क्या विपरीत राजयोग संकट से दौलत देगा?

By पं. अमिताभ शर्मा

षष्ठ अष्टम द्वादश भाव से बनने वाले हर्ष सरल विमल विपरीत राजयोग से दुश्मनों की बर्बादी और संकट से अकूत संपत्ति बनने का विज्ञान

विपरीत राजयोग क्या है हर्ष सरल विमल योग नियम और सात्विक उपाय

संकट के गर्भ से साम्राज्य का उदय

मानव जीवन में समृद्धि, सत्ता और प्रतिष्ठा प्राप्त करने के सामान्य नियम प्रत्यक्ष पुरुषार्थ और शुभ अवसरों पर आधारित होते हैं। अधिकांश जातकों की उन्नति तब होती है जब परिस्थितियां उनके अनुकूल हों, बाजार में तेजी हो और समाज का सहयोग प्राप्त हो। किंतु सनातन वैदिक ज्योतिष में कुछ ऐसे भी अत्यंत रहस्यमयी और चमत्कारी योगों का वर्णन मिलता है जो सामान्य नियमों के सर्वथा विपरीत कार्य करते हैं। जब संपूर्ण विश्व में आर्थिक मंदी का दौर चल रहा हो, व्यापारिक प्रतिष्ठान दिवालिया हो रहे हों, महामारी अथवा युद्ध जैसे वैश्विक संकट छाए हों और चारों ओर से शत्रु जातक पर प्राणघातक प्रहार कर रहे हों, ठीक उसी अंधकारमय कालखंड में एक विशिष्ट योग जातक को अप्रत्याशित रूप से शून्य से उठाकर अरबपति बना देता है। वैदिक ज्योतिष के प्राचीन शास्त्रों में इस अदभुत घटना को विपरीत राजयोग की संज्ञा दी गई है। यह योग सिद्ध करता है कि ब्रह्मांड में कोई भी ग्रह अथवा भाव पूर्णतः अशुभ नहीं होता। जब विनाशकारी ऊर्जाएं आपस में टकराकर एक दूसरे को निष्प्रभावी कर देती हैं तब उस शून्यता से असीम ऐश्वर्य, अकूत धन संपदा और अपराजेय सत्ता का प्राकट्य होता है।

त्रिक भावों का रहस्यमयी और दंडात्मक विज्ञान

वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जन्म कुंडली के 12 भावों में से तीन भावों को सर्वाधिक अनिष्टकारी, पीड़ादायक और अशुभ माना जाता है जिन्हें सामूहिक रूप से त्रिक भाव कहा जाता है।

त्रिक भावों का स्वरूप और उनके द्वारा दिए जाने वाले कष्ट निम्नलिखित हैं।

  • षष्ठ भाव जन्म कुंडली का छठा भाव प्रत्यक्ष शत्रुओं, ऋण, बैंक कर्जों, शारीरिक रोगों, अदालती मुकदमों, कानूनी विवादों और जीवन संघर्ष का मुख्य स्थान है।
  • अष्टम भाव आठवां भाव रंध्र भाव कहलाता है जो आकस्मिक संकट, मृत्यु तुल्य कष्ट, अपमान, गंभीर वित्तीय धोखे, लांछन और गुप्त शत्रुओं का प्रतिनिधित्व करता है।
  • द्वादश भाव बारहवां भाव व्यय स्थान है जो भारी आर्थिक नुकसान, संपत्ति की जब्ती, जेल यात्रा, विदेशी निर्वासन, अस्पताल के खर्च और पूंजी क्षय का कारक है।

सामान्य परिस्थिति में जब इन त्रिक भावों के स्वामी केंद्र अथवा त्रिकोण भावों में बैठते हैं, तो वे उन शुभ भावों के फलों को नष्ट कर देते हैं। किंतु जब षष्ठ, अष्टम और द्वादश भाव के स्वामी परस्पर इन्हीं तीन भावों में एक दूसरे के स्थान पर बैठ जाते हैं, तो एक नकारात्मक ऊर्जा दूसरी नकारात्मक ऊर्जा को पूरी तरह समाप्त कर देती है। गणित के उस शाश्वत नियम की भांति जहां दो ऋण मिलकर धन बन जाते हैं, त्रिक भावों का यह आपसी संबंध जातक के जीवन में महा कल्याणकारी राजयोग का सृजन करता है।

