ग्रहों की मित्रता और शत्रुता कैसे काम करती है

By पं. अमिताभ शर्मा

वैदिक ज्योतिष में ग्रह संबंधों की गहन व्याख्या

ग्रह मित्रता और शत्रुता का महत्व

सामग्री तालिका

जब भी कोई जन्म कुंडली देखी जाती है, सबसे पहले ग्रहों की शक्ति पर ध्यान जाता है। कौन सा ग्रह उच्च है, कौन नीच है, कौन अपने घर में है, यह सब महत्वपूर्ण लगता है। फिर भी कई बार ऐसा होता है कि ग्रह मजबूत दिखते हैं, योग भी बनते हैं, पर जीवन के परिणाम वैसे नहीं निकलते जैसा गणना में दिख रहा होता है। यहीं पर ग्रहों की मैत्री और वैर भाव की समझ असली गहराई दिखाती है।

वैदिक ज्योतिष में हर ग्रह केवल अलग इकाई नहीं माना जाता। हर ग्रह दूसरे ग्रहों के साथ विशेष सम्बन्ध रखता है। कुछ ग्रह एक दूसरे के स्वाभाविक मित्र होते हैं, कुछ स्वाभाविक शत्रु होते हैं और कुछ बीच की तटस्थ स्थिति में रहते हैं। जन्म पत्रिका में ग्रह आपस में जिस प्रकार बैठे होते हैं, उससे यह सम्बन्ध और गहरा या हल्का होता है। इसी मिश्रित संबंध को समझना ही पंचधा मित्रत्व का मूल है।

ग्रह मैत्री के प्रकार क्या हैं

ग्रहों के संबंध को तीन मुख्य स्तरों पर समझा जाता है।

  1. स्वाभाविक (नैसर्गिक) मैत्री और वैर भाव
  2. तात्कालिक (अस्थायी) मैत्री और वैर भाव
  3. संयुक्त या पंचधा मित्रत्व (कॉम्पाउंड रिलेशनशिप)

इन तीनों को मिलाकर ही यह समझ आता है कि दो ग्रह वास्तव में कुंडली में एक दूसरे के लिए कैसे कार्य करेंगे।

नीचे तालिका में इन तीन स्तरों को सरल रूप में रखा गया है।

स्तरक्या दर्शाता हैकब उपयोग होता है
स्वाभाविक संबंधग्रहों की जन्मजात मैत्री, शत्रुता या तटस्थताहर कुंडली में स्थिर, कभी नहीं बदलता
तात्कालिक संबंधग्रहों की आपसी भाव स्थिति से बनने वाला रिश्ताहर चार्ट में अलग, भावों के अनुसार बदलता
पंचधा मित्रत्वस्वाभाविक और तात्कालिक संबंध का योगवास्तविक व्यवहार, योगों के फल में मुख्य

स्वाभाविक ग्रह मैत्री और वैर भाव क्या है

नैसर्गिक सम्बंध की मूल बात

वैदिक ज्योतिष में प्रत्येक ग्रह के लिए प्रत्येक दूसरे ग्रह के साथ एक निश्चित रिश्ता तय माना जाता है जिसे नैसर्गिक संबंध या Naisargik Sambandh कहा जाता है। यह रिश्ता किसी एक कुंडली से नहीं, बल्कि ग्रह के स्वभाव से तय होता है।

यह संबंध तीन प्रकार का होता है।

  • स्वाभाविक मित्र
  • स्वाभाविक शत्रु
  • स्वाभाविक तटस्थ

यह रिश्ता कभी नहीं बदलता। कुंडली कोई भी हो, ग्रह जहाँ भी बैठें, नैसर्गिक मैत्री वही रहती है।

स्वाभाविक ग्रह मैत्री तालिका

नीचे प्रत्येक ग्रह की नैसर्गिक मैत्री और शत्रुता को तालिका में रखा गया है।

ग्रहस्वाभाविक मित्रस्वाभाविक शत्रुतटस्थ ग्रह
सूर्योचंद्र, मंगल, गुरु, बुधशुक्र, शनिकोई नहीं
चंद्रसूर्यो, बुधकोई नहींमंगल, गुरु, शुक्र, शनि
मंगलसूर्यो, चंद्र, गुरुबुधशुक्र, शनि
बुधसूर्यो, शुक्रचंद्रमंगल, गुरु, शनि
गुरुसूर्यो, चंद्र, मंगलशुक्र, बुधशनि
शुक्रबुध, शनिसूर्यो, चंद्रमंगल, गुरु
शनिबुध, शुक्रसूर्यो, चंद्रमंगल, गुरु

