By पं. नीलेश शर्मा
भगवान शिव की स्तुति में रचित यह चालीसा न केवल भक्ति भाव जगाती है बल्कि जीवन के संकटों को भी दूर करती है।

शिव चालीसा भगवान शिव की अनंत महिमा करुणा और शक्ति का दिव्य स्तुति ग्रंथ है। इसके चालीस छंद शिव के स्वरूप उनके चरित्र भक्तों के प्रति उनकी कृपा और संकट निवारण सामर्थ्य का सुंदर वर्णन करते हैं। शिव चालीसा का पाठ आत्मबल मानसिक शांति सकारात्मक ऊर्जा और शिव कृपा प्रदान करता है। यहां संपूर्ण चालीसा और प्रत्येक छंद का सरल अर्थ दिया जा रहा है।
श्री गणेश गिरिजा सुवन मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम देहु अभय वरदान॥
अर्थ
हे गणेश गिरिजा के पुत्र आप मंगल के मूल अत्यंत बुद्धिमान हैं। कवि अयोध्या दास आपसे अभय और कल्याण का वरदान मांगते हैं।
जय गिरिजा पति दीन दयाला सदा करत संतन प्रतिपाला।
भाल चंद्रमा सोहत नीके कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाए मुण्डमाल तन छार लगाए॥
वस्त्र खाल बाघंबर सोहे छवि को देख नाग मुनि मोहे॥
मैना मातु की ह्वै दुलारी बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
अर्थ
हे पार्वतीपति शिव आप दीनों पर कृपा करने वाले हैं। आपके मस्तक पर चंद्रमा कानों में नागफनी गंगा शिर पर बहती है और मुंडमाला भस्म तथा बाघांबर से आपका सौंदर्य अलौकिक दिखता है। पार्वती आपके बाईं ओर शोभायमान हैं। त्रिशूल आपके शत्रु विनाशक रूप का प्रतीक है।
नन्दि गणेश सोहै तहं कैसे सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी देवन सब मिलि तुम्हिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ लवनिमेष महं मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
अर्थ
नंदी गणेश कार्तिकेय और शिवगण आपके आसपास ऐसे शोभते हैं जैसे सागर में कमल। देवताओं के संकट में आपने तारकासुर जलंधर और त्रिपुरासुर का नाश किया। भागीरथ की तपस्या स्वीकार कर गंगा अवतरित करने का संकल्प पूरा किया। दान देने में आप अद्वितीय हैं और वेद भी आपकी महिमा का संपूर्ण वर्णन नहीं कर पाते।
प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहाँ करी सहाई नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनंत अविनाशी करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो संकट से मोहि आन उबारो॥
अर्थ
समुद्र मंथन में निकले विष से देव और दानव त्रस्त हुए तब आपने विष पिया और नीलकंठ कहलाए। श्रीराम ने सहस्र कमल से पूजा की और एक कमल कम पड़ने पर अपनी आंख अर्पित कर दी जिससे प्रसन्न होकर आपने वरदान दिया। भक्त संकट में जब पुकारे तो आप तुरन्त रक्षा करते हैं और अपने त्रिशूल से शत्रु बाधा दूर करते हैं।
मातु पिता भ्राता सब कोई संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी आय हरहु अब संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदाहीं जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं नारद शारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमो शिवाय सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई ता पार होत है शम्भु सहाई॥
ऋणिया जो कोई हो अधिकारी पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
अर्थ
संकट में कोई साथ न दे तो शिव ही आश्रय हैं। वे धनवान निर्धन सबको फल देते हैं। भक्त की स्तुति का कोई निश्चित नियम नहीं बस भाव आवश्यक है। योगी और देवता भी शिव का ध्यान करते हैं। श्रद्धा से पाठ करने पर ऋण मुक्ति संकटों से मुक्ति और संतान प्राप्ति होती है।
पण्डित त्रयोदशी को लावे ध्यान पूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी व्रत करे हमेशा तन नहीं ताके रहे कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे अन्तवास शिवपुर में पावे॥
कहे अयोध्या आस तुम्हारी जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥
अर्थ
त्रयोदशी के दिन हवन करना उत्तम माना गया है। नियमित व्रत करने से शरीर कष्टों से मुक्त रहता है। शिव चालीसा का पाठ जन्म जन्म के पापों का नाश करता है और अंत में शिवलोक प्राप्त होता है।
नित्त नेम कर प्रातः ही पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ऋतु संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि पूर्ण कीन कल्याण॥
अर्थ
प्रतिदिन शिव चालीसा का पाठ करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कवि ने कल्याण भाव से यह स्तुति की रचना की।
शिव चालीसा का पाठ जीवन में साहस शांति स्थिरता और शिव कृपा का प्रकाश भर देता है। यह साधना भक्त को भय शत्रु बाधा संकट मानसिक तनाव और नकारात्मकता से मुक्त करती है। श्रद्धा नियम और भक्ति से किया गया पाठ आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है।
1. शिव चालीसा कब पढ़नी चाहिए
सुबह प्रदोष काल शिवरात्रि और सोमवार के दिन सर्वोत्तम माने जाते हैं।
2. क्या शिव चालीसा रोज़ पढ़ना शुभ है
हाँ नियमित पाठ से मानसिक शांति और शिव कृपा मिलती है।
3. क्या शिव चालीसा से शत्रु बाधा दूर होती है
हाँ त्रिशूल और नीलकंठ प्रकरण शत्रु भय और बाधा से रक्षा का प्रतीक है।
4. क्या ऋण मुक्ति में शिव चालीसा सहायक है
हाँ श्रद्धा से पाठ करने पर ऋण निवारण का फल बताया गया है।
5. संतान प्राप्ति की इच्छा पर क्या लाभ है
शिव कृपा से संतान प्राप्ति का वर वर्णित है।
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