त्रिक भाव नैसर्गिक कारक तत्व सामान्य अशुभ फल विपरीत राजयोग में शुभ रूपांतरण
षष्ठ भाव शत्रु, ऋण और रोग मुकदमों में पराजय और भारी कर्ज शत्रुओं का स्वतः विनाश और ऋण मुक्ति
अष्टम भाव आकस्मिक संकट और बदनामी अचानक पतन और व्यापार ठप होना अप्रत्याशित वसीयत और अकूत गुप्त धन लाभ
द्वादश भाव व्यय, हानि और कारावास दिवालियापन और संपत्ति की जब्ती वैश्विक व्यापार और विदेशी स्रोतों से अकूत आय

हर्ष सरल और विमल योग का शास्त्रीय स्वरूप

महर्षि कालिदास रचित उत्तर कालामृत और मंत्रेश्वर कृत फलदीपिका में विपरीत राजयोग को तीन विशिष्ट रूपों में वर्गीकृत किया गया है जिन्हें हर्ष योग, सरल योग और विमल योग कहा जाता है।

इन तीनों योगों का शास्त्रीय विश्लेषण इस प्रकार है।

  • हर्ष योग (षष्ठेश का प्रभाव) जब छठे भाव का स्वामी ग्रह केवल 6ठे, 8वें अथवा 12वें भाव में स्थित हो तब हर्ष योग का निर्माण होता है। इस योग से युक्त जातक शारीरिक रूप से अत्यंत बलिष्ठ, अजेय मनोबल का धनी और शत्रुओं का दमन करने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति के विरोधी जब भी उस पर षड्यंत्र रचते हैं, वे स्वयं अपने ही जाल में उलझकर बर्बाद हो जाते हैं और जातक को भारी कानूनी व वित्तीय विजय मिलती है।
  • सरल योग (अष्टमेश का प्रभाव) जब आठवें भाव का स्वामी ग्रह केवल 8वें, 6ठे अथवा 12वें भाव में विराजमान होता है तब सरल योग बनता है। इस योग का प्रभाव जातक को निर्भय, विद्वान, दीर्घायु और अकूत संपत्ति का स्वामी बनाता है। जब समाज अथवा व्यापार में अप्रत्याशित संकट आते हैं, तो अन्य सभी लोग नष्ट हो जाते हैं किंतु यह जातक संकट के मलबे से अरबों की संपत्ति निकाल लेता है।
  • विमल योग (द्वादशेश का प्रभाव) जब बारहवें भाव का स्वामी ग्रह केवल 12वें, 6ठे अथवा 8वें भाव में स्थित हो तब विमल योग का प्राकट्य होता है। यह योग व्यक्ति को स्वतंत्र वित्तीय सत्ता, सादगी, आंतरिक पवित्रता और असीम धन संचय की शक्ति देता है। ऐसे जातक का धन कभी व्यर्थ नहीं बहता और वह न्यूनतम खर्च में विशाल साम्राज्य खड़ा कर लेता है।
विपरीत राजयोग का नाम निर्माणकारी ग्रह नियम व्यक्तित्व पर मुख्य प्रभाव प्राप्त होने वाला वास्तविक भौतिक लाभ
हर्ष योग 6ठे भाव का स्वामी 6, 8 या 12वें में अदम्य साहसी, निरोगी और शत्रुहंता कानूनी मुकदमों में जीत और प्रतिस्पर्धियों का पतन
सरल योग 8वें भाव का स्वामी 8, 6 या 12वें में अत्यंत दृढ़ निश्चयी, चतुर और दीर्घजीवी संकट काल में भारी धन लाभ और संकटों पर विजय
विमल योग 12वें भाव का स्वामी 12, 6 या 8वें में मितव्ययी, नीतिवान और स्वतंत्र विचारक विदेशी व्यापार से भारी मुनाफा और संचित पूंजी वृद्धि

क्या शत्रुओं का विनाश ही आपकी सफलता बनेगा?