राहु और केतु की विशेष स्थिति

राहु और केतु को छाया ग्रह माना जाता है। इनके लिए वैसी स्थिर नैसर्गिक मैत्री नहीं दी जाती जैसी स्थूल ग्रहों के लिए दी गई है।

  • राहु सामान्यतः बुध, शुक्र और शनि के साथ अनुकूल माना जाता है, पर इसका स्वभाव पूरी तरह उसके राशि स्वामी और जिन ग्रहों के साथ बैठा है, उन पर निर्भर करता है।
  • केतु को मंगल के समान स्वभाव वाला माना जाता है और इसकी आध्यात्मिक निकटता गुरु से जोड़ी जाती है।

इन दोनों के लिए कठोर तालिका बनाने के स्थान पर उनके dispositor और संयुक्त ग्रहों के आधार पर निर्णय लेना अधिक उचित माना जाता है।

ग्रह तात्कालिक मित्र कब बनते हैं

तात्कालिक मित्रत्व क्या है

कुंडली के भीतर ग्रहों की भाव स्थिति के आधार पर जो रिश्ता बनता है, उसे तात्कालिक मित्रत्व या Tatkalik Mitratva कहा जाता है। यह संबंध हर कुंडली के लिए अलग होता है और केवल उस चार्ट की व्यवस्था पर निर्भर करता है।

यह नियम बताता है कि एक ग्रह, दूसरे ग्रह को उसके स्थान के आधार पर मित्र देखेगा या शत्रु।

तात्कालिक मित्रत्व का नियम

किसी भी ग्रह A और ग्रह B के बीच तात्कालिक संबंध जानने के लिए यह देखा जाता है कि ग्रह A, ग्रह B से कितनेवें भाव में बैठा है।

  • यदि ग्रह A, ग्रह B से २, ३, ४, १०, ११ या १२ भाव में हो तो B, A को तात्कालिक मित्र मानता है।
  • यदि ग्रह A, ग्रह B से १, ५, ६, ७, ८ या ९ भाव में हो तो B, A को तात्कालिक शत्रु मानता है।

यह संबंध एकतरफ़ा होता है। इसका अर्थ यह है कि यदि B, A को मित्र मान रहा है तो यह आवश्यक नहीं कि A भी B को मित्र माने। दोनों दिशाओं की गणना अलग अलग करनी पड़ती है।

नीचे तालिका में इसे संक्षेप में दिखाया गया है।

भाव स्थिति (B से A की)तात्कालिक संबंध
2, 3, 4, 10, 11, 12तात्कालिक मित्र
1, 5, 6, 7, 8, 9तात्कालिक शत्रु

यह भाव क्यों चुने गए हैं

वैदिक परंपरा में प्रत्येक भाव की प्रकृति अलग मानी जाती है।

  • 2, 3, 4, 10, 11, 12 को यहाँ अपेक्षाकृत सहयोगी या कम से कम टकराव रहित स्थिति माना गया है, इसलिए इन्हें मित्र भाव में रखा जाता है।
  • 1, 5, 6, 7, 8, 9 भाव ग्रहों के बीच अधिक द्वंद्व, प्रतिस्पर्धा या तनाव पैदा कर सकते हैं, इसलिए इन्हें तात्कालिक शत्रु के भाव माने जाते हैं।

यहाँ 12वां भाव सामान्यतः हानि से जुड़ा माना जाता है, पर इस नियम में इसे दूरी के साथ बिना सीधी टक्कर के रूप में देखा जाता है, इसलिए मित्र श्रेणी में रखा गया है।

तात्कालिक मित्रत्व के उदाहरण

उदाहरण 1: चंद्र मेष में, बुध मकर में

मान लीजिए चंद्र मेष राशि में और बुध मकर राशि में है।

  • चंद्र से मकर १०वां भाव है, इसलिए चंद्र, बुध को तात्कालिक मित्र मानता है।
  • बुध से मेष ४था भाव है, इसलिए बुध भी चंद्र को तात्कालिक मित्र मानता है।

यहाँ दोनों ग्रह तात्कालिक रूप से मित्र बन जाते हैं, जबकि नैसर्गिक रूप से चंद्र, बुध को मित्र मानता है और बुध, चंद्र को शत्रु मानता है। इस स्थिति में तात्कालिक मित्रत्व कई बार नैसर्गिक वैर भाव की तीव्रता को नरम कर देता है।

