By पं. अभिषेक शर्मा
सप्तम भाव नवमांश दशा और गोचर से जानिए विवाह का संपूर्ण सत्य

सनातन ज्योतिष परंपरा में विवाह को केवल दो व्यक्तियों का सामाजिक अनुबंध नहीं अपितु दो जीवात्माओं और उनके संचित प्रारब्ध का पावन संगम माना गया है। जब कोई जिज्ञासु यह प्रश्न करता है कि विवाह कब संपन्न होगा और वैवाहिक जीवन का स्वरूप कैसा रहेगा तब एक कुशल दैवज्ञ केवल किसी एक ग्रह को देखकर निर्णय नहीं लेता। इसके लिए लग्न कुंडली के आधारभूत स्तंभों से लेकर सूक्ष्म नवमांश चक्र और काल की गति को निर्धारित करने वाली दशा प्रणालियों का त्रिस्तरीय परीक्षण किया जाता है। आकाश मंडल में भ्रमण करते हुए ग्रह मनुष्य के पूर्व जन्मों के ऋणानुबंध को इस जन्म में साकार करते हैं।
सप्तम भाव जातक के जीवन में आने वाले अर्धांग अथवा अर्धांगिनी का दर्पण होता है। इस भाव पर पड़ने वाले शुभ और अशुभ ग्रहों के प्रभाव से ही दांपत्य सुख का ताना बाना निर्मित होता है। जब तक लग्न और सप्तम भाव के मध्य सामंजस्य नहीं बनता तब तक मानसिक एकाकार संभव नहीं होता।
| ज्योतिषीय घटक | विश्लेषणात्मक भूमिका | संबंधित भाव अथवा ग्रह | फल विचार का आधार |
|---|---|---|---|
| सप्तम भाव और सप्तमेश | विवाह की नींव और जीवनसाथी का स्वभाव | लग्न कुंडली का 7वां भाव | साथी का रूप रंग और सामंजस्य |
| स्वाभाविक कारक ग्रह | दांपत्य सुख और आकर्षण की क्षमता | पुरुषों के लिए शुक्र स्त्रियों के लिए गुरु | आंतरिक संतुष्टि और समर्पण |
| नवमांश कुंडली डी9 | वैवाहिक जीवन की वास्तविक सूक्ष्म स्थिति | नवमांश का लग्न और सप्तम भाव | विवाह की स्थिरता और भाग्य |
| 64वां नवमांश प्रभाव | वैवाहिक जीवन में आकस्मिक बाधाएं | चंद्रमा अथवा लग्न से 64वां भाग | संकट और स्वास्थ्य की स्थिति |
| विंशोत्तरी दशा चक्र | विवाह का सटीक समय निर्धारण | 2रे 7वें और 11वें भाव के स्वामी | विवाह के मांगलिक अवसर का प्राकट्य |
| शनि और गुरु का दोहरा गोचर | घटना के घटित होने की ब्रह्मांडीय अनुमति | 7वें भाव और सप्तमेश पर संयुक्त दृष्टि | विवाह बंधन की अंतिम पुष्टि |
जन्म कुंडली का सप्तम भाव सीधे तौर पर साझेदारी, दांपत्य और वैवाहिक प्रतिबद्धता का प्रतिनिधित्व करता है। इस भाव में कौन सी राशि स्थित है और उसका स्वामी ग्रह किस अवस्था में बैठा है यह जानना विश्लेषण का प्रथम चरण होता है।
सप्तम भाव के साथ साथ द्वितीय भाव जो कुटुंब का है और एकादश भाव जो कामना पूर्ति का है उनका भी संतुलित होना आवश्यक है। जब यह तीनों भाव एक दूसरे से शुभ संबंध बनाते हैं तब जातक को उत्तम कुल और मधुर स्वभाव वाला जीवनसाथी मिलता है।
प्रत्येक मनुष्य की कुंडली में लिंग भेद के अनुसार विवाह के स्वाभाविक कारक ग्रह निर्धारित किए गए हैं। पुरुष जातक की कुंडली में शुक्र ग्रह प्रेम, सौंदर्य, आकर्षण और पत्नी का कारक माना जाता है। यदि पुरुष की कुंडली में शुक्र बलवान और दोषमुक्त हो तो उसे सुंदर और सुरुचिपूर्ण जीवन संगिनी मिलती है।
