By पं. अमिताभ शर्मा
कुंडली के अष्टम और दशम भाव से समझें विवाह के बाद ससुराल का वैभव सास ससुर से संबंध और मान सम्मान के योग

सनातन वैदिक परंपरा में विवाह केवल दो व्यक्तियों का शारीरिक अथवा सामाजिक मिलन नहीं है अपितु यह दो कुलों, दो आत्माओं के संचित संस्कारों और पूर्व जन्मों के ऋणानुबंध का पावन संगम है। जब कोई कन्या अथवा वर परिणय सूत्र में बंधकर नए परिवार में प्रवेश करता है, तो उसके मन में यह स्वाभाविक और गहन जिज्ञासा उठती है कि उसका ससुराल पक्ष कैसा होगा, वहां उसे मान सम्मान प्राप्त होगा या संघर्ष का सामना करना पड़ेगा और सास ससुर के साथ उसके संबंध कितने मधुर रहेंगे। वैदिक दर्शन के अनुसार व्यक्ति को कैसा वैवाहिक परिवार प्राप्त होगा, यह सब कुछ उसकी जन्म पत्रिका में पहले से ही निश्चित होता है। विवाह के पश्चात मिलने वाला नया घर, वहां का वातावरण, संपत्ति की स्थिति और ससुराल के सदस्यों का व्यवहार ब्रह्मांडीय ऊर्जा और विशिष्ट ग्रहों की स्थिति से संचालित होता है। जन्म कुंडली का सूक्ष्म अध्ययन इन सभी अदृश्य रहस्यों को पूरी स्पष्टता के साथ उजागर कर देता है।
वैदिक ज्योतिष में भावात भावम के अकाट्य सिद्धांत के अनुसार ससुराल पक्ष और उसके विभिन्न सदस्यों का आकलन करने के लिए जन्म कुंडली के विशिष्ट भावों का अध्ययन किया जाता है। सप्तम भाव जातक के जीवनसाथी का घर होता है, इसलिए सप्तम भाव को लग्न मानकर ससुराल के अन्य पारिवारिक सदस्यों के भावों की गणना की जाती है।
ससुराल पक्ष का निर्धारण करने वाले प्रमुख ज्योतिषीय भाव निम्नलिखित हैं।
| ज्योतिषीय भाव | ससुराल का संबंध | कारक ग्रह | वैवाहिक जीवन पर प्रभाव |
|---|---|---|---|
| अष्टम भाव | ससुराल का परिवार और कुल संपत्ति | गुरु और शुक्र | ससुराल का आर्थिक स्तर, संस्कार और सम्मान |
| दशम भाव | सास का स्थान और अधिकार | चंद्रमा और मंगल | सास के साथ भावनात्मक प्रेम अथवा सत्ता का संघर्ष |
| तृतीय भाव | ससुर का स्थान और मार्गदर्शन | सूर्य और गुरु | ससुर का आशीर्वाद, सामाजिक मान और सहयोग |
| द्वादश भाव | ससुराल के दूरस्थ संबंध और व्यय | शनि और राहु | ससुराल में वैचारिक दूरी अथवा विदेशी ससुराल |
| एकादश भाव | जीवनसाथी के बड़े भाई बहन | गुरु और बुध | जेठ, जेठानी या ननद से प्राप्त होने वाला लाभ |
जन्म कुंडली के अष्टम भाव की स्थिति यह तय करती है कि ससुराल पक्ष में जातक का स्वागत किस प्रकार होगा और वहां उसे कैसा मान सम्मान प्राप्त होगा।
जब जन्म पत्रिका के आठवें भाव में देवगुरु बृहस्पति, दैत्यगुरु शुक्र, शुभ बुध अथवा पूर्ण बली चंद्रमा जैसे शुभ ग्रह विराजमान होते हैं, तो जातक को अत्यंत धनवान, सुशिक्षित और उच्च कुल का ससुराल प्राप्त होता है। ऐसे ससुराल में जातक को अपनी संतान के समान प्रेम दिया जाता है और उसे कभी किसी वस्तु का अभाव नहीं होता। यदि अष्टम भाव में गुरु अपनी स्वराशि धनु अथवा मीन में हों या उच्च राशि कर्क में स्थित हों, तो ससुराल पक्ष धार्मिक, प्रतिष्ठित और जातक की हर इच्छा का सम्मान करने वाला होता है। इसी प्रकार शुक्र का अष्टम भाव में होना ससुराल में अपार विलासिता, ऐश्वर्य और भौतिक सुखों की प्रचुरता को दर्शाता है।
