By पं. सुव्रत शर्मा
डिग्री से ग्रह शक्ति, समय और पहलू कैसे समझें

जन्म कुंडली को कई लोग केवल राशि और भाव तक सीमित मान लेते हैं। पर जब किसी जीवन घटना का समय, तीव्रता और असर समझना हो तब ग्रह की डिग्री एक सूक्ष्म चाबी की तरह काम करती है। यही कारण है कि एक ही ग्रह, उसी राशि में होते हुए भी अलग डिग्री पर अलग तरह से बोलता हुआ दिखाई देता है।
वैदिक ज्योतिष में डिग्री केवल गणित नहीं है। यह ग्रह की अभिव्यक्ति की बारीकी है। यही बारीकी बताती है कि ग्रह अपनी शक्ति को किस ढंग से व्यक्त कर रहा है, कब वह पकता हुआ दिखेगा और किन स्थितियों में उसका संकेत अधिक तेज होगा।
कुंडली एक पहिए जैसी आकृति में दिखती है। इसे 360 डिग्री के वृत्त की तरह समझा जाता है। इसी वृत्त को बारह राशियों में बांटा जाता है और हर राशि का फैलाव 30 डिग्री का माना जाता है। ग्रह जन्म समय पर जिस राशि के जिस अंश पर स्थित होता है वही डिग्री कुंडली में दिखती है।
डिग्री का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि यह ग्रह की स्थिति के ठीक नीचे अर्थ की एक नई परत जोड़ती है। कई बार राशि और भाव समान होते हैं फिर भी परिणाम अलग निकलते हैं। वहां यह सूक्ष्म फर्क डिग्री के स्तर पर दिखाई दे सकता है। अनुभवी आचार्य इसी से प्रवृत्तियों, प्रतिक्रियाओं और समय संकेतों को अधिक गहराई से पकड़ते हैं।
डिग्री उस माप को कहा जाता है जो राशिचक्र के 360 डिग्री के पूरे चक्र में ग्रह की सटीक स्थिति बताता है। हर राशि 0 से 30 डिग्री तक फैली मानी जाती है। इसलिए जब किसी ग्रह के आगे एक संख्या दिखती है तो वह संख्या बताती है कि वह ग्रह उस राशि के भीतर कितने अंश पर बैठा है।
उदाहरण के लिए यदि मेष राशि के साथ 15 डिग्री लिखा हो तो इसका अर्थ है कि ग्रह मेष के मध्य भाग के आसपास है। यह स्थिति अपने साथ कुछ सूक्ष्म गुण लाती है। यही सूक्ष्मता व्यक्तित्व, रिश्तों और निर्णय शैली में अलग रंग भर देती है।
तालिका 1 कुंडली में डिग्री देखने से क्या स्पष्ट होता है
| क्या देखा जाता है | क्यों जरूरी है | व्यवहार में इसका संकेत |
|---|---|---|
| राशि के भीतर ग्रह का अंश | अभिव्यक्ति की परिपक्वता समझ आती है | ग्रह का परिणाम कब साफ दिखेगा |
| डिग्री के आधार पर कोण | पहलू अधिक सटीक बनते हैं | समर्थन या तनाव का स्वरूप |
| अन्य ग्रहों से दूरी | ग्रह आपस में कैसे बात कर रहे हैं | जीवन में घटनाओं की चाल |
वैदिक ज्योतिष में ग्रह की डिग्री को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह ग्रह के प्रभाव की तीव्रता और ग्रह दृष्टि की धार का संकेत दे सकती है। डिग्री यह भी बताती है कि कोई ग्रह जीवन को कब और किस तरह स्पर्श करेगा।
डिग्री को समझने के लिए एक उपयोगी दृष्टि यह है कि ग्रह को उम्र के रूपक से देखा जाए। जैसे मनुष्य की उम्र के साथ उसका व्यवहार बदलता है वैसे ही ग्रह की डिग्री के साथ उसका स्वभाव बदलता हुआ दिख सकता है। यह दृष्टि समय संकेत को पकड़ने में मदद करती है। फिर भी अंतिम निष्कर्ष हमेशा राशि, भाव, ग्रह बल और दृष्टि के साथ मिलाकर ही निकाला जाता है।
जब कुंडली में कोई ग्रह 0 डिग्री पर हो तो उसे आरंभिक अवस्था माना जाता है। यह स्थिति जन्म समय के आसपास दिखती है और इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे शिशु पूरी तरह बाहरी सहारे पर निर्भर रहता है। इसी तरह 0 डिग्री वाला ग्रह धीरे धीरे पकता है।