विपरीत राजयोग का सबसे रहस्यमयी सिद्धांत यह है कि यह जातक को सीधी रेखा में सफलता नहीं देता बल्कि दूसरों के पतन और वैश्विक उथल पुथल के माध्यम से जातक का उत्थान कराता है।

जब किसी व्यक्ति की कुंडली में यह योग सक्रिय होता है, तो उसका भाग्योदय तब होता है जब उसके प्रतिस्पर्धी उस पर हमला करते हैं। विरोधी जातक को नीचा दिखाने के लिए जो भी चक्रव्यूह रचते हैं, वह चक्रव्यूह उल्टा विरोधियों पर ही गिर पड़ता है। शत्रु कानूनी मुकदमों में बर्बाद हो जाते हैं और उनकी संपूर्ण बाजार हिस्सेदारी, प्रतिष्ठा और संपत्तियां जातक के अधिकार में आ जाती हैं।

इसी प्रकार जब शेयर बाजार क्रैश होता है अथवा रियल एस्टेट बाजार में घोर मंदी आती है तब विपरीत राजयोग से युक्त जातक कौड़ियों के भाव संपत्तियां खरीदता है। कुछ ही वर्षों बाद जब बाजार पुनः सामान्य होता है, तो वही संपत्तियां उस जातक को विश्व स्तर का धनकुबेर बना देती हैं।

विपरीत राजयोग के सक्रिय होने की अनिवार्य शर्तें

जन्म पत्रिका में केवल त्रिकेशों का त्रिक भावों में बैठ जाना ही विपरीत राजयोग के पूर्ण फल देने के लिए पर्याप्त नहीं होता। वैदिक ज्योतिष के आचार्यों ने इसके सक्रिय होने के लिए कुछ अत्यंत कठोर नियम निर्धारित किए हैं।

यदि इन नियमों में थोड़ी भी त्रुटि हो, तो राजयोग निष्प्रभावी हो जाता है अथवा साधारण फल देता है।

  • शुभ ग्रहों की दृष्टि का सर्वथा अभाव त्रिक भावों में बैठे त्रिकेशों पर लग्न, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम अथवा दशम भाव के स्वामियों की कोई दृष्टि या युति नहीं होनी चाहिए। यदि किसी शुभ केंद्रेश या त्रिकोणेश का संबंध इनसे बन गया, तो वह शुभ ग्रह भी दूषित हो जाएगा और राजयोग भंग हो जाएगा।
  • लग्नेश का परम बलवान होना विपरीत राजयोग की सबसे अनिवार्य शर्त यह है कि जन्म कुंडली का लग्नेश अर्थात प्रथम भाव का स्वामी अत्यंत बली, उच्च अथवा स्वराशि का होकर केंद्र या त्रिकोण में बैठा हो। यदि लग्नेश स्वयं कमजोर हुआ, तो जातक संकटों और शत्रुओं के दबाव को झेल नहीं पाएगा और पतन को प्राप्त होगा।
  • राहु और केतु से मुक्ति इन भावों में स्थित ग्रह यदि छाया ग्रहों के अत्यधिक निकट न हों, तो योग की शुद्धता और प्रभावशीलता कई गुना बढ़ जाती है।
  • त्रिकेश की महादशा का आगमन यह योग केवल तभी अपना चमत्कारी प्रभाव दिखाता है जब जातक के जीवन काल में 6ठे, 8वें अथवा 12वें भाव के स्वामी की विंशोत्तरी महादशा अथवा अंतर्दशा सक्रिय होती है।
योग की स्थिति लग्नेश का बलाबल शुभ ग्रहों का हस्तक्षेप जीवन पर वास्तविक फलादेश
शुद्ध विपरीत राजयोग लग्नेश केंद्र या त्रिकोण में अति बली कोई शुभ दृष्टि या युति नहीं भयंकर संकट के बाद अकूत दौलत, पद और विजय
खंडित विपरीत राजयोग लग्नेश 6, 8 या 12वें भाव में निर्बल शुभ ग्रहों की दृष्टि उपस्थित संकटों का भारी दबाव और केवल सामान्य बचाव
मिश्रित विपरीत राजयोग लग्नेश सामान्य बली केंद्रेश की युति त्रिक भाव में संघर्ष के बाद आंशिक वित्तीय लाभ किंतु मानसिक तनाव

