क्या पीसीओडी और बांझपन के ज्योतिषीय कारण हैं?

By पं. नरेंद्र शर्मा

शुक्र चंद्रमा और मंगल के प्रभाव से जानें पीसीओडी हार्मोनल असंतुलन बांझपन के कारण और षष्ठी माता के सात्विक उपाय

पीसीओडी और बांझपन के ज्योतिषीय कारण एवं षष्ठी माता उपाय

नारी देह में ब्रह्मांडीय ऊर्जा और जल तत्व का रहस्य

सृष्टि के समस्त चर और अचर जगत में नारी शक्ति को साक्षात प्रकृति और जीवन के सृजन का पावन स्रोत माना गया है। सनातन वैदिक दर्शन के अनुसार एक स्त्री का शरीर केवल रक्त और मांस से निर्मित भौतिक ढांचा नहीं है अपितु यह ब्रह्मांडीय ऋतु चक्र, चंद्र कलाओं और पंच तत्वों का एक अत्यंत संवेदनशील और दिव्य यंत्र है। जब इस पावन यंत्र में जल, अग्नि और वायु तत्व का प्राकृतिक संतुलन बना रहता है, तब स्त्री का स्वास्थ्य, मासिक धर्म चक्र और मातृत्व शक्ति पूर्ण रूप से प्रफुल्लित रहती है। किंतु आधुनिक काल में अत्यधिक मानसिक तनाव, दूषित जीवनशैली और आहार की अशुद्धि के कारण लाखों महिलाएं पॉलीसिस्टिक ओवरी डिजीज अर्थात पीसीओडी, थायरॉइड, अनियमित माहवारी और बांझपन जैसी गंभीर व्याधियों से जूझ रही हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इसे केवल अंतःस्रावी ग्रंथियों और हार्मोन का विकार मानता है, किंतु वैदिक ज्योतिष का मेडिकल एस्ट्रोलॉजी विभाग यह स्पष्ट करता है कि इसके मूल में जन्म पत्रिका के विशिष्ट ग्रह दोष, जल तत्व की विकृति और कालपुरुष के प्रजनन अंगों पर पापी ग्रहों का क्रूर प्रभाव कार्य कर रहा होता है। जब तक इन सूक्ष्म ऊर्जा असंतुलनों को ज्योतिषीय उपायों द्वारा ठीक नहीं किया जाता, तब तक केवल औषधियां पूर्ण लाभ देने में असमर्थ सिद्ध होती हैं।

प्रजनन स्वास्थ्य को नियंत्रित करने वाले प्रमुख ग्रह और भाव

वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार स्त्रियों के संपूर्ण प्रजनन तंत्र, हार्मोनल संतुलन, गर्भाशय की कार्यक्षमता और डिंबोत्सर्जन की प्रक्रिया का आकलन करने के लिए तीन प्रमुख ग्रहों और विशिष्ट भावों का सूक्ष्म समन्वय देखा जाता है।

स्त्री स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता को नियंत्रित करने वाले प्रमुख ज्योतिषीय घटक निम्नलिखित हैं।

  • शुक्र ग्रह दैत्यगुरु शुक्र स्त्री देह में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे मुख्य प्रजनन हार्मोन, अंडाणु की गुणवत्ता, डिंबग्रंथि की सक्रियता, सौंदर्य और आकर्षण के नैसर्गिक अधिपति हैं।
  • चंद्रमा ग्रह चंद्रमा समस्त जल तत्व, मासिक धर्म चक्र की 28 दिवसीय गति, गर्भाशय की आंतरिक परत, मानसिक शांति और मातृत्व वात्सल्य के स्वामी हैं।
  • मंगल ग्रह रक्त के प्रवाह, हीमोग्लोबिन, मासिक धर्म के दौरान रक्तस्राव की नियमितता और डिंबग्रंथि से अंडे के फूटने की क्रिया के नैसर्गिक कारक मंगल देव हैं।
  • पंचम भाव जन्म कुंडली का पांचवां भाव पूर्व जन्म के पुण्य, गर्भधारण की क्षमता, संतान सुख और गर्भाशय की स्थिति का मुख्य स्थान है।
  • सप्तम भाव सातवां भाव स्त्री के आंतरिक प्रजनन अंगों, डिंबवाहिनी नलिकाओं और हार्मोनल स्राव के संतुलन का प्रतिनिधित्व करता है।
  • अष्टम भाव आठवां भाव बाह्य एवं आंतरिक जननांगों, गुप्त ग्रंथियों, पेल्विक क्षेत्र और अंडाशय का कारक माना जाता है।
  • वृश्चिक राशि कालपुरुष चक्र की 8वीं राशि वृश्चिक जल तत्व की राशि है जो प्रत्यक्ष रूप से स्त्री के संपूर्ण प्रजनन तंत्र और गर्भाशय पर शासन करती है।
ज्योतिषीय घटक नैसर्गिक प्रतिनिधित्व शारीरिक व हार्मोनल प्रभाव असंतुलन होने पर उत्पन्न होने वाला रोग
शुक्र ग्रह हार्मोन और प्रजनन शक्ति अंडाणु की गुणवत्ता और एस्ट्रोजन स्तर पीसीओडी, डिंब का न बनना और बांझपन
चंद्रमा ग्रह जल तत्व और मासिक धर्म 28 दिन का माहवारी चक्र और मन मासिक धर्म की अनियमितता, थायरॉइड और सिस्ट
मंगल ग्रह रक्त प्रवाह और ओव्यूलेशन रक्त स्राव की तीव्रता और गर्भाशय बल अत्यधिक दर्द, रक्तस्राव में रुकावट और सूजन
वृश्चिक राशि प्रजनन अंग और गर्भाशय आंतरिक जननांग और हार्मोनल ग्रंथियां ओवेरियन सिस्ट, फाइब्रॉएड और एंडोमेट्रियोसिस
पंचम भाव संतान और गर्भाधान गर्भ ठहरने की प्राकृतिक क्षमता बारंबार गर्भपात और गर्भधारण में भारी विलंब

