By पं. संजीव शर्मा
मां दुर्गा की कृपा, ऋषियों की साधना और महाविद्याओं की शक्ति से जुड़ी यह कथा तंत्र और भक्ति का अद्भुत समागम है।

गुप्त नवरात्रि केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत स्वरूप है। यह काल साधना तप आस्था और दिव्य परिवर्तन की वह यात्रा है जिसमें साधक असंभव को भी संभव बनते हुए देखता है। इस कथा में शक्ति तंत्र और मां दुर्गा की कृपा का गहरा प्रभाव दिखाई देता है।
सतयुग के प्रारंभ में पृथ्वी पर धर्म सत्य और सदाचार का वास था। देवता ऋषि और मानव सभी तप साधना यज्ञ और वेद अध्ययन में रत रहते थे। इसी समय दैत्य दुर्ग ने कठोर तप करके ब्रह्मा को प्रसन्न किया और उनसे चारों वेद प्राप्त कर लिए।
वेद प्राप्त करते ही वह अत्यधिक शक्तिशाली हो गया और उसने वेदों को छिपा दिया। वेद मार्ग बंद होने से धर्म दुर्बल हो गया यज्ञ थम गए और पृथ्वी पर अकाल अराजकता और अंधकार फैल गया।
देवता और ऋषि अत्यंत चिंतित होकर मां पराम्बा के पास पहुंचे और उनसे संकट हटाने की प्रार्थना की।
देवताओं की पुकार सुनकर मां पराम्बा ने अपने तेज से दस दिव्य शक्तियों को प्रकट किया।
उनके उज्ज्वल स्वरूप से काली तारा त्रिपुरसुंदरी भुवनेश्वरी छिन्नमस्ता त्रिपुर भैरवी धूमावती बगलामुखी मातंगी और कमला ये दस महाविद्याएँ प्रकट हुईं।
इन देवियों ने मिलकर दैत्य दुर्ग का संहार किया और वेदों को पुन स्थापित किया। उसी समय से गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्याओं की साधना का विशेष महत्व माना गया।
एक गांव में एक स्त्री रहती थी जिसका पति व्यसनों में डूबा था। मद्य सेवन जुआ क्रोध और अधार्मिक आचरण उसका स्वभाव बन चुकी थी। स्त्री धर्मपरायण थी परंतु पति के कारण घर में शांति और सुख का अभाव था।
एक दिन वह अत्यंत दुखी होकर ऋषि श्रृंगी के आश्रम पहुंची और बोली कि वह मां दुर्गा की उपासना करना चाहती है परंतु घर की परिस्थिति इसकी अनुमति नहीं देती।
ऋषि श्रृंगी ने कहा कि गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्याओं की साधना करो। यह साधना गोपनीय संयमित और अत्यंत प्रभावशाली होती है।
स्त्री ने नियमपूर्वक नौ दिनों तक पूजा व्रत मंत्र जाप और संयम को अपनाया। कुछ ही समय में वातावरण बदलने लगा। पति के स्वभाव में परिवर्तन आया और घर में सुख शांति और समृद्धि लौट आई।
यह कथा दर्शाती है कि श्रद्धा और साधना से जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन संभव है।
गुप्त नवरात्रि के दिनों में साधक तंत्र साधना के लिए तारापीठ कामाख्या त्र्यंबकेश्वर और उज्जैन जैसे शक्ति स्थलों पर जाते हैं।
यहां साधक एकांत में उपवास मंत्र जाप और ध्यान द्वारा अपनी आंतरिक शक्ति को जागृत करते हैं। माना जाता है कि इन स्थानों पर साधना शीघ्र सिद्धि और दिव्य अनुभव प्रदान करती है।
गुप्त नवरात्रि का आरंभ प्रातः स्नान और शुद्ध वस्त्र धारण से होता है।
शुभ मुहूर्त में कलश स्थापित किया जाता है जिसमें गंगाजल सुपारी सिक्का आम पत्ते और नारियल रखा जाता है।
मां दुर्गा और दस महाविद्याओं को लाल पुष्प कुमकुम चंदन मिठाई फल दीपक और धूप अर्पित किए जाते हैं।
दस महाविद्याओं के मंत्रों का जाप दुर्गा सप्तशती का पाठ कन्या पूजन और दान आवश्यक है।
साधक को नौ दिन सात्विक आहार रखना चाहिए और तामसिक भोजन मांस मदिरा प्याज लहसुन क्रोध और विवाद से दूर रहना चाहिए।
गुप्त नवरात्रि के दौरान चंद्रमा मंगल राहु और केतु की स्थिति साधना के लिए अत्यंत अनुकूल होती है।
इस समय सर्वार्थ सिद्धि योग अभिजीत मुहूर्त और अमृत काल जैसे संयोग निर्मित होते हैं जो साधना के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देते हैं।
यह साधना मन को स्थिर करती है ग्रह दोष शांत करती है और जीवन में शांति और समृद्धि लाती है।
गुप्त नवरात्रि बताती है कि जब जीवन में मार्ग बंद नजर आए तब आत्मशक्ति का जागरण सबसे बड़ा सहारा बनता है।
दस महाविद्याओं की साधना साधक को भय से मुक्त करती है मार्ग दिखाती है और जीवन में सुख स्थिरता और विजय प्रदान करती है।
गुप्त नवरात्रि को गुप्त क्यों कहा जाता है
इस अवधि की साधना तंत्र आधारित और गोपनीय मानी जाती है इसलिए इसे प्रकट रूप से नहीं किया जाता।
क्या सामान्य भक्त भी इस साधना को कर सकता है
हाँ नियम संयम और सात्विकता के साथ कोई भी भक्त पूजा कर सकता है।
दस महाविद्याओं का इस साधना में क्या महत्व है
ये देवियाँ ब्रह्मांड की दस प्रमुख शक्तियों का प्रतीक हैं जो साधक के भीतर छिपे अंधकार को दूर करती हैं।
क्या सप्तशती का पाठ आवश्यक है
यह साधना को अत्यंत प्रभावशाली बनाता है इसलिए इसे अत्यंत शुभ माना जाता है।
इस साधना का प्रमुख लाभ क्या माना गया है
मनोकामना सिद्धि ग्रह दोष शांति मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति इसके प्रमुख फल हैं।
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