उदाहरण 2: गुरु मेष में, शुक्र सिंह में

अब मान लें गुरु मेष में और शुक्र सिंह में हो।

  • गुरु से सिंह ५वां भाव है, इसलिए गुरु, शुक्र को तात्कालिक शत्रु मानता है।
  • शुक्र से मेष ९वां भाव है, इसलिए शुक्र भी गुरु को तात्कालिक शत्रु मानता है।

यहाँ दोनों दिशाओं से तात्कालिक शत्रुता बनती है। साथ ही गुरु और शुक्र पहले से नैसर्गिक शत्रु भी हैं। ऐसे में दोनों के साथ होने या एक दूसरे पर दृष्टि होने से इच्छाओं में खींचतान, मूल्यों में टकराव और निर्णयों में विरोधाभास बढ़ सकता है।

पंचधा मित्रत्व कैसे निकाला जाता है

संयुक्त संबंध का सिद्धांत

केवल नैसर्गिक मैत्री या केवल तात्कालिक रिश्ता देखने से पूरी तस्वीर स्पष्ट नहीं होती। असली व्यवहार समझने के लिए दोनों को साथ जोड़कर देखना पड़ता है। इसे पंचधा मित्रत्व या compound relationship कहा जाता है।

इसके लिए प्रत्येक प्रकार के संबंध को संख्यात्मक मूल्य दिया जाता है।

  • स्वाभाविक मित्र = +1
  • स्वाभाविक शत्रु = −1
  • स्वाभाविक तटस्थ = 0
  • तात्कालिक मित्र = +1
  • तात्कालिक शत्रु = −1

अब किसी भी दो ग्रहों के लिए स्वाभाविक और तात्कालिक दोनों मान जोड़ते हैं।

कुल योग से संयुक्त संबंध तय होता है।

कुल योगसंयुक्त संबंध का प्रकार
+2महा मित्र
+1मित्र
0तटस्थ
−1शत्रु
−2महा शत्रु

यही वह रिश्ता है जो किसी भी जन्म कुंडली में वास्तविक रूप से दिखता है।

उदाहरण: सूर्यो और बुध

सूर्यो और बुध नैसर्गिक रूप से मित्र हैं।

मान लें सूर्यो मेष में और बुध मीन में हो।

  • सूर्यो से मीन १२वां भाव है, जो तात्कालिक मित्र का भाव है।
  • अतः सूर्यो के लिए बुध
    • स्वाभाविक मित्र = +1
    • तात्कालिक मित्र = +1
    • संयुक्त योग = +2 → महा मित्र

ऐसी स्थिति में सूर्यो और बुध दोनों एक दूसरे के फल को बहुत मजबूती से सहयोग करते हैं। बुद्धि, साहस और निर्णय शक्ति साथ मिलकर काम करती है।

उदाहरण: गुरु और शुक्र

गुरु और शुक्र नैसर्गिक रूप से शत्रु हैं।

मान लें गुरु धनु में और शुक्र मकर में हो।

  • धनु से मकर २रा भाव है, जो तात्कालिक मित्र वाला भाव है।
  • अतः गुरु के लिए शुक्र
    • स्वाभाविक शत्रु = −1
    • तात्कालिक मित्र = +1
    • संयुक्त योग = 0 → तटस्थ

यहाँ दोनों के बीच का तनाव काफी हद तक कम हो जाता है। न पूर्ण मैत्री न तीव्र शत्रुता, परिणाम बीच की स्थिति में रहते हैं।

उदाहरण: मंगल और बुध

मंगल और बुध स्वाभाविक रूप से शत्रु हैं।

मान लें मंगल वृषभ में और बुध सिंह में हो।

  • वृषभ से सिंह ४था भाव होता है, जो तात्कालिक मित्र का भाव है।
  • मंगल के लिए बुध का संयुक्त संबंध
    • स्वाभाविक शत्रु = −1
    • तात्कालिक मित्र = +1
    • योग = 0 → तटस्थ

इस प्रकार कई बार शत्रु भी सही स्थिति में बैठकर व्यावहारिक रूप से तटस्थ या सहयोगी बन सकते हैं।

ज्योतिषीय विश्लेषण में ग्रह मैत्री का महत्व

संयोग (युति) पर प्रभाव

जब दो ग्रह एक ही घर में युति बनाते हैं, तो उनकी मैत्री या शत्रुता सीधे परिणामों पर असर डालती है।

  • यदि वे मित्र या महा मित्र हों तो योग सामान्यतः सहयोगी परिणाम देता है।
  • यदि वे शत्रु या महा शत्रु हों तो परिणाम मिश्रित, विलंबित या तनावपूर्ण हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए यदि गुरु और शुक्र किसी घर में साथ हों और संयुक्त संबंध शत्रुता का हो, तो ज्ञान और भोग के बीच खींचतान मजबूत हो सकती है। व्यक्ति उच्च आदर्श और सुखों के बीच झूल सकता है।

