमित रूप से कर्पूर और लोबान की धूप |
पारिवारिक क्लेश निवारण के प्रमुख नियम इस प्रकार हैं।
पारिवारिक संबंध केवल रक्त के बंधन नहीं अपितु आत्माओं के आत्मिक संधान हैं। जब मनुष्य ज्योतिषीय मार्गदर्शन के द्वारा अपने प्रतिकूल ग्रहों के प्रभाव को समझकर क्षमा, त्याग और सेवा का मार्ग चुनता है, तब बड़े से बड़े ग्रह दोष और षडाष्टक योग का अशुभ प्रभाव भी निष्प्रभावी हो जाता है। अपने माता पिता और भाई बहनों का सम्मान करना ही सबसे बड़ा धर्म है। सात्विक वैदिक आचरण और ईश्वरीय शरणागति से कलह का अंधकार दूर होता है और परिवार पुनः प्रेम, विश्वास तथा अखंड आनंद के प्रकाश से आलोकित हो उठता है।
क्या कुंडली का षडाष्टक योग परिवार में कभी सुलह नहीं होने देता? षडाष्टक योग अत्यंत तीव्र मतभेद और कटुता उत्पन्न करता है, परंतु शुभ ग्रहों जैसे देवगुरु बृहस्पति की दशा अथवा गोचरीय दृष्टि आने पर उचित वैदिक उपायों के माध्यम से सुलह संभव हो जाती है।
माता के साथ संबंध सुधारने के लिए किस ग्रह को मजबूत करना चाहिए? माता के साथ मधुर संबंध स्थापित करने के लिए कुंडली के चतुर्थ भाव और उसके नैसर्गिक कारक चंद्रमा को मजबूत करना अनिवार्य है, जिसके लिए शिव उपासना और माता की सेवा सर्वोत्तम उपाय है।
सगे भाइयों के बीच संपत्ति विवाद के लिए मुख्य रूप से कौन सा ग्रह उत्तरदायी है? सगे भाइयों के बीच संपत्ति विवाद के लिए मुख्य रूप से पीड़ित मंगल और शनि की युति अथवा राहु का तृतीय और चतुर्थ भाव पर क्रूर प्रभाव उत्तरदायी होता है।
पिता के साथ अत्यधिक वैचारिक मतभेद होने पर कौन सा वैदिक स्तोत्र पढ़ना चाहिए? पिता के साथ वैचारिक मतभेद दूर करने और संबंधों में आदर भाव बढ़ाने के लिए प्रतिदिन सूर्योदय के समय आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत लाभकारी माना गया है।
पारिवारिक शांति के लिए घर में किस प्रकार की पूजा सबसे अधिक फलदायी मानी जाती है? पारिवारिक शांति और कलह मुक्ति के लिए घर में संपूर्ण शिव परिवार की संयुक्त आराधना, पार्थिव रुद्राभिषेक तथा नित्य संध्या समय कर्पूर की आरती सबसे अधिक फलदायी होती है।
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