दूसरी ओर स्त्री जातक की कुंडली में देवगुरु बृहस्पति पति, धर्म और वैवाहिक सुरक्षा के अधिष्ठाता होते हैं। गुरु का शुभ प्रभाव कन्या को दीर्घायु, कर्तव्यनिष्ठ और आदर देने वाला पति प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त चंद्रमा को मन का स्वामी माना जाता है इसलिए चंद्रमा की स्थिति यह दर्शाती है कि दोनों साथी एक दूसरे की भावनाओं का कितना आदर करेंगे। यदि शुक्र और गुरु दोनों ही पीड़ित हों तो व्यक्ति भौतिक रूप से संपन्न होने के बाद भी वैवाहिक सुख से वंचित रह सकता है।
लग्न कुंडली केवल स्थूल शरीर और सांसारिक स्थिति को दर्शाती है जबकि नवमांश कुंडली अर्थात डी9 चक्र आत्मा के सूक्ष्म संबंधों और विवाह के वास्तविक फल को उद्घाटित करता है। ऋषि पराशर ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि बिना नवमांश के परीक्षण के वैवाहिक भविष्यवाणी कभी पूर्ण नहीं हो सकती।
लग्न कुंडली में जो ग्रह अत्यंत बलवान दिखाई देते हैं यदि वे नवमांश में नीच अथवा शत्रु राशि में चले जाएं तो उनका शुभ फल क्षीण हो जाता है। इसके विपरीत यदि लग्न कुंडली का कमजोर सप्तमेश नवमांश में उच्च का होकर शुभ भाव में बैठ जाए तो प्रारंभिक कठिनाइयों के बाद भी वैवाहिक जीवन अत्यंत सुखद रहता है।
ज्योतिष में 64वां नवमांश अत्यंत संवेदनशील और छिद्र युक्त बिंदु माना जाता है। जन्म चंद्रमा अथवा लग्न के भोगांश से गणना करने पर 8वें भाव का नवमांश 64वां नवमांश कहलाता है। जब सप्तमेश अथवा कारक ग्रह 64वें नवमांश में स्थित होते हैं या उस पर क्रूर ग्रहों का गोचर होता है तब दांपत्य जीवन में आकस्मिक स्वास्थ्य संकट, अलगाव अथवा गंभीर पारिवारिक कलह उत्पन्न हो सकती है। अतः इस सूक्ष्म बिंदु का शोधन करना दैवज्ञ के लिए अनिवार्य होता है।
विवाह की संभावित आयु और निश्चित कालखंड को जानने के लिए महर्षि पराशर की विंशोत्तरी दशा प्रणाली का आश्रय लिया जाता है। जीवन में विवाह तभी संभव होता है जब संबंधित भावों के स्वामियों की दशा अथवा अंतर्दशा सक्रिय हो।
जब इन दशाओं का कालखंड आता है तब जातक के मन में गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने की तीव्र इच्छा जाग्रत होती है और अनुकूल रिश्ते आने लगते हैं।
दशा व्यक्ति के भीतर विवाह की अनुकूलता और इच्छा उत्पन्न करती है किंतु उस घटना को भौतिक धरातल पर साकार करने की शक्ति केवल गोचर के पास होती है। इस संदर्भ में न्याय के देवता शनि और कृपा के सागर गुरु का दोहरा गोचर अचूक माना जाता है।
शनि देव कर्म के नियंत्रक हैं और गुरु देव ईश्वरीय आशीर्वाद के प्रतीक हैं। जब तक शनि की कर्म दृष्टि और गुरु की अमृतमयी दृष्टि एक साथ कुंडली के सप्तम भाव अथवा सप्तमेश पर नहीं पड़ती तब तक शहनाई नहीं बजती।