बहुत बार ऐसा देखा जाता है कि ऐसे ग्रह का परिणाम जीवन के बाद के चरण में अधिक स्पष्ट होता है। कई कुंडलियों में यह संकेत तीस के बाद के वर्षों में अधिक उभरता हुआ दिखता है। इसके पीछे का भाव यही है कि ग्रह अपनी भाषा को समय के साथ मजबूत करता है। जब वह मजबूत होता है तब उसका परिणाम भी अधिक सधा हुआ दिखाई देता है।
1 से 5 डिग्री वाला ग्रह अक्सर बहुत उत्साही दिखता है। इसमें ऊर्जा अधिक हो सकती है पर दिशा तय करने के लिए उसे सहारा चाहिए। ऐसे ग्रह कई बार उच्च डिग्री वाले ग्रहों की संगति, दृष्टि या योग से अधिक संतुलित परिणाम देते हैं।
यदि कुंडली में यह ग्रह शुभ संबंध में हो तो यह नए काम शुरू कराने की ताकत देता है। यदि संबंध कमजोर हो तो वही उत्साह जल्दबाजी में बदल सकता है। इसलिए इस श्रेणी में ग्रह को समझते समय संयोजन और दृष्टि की भूमिका बहुत बढ़ जाती है।
6 से 17 डिग्री के बीच स्थित ग्रह को किशोरावस्था के रूपक से समझाया जाता है। यह स्वतंत्रता चाहता है। यह जोखिम लेने को तैयार रहता है। इसमें जोश और इच्छाशक्ति अधिक होती है। पर अनुभव की कमी के कारण यह कभी कभी सही और गलत के फर्क को जल्दी नहीं पकड़ पाता।
ऐसी स्थिति को एक शौकिया खिलाड़ी के बड़े टूर्नामेंट में उतरने जैसा कहा जा सकता है। परिणाम बहुत अच्छा भी हो सकता है और बिखराव भी दिख सकता है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ग्रह को समर्थन देने वाले संकेत कितने मजबूत हैं। यहां डिग्री के साथ ग्रह बल भी उतना ही जरूरी हो जाता है।
18 से 25 डिग्री के बीच वाले ग्रह को परिपक्व वयस्क के रूपक से जोड़ा जाता है। यह जीवन को समझता है। यह निर्णय को संभालता है। इस श्रेणी में ग्रह का प्रभाव चरम पर महसूस हो सकता है। परिणाम अच्छा हो सकता है, बुरा हो सकता है या तटस्थ भी रह सकता है। यह पूरी तरह कुंडली में ग्रह की स्थिति, संबंध और बल पर निर्भर करता है।
जिस कुंडली में कई ग्रह इस सीमा में हों वहां जीवन में ग्रहों के संकेत अधिक साफ दिखते हैं। व्यक्ति को अनुभव का स्वाद जल्दी मिलता है। जिम्मेदारियां भी जल्दी आती हैं। उपलब्धि भी जल्दी दिख सकती है। चुनौती भी उतनी ही स्पष्ट हो सकती है।
26 से 29 डिग्री को जीवन के उत्तर चरण का रूपक दिया जाता है। यहां ग्रह में एक तरह की अनुभवी सघनता होती है। कुछ कुंडलियों में यह डिग्री ऐसे परिणाम देती है जहां व्यक्ति जल्दी समझदार दिखता है और कई बातों को बिना शोर के संभाल लेता है।
कुछ परंपराओं में यह भी कहा जाता है कि राहु, केतु, मंगल और शनि जैसे ग्रह इस श्रेणी में हों तो उनके अशुभ परिणामों की धार कम महसूस हो सकती है। व्यवहार में यह तभी सही बैठता है जब कुंडली के बाकी संकेत भी उसी दिशा में समर्थन दें। इसलिए इस संकेत को अकेला नियम मानने के बजाय समग्र दृष्टि से देखना अधिक सुरक्षित है।
भविष्यवाणी में राशि और ग्रह स्थिति महत्वपूर्ण हैं पर इतना ही पर्याप्त नहीं माना जाता। डिग्री और युति की बारीकी कई बार समझा देती है कि एक ग्रह होते हुए भी परिणाम क्यों नहीं मिल रहा। यही बिंदु व्यक्ति को भ्रम से बाहर निकालता है और कुंडली पढ़ने में विनम्रता भी लाता है।
यह भी ध्यान रखने योग्य है कि ज्योतिष केवल भावनात्मक आश्वासन नहीं है। यह गणना, अनुभव और अर्थ तीनों का संतुलन है। डिग्री इसी संतुलन में सटीकता जोड़ती है।
पहलू ग्रहों के बीच कोणीय संबंध है। जन्म कुंडली की गणना में डिग्री के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि ग्रह एक दूसरे से किस कोण पर हैं। अलग अलग कोण अलग तरह की ऊर्जा बनाते हैं। इन्हीं से सहयोग, तनाव और ध्रुवीकरण के संकेत उभरते हैं।