दृष्टि (Aspects) और आपसी प्रभाव

ग्रहों की आपसी दृष्टि में भी यही नियम चलते हैं। जब सूर्यो और शनि जैसे स्वाभाविक शत्रु एक दूसरे पर दृष्टि रखते हैं और यदि संयुक्त संबंध भी प्रतिकूल हो, तो अहं, अनुशासन और जिम्मेदारी वाले क्षेत्र में टकराव, देरी या दबाव अनुभव हो सकता है।

महादशा और अंतर्दशा में भूमिका

जब दो ग्रह एक के बाद एक या एक साथ (महादशा और अंतर्दशा में) फल दे रहे होते हैं, तो उनका संयुक्त संबंध बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।

  • यदि दोनों महा मित्र या मित्र हों तो समय प्रायः सहयोगी, स्पष्ट और प्रगतिशील होता है।
  • यदि दोनों महा शत्रु हों तो भीतर खिंचाव, उलझन और सम्भावित रुकावटें अधिक दिखाई दे सकती हैं, भले ही ग्रह अपनी जगह मजबूत क्यों न हों।

इसी कारण दो व्यक्तियों की दशा एक जैसी होने पर भी अनुभव अलग होते हैं, क्योंकि उनकी पत्रिका में ग्रहों की आपसी मैत्री अलग होती है।

योगों पर प्रभाव

बहुत से राजयोग, धन योग आदि दो या अधिक ग्रहों के सहयोग से बनते हैं। यदि योग बनाने वाले ग्रह संयुक्त संबंध से मित्र हों, तो योग अपने पूरे बल से फल देता है।

यदि वही ग्रह संयुक्त रूप से शत्रु हों तो योग तो रहेगा, पर उसका फल सीमित या अस्थिर रह सकता है। इसीलिए किसी भी योग को देखते समय केवल शास्त्रीय सूत्र देखना पर्याप्त नहीं, ग्रहों की आपसी मैत्री भी देखनी पड़ती है।

नीचे एक संक्षिप्त तालिका में योग पर ग्रह मैत्री के असर को रखा गया है।

संयुक्त संबंधयोग पर सामान्य प्रभाव
महा मित्र (+2)योग सशक्त, फल स्थिर और स्पष्ट
मित्र (+1)अच्छा सहयोग, परिणाम प्रायः सकारात्मक
तटस्थ (0)मध्यम फल, समय और दशा पर निर्भर
शत्रु (−1)फल घटा हुआ, परिणाम मिश्रित
महा शत्रु (−2)योग कागज पर, जीवन में फल कम या बाधित

ग्रह मैत्री को लेकर आम गलतफहमियाँ

क्या केवल नैसर्गिक मैत्री पर्याप्त है

कई बार यह मान लिया जाता है कि यदि दो ग्रह नैसर्गिक मित्र हैं तो उनकी युति हमेशा शुभ होगी। यदि उनके भाव स्थान से तात्कालिक शत्रुता बन रही हो तो संयुक्त संबंध तटस्थ या शत्रु भी हो सकता है। ऐसे में परिणाम उतने सीधे नहीं रहते जितना केवल तालिका से दिखता है।

क्या दो मजबूत ग्रह हमेशा अच्छा फल देंगे

यदि दो ग्रह अपनी अपनी स्थिति में मजबूत हों, पर संयुक्त संबंध से महा शत्रु हों, तो उनकी शक्ति एक दूसरे के विरुद्ध काम कर सकती है। परिणाम यह होता है कि भीतर संघर्ष और बाहर देरी अधिक दिखती है।

क्या एक तरफ़ा मित्रता पर्याप्त है

कभी किसी एक ग्रह की दृष्टि से मित्रता दिखती है और दूसरे की दृष्टि से शत्रुता। ऐसी स्थिति में सहयोग अधूरा रहता है। इसलिए हर बार दोनों दिशाओं से संबंध देखना आवश्यक है।

राहु केतु पर वही नियम लागू होते हैं क्या

राहु, केतु के लिए कठोर नैसर्गिक मैत्री तालिका पर निर्भर रहना उपयुक्त नहीं। इनके लिए जिस ग्रह के साथ ये बैठे हैं और जिस ग्रह की राशि में बैठे हैं, वही सबसे बड़ा संकेतक होते हैं।

