By अपर्णा पाटनी
चतुर्थ भाव चतुर्थांश कुंडली डी 4 और दशा चक्र से जानें विदेश से भारत लौटने का सटीक ज्योतिषीय योग

वैदिक ज्योतिष और प्राचीन सनातन परंपरा में जन्मभूमि को जननी के समान परम पूजनीय स्थान प्रदान किया गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि जननी और जन्मभूमि का गौरव स्वर्ग से भी बढ़कर है। आधुनिक युग में ज्ञान प्राप्ति आजीविका के विस्तार और धन उपार्जन के लिए लाखों लोग अपने देश की सीमाओं को लांघकर सुदूर देशों में जाकर बस जाते हैं। वहां उन्हें भौतिक संपन्नता आधुनिक जीवन शैली और उच्च पद प्रतिष्ठा तो प्राप्त हो जाती है किंतु अनेक वर्षों के प्रवास के पश्चात भी अंतर्मन में अपनी मिट्टी अपनी संस्कृति और मातृभूमि के प्रति एक गहरा खिंचाव बना रहता है।
यह आंतरिक पुकार केवल एक भावुक विचार नहीं होती बल्कि यह जीवात्मा और जन्म स्थान की भूमि के मध्य बहने वाले सूक्ष्म प्राणिक तारों का स्पंदन है। जब कोई व्यक्ति विदेश की स्थायी नागरिकता या निवास अनुमति प्राप्त करने के बाद भी सब कुछ छोड़कर अपने देश लौटने का विचार करता है तो यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं होता। जन्म कुंडली में ग्रहों की बदलती दशाएं गोचर का प्रभाव और चतुर्थ भाव की जाग्रति ही व्यक्ति के भीतर स्वदेश लौटने का प्रबल संकल्प उत्पन्न करती हैं।
जन्म पत्रिका के बारह भावों में से दो भाव विशेष रूप से व्यक्ति के निवास स्थान और भौगोलिक स्थिति को निर्धारित करते हैं। इनमें सबसे प्रमुख चतुर्थ भाव है जो मातृभूमि आंतरिक सुख पैतृक संपत्ति जड़ों और हृदय की शांति का अधिष्ठाता है। जब चतुर्थ भाव और उसका स्वामी बलवान होता है तो व्यक्ति अपनी जन्मभूमि से कभी पूरी तरह कट नहीं पाता है।
इसके विपरीत कुंडली का द्वादश भाव विदेश वास दूरस्थ स्थानों पर प्रवास और मूल परिवेश से अलगाव का प्रतिनिधित्व करता है। जब द्वादश भाव और नवम भाव सक्रिय होते हैं तब व्यक्ति विदेश जाता है। किंतु जब द्वादशेश का प्रभाव समाप्त होता है और चतुर्थेश अथवा लग्नेश की शुभ दशा सक्रिय होती है तो व्यक्ति का मन विदेश से उचटने लगता है और वह अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए तत्पर हो जाता है।
| भाव और ग्रह स्थिति | नियंत्रित जीवन आयाम | स्वदेश वापसी का संकेत | ज्योतिषीय अवस्था |
|---|---|---|---|
| चतुर्थ भाव और चतुर्थेश | मातृभूमि जड़ें और गृह सुख | स्वदेश में स्थायी निवास और शांति | चतुर्थेश का केंद्र त्रिकोण में स्वराशि होना |
| द्वादश भाव और द्वादशेश | विदेश वास और सुदूर प्रवास | विदेश से संपर्क टूटना और विरक्ति | द्वादशेश की दशा का समाप्त होना |
| प्रथम भाव (लग्नेश) | स्वयं का अस्तित्व और निर्णय | अपनी भूमि पर नया साम्राज्य खड़ा करना | लग्नेश का चतुर्थ भाव से शुभ संबंध |
| गुरु ग्रह (देवगुरु) | धर्म संस्कृति और विवेक | अपनी संस्कृति की ओर पुनरागमन | चतुर्थ अथवा नवम भाव पर शुभ दृष्टि |
| शनि ग्रह | कर्म क्षेत्र और आजीविका | स्वदेश में स्थायी कार्य विस्तार | चतुर्थ भाव पर गोचर से सकारात्मक प्रभाव |