चंद्रमा शुक्र और पापकर्तरी योग से हार्मोनल असंतुलन

स्त्री के शरीर में हार्मोनल असंतुलन और ओवरी में सिस्ट बनने की प्रक्रिया तब प्रारंभ होती है जब जल तत्व के स्वामी चंद्रमा और सौंदर्य व प्रजनन के स्वामी शुक्र पाप ग्रहों के क्रूर प्रभाव में आ जाते हैं।

जब जन्म पत्रिका में निम्नलिखित विशिष्ट ग्रह संयोग निर्मित होते हैं, तब स्त्री को पीसीओडी और थायरॉइड की समस्या घेर लेती है।

  • चंद्रमा और शुक्र का पापकर्तरी योग जब चंद्रमा अथवा शुक्र के दोनों ओर 6ठे, 8वें अथवा 12वें भाव में पापी ग्रह जैसे शनि, राहु अथवा सूर्य बैठ जाते हैं, तो इसे पापकर्तरी योग कहा जाता है। इस योग के कारण स्त्री के शरीर में जल और कफ तत्व का प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है जिससे डिंबग्रंथियों में तरल से भरी छोटी छोटी गांठें अर्थात सिस्ट बनने लगती हैं।
  • वृश्चिक राशि पर शनि और राहु का प्रभाव जब कालपुरुष के प्रजनन अंग की राशि वृश्चिक में मंद गति वाले शनि देव अथवा छाया ग्रह राहु स्थित होते हैं, तो वे उस क्षेत्र में अत्यधिक ठंडक, शुष्कता अथवा विषाक्तता पैदा कर देते हैं। शनि के प्रभाव से ओवरी के भीतर अंडे का विकास रुक जाता है और राहु के प्रभाव से हार्मोनल स्तर अप्रत्याशित रूप से ऊपर नीचे होने लगता है।
  • मंगल और चंद्रमा का विषम संबंध जब मंगल और चंद्रमा का षडाष्टक योग 6 और 8 भाव का संबंध बनता है अथवा मंगल की चतुर्थ या अष्टम दृष्टि चंद्रमा पर पड़ती है, तो मासिक धर्म के दौरान असहनीय पेट दर्द, भारी ऐंठन और रक्त के थक्के जमने की समस्या उत्पन्न होती है।
  • लग्न पर गुरु की शुभ दृष्टि का अभाव यदि जन्म लग्न अथवा पंचम भाव पर ज्ञान और जीवन दाता देवगुरु बृहस्पति की शुभ दृष्टि न हो, तो शरीर की अंतःस्रावी ग्रंथियां सही समय पर सही हार्मोन का स्राव नहीं कर पातीं जिससे थायरॉइड और मोटापा तेजी से बढ़ता है।
रोग का स्वरूप मुख्य ग्रह संयोजन प्रभावित भाव व राशि वास्तविक चिकित्सीय लक्षण
पीसीओडी और ओवेरियन सिस्ट शुक्र पर राहु व शनि का प्रभाव वृश्चिक राशि और 8वां भाव चेहरे पर बाल, वजन बढ़ना, ओवरी में सिस्ट और अनियमित चक्र
थायरॉइड विकार चंद्रमा और बुध पर राहु का आघात द्वितीय भाव और वृषभ राशि गले की ग्रंथि में सूजन, अत्यधिक थकान और वजन का असंतुलन
एनोव्यूलेशन (अंडे का न बनना) शुक्र और गुरु का नीच राशि में होना पंचम और सप्तम भाव डिंब का परिपक्व न होना और गर्भधारण में विफलता
एंडोमेट्रियोसिस और दर्द मंगल और शनि का चतुर्थेश से संबंध 4था और 8वां भाव गर्भाशय में सूजन, अत्यधिक दर्द और पेल्विक क्षेत्र में खिंचाव