अष्टमेश यदि जन्म कुंडली के केंद्र 1, 4, 7, 10 अथवा त्रिकोण 1, 5, 9 भाव में शुभ ग्रहों के साथ बैठा हो, तो विवाह के तुरंत बाद जातक के भाग्य का तीव्र उदय होता है और ससुराल के सहयोग से जीवन में अभूतपूर्व प्रगति होती है।
यदि किसी जातक की जन्म पत्रिका में अष्टम भाव पाप ग्रहों से पीड़ित हो अथवा वहां क्रूर ग्रहों का वास हो, तो ससुराल के वातावरण में अशांति और कड़वाहट का जन्म होता है।
जब अष्टम भाव में सूर्य, राहु, केतु, शनि अथवा वक्री मंगल जैसे क्रूर ग्रह स्थित होते हैं, तो ससुराल में राजनीति, षड्यंत्र और अविश्वास का माहौल बन जाता है। अष्टम भाव में स्थित राहु ससुराल के लोगों में दोहरा चरित्र, कपट और गुप्त बातें छिपाने की प्रवृत्ति पैदा करता है। यदि अष्टम भाव में सूर्य स्थित हो, तो ससुराल के सदस्यों के भीतर अत्यधिक अहंकार होता है और वे जातक को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं।
मंगल का अष्टम भाव में होना मांगलिक दोष का निर्माण करता है जो ससुराल में संपत्ति विवाद, कटु भाषा और अचानक होने वाले कलह को जन्म देता है। जब शनि देव अष्टम भाव में नीच या पीड़ित होकर बैठते हैं, तो ससुराल में जातक को लंबे समय तक उपेक्षा, अत्यधिक पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ और भावनात्मक अकेलापन सहन करना पड़ता है।
सास और ससुर के साथ जातक का तालमेल कैसा रहेगा, इसका उत्तर दशम और तृतीय भाव के सूक्ष्म विश्लेषण से प्राप्त होता है।
| सास ससुर संबंध योग | प्रमुख ग्रह स्थितियां | भाव संबंध | संबंधों का वास्तविक स्वरूप |
|---|---|---|---|
| सास से अगाध प्रेम | दशम भाव में चंद्रमा या गुरु | 4 और 10 भाव का योग | मातृत्व जैसा वात्सल्य, घर में आदर और पूर्ण स्वतंत्रता |
| सास से तीव्र मतभेद | दशम भाव में राहु या सूर्य | 10 और 6 भाव का संबंध | सास का कठोर नियंत्रण, ताने और घरेलू राजनीति |
| ससुर का पूर्ण समर्थन | तृतीय भाव में गुरु या सूर्य | 3 और 9 भाव की युति | पितातुल्य संरक्षण, हर निर्णय में सहयोग और सुरक्षा |
| ससुराल में अलगाव योग | अष्टमेश का 6ठे या 12वें भाव में होना | 8 और 12 भाव की स्थिति | विवाह के उपरांत ससुराल से दूरी अथवा अलग निवास |
वैदिक ज्योतिष में विवाह और वैवाहिक सुख की अंतिम पुष्टि के लिए नवमांश कुंडली अर्थात डी 9 चार्ट का अध्ययन परम आवश्यक माना गया है। लग्न कुंडली केवल बाह्य परिस्थितियों को दर्शाती है, जबकि नवमांश कुंडली ससुराल की आंतरिक वास्तविकता को उजागर करती है।
नवमांश चक्र से प्राप्त होने वाले प्रमुख ज्योतिषीय संकेत इस प्रकार हैं।