शास्त्रीय आधार और ऋषि परंपरा

ग्रह मैत्री का ज्ञान आधुनिक कल्पना नहीं, बल्कि ऋषि परंपरा से आया हुआ सूत्र है।

  • बृहद्पाराशर होरा शास्त्र में ऋषि पाराशर ने नैसर्गिक मित्र, शत्रु और तटस्थ ग्रहों की स्पष्ट तालिका दी है। इसी ग्रंथ में तात्कालिक संबंध और पंचधा मित्रत्व की विधि भी बताई गई है।
  • सरावली, जातक पारिजात और फलदीपिका जैसे ग्रंथ भी योगों और ग्रहों के संयुक्त फल में आपसी मैत्री की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हैं।

इन सब ग्रंथों में ग्रहों को स्वतंत्र न मानकर आपस में संबंधित ऊर्जा के रूप में देखा गया है।

ग्रह मैत्री और शत्रुता पर आधारित सार

ग्रह मित्र और शत्रु शब्द भावनात्मक नहीं हैं, बल्कि यह संकेत हैं कि दो ग्रह की ऊर्जा कितनी सामंजस्यपूर्ण तरीके से मिल पाएगी। किसी भी कुंडली को गहराई से समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि कौन से ग्रह वास्तव में साथ खड़े हैं और कौन से भीतर खींचतान पैदा कर रहे हैं।

जब नैसर्गिक, तात्कालिक और संयुक्त तीनों स्तरों पर संबंध को समझा जाता है तब ही दशा, गोचर, योग और जीवन के अनुभव एक दूसरे से मेल खाते दिखते हैं। यही स्तर वह है जहाँ से ज्योतिष केवल गणना से आगे बढ़कर अनुभव के साथ जुड़ता है।


सामान्य प्रश्न: ग्रह मैत्री और वैर भाव

प्रश्न 1. क्या दो स्वाभाविक शत्रु ग्रह भी अच्छा फल दे सकते हैं

यदि दो ग्रह नैसर्गिक रूप से शत्रु हों, पर तात्कालिक संबंध से मित्र बन रहे हों और संयुक्त गणना से तटस्थ या मित्र बन जाएँ, तो वे व्यावहारिक रूप से सहयोग दे सकते हैं। ऐसी स्थिति में शत्रुता की तीक्ष्णता काफी कम हो जाती है, हालांकि भीतर हल्का खिंचाव बना रह सकता है।

प्रश्न 2. यदि दो ग्रह मित्र हों लेकिन उनमें से एक कमजोर हो तो क्या होगा

यदि एक ग्रह नीच, अस्त, अत्यधिक पीड़ित या बहुत कमजोर हो, तो उसकी क्षमता अपने मित्र ग्रह को सहयोग देने की कम हो जाती है। मित्रता बनी रहती है परन्तु फल उतना प्रबल नहीं दिखता जितना मजबूत ग्रहों के साथ संभव होता।

प्रश्न 3. क्या यह ग्रह मैत्री केवल जन्म कुंडली में देखनी चाहिए या विभाजित वर्गों में भी

ग्रह मैत्री सभी वर्ग कुंडलियों में महत्त्व रखती है, खासकर नवांश (D9) और दशमांश (D10) जैसे महत्वपूर्ण चार्ट में। विवाह, करियर और प्रतिष्ठा को समझते समय इन वर्गों में ग्रहों के संबंध की स्थिति और मैत्री को देखना बहुत उपयोगी रहता है।

प्रश्न 4. क्या ग्रह एक दिशा से मित्र और दूसरी से शत्रु हो सकते हैं

हाँ, तात्कालिक संबंध में ऐसा अक्सर होता है। एक ग्रह दूसरे से मित्र भाव में हो सकता है, जबकि दूसरा उसकी दृष्टि से शत्रु भाव में हो। ऐसी स्थिति में एक ग्रह सहयोग देता है और दूसरा प्रतिरोध कर सकता है, जिससे परिणाम मिश्रित हो जाते हैं।

प्रश्न 5. किसी योग के सच में फल देने की क्षमता को ग्रह मैत्री से कैसे परखा जाए

सबसे पहले योग में जुड़े ग्रहों की संयुक्त (पंचधा) मैत्री को देखें। फिर उनकी शक्ति, स्थिति और पीड़ा की जाँच करें और यह देखें कि प्रासंगिक दशा और गोचर कब सहयोगी बनते हैं। यदि ग्रह आपसी शत्रु हैं या अत्यधिक कमजोर हैं, तो योग केवल सिद्धांत में रहेगा और उसका फल सीमित या टुकड़ों में मिल सकता है।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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