स्थूल लग्न कुंडली के साथ साथ सूक्ष्म घटनाओं के विश्लेषण के लिए महर्षि पराशर ने वर्ग कुंडलियों का विधान किया है। निवास स्थान गृह संपत्ति और देश विदेश के सुख का सटीक निर्णय करने के लिए चतुर्थांश कुंडली अर्थात डी 4 चक्र का अध्ययन अनिवार्य माना जाता है।
जब जातक विदेश में रह रहा होता है तो सामान्यतः वह द्वादशेश राहु अथवा अष्टमेश की विंशोत्तरी दशा के प्रभाव में होता है। जैसे ही यह कालखंड पूर्ण होता है और चतुर्थांश कुंडली के लग्न लग्नेश अथवा चतुर्थेश की महादशा या अंतर्दशा प्रारंभ होती है परिस्थितियां स्वतः ऐसी बन जाती हैं कि व्यक्ति विदेश छोड़ने का निर्णय ले लेता है। यदि डी 4 चक्र में चतुर्थेश उच्च का होकर केंद्र में बैठा हो तो व्यक्ति न केवल भारत लौटता है बल्कि यहां आकर एक विशाल व्यावसायिक अथवा सामाजिक साम्राज्य स्थापित करने में सफल होता है।
एक कुशल ज्योतिषी जब जातक की कुंडली का परीक्षण करता है तो वह इस बात का सूक्ष्म मूल्यांकन करता है कि स्वदेश आगमन केवल कुछ महीनों का अवकाश है अथवा यह सदा के लिए पुनर्स्थापना है। इसके लिए कुछ शास्त्रीय नियमों की पुष्टि की जाती है।
यदि कोई प्रवासी भारतीय अपने वतन वापस लौटने का इच्छुक है किंतु व्यावसायिक असुरक्षा अथवा परिस्थितियों के अवरोध के कारण निर्णय नहीं ले पा रहा है तो वैदिक शास्त्रों में कुछ विशेष आध्यात्मिक मार्ग सुझाए गए हैं।
भौतिक जगत में मनुष्य चाहे संसार के किसी भी कोने में चला जाए किंतु उसकी आत्मा की वास्तविक शांति उसकी अपनी जड़ों से ही जुड़ी रहती है। वैदिक ज्योतिष यह स्पष्ट करता है कि विदेश गमन पूर्व जन्म के कर्मों और ऋणानुबंधन को चुकाने का एक माध्यम मात्र होता है। जब वह ऋण पूर्ण हो जाता है तो प्रकृति स्वयं व्यक्ति को अपनी पावन मिट्टी की ओर खींच लेती है। सही समय पर ग्रहों के संकेत को पहचान कर स्वदेश लौटने वाला व्यक्ति अपनी भूमि पर मान सम्मान समृद्धि और आत्मिक संतोष का एक स्वर्णिम जीवन व्यतीत करता है।
विदेश से भारत वापसी के लिए कुंडली का कौन सा भाव सबसे महत्वपूर्ण है? मातृभूमि और अपने देश में स्थायी निवास के लिए कुंडली का चतुर्थ भाव और उसका स्वामी ग्रह सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है।
किस दशा के शुरू होने पर व्यक्ति विदेश छोड़कर स्वदेश लौटता है? द्वादशेश की दशा समाप्त होकर जब चतुर्थेश लग्नेश अथवा शुभ गुरु की दशा प्रारंभ होती है तब व्यक्ति स्थायी रूप से स्वदेश लौटता है।
चतुर्थांश कुंडली डी 4 का स्वदेश वापसी में क्या योगदान है? चतुर्थांश कुंडली विशेष रूप से स्थायी निवास संपत्ति और भाग्य स्थान का सूक्ष्म विश्लेषण करती है जिससे वापसी के सही समय का ज्ञान होता है।
क्या विदेश की नागरिकता छोड़ने के बाद भारत में करियर सफल हो सकता है? यदि कुंडली में चतुर्थेश और दशमेश बलवान हों तो जातक भारत लौटकर विदेश से भी बड़ा व्यापार और सामाजिक रुतबा स्थापित करने में सफल होता है।
स्वदेश वापसी में आ रही रुकावटों को दूर करने के लिए कौन सा उपाय करना चाहिए? चतुर्थ भाव के स्वामी के मंत्रों का जप करना कुलदेवता की आराधना और तांबे के लोटे से सूर्य को नित्य अर्घ्य देना सबसे प्रभावशाली उपाय है।
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