गर्भधारण में बाधा और बांझपन का सूक्ष्म ज्योतिषीय परीक्षण

वैदिक ज्योतिष में संतान प्राप्ति और गर्भधारण की संभावनाओं का सटीक विश्लेषण करने के लिए केवल मुख्य जन्म कुंडली ही नहीं अपितु सप्तांश कुंडली अर्थात डी 7 चक्र और स्त्री की कुंडली में क्षेत्र स्फुट का विशेष गणित किया जाता है।

गर्भाधान की क्षमता को मापने के प्रमुख ज्योतिषीय नियम इस प्रकार हैं।

  • क्षेत्र स्फुट का बलवान होना वैदिक ऋषियों ने स्त्री की प्रजनन उर्वरता को मापने के लिए क्षेत्र स्फुट का नियम बनाया है जिसमें चंद्रमा, मंगल और गुरु के स्पष्ट भोगांशों को जोड़कर यह देखा जाता है कि स्त्री का शरीर बीज को धारण करने के लिए पूर्णतः सक्षम और उपजाऊ है या नहीं।
  • सप्तांश चक्र में पंचम भाव की स्थिति यदि डी 7 कुंडली में पंचम भाव का स्वामी शुभ भाव में बैठा हो और उस पर देवगुरु बृहस्पति की दृष्टि हो, तो वर्तमान जीवन में पीसीओडी की समस्या होने के बावजूद सही समय पर संतान सुख अवश्य प्राप्त होता है।
  • ऋतु काल और चंद्र गोचर का नियम गर्भधारण के लिए सबसे उपयुक्त समय वह माना जाता है जब गोचर का चंद्रमा स्त्री की जन्म राशि से 1, 2, 4, 5, 7, 8 अथवा 9वें भाव में भ्रमण कर रहा हो और उस पर मंगल व गुरु का शुभ दृष्टि संबंध बन रहा हो।
  • पति और पत्नी की कुंडली का समन्वय बांझपन के मामलों में केवल स्त्री की कुंडली देखना पर्याप्त नहीं होता बल्कि पति की कुंडली में शुक्र और सूर्य के बल अर्थात बीज स्फुट की भी बराबर जांच की जाती है।

जल तत्व संतुलन और षष्ठी माता के सात्विक अनुष्ठान

स्त्री शरीर में हार्मोनल संतुलन स्थापित करने, पीसीओडी के प्रभाव को समाप्त करने और मातृत्व सुख की प्राप्ति के लिए सनातन वैदिक परंपरा में अत्यंत शक्तिशाली आध्यात्मिक और सात्विक उपायों का विधान किया गया है।

साधना क्षेत्र अधिष्ठाता देव एवं साधना सात्विक वैदिक विधान स्वास्थ्य लाभ का स्वरूप
हार्मोनल संतुलन और शुक्र बल माँ भगवती जगदंबा और माँ लक्ष्मी नित्य श्री सूक्त का पाठ और शुक्रवार को स्फटिक माला धारण एस्ट्रोजन का नियमन, चेहरे की कांति और सिस्ट का शमन
मासिक धर्म शुद्धि और चंद्र बल देवाधिदेव महादेव नटराज सोमवार को शिवलिंग पर जल व कच्चा दूध अर्पण और चंद्र मंत्र जप 28 दिन के चक्र की बहाली, मानसिक शांति और थायरॉइड लाभ
गर्भाशय रक्षा और संतान प्राप्ति देवसेना षष्ठी माता की उपासना प्रत्येक शुक्ल षष्ठी को षष्ठी स्तोत्र पाठ और व्रत का पालन ओवरी की कार्यक्षमता में सुधार, बांझपन नाश और गर्भ रक्षा
रक्त शुद्धि और ओव्यूलेशन बल श्री हनुमान जी और मंगल शांति मंगलवार को लाल पुष्प अर्पण और ॐ भौमाय नमः का शांत जप गर्भाशय में रक्त संचार का सुधार और अंडों का सही विकास