120 डिग्री के संबंध को सामंजस्यपूर्ण माना जाता है। इसमें समर्थन, शांति और सहयोग का भाव रहता है। यह ऐसा प्रवाह बनाता है जहां अवसर सहज रूप से मिलते हैं और काम बिना अधिक टूट फूट के आगे बढ़ता है।
उदाहरण के लिए यदि शुक्र मेष में 10 डिग्री पर हो और बृहस्पति सिंह में 10 डिग्री पर हो तो यह त्रिकोण संबंध बनता है। यहां शुक्र का प्रेम भाव और बृहस्पति का विस्तार भाव मिलकर रिश्तों में सहजता और नई ऊर्जा का संकेत दे सकते हैं।
90 डिग्री का संबंध अक्सर तनाव दिखाता है। ग्रहों की ऊर्जा में टकराव बन सकता है। यह टकराव परेशान भी करता है और परिपक्व भी करता है। कई बार यही पहलू व्यक्ति को अनुशासन, धैर्य और आत्म नियंत्रण सीखने पर मजबूर करता है।
उदाहरण के लिए यदि मंगल वृषभ में 15 डिग्री पर हो और शनि कुंभ में 15 डिग्री पर हो तो संघर्ष का भाव बन सकता है। मंगल की मुखर ऊर्जा और शनि की अनुशासित ऊर्जा एक दूसरे पर दबाव डाल सकती है। यदि व्यक्ति सही दिशा चुने तो यही दबाव बड़ी उपलब्धि में बदल सकता है।
180 डिग्री का संबंध ध्रुवीकरण बनाता है। यह दिखाता है कि ऊर्जा दो छोर पर खिंच रही है। यह पहलू यह भी बताता है कि जीवन में कहां संतुलन की जरूरत है।
उदाहरण के लिए यदि सूर्य कर्क में 20 डिग्री पर हो और चंद्रमा मकर में 20 डिग्री पर हो तो विरोध का भाव बनेगा। यहां भावनात्मक जरूरत और आत्म अभिव्यक्ति का दबाव एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा हो सकता है। संतुलन का रास्ता यही है कि दोनों पक्षों की भाषा समझी जाए और अतिवाद से बचा जाए।
अपनी जन्म कुंडली में डिग्री देखना कठिन नहीं है। इसके लिए सही जन्म समय और जन्म स्थान का होना जरूरी है। कुंडली के चार्ट में हर ग्रह के आगे एक संख्या दिखती है। वही संख्या ग्रह की डिग्री होती है। इस जानकारी से व्यक्ति अपनी कुंडली के पहलुओं को भी अधिक स्पष्टता से देख सकता है।
डिग्री की समझ का सबसे उपयोगी पक्ष यह है कि यह आत्म जागरूकता बढ़ाती है। यह व्यक्ति को अपने स्वभाव की बारीक परतें दिखाती है और समय के साथ निर्णय को बेहतर बनाती है। साथ ही यह जीवन योजनाओं में मदद करती है और महत्वपूर्ण विकल्पों के लिए सही समय चुनने की समझ भी देती है।
ग्रहों की डिग्री का क्या मतलब है
कुल 360 अंश को बारह राशियों में बांटा जाता है और हर राशि का फैलाव 30 डिग्री माना जाता है। ग्रह इसी चक्र में चलते हैं। जब वे कुछ कोणों पर एक दूसरे से जुड़ते हैं तब पहलू बनते हैं और वही कुंडली की व्याख्या को आकार देते हैं।
राहु कितने डिग्री पर उच्च का होता है
राहु और केतु को सूर्य और चंद्र के परिक्रमा पथ के काटने वाले बिंदुओं का द्योतक माना जाता है। ये दोनों बिंदु हमेशा एक दूसरे के ठीक सामने रहते हैं और उनका आपसी अंतर 180 डिग्री का होता है। उच्चत्व की चर्चा अलग परंपराओं में अलग ढंग से मिलती है इसलिए केवल डिग्री के आधार पर एक नियम बनाना सुरक्षित नहीं है।
जन्म कुंडली में डिग्री कैसे पढ़ते हैं
कुंडली पहिए जैसी आकृति में होती है जिसे 360 डिग्री के वृत्त की तरह समझा जाता है। यह बारह राशियों में विभाजित होता है और ग्रहों के आगे लिखी संख्या बताती है कि वह ग्रह उस राशि में किस अंश पर स्थित है।
क्या कुंडली में ग्रहों की डिग्री महत्वपूर्ण होती है
हां। ग्रह की डिग्री उसके प्रभाव की तीव्रता, परिपक्वता और पहलुओं की सटीकता को समझने में मदद करती है। इससे कुंडली की रीडिंग अधिक स्पष्ट बनती है।
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