By पं. सुव्रत शर्मा
जन्म कुंडली के द्वितीय और सप्तम भाव के मारकेश तथा बाधक ग्रहों की दशा में आयु और स्वास्थ्य रक्षा के सात्विक वैदिक उपाय

मानव जीवन का भौतिक अस्तित्व ब्रह्मांडीय समय चक्र और ग्रहों की विशिष्ट रश्मियों के अधीन संचालित होता है। सनातन वैदिक दर्शन के अनुसार प्रत्येक आत्मा एक निश्चित आयु सीमा और निर्धारित प्रारब्ध के साथ इस धरातल पर देह धारण करती है। जब किसी जातक के जीवन में अचानक गंभीर शारीरिक व्याधियां उत्पन्न होने लगें, निरंतर दुर्घटनाओं का भय सताने लगे अथवा स्वास्थ्य बिना किसी स्पष्ट चिकित्सीय कारण के गिरने लगे, तो यह कुंडली में सक्रिय हुई मारक अथवा बाधक ऊर्जा का संकेत होता है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में जन्म पत्रिका के कुछ विशिष्ट भावों को आयु क्षय और जीवन शक्ति के क्षरण का केंद्र माना गया है। जब इन भावों के स्वामियों की दशा अथवा अंतर्दशा सक्रिय होती है, तो व्यक्ति को असहनीय शारीरिक और मानसिक संताप से गुजरना पड़ता है। ऐसी विषम परिस्थितियों में घबराने के स्थान पर ऋषियों द्वारा प्रतिपादित सूक्ष्म ज्योतिषीय आकलन और सात्विक वैदिक उपायों का आश्रय लेना ही जीवन रक्षा का सबसे सुरक्षित मार्ग है।
वैदिक ज्योतिष के मूल ग्रंथ बृहत पराशर होरा शास्त्र के अनुसार जन्म कुंडली के आठवें भाव को मुख्य आयु स्थान माना जाता है और तीसरे भाव को आयु का दूसरा पूरक स्थान माना जाता है। किसी भी भाव से बारहवां भाव उस भाव के फलों का व्यय अथवा हानि करता है। इसी गणितीय सिद्धांत के आधार पर आठवें भाव से बारहवां भाव अर्थात सातवां भाव और तीसरे भाव से बारहवां भाव अर्थात दूसरा भाव मारक भाव कहलाते हैं।
मारक शक्तियों के निर्धारण में निम्नलिखित ज्योतिषीय घटकों का अध्ययन किया जाता है।
| लग्न राशि | द्वितीय भाव का स्वामी (मारकेश) | सप्तम भाव का स्वामी (मारकेश) | मारक प्रभाव का मुख्य स्वरूप |
|---|---|---|---|
| मेष लग्न | शुक्र ग्रह | शुक्र ग्रह | शारीरिक दुर्बलता और अचानक व्याधि |
| वृषभ लग्न | बुध ग्रह | मंगल ग्रह | रक्त विकार और शल्य चिकित्सा |
| मिथुन लग्न | चंद्रमा | गुरु ग्रह | मानसिक तनाव और कफ जनित रोग |
| कर्क लग्न | सूर्य देव | शनि देव | अस्थि रोग और दीर्घकालिक कष्ट |
| सिंह लग्न | बुध ग्रह | शनि देव | तंत्रिका तंत्र विकार और वात रोग |
| कन्या लग्न | शुक्र ग्रह | गुरु ग्रह | उदर रोग और जीवन ऊर्जा का ह्रास |
| तुला लग्न | मंगल ग्रह | मंगल ग्रह | दुर्घटना योग और रक्त संबंधी समस्या |
| वृश्चिक लग्न | गुरु ग्रह | शुक्र ग्रह | गुप्त व्याधियां और शारीरिक क्षय |
| धनु लग्न | शनि देव | बुध ग्रह | श्वास रोग और जोड़ों में असहनीय पीड़ा |
| मकर लग्न | शनि देव | चंद्रमा | मानसिक विषाद और छाती के विकार |
| कुंभ लग्न | गुरु ग्रह | सूर्य देव | नेत्र विकार और हृदय संबंधी दबाव |
| मीन लग्न | मंगल ग्रह | बुध ग्रह | त्वचा रोग और आकस्मिक शारीरिक आघात |
जन्म पत्रिका में केवल मारकेश ही नहीं अपितु बाधक ग्रह भी स्वास्थ्य और जीवन में अदृश्य रुकावटें खड़ी करने में प्रमुख भूमिका निभाता है। प्रत्येक लग्न की प्रकृति के आधार पर एक विशिष्ट भाव बाधक भाव बन जाता है।
लग्न के स्वरूप के अनुसार बाधक भाव का निर्धारण इस प्रकार होता है।
| लग्न की प्रकृति | अंतर्गत आने वाली राशियां | बाधक भाव | बाधकेश का नकारात्मक प्रभाव |
|---|---|---|---|
| चर लग्न | 1, 4, 7, 10 (मेष, कर्क, तुला, मकर) | एकादश भाव (11वां) | कार्य सिद्धि में अचानक अवरोध और अज्ञात व्याधि |
| स्थिर लग्न | 2, 5, 8, 11 (वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ) | नवम भाव (9वां) | भाग्य की हानि, पिता को कष्ट और दीर्घकालिक रोग |
| द्विस्वभाव लग्न | 3, 6, 9, 12 (मिथुन, कन्या, धनु, मीन) | सप्तम भाव (7वां) | मारक और बाधक का दोहरा प्रभाव तथा जीवन संकट |
