बार बार गंभीर बीमारी क्यों होती है?

By पं. नीलेश शर्मा

षष्ठ अष्टम द्वादश भाव और त्रिदोष से जानिए बार बार बीमार पड़ने का ज्योतिषीय सच

बार बार बीमार क्यों पड़ते हैं ज्योतिषीय कारण और उपाय

कालपुरुष शरीर और खगोलीय स्वास्थ्य चक्र

सनातन वैदिक संस्कृति में मानव देह को केवल हाड़ मांस का एक ढांचा नहीं माना गया है अपितु यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एक सूक्ष्म प्रतिरूप है। यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे के सनातन सिद्धांत के अनुसार जो कुछ इस अनंत खगोल में घटित होता है उसका प्रत्यक्ष और सूक्ष्म प्रभाव मनुष्य के शरीर, मन और प्राण पर पड़ता है। जब कोई व्यक्ति अपने जीवन में निरंतर एक रोग से उबरते ही दूसरे गंभीर रोग का शिकार हो जाता है, जब औषधियां और आधुनिक चिकित्सा पद्धतियां भी केवल तात्कालिक राहत देकर विफल होने लगती हैं, तो मन में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि इस निरंतर शारीरिक पीड़ा के पीछे कौन से अदृश्य खगोलीय कारण कार्य कर रहे हैं।

वैदिक ज्योतिष की अत्यंत प्रतिष्ठित शाखा जिसे मेडिकल एस्ट्रोलॉजी अथवा आयुर्वेद ज्योतिष कहा जाता है, इस रहस्य का उद्घाटन अत्यंत वैज्ञानिक और कर्मिक दृष्टिकोण से करती है। रोग की उत्पत्ति केवल जीवाणुओं अथवा असंतुलित दिनचर्या का परिणाम नहीं होती बल्कि यह जन्म कुंडली के विशिष्ट भावों, पीड़ित ग्रहों, कालपुरुष के अंगों और शारीरिक त्रिदोष के असंतुलन का जीवंत प्रकटीकरण है। जब तक कुंडली के उन मूल रोग प्रदायक ग्रहों और भावों की नकारात्मक ऊर्जा को शांत नहीं किया जाता तब तक शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पूर्ण रूप से जाग्रत नहीं हो पाती है। एक अनुभवी दैवज्ञ जन्म पत्रिका के लग्न, षष्ठ, अष्टम और द्वादश भाव के त्रिआयामी अध्ययन से रोग के मूल कारण को पहचानकर सटीक वैदिक समाधान प्रदान करता है।

स्वास्थ्य एवं रोग का आयाम संबंधित भाव एवं ग्रह शारीरिक स्वास्थ्य में मुख्य भूमिका
शारीरिक शक्ति और जीवन ऊर्जा प्रथम भाव अथवा लग्न देह की मूल संरचना, जीवन शक्ति, आत्मबल और समग्र स्वास्थ्य
तीव्र रोग और तात्कालिक व्याधियां षष्ठ भाव और षष्ठेश संक्रामक रोग, सूजन, चोट, दैनिक स्वास्थ्य समस्याएं और पाचन
दीर्घकालिक और असाध्य रोग अष्टम भाव और अष्टमेश छिपी हुई गंभीर बीमारियां, अंग विकृति, असाध्य व्याधियां और आयु
अस्पताल और ऊर्जा क्षरण द्वादश भाव और द्वादशेश अस्पताल में भर्ती होना, शल्य चिकित्सा, दीर्घकालिक चिकित्सा व्यय
जीवन शक्ति और प्राकृतिक सुरक्षा सूर्य देव की स्थिति आंतरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता, अस्थि स्वास्थ्य और हृदय बल
मानसिक संतुलन और जल तत्व चंद्रमा की स्थिति कफ दोष, मानसिक अवसाद, रक्त संचार और तरल संतुलन

लग्न षष्ठ अष्टम और द्वादश भाव की भूमिका

जन्म कुंडली में स्वास्थ्य और व्याधियों का विश्लेषण करने के लिए चार प्रमुख भावों की शक्ति और उनके अंतर्संबंधों का गहन परीक्षण किया जाता है।

कुंडली का प्रथम भाव अर्थात लग्न मनुष्य के शरीर का मूल आधार है। यह भाव व्यक्ति की जीवन शक्ति, शारीरिक बनावट, आत्मबल और रोगों से लड़ने की प्राकृतिक क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है। जब लग्न भाव में शुभ ग्रह स्थित होते हैं और लग्नेश बलवान होकर केंद्र अथवा त्रिकोण में बैठता है तो जातक का शरीर वज्र के समान मजबूत होता है। इसके विपरीत जब लग्नेश 6ठे, 8वें अथवा 12वें भाव में निर्बल होकर बैठता है या पाप ग्रहों से आक्रांत होता है तो शरीर की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली अत्यंत दुर्बल हो जाती है।