त्रिकेश की महादशा में सफलता प्राप्त करने का विज्ञान

जब किसी जातक के जीवन में उस ग्रह की महादशा आती है जो विपरीत राजयोग का निर्माण कर रहा है, तो उस दशा का प्रारंभिक कालखंड अत्यंत भयावह और अशांत प्रतीत होता है।

दशा के आरंभ होते ही जातक को चारों ओर से घेर लिया जाता है। पुराने कर्जे सामने आ जाते हैं, विरोधी सक्रिय हो जाते हैं और व्यापारिक अनुबंध अचानक रद्द हो जाते हैं। एक साधारण व्यक्ति इस समय घबराकर हथियार डाल देता है, किंतु जिस जातक की कुंडली में शुद्ध विपरीत राजयोग होता है, वह धैर्यपूर्वक उस तूफान के शांत होने की प्रतीक्षा करता है।

जैसे ही दशा का मध्य भाग आता है, पासा पूरी तरह पलट जाता है। जातक के सभी शत्रु किसी अन्य विवाद में फंसकर नष्ट हो जाते हैं। सरकारी अथवा कानूनी निर्णयों में अचानक ऐसा मोड़ आता है जो जातक के पक्ष में चला जाता है। इसके पश्चात दशा के अंतिम भाग तक जातक इतनी विशाल संपत्ति और सत्ता अर्जित कर लेता है जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

विपरीत राजयोग की ऊर्जा को साधने के सात्विक उपाय

विपरीत राजयोग की प्रचंड और उग्र ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने, शत्रुओं के नकारात्मक वार से स्वयं की रक्षा करने और संकटों को स्थायी समृद्धि में बदलने के लिए सनातन वैदिक परंपरा में अत्यंत शक्तिशाली सात्विक साधनाओं का विधान किया गया है।

साधना क्षेत्र अधिष्ठाता देव एवं साधना सात्विक वैदिक विधान
शत्रु दमन और मुकदमा विजय भगवान नृसिंह और श्री हनुमान जी नित्य नृसिंह कवच का पाठ और मंगलवार को चमेली तेल दीप
आकस्मिक संकट से अकूत लाभ देवाधिदेव महादेव नटराज सोमवार को शिवलिंग पर गन्ने के रस से अभिषेक और शिव तांडव स्तोत्र पाठ
अनियंत्रित व्यय का नियमन माँ भगवती बगलामुखी और दुर्गा नित्य दुर्गा सप्तशती के अर्गला स्तोत्र का पाठ और शुक्रवार को कन्या पूजन
आत्मबल और लग्नेश का पोषण भगवान सूर्यनारायण की उपासना प्रातः काल तांबे के लोटे से सूर्य को जल और गायत्री महामंत्र जप