यह दोहरा गोचर काल चक्र का वह क्षण होता है जब प्रकृति जातक को नए पारिवारिक उत्तरदायित्वों में बंधने की अनुमति प्रदान करती है।
विवाह हो जाना एक पक्ष है किंतु वह संबंध जीवन भर कितना मधुर और स्थिर रहेगा इसका आकलन कुंडली के अन्य भावों से किया जाता है। कुंडली का अष्टम भाव मांगल्य और वैवाहिक आयु का होता है जबकि द्वादश भाव शय्या सुख और मानसिक शांति का कारक है।
यदि अष्टम और द्वादश भाव पाप कर्तरी योग में न हों और वहां शुभ ग्रहों की उपस्थिति हो तो दांपत्य जीवन दीर्घकालिक और आनंदमय बनता है। मंगल दोष का विचार करते समय यह देखा जाता है कि मंगल लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में बैठकर वैवाहिक ऊर्जा को कितना आक्रामक बना रहा है। यदि दोनों पक्षों की कुंडलियों में ग्रहों का संतुलन उत्तम हो तो मंगल दोष भी निष्प्रभावी हो जाता है। परस्पर सम्मान, आध्यात्मिक समझ और त्याग की भावना ही किसी भी दांपत्य को स्वर्ग जैसा सुंदर बनाती है।
ग्रह केवल काल के संकेतक हैं जो यह बताते हैं कि आत्मा को अपने किन कर्मों का फल किस समय प्राप्त होना है। विवाह का समय और जीवनसाथी का स्वभाव वास्तव में पूर्व जन्मों के ऋण और अनुबंधन का ही परिणाम है। जब कोई व्यक्ति अपनी कुंडली के संकेतों को समझकर धैर्य और विवेक से कार्य करता है तब विषम ग्रह स्थितियां भी शांति में बदल जाती हैं। ईश्वर की आराधना, कुलदेवता का पूजन और जीवनसाथी के प्रति सच्चा समर्पण ही वह दिव्य मार्ग है जो किसी भी वैवाहिक जीवन को अखंड सौभाग्य और सुख से परिपूर्ण कर सकता है।
विवाह का सटीक समय जानने के लिए कौन सी दशा सबसे महत्वपूर्ण होती है? सप्तमेश, द्वितीयेश अथवा एकादशेश की विंशोत्तरी महादशा और अंतर्दशा विवाह के समय का निर्धारण करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
नवमांश कुंडली वैवाहिक जीवन के लिए क्यों इतनी आवश्यक मानी जाती है? नवमांश कुंडली जातक के सूक्ष्म भाग्य और दांपत्य की आंतरिक मजबूती को प्रकट करती है जिससे यह ज्ञात होता है कि विवाह के बाद वास्तविक सुख प्राप्त होगा या नहीं।
पुरुष और स्त्री की कुंडली में विवाह के मुख्य कारक ग्रह कौन से हैं? पुरुष जातक की कुंडली में शुक्र ग्रह पत्नी और भौतिक सुख का कारक होता है जबकि स्त्री जातक की कुंडली में देवगुरु बृहस्पति पति और सौभाग्य के कारक होते हैं।
शनि और गुरु का दोहरा गोचर विवाह में क्या भूमिका निभाता है? जब शनि और गुरु दोनों एक साथ लग्न कुंडली के सप्तम भाव अथवा सप्तमेश पर दृष्टि डालते हैं तब उस कालखंड में विवाह की घटना घटित होना निश्चित हो जाता है।
यदि कुंडली में सप्तम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो क्या उपाय करने चाहिए? सप्तमेश के अधिष्ठाता देव की नित्य आराधना, भगवान शिव और माता पार्वती का संयुक्त पूजन तथा नवग्रह स्तोत्र का पाठ करने से दांपत्य के समस्त दोष शांत होते हैं।
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