षष्ठ भाव प्रत्यक्ष रूप से रोग, व्याधि और शारीरिक पीड़ा का केंद्र माना गया है। जब षष्ठ भाव का स्वामी षष्ठेश लग्न भाव पर हावी हो जाता है अथवा लग्न में आकर बैठ जाता है तो व्यक्ति का जीवन निरंतर बीमारियों के चक्रव्यूह में उलझा रहता है। ऐसे जातक को बारंबार संक्रमण, पेट के विकार और ज्वर जैसी समस्याएं घेरती रहती हैं।

अष्टम भाव गुप्त रोगों, दीर्घकालिक बीमारियों और असाध्य व्याधियों का स्थान है। जब अष्टम भाव पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव होता है तो रोग का निदान समय पर नहीं हो पाता और बीमारी शरीर के भीतर गहराई तक जड़ें जमा लेती है।

द्वादश भाव अस्पताल में भर्ती होने, शल्य चिकित्सा, शारीरिक ऊर्जा के विसर्जन और लंबे समय तक बिस्तर पर रहने की स्थिति को दर्शाता है। जब 6ठे, 8वें और 12वें भाव के स्वामियों के मध्य कोई अशुभ दृष्टि अथवा युति संबंध बनता है तो व्यक्ति बार बार चिकित्सालय के चक्कर लगाने पर विवश हो जाता है।

  • जब लग्नेश और षष्ठेश एक साथ युति बनाकर त्रिक भावों में स्थित होते हैं तो शरीर में असाध्य रोग जन्म लेते हैं
  • यदि 8वें भाव का स्वामी लग्न को देखता है तो जातक को ऐसी बीमारियां होती हैं जिनका चिकित्सकीय परीक्षणों में स्पष्ट पता नहीं चलता
  • जब 12वें भाव में पापी ग्रह स्थित हों और लग्नेश निर्बल हो तो सामान्य बीमारी भी गंभीर रूप लेकर अस्पताल पहुंचा देती है
  • यदि 6ठे भाव में राहु अथवा शनि स्थित हों तो वे शरीर में लंबी और बारंबार उभरने वाली व्याधियां उत्पन्न करते हैं

कालपुरुष चक्र और राशियों में रोग का वास

वैदिक ज्योतिष में संपूर्ण ब्रह्मांड को कालपुरुष के विराट शरीर के रूप में देखा गया है। भचक्र की 12 राशियां कालपुरुष के 12 प्रमुख शारीरिक अंगों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

जब किसी जातक की कुंडली में कोई विशिष्ट राशि पापी अथवा क्रूर ग्रहों के प्रभाव से पीड़ित होती है, तो कालपुरुष के उस संबंधित अंग में व्याधि उत्पन्न होती है।

  1. मेष राशि सिर, मस्तिष्क और नेत्रों की ऊपरी संरचना का प्रतिनिधित्व करती है, जहां मंगल और राहु का दुष्प्रभाव होने पर गंभीर सिरदर्द, माइग्रेन अथवा सिर की चोट लगती है
  2. वृषभ राशि मुख, कंठ, स्वर ग्रंथि और मुखमंडल की कारक है, जिसके पीड़ित होने पर गले के संक्रमण, थायरॉइड और वाणी दोष उत्पन्न होते हैं
  3. मिथुन राशि फेफड़े, श्वास नलिका, कंधे और बाहों को नियंत्रित करती है, जहां बुध और शनि का अशुभ प्रभाव दमा और श्वसन तंत्र के रोग देता है
  4. कर्क राशि हृदय, छाती, फेफड़ों के निचले हिस्से और स्तन प्रदेश की स्वामी है, जिसके दूषित होने पर छाती में संक्रमण और जल भराव होता है
  5. सिंह राशि हृदय, रीढ़ की हड्डी, प्राण शक्ति और पाचन तंत्र के ऊपरी भाग की कारक है, जहां सूर्य का पीड़ित होना हृदय रोग और रक्त चाप बढ़ाता है
  6. कन्या राशि आंतों, पेट के निचले हिस्से और पाचन क्रिया का केंद्र है, जिसके निर्बल होने पर अल्सर, गैस और पाचन तंत्र के गंभीर रोग होते हैं
  7. तुला राशि गुर्दे, त्वचा और गर्भाशय के आंतरिक भाग की प्रतिनिधि है, जिसके पीड़ित होने पर गुर्दे के रोग और मूत्र विकार जन्म लेते हैं
  8. वृश्चिक राशि प्रजनन अंगों, उत्सर्जन तंत्र और रक्त नलिकाओं की स्वामी है, जहां मंगल और शनि की अशुभता बवासीर और शल्य चिकित्सा कराती है
  9. धनु राशि जांघों, कूल्हों और यकृत की कारक है, जिसके दूषित होने पर यकृत की खराबी और वसा जनित रोग होते हैं
  10. मकर राशि घुटनों, जोड़ों, हड्डियों और त्वचा की प्रतिनिधि है, जहां शनि का दुष्प्रभाव वात रोग, गठिया और जोड़ों का दर्द देता है
  11. कुंभ राशि पिंडलियों, टखनों और रक्त संचार की स्वामी है, जिसके पीड़ित होने पर नसों की कमजोरी और हृदय गति की अनियमिता होती है
  12. मीन राशि पैरों के तलवों, अंगूठों और लसीका तंत्र की कारक है, जहां राहु अथवा केतु का वास पैरों के विकार और अनिद्रा उत्पन्न करता है

