By पं. सुव्रत शर्मा
जानिए गुरु पूर्णिमा 2025 पर राहु को नवयुग का गुरु क्यों माना जा रहा है और इसका ज्योतिषीय महत्व

गुरु पूर्णिमा 2025 का पावन पर्व 10 जुलाई को मनाया जाएगा। परंपरा के अनुसार यह दिन बृहस्पति को समर्पित है जो ज्ञान सत्य और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना जाता है। सदियों से गुरु पूर्णिमा का केंद्र बिंदु बृहस्पति रहा है लेकिन आधुनिक युग की चुनौतियों मानसिक दबाव तकनीकी उतार चढ़ाव और तेज बदलावों के बीच राहु की शिक्षाएं अधिक प्रासंगिक होती जा रही हैं। इसी कारण कई ज्योतिषाचार्य आज राहु को नवयुग का आध्यात्मिक गुरु मान रहे हैं।
गुरु पूर्णिमा 10 जुलाई 2025 गुरुवार
पूर्णिमा प्रारंभ 10 जुलाई सुबह 1:36 बजे
पूर्णिमा समाप्त 11 जुलाई सुबह 2:06 बजे
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
गुरु बृहस्पति और राहु दोनों का ध्यान करें।
बृहस्पति के लिए पीले पुष्प चना दाल हल्दी और पीला वस्त्र अर्पित करें।
राहु के लिए नीले या काले पुष्प नारियल उड़द और नीला वस्त्र अर्पित करें।
"ॐ बृं बृहस्पतये नमः" और "ॐ राहवे नमः" मंत्रों का जाप करें।
माता पिता गुरु और शिक्षकों को प्रणाम करें।
जरूरतमंदों को दान दें विशेषकर शिक्षा तकनीक और नवाचार से जुड़े क्षेत्रों में।
बृहस्पति सदियों से धर्म ज्ञान सत्य और अनुशासन के मार्गदर्शक रहे हैं।
वे स्थिरता संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति का प्रकाश देते हैं।
बृहस्पति का मार्ग परंपरा शास्त्र और गुरु शिष्य संबंध को मजबूत करता है।
गुरु पूर्णिमा पर बृहस्पति की पूजा से शांति विवेक और आध्यात्मिक विकास होता है।
राहु परिवर्तन चुनौती अनिश्चितता और अनुभव आधारित शिक्षा का कारक है।
तेजी से बदलते संसार में तकनीक कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक उतार चढ़ाव के बीच राहु की ऊर्जा अत्यंत प्रासंगिक है।
राहु डर भ्रम और सीमाओं का सामना कराते हुए साधक को भीतर से मजबूत करता है।
यह ग्रह साधक को कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकालकर जीवन की वास्तविकताओं से रूबरू कराता है।
राहु का मार्ग कठिन है लेकिन आत्मविकास तेजी से कराता है।
इस वर्ष राहु की ऊर्जा अत्यंत सक्रिय मानी जा रही है जिससे यह दिन राहु को गुरु रूप में मानने का श्रेष्ठ अवसर है।
राहु साधक को जीवन की छाया पक्ष दिखाता है ताकि वह भीतर की सच्चाई पहचान सके।
आज के समय में अनिश्चितता परिवर्तन और मानसिक दबाव के बीच राहु की शिक्षा अधिक प्रभावशाली हो गई है।
यह नवयुग बृहस्पति को छोड़कर राहु को अपनाने का नहीं बल्कि दोनों को संतुलित करने का समय है।
बृहस्पति प्रकाश सत्य और परंपरा सिखाते हैं।
राहु चुनौती अनुभव नवाचार और आत्मछाया का पाठ पढ़ाते हैं।
दोनों की ऊर्जा साधक को संपूर्ण बनाती है।
बृहस्पति से स्थिरता शांति और नैतिकता।
राहु से साहस स्वतंत्रता और सीमाओं से मुक्ति।
"ॐ राहवे नमः" मंत्र का जाप करें।
अपने डर भ्रम और असुरक्षा को स्वीकारें उनसे भागें नहीं।
नवाचार तकनीक शिक्षा और वंचित वर्गों के लिए दान करें।
परिवर्तन को अपनाएं यह राहु का सबसे बड़ा संदेश है।
गुरु पूर्णिमा 2025 यह सिखाती है कि गुरु का अर्थ समय के साथ बदलता है।
बृहस्पति आज भी चिरस्थायी ज्ञान का दीपक हैं पर राहु आधुनिक युग की शिक्षा देता है।
सच्चा साधक वही है जो प्रकाश और छाया दोनों को स्वीकार कर संतुलित मार्ग पर चले।
जब साधक बृहस्पति से विवेक और राहु से साहस ग्रहण करता है तब आध्यात्मिक यात्रा गहरी सशक्त और व्यक्तिगत बन जाती है।
गुरु पूर्णिमा 2025 का संदेश है अपने भीतर के दोनों स्वरूपों को पहचानें प्रकाश और छाया दोनों ही गुरु हैं दोनों पूज्य हैं।
1. राहु को आधुनिक युग का गुरु क्यों माना जा रहा है
क्योंकि राहु परिवर्तन अनिश्चितता तकनीकी गति और मानसिक चुनौतियों के बीच सीखने की क्षमता बढ़ाता है जो आज के युग की जरूरत है।
2. क्या राहु की पूजा गुरु पूर्णिमा पर शुभ मानी जाती है
हाँ आधुनिक समय में कई साधक बृहस्पति के साथ राहु की पूजा भी करते हैं क्योंकि दोनों अलग प्रकार की शिक्षा देते हैं।
3. बृहस्पति और राहु में क्या मूल अंतर है
बृहस्पति स्थिरता और परंपरा का मार्ग दिखाते हैं जबकि राहु चुनौती अनुभव और नवाचार का पाठ पढ़ाते हैं।
4. राहु से जुड़े उपाय कौन से हैं
"ॐ राहवे नमः" मंत्र जाप नवाचार और शिक्षा से संबंधित दान डर और भ्रम का सामना करना और परिवर्तन को स्वीकारना।
5. क्या राहु का मार्ग कठिन होता है
हाँ राहु साधक को छाया पक्ष दिखाता है लेकिन यही चुनौती आत्मविकास और आंतरिक शक्ति को प्रकट करती है।
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