दैनिक जीवन में हार्मोनल संतुलन बनाए रखने के प्रमुख सात्विक नियम निम्नलिखित हैं।

  • शुद्ध चांदी के पात्र में जल का सेवन चंद्रमा और शुक्र दोनों जल तत्व के कारक हैं, अतः रात्रि को चांदी के गिलास अथवा जग में शुद्ध जल भरकर रखें और प्रातः काल खाली पेट उस जल का सेवन करें जिससे शरीर का पित्त और कफ शांत होता है।
  • अभिमंत्रित प्राकृतिक मोती अथवा स्फटिक धारण योग्य ज्योतिषी की सलाह से शुक्ल पक्ष के सोमवार को चांदी की अंगूठी में शुद्ध प्राकृतिक मोती रत्न कनिष्ठिका अंगुली में अथवा गले में 108 दानों की स्फटिक माला धारण करने से मासिक धर्म के समस्त विकार दूर होते हैं।
  • षष्ठी माता का पावन स्तोत्र पाठ ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित षष्ठी देवी स्तोत्र का प्रतिदिन प्रातः स्नान के उपरांत पाठ करने से स्त्रियों के समस्त गुप्त रोग, बांझपन और हार्मोनल असंतुलन समाप्त होते हैं।
  • आहार में सात्विक और प्राकृतिक बदलाव अत्यधिक जंक फूड, प्लास्टिक के बर्तनों में रखा भोजन, बासी आहार और रिफाइंड चीनी का पूर्ण त्याग करें तथा अपने आहार में अलसी के बीज, कद्दू के बीज, सफेद तिल और आंवले का नियमित उपयोग करें।
  • चंद्र नमस्कार और भ्रामरी प्राणायाम प्रतिदिन प्रातः काल 15 मिनट चंद्र नमस्कार और अनुलोम विलोम प्राणायाम का अभ्यास करने से मस्तिष्क की पिट्यूटरी ग्रंथि संतुलित होती है जिससे प्रजनन हार्मोन का सही स्राव होता है।

चेतना का परिष्कार और मातृत्व का पावन वरदान

वैदिक सनातन दर्शन यह प्रमाणित करता है कि मानव देह प्रकृति का ही एक विस्तार है। जब कोई स्त्री अपने शरीर के सूक्ष्म संकेतों को समझती है, प्रकृति के नियमों के अनुकूल अपनी दिनचर्या बनाती है और चिकित्सा उपचार के साथ साथ वैदिक सात्विक साधनाओं का आश्रय लेती है, तो उसके शरीर की अंतःस्रावी ग्रंथियां पुनः नवजीवन प्राप्त कर लेती हैं। पीसीओडी अथवा हार्मोनल विकार कोई असाध्य अभिशाप नहीं हैं अपितु यह जीवनशैली और ऊर्जा संतुलन को सुधारने का एक संकेत हैं। अनुकूल ग्रह दशाएं, आहार शुद्धि और षष्ठी माता की असीम कृपा से हर कठिन बाधा दूर हो जाती है और स्त्री की गोद में एक स्वस्थ, तेजस्वी और दीर्घायु संतान की किलकारियां गूंज उठती हैं। ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास, सकारात्मक दृष्टिकोण और सात्विक जीवन शैली ही स्त्री स्वास्थ्य और अखंड मातृत्व की सच्ची और सर्वोच्च सुरक्षा है।

FAQ

क्या कुंडली के ग्रह दोषों से पीसीओडी और ओवेरियन सिस्ट हो सकते हैं? हां, जब शुक्र और चंद्रमा पर राहु या शनि का पाप प्रभाव पड़ता है और वृश्चिक राशि पीड़ित होती है, तब स्त्री के शरीर में हार्मोनल असंतुलन और पीसीओडी की समस्या उत्पन्न होती है।

पीसीओडी और थायरॉइड को ठीक करने के लिए कौन सा ग्रह सबसे अधिक मजबूत होना चाहिए? हार्मोनल संतुलन और थायरॉइड को नियंत्रित करने के लिए जन्म कुंडली में चंद्रमा और शुक्र ग्रह का बलवान और शुभ स्थिति में होना सबसे अधिक आवश्यक है।

क्या मोती या स्फटिक पहनने से मासिक धर्म नियमित हो सकता है? हां, चांदी में बना शुद्ध प्राकृतिक मोती अथवा गले में स्फटिक माला धारण करने से शरीर का जल तत्व संतुलित होता है और मासिक धर्म की अनियमितता दूर होती है।

संतान प्राप्ति और गर्भधारण में बाधा आने पर किस देवी की पूजा करनी चाहिए? गर्भधारण में आ रही रुकावटों और बांझपन को दूर करने के लिए ब्रह्मवैवर्त पुराणोक्त षष्ठी माता की उपासना और षष्ठी स्तोत्र का पाठ करना सर्वोत्तम माना गया है।

हार्मोनल संतुलन के लिए घर की किस दिशा को स्वच्छ रखना चाहिए? स्त्री स्वास्थ्य और प्रजनन शक्ति को बनाए रखने के लिए घर की उत्तर पश्चिम दिशा जो चंद्रमा की है और दक्षिण पूर्व दिशा जो शुक्र की है, उन्हें सदैव स्वच्छ और जल तत्वों से युक्त रखना चाहिए।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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