त्रिदोष असंतुलन और ग्रहों का गहरा संबंध

आयुर्वेद और वैदिक ज्योतिष का संबंध अत्यंत प्राचीन और अभिन्न है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर का समस्त स्वास्थ्य तीन प्रमुख दोषों अर्थात वात, पित्त और कफ के संतुलन पर टिका होता है। जब ग्रहों के अशुभ प्रभाव से यह त्रिदोष असंतुलित होते हैं तभी गंभीर बीमारियां प्रकट होती हैं।

वात दोष का संबंध वायु और आकाश तत्व से है। ज्योतिष में शनि देव, राहु और निर्बल बुध वात दोष के मुख्य अधिपति हैं। जब कुंडली में शनि और राहु लग्न अथवा षष्ठ भाव को पीड़ित करते हैं तो शरीर में वात का प्रकोप होता है। इसके कारण जोड़ों में असहनीय दर्द, नसों का खिंचाव, लकवा, सायटिका, त्वचा का रूखापन, कब्ज और तंत्रिका तंत्र की दुर्बलता उत्पन्न होती है।

पित्त दोष अग्नि तत्व का प्रतीक है जिसके मुख्य नियामक ग्रह सूर्य, मंगल और केतु हैं। जब जन्म पत्रिका में सूर्य और मंगल उग्र होकर षष्ठ अथवा अष्टम भाव से संबंध बनाते हैं तो शरीर में अत्यधिक पित्त बढ़ता है। इससे रक्त विकार, उच्च रक्तचाप, यकृत की बीमारियां, त्वचा की जलन, एसिडिटी, अत्यधिक गुस्सा और आंतरिक अल्सर जैसी व्याधियां जन्म लेती हैं।

कफ दोष जल और पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है जिसके मुख्य कारक चंद्रमा, शुक्र और देवगुरु बृहस्पति हैं। जब चंद्रमा अथवा शुक्र पाप ग्रहों से घिर जाते हैं अथवा जल राशियों में पीड़ित होते हैं तो कफ दोष का असंतुलन होता है। इसके फलस्वरूप मोटापा, मधुमेह, कफ जनित दमा, फेफड़ों में पानी भरना, थाइरॉइड और लसीका ग्रंथियों की सूजन की समस्या उत्पन्न होती है।

सूर्य की क्षीणता और रोग प्रतिरोधक क्षमता

वैदिक ज्योतिष में भगवान सूर्यनारायण को संपूर्ण ब्रह्मांड की आत्मा और मानव शरीर की नैसर्गिक रोग प्रतिरोधक क्षमता का साक्षात स्वामी माना गया है। सूर्य देव प्राण ऊर्जा और जीवन शक्ति के प्रत्यक्ष प्रदाता हैं।

जब जन्म पत्रिका में सूर्य देव मेष राशि में उच्च के होते हैं अथवा अपनी स्वराशि सिंह में बली होकर केंद्र या त्रिकोण भावों में विराजमान होते हैं तो जातक के भीतर रोगों से लड़ने की अद्भुत आत्मिक और शारीरिक शक्ति होती है। ऐसा व्यक्ति कठिन से कठिन मौसमी और संक्रामक बीमारियों को भी अपनी स्वाभाविक प्रतिरक्षा प्रणाली के बल पर सहजता से परास्त कर देता है।