ससुराल में अपना आदर बढ़ाने, सास ससुर के साथ प्रेमपूर्ण संबंध स्थापित करने और अष्टम भाव के दोषों को शांत करने के लिए वैदिक सनातन परंपरा में अत्यंत प्रभावशाली सात्विक उपाय बताए गए हैं।
| लक्षित उद्देश्य | अधिष्ठाता देव एवं साधना | सात्विक वैदिक उपाय |
|---|---|---|
| सास के साथ मधुर संबंध | माता पार्वती और चंद्र देव उपासना | सोमवार को शिवलिंग पर कच्चा दूध अर्पण और शिव चालीसा पाठ |
| ससुर का आशीर्वाद और आदर | भगवान सूर्यनारायण की पूजा | नित्य प्रातः तांबे के पात्र से सूर्य को जल और गायत्री मंत्र जप |
| ससुराल के कलह से मुक्ति | भगवान श्री गणेश की आराधना | बुधवार को दूर्वा अर्पित करना और संकटनाशन स्तोत्र का पाठ |
| अष्टम भाव की शुद्धि और शांति | माँ महालक्ष्मी और श्री हरि विष्णु | शुक्रवार को श्री सूक्त का पाठ और घर में सुगंधित धूप प्रज्वलित करना |
|
पारिवारिक समरसता स्थापित करने के प्रमुख सात्विक नियम निम्नलिखित हैं।
विवाह के उपरांत ससुराल को अपना समझना और वहां के सदस्यों को अपने आत्मिक प्रेम से जीतना ही सनातन संस्कृति का सर्वोच्च संस्कार है। जब कोई जातक अपनी जन्म पत्रिका में स्थित ग्रहों के प्रभाव को समझकर धैर्य, क्षमा, सेवा और सात्विक आचरण का मार्ग अपनाता है, तो ससुराल के समस्त ग्रह दोष स्वतः शांत हो जाते हैं। प्रतिकूल ग्रह स्थितियां भी ईश्वरीय कृपा और मधुर व्यवहार के सम्मुख नतमस्तक हो जाती हैं। अपने सास ससुर को माता पिता तुल्य सम्मान देना और परिवार की मर्यादा की रक्षा करना ही व्यक्ति को ससुराल में साक्षात लक्ष्मी और कुल का गौरव बना देता है।
क्या कुंडली का अष्टम भाव देखकर ससुराल की आर्थिक स्थिति का पता लगाया जा सकता है? हां, अष्टम भाव सप्तम से दूसरा भाव होने के कारण ससुराल के संचित धन, अचल संपत्ति और उनकी वास्तविक वित्तीय स्थिति को पूरी सटीकता से दर्शाता है।
सास के साथ संबंध खराब होने का मुख्य ज्योतिषीय कारण क्या होता है? सास के साथ संबंध खराब होने का मुख्य कारण कुंडली के दशम भाव पर राहु, सूर्य अथवा मंगल का क्रूर प्रभाव होना और चंद्रमा का पीड़ित होना होता है।
यदि अष्टम भाव में राहु हो तो ससुराल में किस प्रकार की सावधानियां रखनी चाहिए? अष्टम भाव में राहु होने पर ससुराल में किसी भी व्यक्ति के साथ वित्तीय लेन देन में अत्यधिक पारदर्शिता रखनी चाहिए और किसी भी घरेलू राजनीति अथवा गपशप से दूर रहना चाहिए।
ससुराल में मान सम्मान बढ़ाने के लिए कौन सा वैदिक उपाय सबसे उत्तम है? ससुराल में मान सम्मान बढ़ाने के लिए प्रतिदिन सूर्योदय के समय सूर्य देव को जल अर्पित करना और शुक्रवार को माँ लक्ष्मी के सम्मुख श्री सूक्त का पाठ करना सबसे उत्तम उपाय है।
क्या नवमांश कुंडली सास ससुर से मिलने वाले सुख की पुष्टि करती है? हां, नवमांश कुंडली के तृतीय और दशम भाव की स्थिति यह पूरी तरह स्पष्ट कर देती है कि विवाह के बाद सास और ससुर से जातक को कितना वास्तविक सहयोग और सुख प्राप्त होगा।
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