कुंडली में मारकेश अथवा बाधक ग्रह की दशा प्रारंभ होते ही व्यक्ति की मृत्यु हो जाएगी ऐसा सोचना सर्वथा अनुचित और भ्रामक है। वैदिक ज्योतिष में सर्वप्रथम जातक की कुल संभावित आयु का गणितीय आकलन किया जाता है।
आयु खंडों का विभाजन मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में किया जाता है।
यदि किसी जातक की कुंडली में दीर्घायु योग विद्यमान है और उसकी 25 या 35 वर्ष की आयु में मारकेश की दशा आ जाती है, तो वह दशा मृत्यु नहीं देती। ऐसी स्थिति में मारकेश केवल मृत्यु तुल्य कष्ट देता है, जैसे गंभीर व्यापारिक घाटा, मानहानि, नौकरी का छूटना अथवा कोई ऐसी बीमारी जिससे व्यक्ति कुछ समय के लिए बिस्तर पर आ जाए।
जब किसी व्यक्ति पर मारकेश अथवा बाधकेश की अंतर्दशा का क्रूर प्रभाव पड़ता है, तो उसके शरीर और जीवन में स्पष्ट चेतावनी संकेत दिखाई देने लगते हैं।
वैदिक सनातन परंपरा में मारक दोषों के निवारण और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति हेतु अत्यंत शक्तिशाली सात्विक अनुष्ठानों का विधान किया गया है। इन वैदिक प्रयोगों से नकारात्मक ऊर्जा तत्काल शांत हो जाती है।
| लक्षित संकट | अधिष्ठाता देव एवं साधना | सात्विक वैदिक विधान |
|---|---|---|
| गंभीर जीवन संकट और मारक दशा | भगवान मृत्युंजय महादेव | महामृत्युंजय मंत्र का सवा लाख जप और दशांश हवन |
| असाध्य व्याधि और अंग रक्षा | भगवान सदाशिव | गन्ने के रस अथवा पंचामृत से लघु रुद्राभिषेक |
| दीर्घायु और प्राण शक्ति संवर्धन | भगवान सूर्यनारायण और अग्नि देव | ऋग्वैदिक आयुष सूक्त का नित्य श्रद्धापूर्वक पाठ |
| दुर्घटना और भय निवारण | श्री हनुमान जी | प्रतिदिन हनुमान बाहुक और बजरंग बाण का पाठ |
आरोग्य रक्षा के प्रमुख सात्विक नियम निम्नलिखित हैं।
जीवन और मृत्यु का अंतिम निर्णय केवल उस परम चेतना के हाथ में है जिसने इस संपूर्ण चराचर जगत की रचना की है। मारकेश और बाधक ग्रह केवल मनुष्य को उसके पूर्व कर्मों का स्मरण कराने वाले माध्यम हैं। जब मनुष्य अहंकार और प्रमाद का त्याग करके भगवान शिव की शरण में जाता है, तो मारक ग्रहों का भयानक प्रभाव भी निष्फल हो जाता है। सात्विक दिनचर्या, नियमित मंत्र जप और दीन दुखियों की सेवा से अर्जित पुण्य किसी भी ग्रह की मारक क्षमता को क्षीण करने में पूरी तरह समर्थ हैं। ईश्वरीय विश्वास और वैदिक रक्षा कवच ही मनुष्य को अकाल मृत्यु के भय से मुक्त कर दीर्घायु, आरोग्य और परम शांति प्रदान करते हैं।
क्या मारकेश की दशा आने पर हमेशा मृत्यु ही होती है? नहीं, मारकेश की दशा केवल तभी प्राण घातक बनती है जब व्यक्ति की निर्धारित आयु सीमा पूरी हो चुकी हो अन्यथा यह केवल शारीरिक कष्ट या मानसिक तनाव देती है।
महामृत्युंजय मंत्र का जप किस समय करना सबसे अधिक फलदायी होता है? महामृत्युंजय मंत्र का जप प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त अथवा संध्या काल में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके रुद्राक्ष की माला से करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है।
स्थिर लग्न वालों के लिए बाधक ग्रह कौन सा होता है? स्थिर लग्न जैसे वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ राशि के जातकों के लिए कुंडली के नवम भाव का स्वामी ग्रह बाधक ग्रह कहलाता है।
क्या मारकेश ग्रह का रत्न पहनना सुरक्षित होता है? मारकेश यदि कुंडली का नैसर्गिक पापी ग्रह हो तो उसका रत्न कभी नहीं पहनना चाहिए क्योंकि रत्न उस ग्रह की मारक शक्ति को और अधिक बढ़ा देता है।
आयुष सूक्त का पाठ करने से क्या लाभ मिलता है? आयुष सूक्त का पाठ करने से शरीर के प्राण तत्व का पोषण होता है, गंभीर बीमारियों से मुक्ति मिलती है और अकाल मृत्यु का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
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