इसके विपरीत जब कुंडली में सूर्य देव तुला राशि में नीच के होकर स्थित होते हैं, राहु अथवा केतु के साथ बैठकर ग्रहण योग बनाते हैं अथवा 6ठे, 8वें या 12वें भाव में शनि से दृष्ट होते हैं तो जातक की रोग प्रतिरोधक क्षमता अत्यंत क्षीण हो जाती है। ऐसे व्यक्ति को छोटी सी मौसमी तब्दीली भी तुरंत बीमार कर देती है। सूर्य की निर्बलता हड्डियों को कमजोर बनाती है, आंखों की रोशनी घटाती है और हृदय को दुर्बल कर देती है।

आयुर्वेद औषधि स्नान और मंत्र चिकित्सा के उपाय

यदि जन्म पत्रिका में ग्रह दोषों के कारण बारंबार गंभीर बीमारियां घेर रही हों तो सनातन शास्त्रों में बताए गए औषधि स्नान, धातु चिकित्सा और मंत्र साधना के सात्विक उपाय संजीवनी के समान कार्य करते हैं।

  • प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय के समय तांबे के पात्र से भगवान सूर्यनारायण को कुमकुम और अक्षत मिश्रित जल अर्पित करें तथा आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें जिससे प्राण शक्ति जाग्रत होती है
  • प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर कच्चा दूध और जल अर्पित करते हुए महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार शांत चित्त से जप करें जो असाध्य रोगों का नाश करता है
  • वात दोष और शनि जनित रोगों से मुक्ति के लिए शनिवार के दिन जल में काले तिल, लोध्र और खस मिलाकर विशेष औषधि स्नान करें
  • पित्त दोष और मंगल के शमन के लिए मंगलवार के दिन जल में लाल चंदन, बेलपत्र और रक्त पुष्प डालकर स्नान करें तथा तांबे के पात्र का जल पिएं
  • कफ दोष और चंद्र के निवारण हेतु जल में पंचगव्य, श्वेत चंदन और गूलर की छाल मिलाकर स्नान करें जिससे जल तत्व संतुलित रहता है
  • अपने भोजन में मौसमी फलों, तुलसी दल और गिलोय का नियमित उपयोग करें जो ग्रहों के सात्विक प्रभाव को शरीर में बढ़ाते हैं
  • रोग निवारण हेतु किसी योग्य ज्योतिषी के परामर्श से रोग कारक ग्रह की धातु जैसे तांबा, चांदी अथवा कांसा विधिपूर्वक धारण करें

स्वास्थ्य चेतना और आध्यात्मिक आरोग्यता

वैदिक जीवन दर्शन हमें यह शाश्वत ज्ञान प्रदान करता है कि स्वास्थ्य केवल रोगों की अनुपस्थिति नहीं है बल्कि शरीर, मन और आत्मा का पूर्ण सामंजस्य है। जब जातक अपने पूर्व संचित कर्मों के शोधन हेतु सात्विक दिनचर्या अपनाता है, प्रकृति के नियमों का आदर करता है और ज्योतिषीय उपायों के माध्यम से ग्रहीय ऊर्जा को संतुलित करता है, तो असाध्य से असाध्य व्याधियां भी शांत हो जाती हैं। ग्रहों की अनुकूलता और ईश्वरीय अनुग्रह से मनुष्य को दीर्घायु, ओजस्वी कांति और अखंड आरोग्यता की प्राप्ति होती है।

FAQ

बार बार बीमार पड़ने का मुख्य कारण? बार बार बीमार पड़ने का मुख्य कारण कमजोर लग्न, पीड़ित षष्ठेश, सूर्य की निर्बलता और शारीरिक त्रिदोष का गंभीर असंतुलन होना है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता का मुख्य ग्रह कौन? रोग प्रतिरोधक क्षमता और प्राकृतिक जीवन शक्ति के सर्वोच्च अधिपति ग्रह भगवान सूर्य देव माने जाते हैं।

त्रिदोष असंतुलन की पहचान कैसे होती है? शनि से वात रोग, सूर्य व मंगल से पित्त रोग तथा चंद्रमा व शुक्र के पीड़ित होने से कफ दोष की पहचान की जाती है।

अष्टम भाव किन रोगों को दर्शाता है? अष्टम भाव दीर्घकालिक, असाध्य, गुप्त व्याधियों, अचानक होने वाली शल्य चिकित्सा और गंभीर शारीरिक क्षरण को दर्शाता है।

औषधि स्नान से रोग मुक्ति कैसे? विशिष्ट ग्रहों की जड़ी बूटियों को जल में मिलाकर स्नान करने से शरीर का आभामंडल शुद्ध होता है और ग्रहीय नकारात्मकता नष्ट होती है।

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पं. नीलेश शर्मा

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