विवाह में अप्रत्याशित देरी क्यों होती है?

By पं. नरेंद्र शर्मा

सप्तम भाव और ग्रहों के प्रभाव से समझें विवाह में रुकावट के कारण

विवाह में देरी के मुख्य ज्योतिषीय कारण

वैवाहिक योग और ग्रहों की रहस्यमयी गति

वैदिक ज्योतिष में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं अपितु दो आत्माओं का आध्यात्मिक और कर्मिक अनुबंध माना जाता है। जब जीवन में विवाह योग्य आयु आने के बाद भी रिश्ते तय नहीं हो पाते अथवा बनते बनते टूट जाते हैं तब मन में व्याकुलता स्वाभाविक है। कुंडली का गहन परीक्षण यह स्पष्ट करता है कि प्रत्येक मनुष्य के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएं ग्रहों के विशेष प्रभाव और उनकी दशाओं से संचालित होती हैं।

जन्म पत्रिका का सप्तम भाव विवाह और वैवाहिक सुख का मुख्य केंद्र होता है। जब इस भाव पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव पड़ता है या विवाह के कारक ग्रह निर्बल अवस्था में होते हैं, तो व्यक्ति को विवाह में अकारण बाधाओं और अत्यधिक देरी का सामना करना पड़ता है। ज्योतिषी विभिन्न ग्रहों की स्थिति, दृष्टि, युति और नवांश कुंडली की सूक्ष्म गणना करके इन रुकावटों के मूल कारणों की पहचान करते हैं।

सप्तम भाव और क्रूर ग्रहों का प्रभाव

विवाह में अप्रत्याशित विलंब का सबसे प्रमुख कारण सप्तम भाव पर क्रूर और पापी ग्रहों की उपस्थिति अथवा उनकी दृष्टि होती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य, शनि, राहु और केतु जैसे ग्रह जब सप्तम भाव को प्रभावित करते हैं, तो विवाह प्रक्रिया में जटिलताएं उत्पन्न होती हैं।

शनि देव को न्याय और काल का कारक माना जाता है। जब शनि कुंडली के सप्तम भाव में विराजमान होते हैं अथवा अपनी तीसरी, सातवीं या दसवीं दृष्टि से सप्तम भाव को देखते हैं, तो वे व्यक्ति के जीवन में अनुशासन और परिपक्वता की मांग करते हैं। इसके परिणामस्वरूप विवाह प्रायः 28 से 32 वर्ष की आयु तक अथवा उससे भी अधिक समय के लिए टल जाता है।

सूर्य ग्रह का प्रभाव वैवाहिक मामलों में अहंकार और अलगाव की स्थिति निर्मित करता है। राहु और केतु जब सप्तम भाव से संबंध बनाते हैं, तो वे अप्रत्याशित भ्रम, बातचीत में गलतफहमी और ऐन वक्त पर रिश्ते के टूटने का कारण बनते हैं।

विवाह में विलंब के प्रमुख ज्योतिषीय कारण

ग्रह या स्थिति ज्योतिषीय प्रभाव वैवाहिक स्थिति पर परिणाम
शनि का प्रभाव सप्तम भाव में स्थिति या दृष्टि 28 से 32 वर्ष की आयु तक स्वाभाविक विलंब
राहु और केतु सप्तम भाव या सप्तमेश से युति ऐन वक्त पर रिश्ते टूटना और असमंजस
सूर्य का प्रभाव सप्तम भाव पर दृष्टि या उपस्थिति वैचारिक मतभेद और विवाह में अरुचि
सप्तमेश की त्रिक स्थिति 6, 8 या 12वें भाव में वास प्रयासों में असफलता और बाधाएं
पापकर्तरी योग सप्तम भाव का पाप ग्रहों के बीच होना लगातार अड़चनें और अनुकूल प्रस्तावों का अभाव

सप्तमेश की स्थिति और पापकर्तरी योग

सप्तम भाव के स्वामी ग्रह को सप्तमेश कहा जाता है। कुंडली में विवाह की शुभता इस बात पर अत्यधिक निर्भर करती है कि सप्तमेश किस भाव में और किस अवस्था में बैठा है।

यदि सप्तमेश कुंडली के त्रिक भावों अर्थात 6, 8 या 12वें भाव में स्थित हो जाता है, तो वैवाहिक सुख और विवाह के समय पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 6ठा भाव विवाद और शत्रुता का, 8वां भाव संकट और अज्ञात रुकावटों का तथा 12वां भाव व्यय और अलगाव का प्रतिनिधित्व करता है। इन भावों में सप्तमेश की उपस्थिति विवाह के प्रयासों को बार बार निष्फल कर देती है।