विपरीत राजयोग के पूर्ण लाभ हेतु प्रमुख सात्विक नियम इस प्रकार हैं।

  • भगवान नृसिंह देव की नित्य शरण संकट के समय भगवान नृसिंह का ध्यान करते हुए ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् मंत्र का 108 बार जप करने से सभी प्रकार के षड्यंत्रकारी शत्रु निष्प्रभावी हो जाते हैं।
  • संकट काल में मौन और धैर्य का पालन जब त्रिकेश की दशा सक्रिय हो, तो अपनी योजनाओं को कभी सार्वजनिक न करें। पूर्ण गोपनीयता बनाए रखें और व्यर्थ के वाद विवाद में अपनी ऊर्जा नष्ट न करें।
  • गौ माता और असहाय प्राणियों की सेवा प्रतिदिन भोजन की पहली रोटी गौ माता को खिलाना और शनिवार के दिन काले कुत्तों व पक्षियों को भोजन देना त्रिक भावों की मारक ऊर्जा को शुभ ऊर्जा में परिवर्तित करता है।
  • अहंकार का सर्वथा विसर्जन जब विपरीत राजयोग के प्रभाव से अकूत संपत्ति और सत्ता प्राप्त हो जाए, तो कभी अहंकार न करें क्योंकि यह योग ईश्वरीय न्याय का साक्षात प्रकटीकरण है।

ब्रह्मांडीय संतुलन और ईश्वरीय न्याय का विधान

वैदिक सनातन दर्शन यह सिखाता है कि अंधकार का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता बल्कि प्रकाश की अनुपस्थिति ही अंधकार है। ठीक उसी प्रकार जीवन के संकट और शत्रु मनुष्य को नष्ट करने नहीं आते बल्कि वे उसके भीतर छिपे हुए असीम सामर्थ्य को जाग्रत करने आते हैं। जब कोई जातक अपनी जन्म पत्रिका में स्थित विपरीत राजयोग के गूढ़ विज्ञान को समझकर धर्म, सत्य और ईश्वरीय साधना के साथ संकटों का सामना करता है, तो वही विष उसके लिए अमृत बन जाता है। अनुकूल ग्रह दशाएं और भगवान शिव का अनुग्रह जातक को समस्त आपदाओं के भंवर से निकालकर जगत के सर्वोच्च शिखर पर आसीन कर देते हैं। ईश्वर के न्याय पर अटूट निष्ठा रखना, संकट के समय विचलित न होना और प्राप्त वैभव का उपयोग लोक कल्याण में करना ही विपरीत राजयोग की सर्वोच्च सार्थकता है।

FAQ

क्या विपरीत राजयोग हर उस व्यक्ति को फल देता है जिसकी कुंडली में त्रिकेश त्रिक भाव में हों? नहीं, यह योग केवल तभी पूर्ण फल देता है जब लग्नेश अत्यंत बली हो और त्रिक भावों में बैठे ग्रहों पर किसी भी शुभ केंद्र अथवा त्रिकोण के स्वामी की दृष्टि न हो।

हर्ष, सरल और विमल योग में से सबसे अधिक शक्तिशाली कौन सा माना जाता है? अष्टमेश के प्रभाव से बनने वाला सरल योग सबसे अधिक शक्तिशाली और अप्रत्याशित माना जाता है क्योंकि यह भयंकर संकटों के बीच से अकूत दौलत और दीर्घायु प्रदान करता है।

विपरीत राजयोग का फल किस समय सबसे अधिक दिखाई देता है? जब जातक के जीवन में 6ठे, 8वें अथवा 12वें भाव के स्वामी की विंशोत्तरी महादशा या अंतर्दशा सक्रिय होती है तब इस योग का सबसे चमत्कारी प्रभाव दिखाई देता है।

क्या विपरीत राजयोग के लिए शत्रुओं का होना आवश्यक है? हां, इस योग की प्रकृति ही ऐसी है कि यह विरोधियों के षड्यंत्रों, मुकदमों और बाहरी संकटों के माध्यम से ही जातक को अप्रत्याशित वित्तीय और सामाजिक लाभ दिलाता है।

विपरीत राजयोग की दशा के दौरान कौन सा वैदिक पाठ सबसे सुरक्षित माना गया है? इस योग की दशा में स्वयं की सुरक्षा और अखंड विजय के लिए प्रतिदिन श्री नृसिंह कवच और संकटमोचन हनुमानाष्टक का पाठ करना सबसे सुरक्षित और फलदायी माना गया है।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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