इसके अतिरिक्त यदि सप्तम भाव के ठीक आगे अर्थात आठवें भाव में और ठीक पीछे अर्थात छठे भाव में क्रूर ग्रह स्थित हों, तो यह स्थिति पापकर्तरी योग कहलाती है। इस योग के बनने से सप्तम भाव दो क्रूर शक्तियों के बीच बंध जाता है, जिससे विवाह की बात आगे नहीं बढ़ पाती।

नवांश कुंडली और बाधक ग्रहों की भूमिका

लग्न कुंडली के साथ साथ नवांश कुंडली अर्थात डी9 चार्ट का परीक्षण किए बिना विवाह का सटीक विश्लेषण अधूरा माना जाता है। वैदिक ज्योतिष में नवांश को विवाह और भाग्य की सूक्ष्म शक्ति का दर्पण माना गया है।

  • नवांश में देवगुरु बृहस्पति का नीच राशि में होना कन्या जातकों के विवाह में भारी विलंब कराता है
  • नवांश कुंडली में शुक्र का नीच अवस्था में होना पुरुषों की कुंडली में वैवाहिक योग को कमजोर करता है
  • लग्न अथवा नवांश में मांगलिक दोष का निर्माण विवाह की गति में अवरोध पैदा करता है
  • प्रत्येक लग्न के लिए निर्धारित बाधक ग्रह की महादशा या अंतर्दशा चलने पर रिश्ते अंतिम चरण में पहुंचकर टूट जाते हैं

चर लग्न के लिए 11वां भाव, स्थिर लग्न के लिए 9वां भाव और द्विस्वभाव लग्न के लिए 7वां भाव बाधक माना जाता है। जब इस बाधक भाव के स्वामी की दशा सक्रिय होती है, तो व्यक्ति को अज्ञात और अदृश्य बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

ज्योतिषी किस प्रकार करते हैं सटीक समय का निर्धारण?

विवाह के समय और उसमें आ रही बाधाओं का समाधान निकालने के लिए एक अनुभवी ज्योतिषी बहुआयामी विश्लेषण करता है। केवल एक ग्रह को देखकर निर्णय नहीं दिया जाता बल्कि संपूर्ण कुंडली के कर्मिक संकेतों को समझा जाता है।

सर्वप्रथम सप्तम भाव, सप्तमेश और कारक ग्रहों जैसे गुरु और शुक्र की स्थिति और बल की जांच की जाती है। इसके पश्चात विंशोत्तरी दशा का आकलन किया जाता है ताकि यह पता चल सके कि क्या विवाह कारक ग्रह की शुभ दशा सक्रिय है अथवा बाधक ग्रह विवाह को रोक रहा है। अंत में गोचर अर्थात वर्तमान में ग्रहों के भ्रमण का मिलान किया जाता है। जब बृहस्पति और शनि दोनों का संयुक्त शुभ प्रभाव लग्न, सप्तम भाव अथवा इनके स्वामियों पर पड़ता है, तभी विवाह का मार्ग प्रशस्त होता है।

समय की प्रतीक्षा और काल का विधान

ज्योतिष शास्त्र हमें यह समझाता है कि जीवन की प्रत्येक महत्वपूर्ण घटना काल के अधीन है। जब तक कर्मों का चक्र और ग्रहों का अनुकूल समय नहीं आता तब तक धैर्य और उचित वैदिक उपायों का सहारा लेना चाहिए। बाधाओं का वास्तविक विश्लेषण ही समाधान का प्रथम चरण है।

FAQ

सप्तम भाव में शनि होने से विवाह कब होता है? सप्तम भाव में शनि की उपस्थिति अथवा दृष्टि व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में परिपक्वता लाती है और प्रायः 28 से 32 वर्ष की आयु के आसपास विवाह संपन्न कराती है।

विवाह में बार बार रिश्ते ऐन वक्त पर क्यों टूटते हैं? सप्तम भाव पर राहु, केतु का प्रभाव अथवा कुंडली में बाधक ग्रह की दशा सक्रिय होने से बातचीत अंतिम चरण में पहुंचकर अचानक टूट जाती है।

नवांश कुंडली में शुक्र या गुरु नीच होने पर क्या होता है? नवांश में शुक्र या गुरु के नीच होने से विवाह कारक बल क्षीण हो जाता है, जिससे योग्य रिश्ते मिलने में अत्यधिक कठिनाई और अनावश्यक विलंब होता है।

क्या केवल मांगलिक दोष ही विवाह में देरी का कारण है? मांगलिक दोष विवाह में बाधा डाल सकता है, परंतु सप्तमेश का त्रिक भावों में बैठना, पापकर्तरी योग और क्रूर ग्रहों का प्रभाव भी बड़े कारण होते हैं।

बाधक ग्रह विवाह में किस प्रकार रुकावट उत्पन्न करते हैं? प्रत्येक लग्न के अनुसार निर्धारित बाधक भाव के स्वामी की दशा चलने पर सब कुछ तय होने के बाद भी अकारण और अप्रत्याशित बाधाएं उत्पन्न होती हैं।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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